दूजे शहरों की तरह चित्तौड़गढ़ के साथ भी ऐसी ही कहानी है । - अपनी माटी Apni Maati

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दूजे शहरों की तरह चित्तौड़गढ़ के साथ भी ऐसी ही कहानी है ।


चित्तौड़गढ़ का शैक्षिक परिदृश्य 
(ये आलेख मूल रूप से राजस्थान के प्रमुख समाचार पत्र  सुनहरा राजस्थान के अंक में छापा गया है।जिसे पाठक हित में यहाँ साभार छाप रहे हैं।-सम्पादक )

किसी भी शहर के सर्वांगीण विकास का ध्यान और उसकी विवेचना मन में आते ही कई तरह के आयाम मन में उमड़ पड़ते हैं । कभी हमें शहर के अतीत के हालात याद आते हैं तो कभी भविष्य में लगातार बढ़ती जा रही भागादौड़ी की जिन्दगी सोचने पर मजबूर करती है । दूजे शहरों की तरह चित्तौड़गढ़ के साथ भी ऐसी ही कहानी है । देश के आजादी के बाद भी लगभग तमाम दूसरे कस्बाई शहरो की तरह यहाँ का विकास भी बहुत ठीक स्थिति में नहीं जान पड़ता है । किसी भी दौर के अगले कई सालों का विकास जिस रीढ़ पर निर्भर है वो है शहर का शैक्षिक परिदृश्य । समय के साथ अभिभावकों की जागरूकता बढ़ी है, स्कूलों-कोलेजों की संख्या में इजाफा हुआ है । मगर परिणाम अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं दिखते हैं, ऐसे में वर्तमान परिदृश्य पर एक शोधपरक चिन्तन करने और उस पर खासा ध्यान दिये जाने की जरूरत अनुभव हुई है । 

जहाँ पूरे देश में एक जैसी शिक्षा प्रणाली लागू हुई है । ऐसे में चित्तौड़गढ़ शहर उससे अछूता नहीं है । शहर में केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड़ से जुड़े 6 संस्थान हैं जबकि राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड़ से सम्बद्ध संस्थानों की संख्या का बहुत बड़ा हिस्सा हमारे समाज में है । प्रतियोगिता के इस युग में सभी संस्थान अपने सर्वांगीण प्रयासों के परिणाम स्वरूप स्वयं संस्थान के साथ-साथ शहर का नाम ऊंचा करने में लगे हुए हैं । स्कूलों के इस समाज में शहर में केन्द्रीय विद्यालय का खुलना भी अच्छी खबर है । स्कूलों से निकली पीढ़ी के लिए भले कोलेजों की संख्या पर्याप्त नहीं है । फिर भी मध्यम कद काठी और पढ़ाई के मध्यम दर्जे के विद्यार्थियों के लिए तो पर्याप्त जान पड़ती है । राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रवेश परीक्षाओं को देखते हुए स्तरीय कोचिंग संस्थानों का अभाव भी मन को खलता है । 

प्रदेश में जहाँ निजी विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ निजी शिक्षण संस्थानों से जुड़ी प्रबन्धन समितियों में भले इजाफा हुआ हो मगर फिर भी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत किया जाना बाकी लगता है। प्रदेश की राजधानी के अलावा अब ऐसा लगने लगा है कि जोधपुर और खासकर शेखावटी क्षेत्र में शिक्षा को लेकर पिछले कुछ सालों में बहुत तेजी से सकारात्मक और गुणात्मक बदलाव आया  है । उदयपुर संभाग के पूरे विकास में चित्तौड़गढ़ का निचले पायदान पर आना हमें सोचने पर मजबूर करता है । अब तलक के सफर में मात्र एक विश्वविद्यालय और गिनती के उच्च शिक्षण संस्थानों के बाद स्तरीय और गुणात्मक शिक्षा देने वाले स्कूली शिक्षण संस्थानों की संख्या अपर्याप्त ही है । समय के अनुसार हमारे इस दौर को सही तरीके से आंकने को कहा जाय तो आपको इस आलेख में हमारी नजर इस शैक्षिक परिदृश्य को बहुत कमजोर साबित करती हुई लगेगी । सच्चाई यह है कि आज इस  इलाके  के गवई परिक्षेत्र को ध्यान में रखकर यहां के शिक्षण संस्थानों में किसी तरह के कोर्सेज उपलब्ध नहीं है । मसलन फलो उत्पादन, कृषि विज्ञान, फैशन डिजाइनिंग, फूड प्रोसेसिंग । 

प्रदेश के लगभग दक्षिणी क्षेत्र चित्तौड़गढ़ में यह तथ्य भी बड़े साफ तरीके से उभरे हैं कि यहां मेडिकल, प्रबन्धन, पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई ढंग ढांग के संस्थान नहीं है । कई मर्तबा ऐसा भी लगता है कि समय के साथ सबसे जरूरी करिअर गाईडेंस(निर्देशन) जैसे कॉन्सेप्ट से यहां के विद्यार्थी और अभिभावक अनभिज्ञ ही है । विषयों और संस्थाओं के चयन को लेकर विद्यार्थी पेशोपेश में ही पड़े रहते हैं । बीते सालों में अखबारी कतरनों में कई बार जाना कि हमारे यहां का टेलेंट सीए और सीएस जैसे क्षेत्र में आशा से अधिक परिणाम देने वाली पौध के रूप में उभरा है । मगर अफसोस उन्हें इस उपलब्धि के लिए दूजे महानगरों का सम्बल लेना पडा है । हमें लगता है शहर के लिए असल रूप में चिन्ता करने वाले राजनेता, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ताओं को शिक्षा के क्षेत्र में संख्यात्मक वृद्धि के साथ-साथ गुणात्मक वृद्धि की ओर ध्यान देना चाहिए । समय के साथ मध्यमवर्गीय ओर गरीब परिवारों के बच्चों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है लेकिन अपर्याप्त छात्रवृति और सीटों के अभाव में शहर के राजकीय शिक्षण संस्थानों से रोजगारोन्मुखी शिक्षा पाने के इच्छुक विद्यार्थियों को कई बार निराशा हाथ लगी है । सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का कुछ कम प्रचार प्रसार भी देहाती विद्यार्थियों का आंशिक रूप से ही कल्याण कर पाया है । इन सभी बातों के बीच गांव से शिक्षा अर्जन हेतु शहर आये विद्यार्थियों की अधपकी मानसिकता और अपर्याप्त निर्देशन एक ओर चिन्ता का विषय है । कुल मिलाकर चित्तौड़गढ़ के शैक्षिक विकास को लेकर बहुत किया जाना बकाया है । 

शिक्षा में नवाचारों की वकालत के चलते यहां भी अनिवार्य बाल शिक्षा अधिनियम का असर दिखने लगा है सरकारी नियमों के क्रियान्वयन के चलते खासकर निजी शिक्षण संस्थाओं द्वारा स्कूली शिक्षा में निचले तबके के लोगों के हित संस्थान और संबंधित प्रबन्धन समितियां पर्याप्त रूप से उत्साहित है । मगर निराशाजनक स्थिति यह है कि अभी भी सरकार द्वारा अधिनियम के सभी नियमों में काफी कुछ खुलासे करना बाकी है । इस अधिनियम के बहाने सरकार की मंशा के ठीक-ठीक परिणामों का अन्दाजा लगाये तो ऐसा लगता है आने वाले वक्त में शिक्षण संस्थानों की प्रभावशाली अध्ययन विधियों का फायदा आर्थिक रूप से पिछडो को भी मिल सकेगा । राज्य के लगभग शान्त कहे जाने वाले इस इलाके में सरकारी और प्राइवेट नौकरियों के प्रति यहां के युवाओं में ललक तो है लेकिन उसे प्राप्त करने हेतु की जाने योग्य मेहनत, लगन और धैर्य कम ही देखा गया है । एक जागरूकता पूर्ण माहौल के निर्माण के लिए ऐसा लगता है हमें क्षेत्रीयता के आधार पर भी मेवाड़ के इस दबे हुए हलके को दिमाग में रखना होगा ।

शहर के शैक्षिक परिदृश्य में समय के साथ बदलते शिक्षा माध्यमों में दूरस्थ शिक्षा के नाम पर स्टेट ओपन स्कूल में ही ठीक संख्या में दाखिले हो पा रहे हैं । कोलेज के स्तर पर वर्धमान विश्वविद्यालय कोटा और इग्नू दिल्ली से जुड़ी समुचित और सन्तोषप्रद सेवाएं शहर में उपलब्ध नहीं   है । इसके अलावा भी यदि इस क्षेत्र में सरकारी और निजी स्तर पर कुछ जागरूकता लायी जाये तो युवाओं को अपने रोजगार के साथ-साथ दूरस्थ शिक्षा जैसे सुगम रास्ते से अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने का अवसर मिल पायेगा । 

शहर के ऐतिहासिक अतीत का भान होते ही हमें एकदम से अहसास होता है कि हमारा शहर आज भी पर्यटन, होटल प्रबन्धन और हस्त कलाओं से जुडे हुए कोर्सेज का शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किसी मुफीद संस्थान के खुलने की प्रतीक्षा में है । शहर के साथ-साथ आस पास साल दर साल बढ़ते सीमेंट उत्पादन संस्थानो और अन्य औद्योगिक इकाईयों की मांग चलते हम प्रशिक्षित और योग्य युवा तैयार नहीं कर पा रहे हैं इसके पीछे भी हमारे अपने इलाके में नवाचारी प्रवृति और संसाधन सम्पन्न उच्च संस्थानों की कमी ही है । 

सार रूप में हमने शहर के बारे में अधिकांश रूप से नकारात्मक ही कहा है इसका कारण अब तक के विकास को नकारना नहीं होकर उसे आईना दिखाना ही समझ रहे हैं । हम सभी मिलकर यदि समय रहते कुछ विचार नहीं करेगें और सामलाती चौंतरे पर बैठकर कुछ कदम नहीं उठायेगें तो आने वाली पीढ़ी अपनी कम उपजाऊ बुद्धि और विकट समय में हार मान लेने वाली योग्यता के लिए हमें ही कोसेगें ।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

अश्लेष दशोरा
मूल रूप से विज्ञान के विद्यार्थी हैं ।
युवा हैं,विचारवान है,रंगमंच,कविता के करीब हैं।
फिलहाल सेन्ट्रल एकेडमी सीनियर सैकण्डरी स्कूल के प्राचार्य   हैं।
नगर की संस्था जेसीस और स्पिक  मैके से जुडाव हैं.।
यूनिक सदन,सेंती,चित्तौड़गढ़ पर संपर्क किया जा सकता है ।
akd.dashora@gmail.com
M-9414097946

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