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भाषा या तो वैकल्पिक है या परिणाम निर्धारण में गौण

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, मई 05, 2012 | शनिवार, मई 05, 2012


संस्कृति की चर्चा करते समय हम सामान्यतः किसी देश या समाज के लोगों की भाषा, साहित्य, संगीत, नृत्य, कला, चरित्र, जीवन दर्शन आदि के बारे में सोचते हैं। यदि हम भारतीय समाज के संदर्भ में पिछले कुछ दशकों में इन तत्त्वों में आने वाले परिवर्तनों की समीक्षा करें तो हमारे लिए शायद उस सांस्कृतिक क्षरण का कुछ अनुमान लगाना संभव होगा जो हमारे समाज में इस काल में हुआ है।

सबसे पहले हम भाषा को लें। यह बहुत पहले की बात नहीं है, जब हमारे यहां किसी पढ़े लिखे आदमी की भाषा में उच्चारण या वर्तनी संबंधी ज़रा सी भूल से ही दूसरे पढ़े-लिखे लोगों की त्यौरियां चढ़ जाती थी। किन्तु आज अशुद्ध भाषा का प्रयोग करने वाले स्नातकों के किस्से हमारे यहां आम हो गए हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे अधिकांश नेताओं का भाषा पर उल्लेखनीय अधिकार था और वक्तृत्व व लेखन द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित कर सकने की उनमें ज़बरदस्त क्षमता थी, जबकि हमारे आज के नेतृत्व में बिरले ही लोग ऐसे हैं, जिनमें भाषा को प्रभावोत्पादक रूप से इस्तेमाल कर सकने की हमारे इन पूर्ववर्ती नेताओं जैसी क्षमता हो। 
 
भाषा के प्रति आज न केवल हमारे समाज ने बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने भी उपेक्षा व उदासीनता का रुख अपना लिया है। पुरानी उदार (लिबरल) शिक्षा की तुलना में विज्ञान, तकनीकी या व्यावसायिक शिक्षा को अधिक महत्त्वपूर्ण मानने के साथ ही जैसे यह भी स्वीकार कर लिया गया है कि किसी शिक्षित व्यक्ति को अपना काम चलाने के लिए भाषा पर अधिकार प्राप्त करने की बहुत आवश्यकता नहीं होती। स्कूल व कॉलेज स्तर की कई महत्त्वपूर्ण परीक्षाओं  में  भाषा  को  या तो अब वैकल्पिक बना दिया गया है या फिर उनके परिणाम निर्धारण में भाषा संबंधी उपलब्धि को किसी न किसी रूप में गौण मान लिया गया है। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक ही है कि आज के छात्र अपनी भाषा की बहुत परवाह करना बंद कर दें।

साहित्य का प्रश्न भी उसके व्यापक अर्थ में सीधे-सीधे भाषा से जुड़ा है क्योंकि भाषा के माध्यम से ही किसी व्यक्ति की पैठ साहित्य, दर्शन, राजनीति, मनोविज्ञान, कला, धर्म, कानून, समाजशास्त्र आदि क्षेत्रों की विभिन्न सूक्ष्म व  अमूर्त अवधारणाओं तक हो पाती है। भाषा का सेतु कमज़ोर होने पर लोगों का सूक्ष्मतर  व जटिलतर विचारों व अवधारणाओं तक पहुंच पाना कठिन हो जाता है। इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि आज किसी भी विषय के गम्भीर पाठकों की संख्या हमारे यहां तेज़ी से गिरती जा रही है। अच्छी साहित्यिक पत्रिकाएं हमारे यहां थोड़े समय चल कर बंद हो जाती हैं। कवि सम्मेलनों में अब अधिकांश श्रोता केवल सामाजिक व्यंग्य या चटपटे हास्य के अलावा अन्य काव्य-रसों का आनन्द ले सकने की सामर्थ्य खोते जा रहे हैं। गल्प में भी सामान्य पाठक की रुचियां सेक्स, हिंसा, राजनीति व रहस्य तक सीमित होती जा रही हैं।

   समकालीन सिनेमा पर यदि नज़र डालें तो हम पाते हैं कि जहां फ़िल्मों की विषय वस्तु में पहले काफ़ी वैविध्य हुआ करता था, वहां आज इनके विषयों का दायरा क़ाफी छोटा होता जा रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बहुत समय बाद तक भी जहां पहले धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, पारिवारिक व कलात्मक थीमों पर बनी फ़िल्में अपने वैचारिक व भावनात्मक वैविध्य के कारण बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित कर लेती थीं, वहां सेन्सर की बढ़ती ढील और फ़िल्म निर्माताओं की बढ़ती हुई मुनाफ़ाखोरी की प्रवृत्ति के कारण अब अधिकांश फ़िल्में सेक्स और हिंसा का अधिकाधिक खुला व अनैतिक प्रदर्शन करने लगी हैं और इस तरह वे दर्शकों की संवेदनाओं को अधिकाधिक कुंद कर रही हैं। आजकल की इन लोकप्रिय फ़िल्मों में हम न कोई महत्त्वपूर्ण संदेश पाते हैं और न ही ये किसी गंभीर सत्य को उजागर करने की कोशिश करती प्रतीत होती हैं। यथार्थ के नाम पर येे फ़िल्में जहां अच्छाई को बुराई के आगे पराजित होता दिखा कर आम दर्शक के मनोबल को कमजोर करती हैं वहीं किसी स्पष्ट नैतिक मापदंड के अभाव में इनके नायकों व खलनायकों में भेद अब लगभग समाप्त सा होता जा रहा है। समकालीन सिनेमा के सन्दर्भ में सामान्य दर्शक की समझ व रुचियों  का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जो फ़िल्म आज कोई राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने में सफल होती है, वह बॉक्स ऑफ़िस पर अक्सर ही पिट जाती है। इसका एकमात्र अपवाद केवल वे चन्द फ़िल्में हो सकती हैं, जिनमें सेक्स व हिंसा के सेन्सर किए जाने लायक दृश्यों की भी भरमार हो। मंचीय कलाओं के प्रति भी हमारे युवाओं में आज पहले सा आकर्षण बमुश्किल ही देखने को मिलता है। थिएटर और उसके प्रति रुचि व प्रयोगधर्मिता अब केवल बड़े शहरों तक सीमित होती जा रही है। यही बात बहुत कुछ संगीत-नृत्य आदि अन्य मंचीय कलाओं पर भी लागू होती है। 

इस संदर्भ में यदि हम अपने उन बहुत से राजकीय स्कूलों व कॉलेजों की गतिविधियों पर गौर करें, जहां कि आज नई पीढ़ी के बहुत से छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं तो इससे भी हमें आज के सांस्कृतिक वातावरण का कुछ अनुमान हो जाएगा। हम जानते हैं कि हर शिक्षण संस्था पहले अपने वार्षिकोत्सव पर अभिनय, संगीत व नृत्य के कुछ नए और भली भांति तैयार किए हुए  कार्यक्रम सार्वजनिक मनोरंजन के लिए प्रस्तुत करना और इनके माध्यम  से छात्र-छात्राओं की कला प्रतिभा को प्रोत्साहित करना अपना आवश्यक कर्त्तव्य समझती थी। अधिकांश शिक्षण संस्थाओं में अब ये वार्षिकोत्सव महज एक औपचारिकता बनते जा रहे हैं। आत्म-प्रदर्शन चूंकि युवाओं का सहज व नैसर्गिक गुण है, बहुत से युवा छात्र-छात्रा आज भी इसके लिए मंच पर आने के इच्छुक रहते हैं, किन्तु पर्याप्त नियंत्रण व मार्गदर्शन के अभाव में वे इन अवसरों पर आजकल अक्सर किन्हीं बहुप्रचलित तेज़ धुनों पर कोई सस्ते से नृत्य या अभिनय के नाम पर किन्हीं फिल्मी दृश्यों या संवादों की कोई भोंडी सी नकलें प्रस्तुत कर देते हैं। शास्त्रीय संगीत की समझ और अभ्यास तो दरकिनार, अब सुगम संगीत में भी किसी गम्भीर व हृदयस्पर्शी भाव को व्यक्त करने वाले गीतों के सुधी श्रोता आज हमारी इन शिक्षण संस्थाओं में मुश्किल से ही मिल पाएंगे। 

समझदार आयोजकों के अभाव में अनेक शिक्षण संस्थाएं तो आज ऐसी किसी आर्केस्ट्रा पार्टी आदि को भी अपने मंच पर बुलाने में संकोच नहीं करती जो मादक व उत्तेजक किस्म के पॉप-संगीत से उनके युवा छात्र-छात्राओं का मनोरंजन कर सके। सुरुचि संपन्नता एवं सांस्कृतिक परिष्कार से शून्य आजकल के अधिकांश दर्शकों-श्रोताओं से गम्भीर चीज़ों का आनन्द लेने के लिए अपेक्षित मनोयेाग व अनुशासन की भी उम्मीद नहीं की जा सकती। भावपूर्ण अभिनय, कलात्मक नृत्य और शास्त्रीय संगीत के संबंध में किसी प्रकार की गहरी समझ की हमारी युवा पीढ़ी में आज ज़बरदस्त कमी आती जा रही है। हमारी शिक्षण संस्थाओं पर यह एक दुःखद टिप्पणी है कि उनमें कोई भी सांस्कृतिक आयोजन आजकल सामान्यतः पुलिस आदि के इंतजाम के बग़ैर नहीं करवाए जा सकते। अनेक शिक्षण संस्थाएं तो सांस्कृतिक कार्यक्रमों को अब उच्छृंखलता व अनुशासनहीनता को निमंत्रण देने जैसा मानकर यथासम्भव उनसे बचने का प्रयत्न करती हैं। इस सिलसिले में यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि दस बारह वर्ष पूर्व राजस्थान शिक्षा के एक उच्च पदाधिकारी ने स्कूलों की ज़िला स्तरीय साहित्यिक व सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं को अनावश्यक सिरदर्द समझ कर एक आदेश द्वारा समाप्त ही करवा दिया। नतीजा यह हुआ कि खेलकूद आदि शाला की जिन अन्य सह-शैक्षणिक गतिविधियों में जिला स्तरीय प्रतियोगिताएं पूर्ववत् जारी रहीं उनकी ओर तो शाला प्रधान ध्यान देते रहे, किन्तु इस आदेश के बाद पर्याप्त अभिप्रेरण के अभाव में उन्होंने अपनी संस्था की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों की ओर ध्यान देना लगभग बंद सा कर दिया।  इस तरह काव्य-पाठ, वक्तृता, संगीत, नृत्य आदि में विशिष्ट प्रतिभा सम्पन्न छात्र-छात्राओं की खोज व प्रशिक्षण तथा श्रेष्ठ साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन  द्वारा विद्यार्थियों की रुचियों के परिष्कार के जिस दायित्व का निर्वाह ये शिक्षण संस्थाएं काफ़ी लम्बे समय से करती आ रही थीं वह जैसे अचानक ही ग़ैर ज़रूरी मान लिया गया। 

हमारे समाज की वे लोक कलाएं और वह लोक संगीत, जो कई पीढ़ियों से स्त्री-पुरुषों के जे़हन और उनके कंठों में बसता था अब धीरे-धीरे अभिलेखागारों में संग्रह की सामग्री बनता जा रहा है। आज की पढ़ी लिखी स्त्रियां शादी-ब्याह या उत्सव त्यौहारों के लिए रचित पारंपरिक लोक गीतों की जानकारी व प्रयोग को उनके पिछड़ेपन का लक्षण मानती हैं। गरबे या गणेशोत्सव जैसे मूलतः धार्मिक प्रकृति के गीत या नृत्य समारोहों का भी जो नया मादक व उत्तेजक स्वरूप इन दिनों विकसित होता जा रहा है, वह तेज़ी से उनके पारंपरिक चरित्र को नष्ट कर रहा है। रंगोली, मेंहदी आदि जिन लोक कलाओं से युवतियां परम्परागत रूप से एक रागात्मक व सृजनात्मक आत्मीय जुड़ाव अनुभव करती थीं उनका लक्ष्य भी आज की पीढ़ी के लिए मात्र सार्वजनिक प्रदर्शन व प्रतियोगिताओं द्वारा पुरस्कार व प्रशंसा अर्जित करना होता जा रहा है। 

     साहित्य, संगीत व नृत्य आदि कलाओं की गहरी और लम्बी साधना तथा अपने जीवन को उनके लिए पूरी तरह समर्पित कर देने के उदाहरण भी आज बिरले ही देखने को मिलेंगे। संगीत और कला के क्षेत्र में उन गुरुओं की भी अब कमी आती जा रही है जो अपनी कला के व्यवसायीकरण द्वारा अर्जित किन्हीं भौतिक उपलब्धियों के बजाय उन पर सम्पूर्ण अधिकार द्वारा कोई अलौकिक या जादुई प्रभाव उत्पन्न कर सकने को अपने जीवन की चरम सिद्धि के रूप में देखते थे। 

टीवी जैसे शक्तिशाली दृश्य मीडिया भी उनकी सामर्थ्य का उपयोग आज दर्शकों का स्वस्थ व परिष्कृत मनोरंजन करने के बजाय बाज़ार बलों के हाथों दर्शकों का अनुचित दोहन करवाने में लगे हैं। टीवी के हर मनोरंजन कार्यक्रम को आज नाना प्रकार की पण्य वस्तुओं के विज्ञापन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। बाज़ार का हमला आज दर्शकों के यौन आकर्षण तक ही सीमित न रहकर उनकी अधिक गहरी धार्मिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक भावनाओं तक पर होने लगा है। टीवी के विज्ञापन अब मां के वात्सल्य की तुलना साबुन से मिलने वाली सुरक्षा से करने लगे हैं और भक्ति व वंदना के संदर्भ में न केवल जन-मन में प्रतिष्ठित कोई देवमंत्र बल्कि किसी डिटर्जेण्ट का नाम भी अविकल रूप से सुनाई देता है। 

मानवीय गुणों के सौन्दर्य व परिष्कार को आज यदि हम अपने यहां के आम आदमी के आचरण व व्यवहार में देखने की कोशिश करें, तब भी हमारे हाथ निराशा ही लगेगी। लोगों का सामान्य आचरण आज दूसरों के प्रति कितना नैतिक, मानवीय, दयापूर्ण तथा उदारतापूर्ण रह गया है यह किसी से छिपा नहीं है।सच्चाई, स्वाभिमान और उत्सर्ग का स्थान आज तेज़ी से झूठ, अपमान और स्वार्थपरता लेते जा रहे हैं। किसी महिला को बस में खड़े देखकर अपनी जगह उसे दे देने का परम्परागत शिष्टाचार आज कई तरह के कारणों से हमारे देखते-देखते समाज से तिरोहित हो गया है। भ्रष्टाचार या बेईमानी से अपनेे स्तर पर कोई संघर्ष करने के बजाय लोग आजकल ‘सब ऐसे ही चलता है‘ या ‘सब पैसे का खेल है‘ कहकर चुपचाप किसी तरह अपना काम निकलवाने की कोशिश करते हैं।

इन्द्रियनिग्रह की जगह भोगवाद, उत्सर्ग एवं अपरिग्रह की जगह अधिकाधिक व्यक्तिगत भौतिक समृद्धि, सार्वजनिक कल्याण व परोपकार की जगह स्वार्थपरता और गंभीर ज्ञान व साधना की जगह तात्कालिक सफलता के मूल्य हमारे समाज में अब दृढ़ता से अपनी जड़ें जमाते जा रहे हैं। भारतीय दार्शनिक परम्परा के अनुसार मानव जीवन को दुर्लभ मानकर उसका उपयोग किसी लोकेतर या उच्चतर लक्ष्य के लिए करने के बजाय अधिकांश लोग अब उसके प्रति एक नितान्त भौतिकवादी व भोगवादी दृष्टिकोण अपनाने लगे हैं और उसकी सार्थकता जब तक संभव हो, उसके द्वारा  अधिकाधिक शारीरिक सुख व ऐन्द्रिक आनन्द प्राप्ति में मानने लगे हैं।

    हमारे नेता और निर्वाचित जन प्रतिनिधि सत्ता और सम्पत्ति पर अधिकार के लिए अविश्वसनीयता, अनैतिकता, अनुशासनहीनता व सिद्धान्तहीनता के आए दिन एक से एक नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। लोगों की आत्मकेन्द्रितता इस कदर बढ़ रही है कि वे संयुक्त परिवार, संस्था या राष्ट्र के व्यापक कल्याण के  बारे में सोचने के बजाय अब केवल अपने एकल परिवार के कल्याण या उससे भी एक कदम आगे बढ़ कर केवल अपने व्यक्तिगत कल्याण व स्वार्थ सिद्धि के बारे में सोचते हैं। व्यापक जनहित, सार्वजनिक कल्याण या मानवीय कमज़ोरियों पर विजय प्राप्ति जैसी अवधारणाएं वस्तुतः आज की नई पीढ़ी के लिए अपरिचित सी होती जा रही हैं। शहरों में आम आदमी इतना हृदयहीन होता जा रहा है कि किसी इन्सान को सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त होते देख कर वह सामान्यतः उसकी सहायता के लिए दौड़ने के बजाय किसी तरह आंख बचा कर दुर्घटनास्थल से नौ दो ग्यारह हो जाने की सोचता है।

प्रकृति व धरती पर निवास करने वाले अन्य प्राणियों के प्रति भी लोग आज अधिकाधिक निर्दय व असंवेदनशील होते जा रहे हैं। आर्थिक विकास के नाम पर आज भूमि की हरियाली मिटाकर उसे अधिकाधिक नंगा किया जा रहा है। किसी राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर पड़ने वाले हर प्राकृतिक दृश्य के आगे आज हमें किसी पण्य वस्तु का कोई बड़ा सा विज्ञापन लगा हुआ दिखाई देता है। लोग आज न केवल प्रकृति के उस चिर परिचित सौन्दर्य व संगीत से दूर होते जा रहे हैं, जो रूप-रंग-ध्वनि के नानाविध संयोजनों द्वारा सदा से मानव मन को लुभाता रहा है बल्कि शहरों के विस्तार के साथ ही वे आज अधिकाधिक कुरूपता, गंदगी, अव्यवस्था, अमानवीयता व  प्रदूषण के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। विभिन्न ऋतुओं में मानव मन के सहज आजन्द को अभिव्यक्त करने वाले गीत, नृत्य, चित्र एवं राग-रागिनियां इसीलिए अब इन लोगों के लिए बेगाने और बेमतलब होते जा रहे हैं। उत्कृष्ट काव्य का जो स्पर्श पहले हम तरह-तरह के गीतों-गज़लों, मंत्रों-स्तुतियों, भजनों-कव्वालियों व मुशायरों-कवि सम्मेलनों के रूप में अपने इर्द-गिर्द निरंतर महसूस करते थे, उसका स्थान अब विभिन्न प्रकार की विज्ञापन धुनें और काव्य दृष्टि से अर्थहीन व निम्नस्तरीय पॉप गीत लेने लगे हैं।

देश की बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ ही लोगों के लिए जीने का संघर्ष तीव्र से तीव्रतर होता जा रहाहै। हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा आज इतनी बढ़ती जा रही है कि लोगों के पास अब वह फ़ुर्सत ही नहीं बची है, जिसे वे साहित्य, संगीत व कलाओं की साधना में लगा सकें। आज माता-पिता को अपनी संतान के व्यक्तित्व के संतुलित व बहुआयामी विकास से अधिक चिंता उसके पर्याप्त धनोपार्जन में सफल हो जाने की रहती है। मुनाफ़े और व्यावसायिकता के बाज़ार मूल्य आज न केवल पारिवारिक वरन साहित्यिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी अपना असर दिखाने लगे हैं। अपने बच्चे-बच्चियों को शास्त्रीय संगीत या नृत्य का प्रशिक्षण दिलवाने वाले माता-पिता आज चंद महीनों में ही उन्हें मंच पर देखने की इच्छा करने लगते हैं। ज्ञान व कला के मार्ग को अपनाने वाले लोग उन पर अधिकार प्राप्त करने  या उनकी गहराई में उतर पाने से पहले ही उन्हें किसी अन्य भौतिक उपलब्धि के लिए भुना सकने की फ़िक्र करने लगते हैं।

यांत्रिक अनुकृति की सहज उपलब्धि ने भी सांस्कृतिक क्षेत्र में आज सृजनात्मकता व मौलिकता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। टेलीफोन के बढ़ते प्रयोग ने पत्र-लेखन द्वारा किए जाने वाले गंभीर संवाद या वैचारिक आदान-प्रदान पर अपना असर डाला है। यांत्रिक विकास भविष्य में हमारे यहां किस तरह के अच्छे-बुरे सांस्कृतिक परिवर्तनों  को जन्म देगा, इसका अभी से अनुमान लगा पाना हमारे लिए संभव नहीं रह गया है। 

इस संदर्भ में हमारे ग़ौर करने की बात यह है कि किसी भी संस्कृति के कला, साहित्य, दर्शन आदि तत्त्व शून्य में नहीं पनपते। विकास के लिए उन्हें उपयुक्त ज़मीन और वातावरण भी चाहिए। इसके लिए उन्हें न केवल प्रतिभा सम्पन्न शिष्य व विद्वान गुरु चाहिए, बल्कि अनुशासित श्रोता,  परिष्कृत रुचि सम्पन्न दर्शक व सुधी पाठक भी चाहिए। कद्रदानों की पर्याप्त संख्या के अभाव में किसी भी संस्कृति का यथेष्ट विकास संभव नहीं है। 

सवाल यह है कि राष्ट्रीय विकास के नाम पर क्या हम केवल भौतिक उपलब्धियों को ही अपना लक्ष्य बनाएंगे और अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को धीरे-धीरे नष्ट हो जाने देंगे जिसके नाम पर  हम देश-विदेश में अनेक पर्यटन मेले और भारत उत्सव आयोजित कर दुनिया भर के लोगों की प्रशंसा अर्जित करने का प्रयत्न करते रहते हैं? मानव जीवन के श्रेष्ठतम आनन्द से, जो कि व्यक्ति के स्वयं के आत्मिक और सांस्कृतिक विकास पर मुनहसिर है, क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को पूर्णतः वंचित कर देना चाहते हैं? अधिकाधिक भौतिक सिद्धि और समृद्धि की ओर अग्रसर साहित्य-संगीत-कला विहीन भारतीय नागरिक को क्या हम धीरे-धीरे बिना सींग-पूंछ के पशु में बदल जाने देंगे। 

    हमें यह तय करना होगा कि हम साहित्य, कला व संस्कृति का उपयोग केवल कुछ बड़े लोगों की चाटुकारिता के लिए करना चाहते हैं, उन्हें व्यावसायिक बलों के हाथों में सौंप कर किसी भी सीमा तक विकृत हो जाने देना चाहते हैं, अथवा उनके माध्यम से जन रुचियों को परिष्कृत कर हमारे जन जीवन को सांस्कृतिक दृष्टि से अधिक समृद्ध बनाना चाहते हैं? यदि हम उनका उपयोग इस अंतिम उद्देश्य के लिए करना चाहते हैं तो हमें योजनाबद्ध तरीके से इस दिशा में कोई सार्थक प्रयत्न करना होगा तथा केवल व्यवसायीकरण से प्रेरित होकर पण्यता वृद्धि के  लिए उनके स्तर में लाई जाने वाली गिरावट को रोकना होगा।

ऑडियो, वीडियो व प्रचार-प्रसार की विभिन्न तकनीकों के विकास ने आज हमारे हाथ में इतने शक्तिशाली साधन दे दिए हैं कि उनके सही प्रयोग से हमारी युवा पीढ़ी की साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचियों का परिष्कार पहले की तुलना में आज काफ़ी सरल हो गया है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम इसके लिए एक कल्पनापूर्ण योजना बना कर उस पर निष्ठा व ईमानदारी से अमल करें। हमारे समाज में बढ़ती हुई अराजकता, अनुशासनहीनता, हिंसा, अमानवीयता और असंवेदनशीलता पर यदि हम अंकुश लगाना चाहते हैं तो हमें आज अपनी संस्कृति के इन विभिन्न तत्त्वों का महत्त्व समझ कर इन्हें अपने व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में उपयुक्त स्थान देना होगा।  

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो.08290479063,ई-मेल
(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से      रचनाकाल: जुलाई, 1998   में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )

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