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बातचीत:अनुवाद एक तरह का पुनर्सृजन है

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, जून 13, 2012 | बुधवार, जून 13, 2012

जीवन सिंह 

भारतीय अनुवाद परिषद के द्विवागीश पुरस्कार,राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर के प्रथम अनुवाद-पुरस्कार तथा देश की विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत  डा0 शिबन कृष्ण रैणा से  डा0 जीवन सिंह की अनुवाद की प्रक्रिया एवं अनुवादकला पर विस्तृत बातचीत । 


प्रश्न :  दूसरे कर्मों के इतिहास की तरह अनुवाद-कर्म का भी एक विश्व-इतिहास है।इस इतिहास पर कुछ प्रकाश डालिए।

उ0  :  मेरी समझ में जब से मनुष्य ने वाणी का व्यवहार करना सीखा,अनुवाद की संकल्पना तभी से साकार हुई।दूसरे शब्दों में कहें तो भाषा के आविष्कार के बाद जब मनुष्य-समाज का विकास-विस्तार होता चला गया और सम्पर्कों एवं आदान-प्रदान की प्रकिzया को और अधिक फैलाने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी,तो अनुवाद ने जन्म लिया।घ्यान से देखें तो अपनी बात को कहने के लिए मनुष्य अपने भावों विचारों को स्व-भाषा में रूपांतरित अनुवादित ही तो करता है।किसी भी तरह के वाणी-व्यवहार में वक्ता के मस्तिष्क में हर स्तर पर अनुवाद-प्रकिzया चलती रहती है।प्रारम्भ में अनुवाद की परंपरा निश्चित रूप से मौखिक ही रही होगी।इतिहास साक्षी है कि प्राचीनकाल में जब एक राजा दूसरे राजा पर आक्रमण  करने को निकलता था,तब अपने साथ ऐसे लोगों को भी साथ लेकर चलता था जो उसके लिए दुभाषिए का काम करते थे।यह अनुवाद का आदिम रूप था।साहित्यिक गतिविधि के रूप में अनुवाद को बहुत बाद में महत्व मिला।दरअसल,अनुवाद के शलाका पुरुष वे यात्री रहे हैं, जिन्होंने देशाटन के निमित्त विभिन्न देशों की यात्राएं की और जहां-जहां वे गए,वहां-वहां की भाषाएं सीखकर उन्होंने वहां के श्रेष्ठ ग्रंथों  का अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद किया।चौथी शताब्दी के उत्तराद्र्ध में फाहियान नामक एक चीनी यात्री ने 25 वर्षों तक भारत में रहकर संस्कृत भाषा,व्याकरण,साहित्य,इतिहास,दर्शनशास्त्र आदि का अध्ययन किया और अनेक ग्रंथों की प्रतिलिपियां तैयार कीं। चीन लौटकर उसने इनमें से कई  ग्रंथों  का चीनी में अनुवाद किया।संस्कृत से किए गये ये चीनी अनुवाद जापान में छठी-सातवीं शताब्दी में पहुंचे और वहां जापानी में भी उनका अनुवाद हुआ।

प्राचीनकाल से लेकर अब तक अनुवाद ने कई मंझिलों तय की हैं। यह सच है कि आधुनिककाल में अनुवाद को जो गति मिली है, वह अभूतपूर्व है।मगर यह भी उतना ही सत्य है कि अनुवाद की आवश्यकता हर युग में,हर काल में तथा हर स्थान पर अनुभव की जाती रही है।विश्व में द्रुत गति से हो रहे विज्ञान और तकनालजी तथा साहित्य,धर्म-दर्शन,अर्थशास्त्र,राजनीतिशास्त्र आदि ज्ञान-विज्ञानों में विकास ने अनुवाद की आवश्यकता को बहुत अधिक बढ़ा दिया है।

प्रश्न अनुवाद के लिए आपने साहित्य की किन विधाओं को प्राथमिकता प्रदान की?
उ0 : मैंने मुख्य रूप से कश्मीरी, अंगरेजी और उर्दू से हिन्दी में अनुवाद किया है। साहित्यिक विधाओं में कहानी, कविता, उपन्यास, लेख, नाटक आदि का हिन्दी में अनुवाद किया है।


प्रश्न:   कश्मीरी से हिन्दी में अनुवाद-कर्म में संलग्नता का आपका प्रेरणा स्त्रोत  क्या रहा है?

उ0 : 1962 में कश्मीर विश्वविद्यालय से एम.ए. हिन्दी कर लेने के बाद मैं पी.एच.डी. करने के लिए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय आ गया तब कश्मीर विश्वविद्यालय में रिसर्च की सुविधा नहीं थी. यू.जी.सी. की जूनियर फैलोशिप पर ‘कश्मीरी तथा हिन्दी कहावतों का तुलनात्मक अध्ययन’ पर शोधकार्य किया। 1966 में राजस्थान लोक सेवा आयोग से व्याख्याता हिन्दी के पद पर चयन हुआ। कुछ समय के लिए भीलवाड़ा में और फिर लगभग दस वर्षों तक प्रभु श्रीनाथजी की नगरी नाथद्वारा के राजकीय कालेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में पदस्थापन हुआ। लिखने-पढ़ने, खास तौर पर अनुवाद करने के प्रति मेरी रुचि यहीं पर विकसित हुई। कालेज लाईब्रेरी में उन दिनों देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ - धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवनीत, कादम्बिनी आदि आतीं थीं।

इन में यदा-कदा अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अनुवादित कविताएँ,कहानियाँ,व्यंग्य आदि पढ़ने को मिल जाते। मुझे इन पत्रिकाओं में कश्मीरी से हिन्दी में अनुवादित रचनाएँ बिल्कुल ही नहीं या फिर बहुत कम देखने को मिलतीं। मेरे मित्र मुझसे अक्सर कहते कि मैं यह काम बखूबी कर सकता हूँ क्योंकि एक तो मेरी मातृभाषा कश्मीरी है और दूसरा हिन्दी पर मेरा अधिकार भी है। मुझे लगा कि मित्र ठीक कह रहे हैं। मुझे यह काम कर लेना चाहिए। मैं ने कश्मीरी की कुछ चुनी हुई सुन्दर कहानियों,कविताओं,लेखों,संस्मरणों आदि का मन लगाकर हिन्दी में अनुवाद किया। मेरे ये अनुवाद अच्छी पत्रिकाओं में छपे और खूब पसन्द किए गए। कुछ अनुवाद तो इतने लोकप्रिय एवं चर्चित हुए कि अन्य भाषाओं यथा कन्नड़, मलयालम, तमिल आदि में मेरे अनुवादों के आधार पर इन रचनाओं के अनुवाद हुए और उधर के पाठक कश्मीरी की इन सुन्दर रचनाओं से परिचित हुए। मैंने चूंकि  एक अछूते क्षेत्र में प्रवेश करने की पहल की थी, इसलिए श्रेय भी जल्दी मिल गया।

प्रश्न : आपके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण अनुवाद-कार्य से पाठक समुदाय को परिचित कराएं।

उ0 : मेरे द्वारा अनुवादित कृतियाँ , जिन्हें मैं अति महत्वपूर्ण मानता हूँ और जिनको आज भी देख-पढ़कर मुझे असीम संतोष और आनंद मिलता है, ‘कश्मीर की श्रेष्ठ कहानियाँ’ ¼राजपाल एण्ड संस दिल्ली, ‘ललद्यद’ अंगरेजी से हिन्दी में अनुवाद, साहित्य अकादमी, दिल्ली तथा ‘कश्मीरी रामायण : रामावतारचरित’ भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ  हैं। ‘कश्मीर की श्रेष्ठ कहानियाँ’ में कुल 19 कहानियाँ हैं। कश्मीरी के प्रसिद्ध एवं प्रतिनिधि कहानीकारों को हिन्दी जगत~ के सामने लाने का यह मेरा पहला सार्थक प्रयास है। प्रसिद्ध कथाकार विष्णु प्रभाकर ने मेरे अनुवाद के बारे में मुझे लिखा था- ‘ये कहानियाँ तो अनुवाद लगती ही नहीं हैं, बिल्कुल हिन्दी की कहानियाँ-जैसी हैं, आपने सचमुच मेहनत से उम्दा अनुवाद किया है।’

ललद्यद के अंगरेजी से हिन्दी में किए गए अनुवाद को मैं अपनी मेहनत का अनूठा प्रसाद मानता हूँ। जिसने भी पढ़ा, विभोर हो गया। ‘प्रकर’ अंक 12,वर्ष 13 ने मेरे अनुवाद के बारे में लिखा- ‘अनुवाद गज+ब का है। भाषा-शैली पुष्ट एवं प्रांजल! हिन्दी के पाठकों के लिए इस दुर्लभ सामग्री  को सुलभ कराकर रैणा जी ने बड़ा ही पुनीत एवं सार्थक कार्य किया है। यह पुस्तक शिक्षाविदों, इतिहासविदों, साधकों एवंसाहित्यकारों के लिए समान रूप से उपयोगी है।’पृ.34 मुझे याद है कि इस पुस्तक का अनुवाद करते समय इसके एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य को लक्ष्य भाषा में ढालने के लिए मुझे घंटों बिताने पड़े। मुझे सचमुच इस पुस्तक के अनुवाद को देखकर आज भी बड़ा हर्ष होता है। आँखों को विश्वास नहीं होता कि यह अनुवाद मैंने किया होगा!

कश्मीरी रामायण ‘रामावतारचरित’ मूल कवि प्रकाशराम रचनाकाल सन~ 1847 का मेरे द्वारा सानुवाद-देवनागरी-लिप्यंतरण भुवन वाणी ट्रस्ट लखनऊ  से 1975 में छपा है। लगभग 500 पृष्ठ  की इस रामायण से पहली बार हिन्दी जगत~ कश्मीर की लोकप्रिय रामायण ‘रामावतार चरित’ से परिचित हुआ। गzन्थ की सुन्दर प्रस्तावना डा. कर्णसिंह जी ने लिखी है। मेरे काम की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्होंने लिखा - ‘डा. शिबन रैणा ने अपने कठोर परिश्रम से मूल कश्मीरी भाषा की इस अनमोल निधि ‘रामावतार चरित’ का देवनागरी लिपि में लिप्यंतरण किया है और हिन्दी में सुन्दर अनुवाद भी, जो अपने आप में एक प्रशंसनीय कार्य है। मैं आशा करता हूँ कि रामायण के अकश्मीरी-भाषी भक्त एवं पाठक प्रस्तुत प्रकाशन से लाभान्वित होंगे।इस अनुवाद-कार्य ने मुझे काफी मान-सम्मान दिया।

मेरी अन्य अनुवादित पुस्तकें हैं - ‘कश्मीर की प्रतिनिधि कहानियाँ’’ देवदार प्रकाशन, दिल्ली, प्रतिनिधि संकलन : कश्मीरी भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, एक दौर बंसी निर्दोष के कश्मीरी उपन्यास का हिन्दी अनुवाद, हिन्दी विकासपीठ, मेरठ, हब्बाखातून अंगरेजी  से अनुवादित, साहित्य अकादमी, दिल्ली, कश्मीरी कवयित्रियां और उनका रचना-संसार हिन्दी बुक सेन्टर, दिल्ली, पैदाइशी गुलाम तथा अन्य कहानियाँ बंसी निर्दोष की चुनी हुई कहानियों का अनुवाद, राज प्रकाशन, दिल्ली, ‘शायर-ए-कश्मीर : महजूर प्रसिद्ध कश्मीरी कवि गुलाम अहमद महजूर की चुनी हुई कविताओं का हिन्दी अनुवाद, कल्चरल अकादमी, जम्मू व कश्मीर, जम्मू आदि। ‘कश्मीरी कवयित्रियां एवं उनका रचना-संसार’ में कश्मीरी की तीन कवयित्रियों, ललद्यद, हब्बाखातून एवं अरणिमाल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का सम्यक~ मूल्यांकन है तथा इन कवयित्रियों की चुनी हुई रचनाओं का हिन्दी अनुवाद सहित देवनागरी में लिप्यंतरण है। प्रस्तावना प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे ने लिखी है तथा ‘दो-शब्द’ स्वर्गीय राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा ने लिखे हैं।

उनके शब्दों में - ‘इस पुस्तक के माध्यम से डा. शिबन कृष्ण रैणा कश्मीर की तीन कवयित्रियों - ललद्यद, हब्बाखातून एवं अरणिमाल के भावलोक को पाठकों के सामने लाए हैं। इनकी रचनाओं को हिन्दी अनुवाद के साथ प्रस्तुत करके डा. रैणा ने एक महत्वपूर्ण काम किया है। इसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ ...।’



प्रश्न : अनुवाद की अपनी एक जटिल प्रकिzया होती है। इस प्रकिzया को आपने कैसे पूर्ण किया?इस बारे में कुछ बतलाइए।

उ0 : अनुवाद प्रक्रिया से तात्पर्य यदि उन सोपानों चरणों से है, जिनसे गुजर कर अनुवाद,अनुवादक अपने उच्चतम रूप में प्रस्तुत होता है, तो मेरा यह मानना है कि अनुवाद्य रचना के कथ्य,आशय को पूर्ण रूप से समझ लेने के बाद उसके साथ तदाकार होने की बहुत जरूरत है। वैसे ही जैसे मूल रचनाकार भाव,विचार में निमग्न हो जाता है। यह अनुवाद-प्रक्रिया का पहला सोपान है। दूसरे सोपान के अन्तर्गत वह ‘समझे हुए कथ्य’ को लक्ष्य-भाषा में अंतरित करे, पूरी कलात्मकता के साथ। कलात्मक यानी भाषा की आकर्षकता, सहजता एवं बोधगम्यता के साथ। तीसरे सोपान में अनुवादक एक बार पुन: रचना को आवश्यकतानुसार परिवर्तित,परिवर्धित करे। मेरे विचार से मेरे अनुवाद की यही प्रक्रिया रही है।

प्रश्न : अनुवाद के लिए क्या आपके सामने कोई आदर्श अनुवादक रहे ?

उ0 : आदर्श अनुवादक मेरे सामने कोई नहीं रहा। मैं अपने तरीके से अनुवाद करता रहा हूँ और अपना आदर्श स्वयं रहा हूँ। दरअसल, आज से लगभग 30-35 वर्ष पूर्व जब मैंने इस क्षेत्र में प्रवेश किया, अनुवाद को लेकर लेखकों के मन में कोई उत्साह नहीं था, न ही अनुवादकला पर पुस्तकें ही उपलब्ध थीं और न ही अनुवाद के बारे में चर्चाएँ ही होती थीं। इधर, इन चार दशकों में अनुवाद के बारे में काफी चिंतन-मनन हुआ है। यह अच्छी बात है।


प्रश्न : अनुवाद को कुछ विचारकों ने एक तरह का पुनर्सृजन भी माना है।इस सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं? 


उ0 : मैं अनुवाद को पुनर्सृजन ही मानता हूँ, चाहे वह साहित्य का हो या फिर किसी अन्य विधा का। सच्चे मन से मूल में एकात्म होकर जो अंतरित होगा, वह मूल जैसा ही होगा।दरअसल,साहित्यिक अनुवाद की मूल समस्या पुनर्सृजन नहीं है अपितु साहित्यिक अनुवाद पुनर्सृजन ही है।साहित्य जगत~ में ये मुददा चर्चा का विषय बना हुआ है कि अनुवाद को मौलिक सृजन माना जाए या नहीं। यह सही है कि अनुवाद पराश्रित होता है। वह नूतन सृष्टि नहीं अपितु सृजन का पुनर्सृजन होता है। इस दृष्टि से अनुवाद-कर्म को मौलिक-सृजन की कोटि में रखने की बात पर बार-बार प्रश्नचिन्ह लग जाता है। मगर, यह भी उतना ही सत्य है कि अनुवाद एक श्रमसाध्य और कठिन रचना-प्रक्रिया है। वह मूल रचना का अनुकरण नहीं वरन~ पुनर्जन्म है। वह द्वितीय श्रेणी का लेखन नहीं, मूल के बराबर का ही दमदार प्रयास है।

ध्यान से देखा जाए तो मौलिक सृजन और अनुवाद की प्रक्रिया प्राय: एक- समान है। दोनों  के भीतर अनुभूति-पक्ष की सघनता रहती है। अनुवादक जब तक कि मूल रचना की अनुभूति, आशय और अभिव्यक्ति के साथ तदाकार नहीं हो जाता तब तक सुन्दर एवं पठनीय अनुवाद की सृष्टि नहीं हो पाती। इसलिए अनुवादक में सृजनशील-प्रतिभा का होना अनिवार्य है। मूल रचनाकार की तरह अनुवादक भी कथ्य को आत्मसात करता है, उसे अपनी चित्तवृत्तियों में उतारकर पुन:  सृजित करने का प्रयास करता है तथा अपने अभिव्यक्ति-माध्यम के उत्कृष्ट उपादानों द्वारा उसको एक नया रूप देता है। इस सारी प्रक्रिया में अनुवादक की सृजन-प्रतिभा मुखर रहती है। जिस प्रकार मूल रचनाकार का लेखन जीवन और जगत के प्रति उसकी मानसिक प्रतिक्रिया होता है और वह अपनी अनुभूति प्रतिक्रिया को शब्दों के माध्यम से कलात्मक रूप में अभिव्यक्त करता है, ठीक उसी प्रकार अनुवादक भी मूल कृति को पढ़कर स्पन्दित होता है और अपनी अनुभूति प्रतिक्रिया को वाणी देता है। मूल रचनाकार की तरह ही अनुवादक को आत्मविलोपन कर मूल कथ्य की आत्मा से साक्षात्कार करना पड़ता है। इसके लिए उसकी सृजनात्मक-प्रतिभा उसका मार्गदर्शन करती है। कुछ विद्वान अनुवाद-कर्म को अनुसृजन की संज्ञा देना अधिक उचित समझते हैं. मगर चूंकि दोनों , मूल सृजक और अनुवादक अनुभव, भाषा और अभिव्यक्ति कौशल के स्तर पर एक ही तरह की रचना-प्रतिक्रिया से गुजरते हैं, अत: अनुवाद-कार्य को मौलिक-सृजन न सही, उसे मौलिक-सृजन के बराबर का सृजन-व्यापार समझा जाना चाहिए।


प्रश्न   : अनुवादक को अनुवाद करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

उ. : यों तो अनुवाद करते समय कई बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए जिनका विस्तृत उल्लेख आदर्श अनुवाद,अनुवादक जैसे शीर्षकों के अन्तर्गत ‘अनुवादकला’ विषयक उपलब्ध विभिन्न पुस्तकों में मिल जाता है। संक्षेप में कहा जाए तो अनुवादक को निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उसकोस्त्रोत  और लक्ष्य भाषा पर समानरूप से अच्छा अधिकार होना चाहिए।विषय का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए।मूल लेखक के उद~देश्यों की जानकारी होनी चाहिए। मूल रचना में अन्तर्निहित भावों की समझ होनी चाहिए। सन्दर्भानुकूल अर्थ-निश्चयन की योग्यता हो।   मूल के प्रति निष्ठा का भाव औरसौन्दर्यपूर्ण दृष्टि की प्रबलता हो। एक बात मैं यहाँ पर रेखांकित करना चाहूंगा और अनुवाद-कर्म के सम्बन्ध में यह मेरी व्यक्तिगत मान्यता है। मेरा मानना है कि अनुवाद मूल रचना का अनुकरण मात्र नहीं, अपितु पुनर्जन्म होता है। वह द्वितीय श्रेणी का लेखन नहीं, मूल के बराबर का ही दमदार प्रयास है। कुशल अनुवादक का कार्य पर्याय ढूंढ़ना मात्र नहीं है, वह रचना को पाठक के लिए बोधगम्य बनाए, यह परमावश्यक है। यह कार्य वह लंबे-लंबे वाक्यों को तोड़कर, उनमें संगति बिठाने के लिए अपनी ओर से एक-दो शब्द जोड़कर तथा ‘अर्थ’ के बदले ‘आशय’ पर अधिक जोर  देकर कर सकता है। ऐसा न करने पर ‘अनुवाद’ अनुवाद न होकर मात्र सरलार्थ बनकर रह जाता है।


प्रश्न : मौलिक लेखन और अनुवाद की प्रकृति को आप किस रूप में देखते हैं? 

उ. : मेरी दृष्टि में दोनों की प्रक्रियाएं एक-समान हैं। पर विस्तार से बात हो चुकी है। मैं मौलिक रचनाएं भी लिखता हूँ। मेरे नाटक, कहानियाँ आदि रचनाओं को खूब पसन्द किया गया है। साहित्यिक अनुवाद तभी अच्छे लगते हैं जब अनुवादित रचना अपने आप में एक ‘रचना’ का दर्जा प्राप्त कर ले। दरअसल, एक अच्छे अनुवादक के लिए स्वयं एक अच्छा लेखक होना भी बहुत अनिवार्य है। अच्छा लेखक होना उसे एक अच्छा अनुवादक बनाता है और अच्छा अनुवादक होना उसे एक अच्छा लेखक बनाता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, पोषक हैं।

प्रश्न :  हमारे देश में अनुवाद को कितना सम्मान प्राप्त हुआ है? पश्चिम में अनुवाद की क्या स्थिति है? 

उ. : पश्चिम में अनुवाद के बारे में चिन्तन-मनन बहुत पहले से होता रहा है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस तरह ज्ञान-विज्ञान एवं अन्य व्यावहारिक क्षेत्रों में पश्चिम बहुत आगे है, उसी तरह ‘अनुवाद’ में भी वह बहुत आगे है। वहाँ सुविधाएं प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हैं, अनुवादकों का विशेष मान-सम्मान है। हमारे यहाँ इस क्षेत्र में अभी बहुत-कुछ करना शेष है।

प्रश्न : हमारे देश में अब तक हुए और हो रहे अनुवाद कार्य से आप किस सीमा तक संतुष्ट हैं? आपकी दृष्टि में इस दिशा में और क्या किया जाना चाहिए? 

उ. : साहित्यिक अनुवाद तो बहुत अच्छे हो रहे हैं। पर हाँ, विभिन्न ग्रन्थ अकादमियों द्वारा साहित्येतर विषयों के जो अनुवाद सामने आए हैं या आ रहे हैं, उनका स्तर बहुत अच्छा नहीं है। दरअसल, उनके अनुवादक वे हैं, जो स्वयं अच्छे लेखक नहीं हैं या फिर जिन्हें सम्बन्धित विषय का अच्छा ज्ञान नहीं है। कहीं-कहीं यदि विषय का अच्छा ज्ञान भी है तो लक्ष्य भाषा पर अच्छी,सुन्दर पकड़ नहीं है। मेरा सुझाव है कि अनुवाद के क्षेत्र में जो सरकारी या गैर सरकारी संस्थाएं या कार्यालय कार्यरत हैं, वे विभिन्न विधाओं एवं विषयों के श्रेष्ठ अनुवादकों का एक राष्ट्रीय पैनल तैयार करें। अनुवाद के लिए इसी पैनल में से अनुवादकों का चयन किया जाए। पारिश्रमिक में भी बढ़ोतरी होनी चाहिए।


प्रश्न : अनुवाद के लिए रचना का चयन आप किस आधार पर करते हैं ?रचनाओं के बारे में आपकी चयन-प्रक्रिया क्या है?

उ. : देखिए, पहले यह बात हम को समझ लेनी चाहिए कि हर रचना का अनुवाद हो, यह आवश्यक नहीं है। वह रचना जो अपनी भाषा में अत्यन्त लोकप्रिय रही हो, सर्वप्रसिद्ध हो या फिर चर्चित हो, उसी का अनुवाद वांछित है और किया जाना चाहिए। एक टी.वी. चैनल पर मुझसे पूछे गए इसी तरह के एक प्रश्न के उत्तर में मैंने कहा था - ‘प्रत्येक रचना पुस्तक का अनुवाद हो, यह ज+रूरी नहीं है। हर भाषा में, हर समय बहुत-कुछ लिखा जाता है। हर चीज+ का अनुवाद हो, न तो यह मुमकिन है और न ही आवश्यक। मेरा मानना है कि केवल अच्छी एवं श्रेष्ठ रचना का ही अनुवाद होना चाहिए। ऐसी रचना का, जिसके बारे में पाठक सच्चे मन से यह  स्वीकार करे कि सचमुच अगर मैंने इसका अनुवाद न पढ़ा होता तो निश्चित रूप से एक बहुमूल्य रचना के परिचय एवं उसके आस्वादन से मैं वंचित रह जाता।

प्रश्न : अनुवाद में मूल के प्रति निष्ठावान रहना क्या अनुवादक के लिए संभव है?  

 उ    : अनुवादक यदि मूल के प्रति निष्ठावान नहीं रहता, तो निश्चित रूप से ‘पापकर्म’ करता है। मगर, जैसे हमारे यहाँ व्यवहार में ‘प्रिय सत्य’ बोलने की सलाह दी गई है,उसी तरह अनुवाद में भी प्रिय लगने वाला फेर-बदल स्वीकार्य है। दरअसल, हर भाषा में उस देश के सांस्कृतिक, भौगोलिक तथा ऐतिहासिक सन्दर्भ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में रहते हैं और इन सन्दर्भों का भाषा की अर्थवत्ता से गहरा संबंध रहता है। इस अर्थवत्ता को ‘भाषा का मिजाज ’ अथवा भाषा की प्रति कह सकते हैं। अनुवादक के समक्ष कई बार ऐसे भी अवसर आते हैं जब कोष से काम नहीं चलता और अनुवादक को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा के बल पर समानार्थी शब्दों की तलाश करनी पड़ती है। सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दूरी जितनी-जितनी बढ़ती जाती है, अनुवाद की कठिनाइयाँ भी उतनी ही गुरुतर होती जाती हैं। भाषा, संस्कृति  एवं विषय के समुचित ज्ञान द्वारा एक सफल अनुवादक उक्त कठिनाई का निस्तारण कर सकता है।

प्रश्न    : अनुवाद से अनुवाद के बारे में आप की क्या राय है?

उ     : प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो  की वह पंक्ति याद आती है जिसमें वह कहता है कि कविता में कवि मौलिक कुछ भी नहीं कहता,अपितु नकल की नकल करता है।‘फोटो-स्टेटिंग’ की भाषा में बात करें तो जिस प्रकार मूल प्रति के इम्प्रेशन में और उस इम्प्रेशन के इम्प्रेशन में अन्तर रहना स्वाभाविक है,ठीक उसी प्रकार सीधे मूल से किए गये अनुवाद और अनुवाद से किए गये अनुवाद में फर्क रहेगा।मगर,सच्चाई यह है कि इस तरह के अनुवाद हो रहे हैं।तुर्की,अरबी,फ्रेंच ,जर्मन आदि भाषाएं न जानने वाले भी इन भाषाओं से अनुवाद करते देखे गए हैं।इधर,कन्नड़,मलयालम,गुजराती,तमिल,बंगला आदि भारतीय भाषाओं से इन भाषाओं को सीधे-सीधे न जानने वाले भी अनुवाद कर रहे हैं।ऐसे अनुवाद अंगरेजी या हिन्दी को माध्यम बनाकर हो रहे हैं।यह काम खूब हो रहा है।

प्रश्न   : किसी भी ज्ञान-मींमासा एवं सृजन में प्रशिक्षण एवं सैद्धान्तिक जानकारी को आप कितना आवश्यक मानते हैं?


उ     : सिद्धान्तों की जानकारी उसे एक अच्छा अनुवाद-विज्ञानी या जागरूक अनुवादक बना सकती है,मगर प्रतिभाशाली अनुवादक नहीं।मौलिक लेखन की तरह अनुवादक में कारयित्री प्रतिभा का होना परमावश्यक है।यह गुण उसमें सिद्धान्तों के पढ़ने से नहीं,अभ्यास अथवा अपनी सृजनशील प्रतिभा के बल पर आ सकेगा । यों,अनुवाद-सिद्धान्तों का सामान्य ज्ञान उसे इस कला के विविध ज्ञातव्य पक्षों से परिचय अवश्य कराएगा।

प्रश्न : आप किस तरह के विषयों के अनुवाद को सबसे कठिन मानते हैं और क्यों ?

उ. : अनुवाद किसी भी तरह का हो यह अपने आप में एक दु:साध्य,श्रमसाध्य कार्य है। इस कार्य को करने में जो कोफ़्त होती है, उसका अन्दाज वही लगा सकते हैं जिन्होंने अनुवाद का काम किया हो। वैसे मैं समझता हूँ कि दर्शन-शास्त्र अथवा शुद्ध तकनीकी विषयों से संबंधित अथवा आंचलिकता का विशेष पुट लिए पुस्तकों का अनुवाद करना अपेक्षाकृत कठिन है। गद्य की तुलना में पद्य का अनुवाद करना भी कम जटिल नहीं है।


प्रश्न : अनुवादगत सहजता व स्वाभाविकता लाने के लिए भाषा को कैसा होना चाहिए? 
उ. : सुन्दर-सरस शैली, सरल-सुबोध वाक्य गठन, निकटतम पर्यायों का प्रयोग आदि लक्ष्य भाषा की सहजता को सुरक्षित रखने में सहायक हो सकते हैं। यों मूल भाषा के अच्छे परिचय से भी काम चल सकता है, लेकिन अनुवाद में काम आने वाली भाषा तो जीवन की ही होनी चाहिए।


प्रश्न : अनुवाद को किस सीमा तक एक सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय कर्म की संज्ञा दी जा सकती है? 

उ. : अनुवाद कर्म राष्ट्र-सेवा का कर्म है। यह अनुवादक ही है जो भाषाओं एवं उनके साहित्यों को जोड़ने का अद~भुत एवं अभिनंदनीय प्रयास करता है। दो संस्कृतियों, समाजों, राज्यों, देशों एवं विचारधाराओं के बीच ‘सेतु’ का काम अनुवादक ही करता है। और तो और, यह अनुवादक ही है जो भौगोलिक सीमाओं को लांघकर भाषाओं के बीच सौहार्द, सौमनस्य एवं सदभाव को स्थापित करता है तथा हमें एकात्मकता एवं वैश्वीकरण की भावनाओं से ओतप्रोत कर देता है। इस दृष्टि से यदि अनुवादक को समन्वयक, मध्यस्थ, संवाहक, भाषायी-दूत आदि की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कविवर बच्चन जी, जो स्वयं एक कुशल अनुवादक रहे हैं, ने ठीक ही कहा है कि अनुवाद दो भाषाओं के बीच मैत्री का पुल है। वे कहते हैं - ‘अनुवाद एक भाषा का दूसरी भाषा की ओर बढ़ाया गया मैत्री का हाथ है। वह जितनी बार और जितनी दिशाओं में बढ़ाया जा सके, बढ़ाया जाना चाहिए ...।’

अपने देश के सन्दर्भ में बात करें तो ज्ञात होगा कि हमारा देश एक बहुभाषा-भाषी देश है जिसमें अठारह प्रमुख भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त लगभग 550 बोलियां बोली जाती हैं। हिन्दी को छोड़ प्राय: प्रत्येक प्रदेश की अपनी भाषा है और उस भाषा की अपनी स्वस्थ, सुदीर्घ एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा है, जिसमें भारतीय धर्म-दर्शन, विद्या-बुद्धि, चिंतन और कलाओं की चर्माेत्कृष्ट संपदा समायोजित है। दूसरे शब्दों में भारतीय मनीषा और विचारणा इन्हीं भाषाओं के साधकों एवं सृजकों की समेकित अभिव्यक्ति है जिसे हम दूसरे शब्दों में  ‘भारतीयता’ या ‘भारतीय-अस्मिता’ भी कहते हैं।

आज हमारे देश के सामने यह प्रश्न चुनौती बनकर खड़ा है कि बहुभाषाओं वाले इस देश की सांस्कृतिक धरोहर को कैसे अक्षुण्ण रखा जाए ? कैसे देशवासी एक-दूसरे के निकट आकर आपसी मेलजोल और भाईचारे की भावनाओं को आत्मसात कर सकें ? वर्तमान परिस्थितियों में यह और भी ज+रूरी हो जाता है कि देशवासियों के बीच सामंजस्य और सद~भाव की भावना विकसित हों ताकि प्रत्यक्ष विविधता के होते हुए भी हम अपने सांस्कृतिक अस्मिता एवं सौहार्दता के दर्शन कर अनेकता में एकता की संकल्पना को मूत्र्त रूप प्रदान कर सकें। अनुवाद-कार्य इस दिशा में एक महती भूमिका अदा कर सकता है। दरअसल, यह एक ऐसा मांगलिक कार्य है जो भारतीय अस्मिता को मुखर कर हमें, सच में, भारतीय बनाता है तथा क्षेत्रीय संकीर्णताओं एवं परिसीमाओं से Åपर उठाकर अन्तरराष्ट्रीय दृष्टि प्रदान करता है।

आने वाले समय में सम्प्रेषण के नए-नए माध्यमों व आविष्कारों से वैश्वीकरण के नित्य नए    क्षितिज उद~घाटित होंगे। इस सारी व्यवस्था में अनुवाद की महती भूमिका होगी और इससे   ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा साकार होगी। आज किसी भी विकासशील देश को यदि विकसित देश बनना है तो बिना अनुवाद साधना के यह स्वप्न साकार नहीं हो सकता। इस दृष्टि से सम्प्रेषण-व्यापार के उन्नायक के रूप में अनुवाद,अनुवादक की भूमिका निर्विवाद रूप से अति महत्वपूर्ण सिद्ध होती है।



प्रश्न:   अनुवाद मनुष्यजाति को एकदूसरे के पास लाकर हमारी छोटी दुनिया को बड़ी बनाता है।इसके बावजूद यह दुनिया अपने-अपने छोटे अहंकारों से मुक्त नहीं हो पाती-इसके कारण क्या हैं?आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

उ :   देखिए,इसमें अनुवाद,अनुवादक कुछ नहीं कर सकता। जब तक हमारे मन छोटे रहेंगे,दृष्टि संकुचित एवं नकारात्मक रहेगी,यह दुनिया हमें सिकुड़ी हुई ही दीखेगी ।मन को उदार एवं बहिर्मुखी बनाने से ही हमारी छोटी दुनिया बड़ी हो जाएगी।

प्रश्न:   अच्छा,यह बताइए कि कश्मीर की समस्या का समाधान करने में कश्मीरी-हिन्दी एवं कश्मीरी से हिन्दीतर भारतीय भाषाओं में अनुवाद किस सीमा तक सहायक हो सकते हैं?

उ:    कश्मीर में जो हाल इस समय है ,उससे हम सभी वाकिफ+ हैं।सांप्रदायिक उन्माद ने समूची घाटी के सौहार्दपूर्ण वातावरण को विषाक्त बना दिया है। कश्मीर के अधिकांश कवि,कलाकार,संस्कृतिकर्मी आदि घाटी छोड़कर इधर-उधर डोल रहे हैं और जो कुछेक घाटी में रह रहे हैं उनकी अपनी पीड़ाएं और विवशताएं हैं। विपरीत एवं विषम परिस्थितियों के बावजूद कुछ रचनाकार अपनी कलम की ताकत से घाटी में जातीय सद~भाव एवं सांप्रदायिक सौमनस्य स्थापित करने का बड़ा ही स्तुत्य प्रयास कर रहे हैं। मेरा मानना है कि ऐसे निर्भिक लेखकों की रचनाओं के हिन्दी अनुवाद निश्चित रूप से इस बात को रेखांकित करेंगे कि बाहरी दबावों के बावजूद कश्मीर का रचनाकार शान्ति चाहता है और भईचारे और मानवीय गरिमा में उसका अटूट विश्वास है और इस तरह एक सुखद वातावरण की सृष्टि संभव है।ऐसे अनुवादों को पढ़कर वहां के रचनाकार के बारे में प्रचलित  कई तरह की बद्धमूल,निर्मूल स्थापनाओं का निराकरण भी  हो सकता है।इसी प्रकार  कश्मीरी साहित्य के ऐसे श्रेष्ठ एवं सर्वप्रसिद्ध रचनाकारों जैसे,लल्लद्यद,नुंदऋषि,महजूर,दीनानाथ नादिम,रोशन,निर्दोष आदि, जो सांप्रदायिक सद~भाव के सजग प्रहरी रहे हैं, की रचनाओं के  हिन्दी अनुवाद कश्मीर में सदियों से चली आरही भाईचारे की रिवायत को निकट से देखने में सहायक होंगे। यहां पर मैं यह जोर  देकर कहना चाहूंगा कि घाटी के रचनाकार को मुख्यधारा से जोड़ने में उसकी रचनाओं के हिन्दी अनुवाद अहम भूमिका निभा सकते हैं।



 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डा. शिबन कृष्ण रैणा
कोलेज शिक्षा में प्राचार्य पद से सेवानिवृत हुए हैं।सालों से राजस्थान में लिखते,पढ़ते और छपते रहे हैं।फिलहाल अलवर में साहित्यिक गतिविधियों को संभालती संस्था 'साहित्य संगम' के अध्यक्ष हैं।मूल रूचि और विषय हिंदी में ही निहित रहा है।भारतीय अनुवाद परिषद के द्विवागीश पुरस्कार,राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर के प्रथम अनुवाद-पुरस्कार तथा देश की विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत  हैं साथ ही बिहार राजभाषा विभाग द्वारा कश्मीरी की लोकप्रिय रामायण ‘रामावतारचरित’ के श्रेष्ठ हिन्दी- अनुवाद के लिए पुरस्कृत-सम्मानित  किया जा चुका है। इसके अलावा उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय आदि द्वारा  भी सम्मानित किया गया है। डा0 रैणा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में 1999 से लेकर 2002 तक अध्येता रहे हैं, जहां इन्होंने ‘भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद की समस्याएँ ’ विषय पर अनुसंधान-कार्र्य किया है। 
ई-मेल -skraina123@gmail.com,मो-09414216124

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