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कहावतों में मोहन थानवी का हाथ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जून 14, 2012 | गुरुवार, जून 14, 2012

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खोटा सिक्का 
अलहदा - करिष्माई है हमारी दुनिया। छोटी - सी आंख और सवा पाव वजन के मस्तिष्क ने अनंत अंतरिक्ष में हमें ही अपनी ‘‘जमीन’’ दिखाई है। बात की बात है। कहावतों पर बात करें तो छोटी - सी कहावत बड़ा संदेष दे कर व्यक्ति को दुनिया में आगे बढ़ने की राह दिखाती है। खोटा सिक्का भी काम आ जाता है। राह में पड़ा पत्थर भी संकट - मोचक बन जाता है। बहुत काम के होते हैं नकरा कहे जाने वाले भी। हर वस्तु, हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है। प्यासे कौअे की कहानी हर काल में बताती रहेगी कि कंकर - पत्थर भी कैसे कुषाग्र बुद्धि वालों को ‘‘जीवनदायी जल’’ हासिल कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि हमारे बुजुर्गों ने हर चीज और हर प्रकार के व्यक्ति की उपयोगिता पर ध्यान देने की बात कही है। सूरत नहीं, सीरत देखने की बात कही है।

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अंडे सेवे कोई, बच्चे लेवे कोई 
अजीब कुछ होता हो या न होता हो कुछ वाकिये अजीब होते हैं। कुछ लगते अजीब हैं। कहते हैं, कोयल का अंडा कौआ सेता है। अजीब बात है न ! यह प्रकृति के माध्यम से हमें चतुराई से अपना काम निकालने का संदेष है या धैर्य धारण कर अपना काम तन्मयता से करने का ! बाजारवाद के इस दौर में जब खुद को स्थापित करने के लिए समूह के समूह परिश्रम की भट्टी में खान्द   को झोंक रहे हैं, तब अजीब लगता है किसी उत्पाद की अनुकृति का रातोंरात ईजाद हो जाना। अजीब लगता है किसी मजदूर को भरपेट खाकर सोना भी नसीब न होना और जहां वह मजदूर दिनभर खटता है वहां के हुक्मरानों का रातभर जष्न मनाना। बड़े बुजुर्गों ने ऐसे ही हालात कभी अनुभूत किए होंगे। अजीब बात है, आज भी अंडे कोई और सेता है, बच्चे कोई और और लेता है। 

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अंधरी गैया, धरम रखवाली  
अंधेर नगरी का किस्सा तो सुना है और अंधरी गैया की अवहेलना देख कर भी अनदेखी की जाती है। सामर्थ्यवान होते हुए भी जो कुछ नहीं देखते, सामर्थ्य जुटाने में लगे कैसे देख सकते हैं! किसी को इंगित करने से पहले अंतरमन में झांकने पर प्रकाष को खोजना मुष्किल काम लगने लगता है। अंधा क्या चाहे, दो आंखें। लेकिन बेचारी अंधी गाय को तो सिर्फ सार संभाल करने वाला चाहिए। लाचार पषुधन को पालक मिल जाए तो समझो उसका तो बुढ़ापा सुधर गया। अजीब लगता है जब धर्म पुण्य के नाम पर बेहिसाब धन के खर्च का हिसाब आय कर विभाग की मार्फत अंधेरे में भी चमकता दिखाई देता है और हमारे अपने ही गांव -शहर  में आवारा पषु दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। जबकि कहा यह जाता है कि दीन हीन की सेवा से भगवान मिलते हैं।


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चांद निकलेगा तो दुनिया देखेगी  
अकस्मात कोई एक या बेषमुमार घोषणाएं करना भी नेताओं की अजीब आदत है। नेता लोग जानते हैं कि आजकल जनता जागरूक हो गई है और गुजरे वक्त का हिसाब मांगने में देर नहीं लगाती। बावजूद इसके अक्सर सरकारी मुनादियों में सुनाई दे जाता है, ये होगा वो होगा। कुछ गैर सरकारी लोग भी ऐसा करते हों तो बड़ी बात नहीं। अजीब बात तो यह भी है कि किसी काम के लिए सरकार कमेटी को जिम्मेवारी देती है और बाद में पता चलता है उस काम के संबंध में तो बुनियादी बातें पहले से ही तय हो चुकी थी। बात एक कमेटी की सिफारिष की है जिसके अनुसार बीकानेर में केन्द्रीय विवि खुलता लेकिन सरकार ने राज खोला कि केविवि के लिए अजमेर में पहले से जमीन खरीदी गई और यहां तक कि कुलपति भी तय था। ऐसी बातों से नई पीढ़ी को कैसे संस्कार हस्तांतरित होंगे ! चांद निकलेगा तो दुनिया देखेगी। होना तो यही चाहिए कि काम हो जाने से पहले ऐसा होगा वैसा होगा जैसी बातें भुला दी जाएं।

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बड़ों का बड़ा ही भाग   
आजकल सभी बातें खराब नहीं है जैसा कि सुनहरे छोटे पर्दे के शृंखलारूढ़ वाका डाक वाहक (कतिपय टीवी चैनल) बताते हैं। जरा सी बात को बढ़ा चढ़ा कर पेष करना फितरत में है। कुछ दिन हुए आसमान से किसी आफत के धरती पर गिरने पर तबाही मचने की आषंका की खौफनाक बातें हुई लेकिन इससे भी दषकों पहले स्काईलेब के गिरने की घटना किसी ने षायद ही याद कराई। निष्चय ही तबाही की आषंका से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन बड़ो ने सच ही कहा है भाग्य बड़ा बलवान। उस वक्त भी बड़े और अनुभवी वैज्ञानिकों ने तसल्लीबक्ष बयान जारी किए थे और इस सदी की ऐसी पहली घटना से पहले भी बड़ों ने आषंका का प्रतिषत डरावना तो नहीं ही बताया। इसीलिए सकारात्मक सोच को जीवन में अपनाने की बात भी बड़ो ने ही तो कही है। बड़ों का बड़ा ही भाग होता है। खुषकिस्मत हैं हम सभी कि बड़ों के साये में धूप से बचते हैं। बड़ों का सम्मान और उनकी सेवा करना हमारा फर्ज है।

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अपने मन से जानिए, पराए मन की बात    
अपना काम किसे अच्छा नहीं लगता ! तारीफ सुनने की तमन्ना किसे नहीं होती ! ऐसा होना भी चाहिए ताकि प्रोत्साहन मिले और सकारात्मक सोच ज्यादा विकसित हो। यह सभी के साथ समान रूप से लागू होना चाहिए जबकि अधिकांष लोगों को दूसरांे के काम की आलोचना करना अच्छा लगता है। इससे दूसरों के मन पर क्या असर पड़ता है इस बारे में अपने मन से जानना सबसे बेहतर तरीका है। आलोचना करना भी बुरा नहीं लेकिन इसका मतलब काम में सिर्फ मीन मेख निकालना भी नहीं होना चाहिए। जबकि स्वस्थ समीक्षा करने से अच्छाई के साथ काम में रही चूक भी इंगित की जाती है। समाज में एक दूसरे की पसंद नापसंद का ख्याल रखना सभी की जिम्मेवारी है। ऐसे में बड़ों ने अपने अनुभवों से ठीक ही तो कहा है, अपने मन से जानिए, पराए मन की बात।  

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आब आब कर मर गए सिरहाने रहा पानी     
अपना कहा मनवाने के लिए विनम्रता के साथ लोगों को आसानी से समझ में आए ऐसी बोली - भाषा बोलना भी जरूरी है। अकड़ के बोलने वाले या न समझ में आने वाली बोली बोलने वाले प्यासे ही रह जाते हैं। बड़ों ने अपने अनुभवांे से जीवन जीने की कला सीखी और उसे आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने का बंदोबस्त भी किया। लोकगीत और लोककथाओं के साथ साथ कहावतों के माध्यम से भी जीवन में सुख प्राप्ति के लिए आसान उपाय बताए गए हैं। कथा है कि कोई फारसी पढ़ा लिखा आब आब कहता मर गया किंतु उसकी बात किसी की समझ में नहीं आई जबकि वहीं पानी पड़ा था। कहावत है, काबुल गए मुगल बन आए, बोलन लगे बानी। आब आब कर मर गए, सिरहाने रहा पानी। ( सभी संदर्भ - नेषनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाषित हिंदुस्तानी कहावत कोष पहला संस्करण 1968 पहली आवृति 2006 )

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भ्रष्टाचार से तौबा...      
आज की नहीं सदियों की कहानी है, रिष्वत बिना जिंदगी कहां चल पानी है। आज भ्रष्टाचार के विरोध में गली गली और घर घर से आवाज उठना आने वाले समय के लिए षुभ संकेत है। यह सदियों से चले आ रहे भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए उठाया कदम है। बढ़ते रहेंगे कदम तो मंजिल भी मिलेगी। रिष्वत ले दे कर किए गए काम कागज की नाव के समान हैं तभी तो आए दिन बनते ही सड़कें टूटना और पुल गिरना जैसी खबरें सुनते हैं। दरअसल विभिन्न रूपों में रिष्वत का चलन हमारे अंदर घर कर चुका है। पुराण और लोक कथाओं में भी ऐसे संकेत मिलते हैं कि सदियों से हम रिष्वतखोरों से घिरे रहे हैं। साक्षरता की दर आज भले ही बढ़ गई हो लेकिन सही मायनों में षिक्षित और जागरूक होने के मामले में बीते जमाने से आगे बढ़े हैं या नहीं, यह जानने के लिए पोपां बाई रौ राज जैसी कथा उदाहरण के लिए काफी है।

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बड़न की बात बड़े पहचाना      
असत्य कथन और अपूर्ण कथन दोनों से असमंजस पैदा होता है। गलत फहमी होती है। भ्रम वष कही गई बातें भी परेषानी का सबब बनती है। खुषामद करने के लिए भी लोगों की वास्तविक योग्यता सीमा पार कर अलंकृत करने का प्रचलन नया नहीं है। जब ऐसी बातों का खुलासा होता है तो स्थिति हास्यास्पद भी हो सकती है तो आषंका उत्पन्न करने या ढोल की पोल खोलने वाली भी। दिखने में कुछ और असल में कुछ और के लिए रंगा सियार की कथा तो प्रचलित है ही। सियार से जुड़ी एक कथा और भी है जिससे कहावत प्रचलित हुई, बड़न की बात बड़े पहचाना। दरअसल पूरा जुमला तो है -

कांधे धनुष, हाथ में बाना, कहां चले दिल्ली सुलताना ?
बन के राव विकट के राना, बड़न की बात बड़े पहचाना

इसके पीछे कथा यूं है कि - जंगल में सियार ने एक धुनकर को धुनौता और धुनकी लिए जाते देखा तो उसे सिपाही समझ डर गया। उसे खुष करने के लिए सुलतान कह डाला। धुनकर ने भी उसे सिंह समझ कर सम्मान दिया और बन का राव संबोधित किया। 

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आई बात रुकती नहीं      
अनकही भी प्रचारित होती है। इसीलिए कहावत बनी होगी - आई बात रुकती नहीं। विचार उत्पन्न होता है तो प्रकट भी होकर रहता है। संतों - महापुरुषों द्वारा धर्म - अध्यात्म की विवेचना के साथ मानव मन को भी टटोला गया है। मनो वैज्ञानिक और समाज विज्ञानी ‘‘आई बात रुकती नहीं’’ को मानते हों या न मानते हों, साहित्य के श्रृंगार कहावतों में विद्वानों ने इसे महत्व दिया है। इत्तफाक है - धार्मिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार मात्र विचार का प्रतिफल भी मिलने की बात सामने आती है। यही वजह हो सकती है कि भारतीय संस्कृति में षुद्ध विचार रखने की बात को महत्व दिया जाता रहा है। सकारात्मक विचार व्यक्ति और समाज के साथ देष को प्रगति पथ पर आगे बढ़ाते हैं। गुरुजन सत्साहित्य पठन पाठन के लिए इसीलिए कहते हैं। समाज इलेक्ट्रोनिक, प्रिंट आदि मीडिया के विविध रूपों से भी सकारात्मक विचार संप्रेषण की अपेक्षा करता है।

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आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं       
अकस्मात तो कुछ भी हो सकता है। जागरूक हो कर चलने वाले को कभी परेषानी का सामना नहीं करना पड़ता। वरना - आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं की तर्ज पर भविष्य प्रभावित हो सकता है। खासतौर से नव धनिकों को आज के ‘‘सेंसेक्स लाइन’’ पर दौड़ते युग में सोच विचार कर ही दांव लगाने चाहिए। बड़े बुजुर्गों ने अपने अनुभवों से ऐसी बातें कही हैं जो व्यक्ति को व्यवहार कुषल बनने में सहयोगी बनती हैं। मैनेजमेंट और व्यक्तित्व विकास के पाठ्यक्रमों में भी ऐसी बातें आज की आवष्यकता के अनुसार नए रंग रूप में ढाल कर षामिल की गई हैं। पैसा और रुतबा कमाने के लिए एक उम्र गुजार दी जाती है किंतु आसानी से धनिक बनने वाली नई पीढ़ी बेखबर रहकर धन राशि खर्चने के लिए कदम उठाती है तो लगता है बस चले जा रहे हैं, कहां पहुंचेंगे खबर नहीं। याद रखना जरूरी है, अकस्मात धन आने के रास्ते खुले है तो जाने के रास्ते बंद करने की जिम्मेवारी भी सामने है।

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
मोहन थानवी
साहित्यिक अभिरुचि
 संपन्न पत्रकार,

वर्तमान में हिंदी दैनिक
 के उप-सम्पादक

82 ,सार्दुल कालोनी बीकानेर
mohanthanvi@gmail.com



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