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अपने समय को उदेड़ते हुयी डॉ.अरविंद श्रीवास्तव की कवितायें

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, जून 17, 2012 | रविवार, जून 17, 2012




ये कवितायेँ अपने समय को उदेड़ते हुए अपने आसपास को ही नए रेखांकन के साथ प्रस्तुत करती है। हमारे सामने हमारा ही असल फोटू खींचती नज़र आती है। समाज के साथ ही हमारे राजनैतिक परिदृश्य पर भी पर्याप्त रूप से टिप्पणियाँ करती ये कवितायेँ शायद आपको रास आये। डॉ.अरविंद श्रीवास्तव जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है।

बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।यहाँ आपके सध्य प्रकाशित कविता संग्रह 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'  से कुछ कवितायेँ प्रकाशित की जा रही है .मूल रूप सेराजधानी में एक उज़बेक लड़कीसमसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशियाक्ष महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया.






खींचता हूँ आखिरी कश!

तुम रहस्य की परतें खोलो
मैं सुलगाता हूँ बीड़ी

किबाड़ सारे बंद पड़े हैं
भोर होना उर्वर संकेत है
लपट पश्चिम से उठी है पेट की
टोह में हैं तस्कर सारे

अंतरियाँ जनमती हैं इच्छाएँ

भारी-भड़कम साम्राज्य का स्वामी
इस अनंत में अकेला है
आत्मा के बगैर
वह पिछले कई दिनों से बीमार चल रहा है
वह गाता है दर्दीले गीत

पूरब के बाजार आत्माओं से भरे पटे हैं
जब कभी झाड़ता है बूढ़ा कवि टाइपराइटर
आहट होती है ब्रह्मांड में

मैं खींचता हूँ आखिरी कश
बीड़ी समाप्त होने को है!


चर्चे की समाप्ति पर

नेहयुक्त लफ़्जों के साथ
समेटी गई किस्म-किस्म की छप्पनछुरी
नीयत और संदेहों के खुले ताले और
बंद हुए जिरह के पन्ने

चर्चे की समाप्ति पर
अदबी तकरीम
मिले उत्तप्त हाथ

चूँकि पहन रखे थे सबों ने
हाथों में दस्ताने
सो संदेह की हल्की परत
हमेशा की तरह
स्पर्श के बीच कायम रही।

भरोसा

जैसे-जैसे पहचाना रिश्तों को
कलेजा थर्राया
हृदय हुआ लहूलुहान !

पाँव फिसले चौरासी में
नब्बे में टूटीं हड्डियाँ
चौरानवे में किडनी फेल
अनठानवे में खौले खून
और हुई इधर आँखें धुँधली
अभी-अभी माथा ठनका

शरीर के यही कुछ हिस्से थे
हमारे रिश्तेदार
इनकी अलग-अलग पहचान थी
और अलग-अलग सत्ता

लाख आफत आने पर भी
इन्होंने कभी मुझ पर भरोसा नहीं किया!

यह अलग बात है कि
इन्हें तनिक भी कुछ हुआ
तो मैंने
खूब बोला हल्ला!

प्रेम में विसर्जित किया मैंने

कितना सहज और आत्मीय होकर
मैंने विसर्जित किया
प्रेम में सभी कुछ

कुंठा-द्वेष
राग-उपराग
साद-अवसाद
शौर्य-पराक्रम

प्रेम में- सौंपते हैं तुम्हें
धरती की लहलहाती फसलें
पत्तियों भरा अरण्य वन
हृदय की कोमलता
अपनी परमप्रिय निद्रा
धमनियों के दौड़ते लहू
विनाश की सारी तैयारियाँ
हत्या-आत्महत्या का उतावलापन
कुछ शब्द और चालाकियाँ भी

करता हूँ विसर्जित प्रेम में-
दर्प-अहंकार
अकुलाहट-बैचेनी
ठाठ-बाट
वैभव-शौकत
हाड़-अस्थि

फुटकर तौर पर यही कुछ चीजें थीं
जिन्हें मैंने विसर्जित किया था
प्रेम  में
मति और विवेक के पश्चात!


एक नवजात की शवयात्रा में

अभी तितलियों का फूलों से संवाद बाकी था
बाकी थे अभी गुब्बारों में हवा भरा जाना
अभी खिलौना घरों के टैडीबीयरों ने हाथ
बढ़ाया ही था
अभी झुनझुनों से पैदा की जानी थी आवाज
चाकलेटों को स्वादों के परीक्षण से
गुजरना था अभी बाकी
कोपलों में पत्ते फूटने की खुशी थी
अभी शब्दकोष के लिए तामिर होन थे
नये-नये शब्द
अभी छीनने थे कसाई हाथों के खंजर
और खोलने थे बंदीगृह के ताले
अभी डालने थे शैतान को पिंजरे में
कितनी-कितनी जिज्ञासाओं और तिलस्म से
पर्दा उठना बचा था अभी

अभी शेष था सुलझाने के लिए
अंतरीक्ष की असीम गुत्थियाँ

इन्ही परिदृश्यों में
शामिल होना था हमें
एक नवजात की शवयात्रा में

वहाँ सत्य और गत्य का कोई शोर-शराबा
नहीं था
मुलायमियत से मिट्टी में दबाने की परम्परा
स्थापित की गयी थी नवजातों के लिए

उस निर्जन स्थल पर मैंने
एक क्रूर सेनापति को
रोता हुआ देखा था।


एक डरी और सहमी दुनिया में

सुन ली जातीं हमारी प्रार्थनाएँ
तो सूर्य उदय से पहले
लाल नहीं दिखता

पत्ते कभी पीले नहीं होते
नहीं छिपाना पड़ता नारियल को अपनी सफेदी
नाटक के सारे पात्र
पत्थरों में आत्मा का संचार करते
नदियाँ रोती नहीं
और समुद्र हुंकार नहीं भरते
शब्द बासी नहीं पड़ते और
संदेह के दायरे से प्रेम हमेशा मुक्त होता
स्वप्न हुकूमतों के मोहताज नहीं होते
बुलबुले फूटने के लिए जन्म नहीं लेते
धरती की सुगबुगाहट और प्रकृति की भाषा
साधारण और गैर जरूरी चीजों में शामिल नहीं होतीं
एकाकीपन के सारे हौसले पस्त होते

एक डरी और सहमी दुनिया में
हमारी प्रार्थनाएँ सुन ली जातीं
तब शायद चूक जाता मैं
कवि होने से !

इस जंगल में

यह शहरी जंगल था
जहाँ चिड़ियों ने बसेरा लेना
छोड़ दिया था

जंगल आदमी का था और शब्द काँटे थे
भीड़ में स्पर्श का मतलब था
बबूल-सा तेवर झेलना
क्योंकि आदमी परखनली में जन्म ले रहा था
और प्लास्टिक भोजन का जायकेदार हिस्सा था
मजबूत बैंक-लॉकरों में फ्रिज कर दी गयी थी
कोमल भावनाएँ, संवेदनाएँ और मुलायमीयत

सड़कों पर जला-भुना आदमी
भभकती आग बन दौड़ा जा रहा था
किधर, पता नहीं
यहाँ फुफकारते थे वाहन
रोकने-टोकने का मतलब था
गर्म तवे पर हाथ रखना
इस जंगल में

इस जंगल में
शब्द खुखरी थे और
मुँह म्यान!

प्रकाशक 


यश पब्लिकेशन्स
1/10753,गली न.3,
सुभाष पार्क ,
नवीन सहादरा,
कीर्ति मंदिर के पास 
दिल्ली-110032,
मो-09899938522
वेबसाईट-www.yashpublications.com
ई-मेल-yashpublicationsdelhi@gmail.com
सजिल्द मूल्य-195/-
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