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डा. मनोज श्रीवास्तव की कहानी 'प्रेम-पचीसी'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, जून 19, 2012 | मंगलवार, जून 19, 2012


कहानी-प्रेम-पचीसी
डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.

लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)



शाम को जब भिनगा कहार ओसारे में बैठकर चिलम सुलगा रहा था तो उसके चेहरे पर गज़ब की खुशी छाई हुई थी। जसमतिया सोच-सोचकर हैरान हो रही थी कि आख़िर, बात क्या है कि आज उसका मनसेधू (पति) न तो उस पर कोई रोब ग़ालिब कर रहा है और न ही उस पर कोई हुकुम नहीं जता रहा है। वह हमेशा तो उस पर साँड़ की तरह पिला पड़ा रहता था कि 'जसमतिया, धान ओखली में कूट लिया कि नाहीं...बोरसी में आग लहकाया कि नाहीं...इनार (कूएं) से पानी काढ़ आई कि नाहीं...गोइंठा पाथने के बाद नाद में चारा-पानी डाला कि नाहीं...भैंस पगुराय रही हो तो ओके ओसारे के बाहर खूँटे में बाँध दे...।'

     जसमतिया ताज़्ज़ुब के सैलाब में डूब-उतरा रही थी कि आज दिन-भर से एक बार भी उसके मनसेधू ने मनरौतिया के बारे में अनाप-शनाप क्यों नहीं पूछा, उसे झाड़ क्यों नहीं लगाई, उसे बात-बात में लप्पड़ लगाने की बात क्यों नहीं की...

तभी अचानक, उसे ध्यान आया कि वह भिनसारे से मनरौतिया का थोपड़ा एक-दो बार ही देख पाई है। हाँ, जब सबेरे वह देर तक सोती रही थी तो उसके बाऊ ने उसका झोटा खींचकर उसे उठाया था, "करमजली! देख दुपहरिया होने को आई है और तूं है कि घोड़ा बेच के सूत रही है। देख तूं अपना रास्ता बदल दे; अपनी चाल-चलन सुधार ले; मनभावन के चक्कर में पड़के हमरे खन्दान की इज़्ज़त पर लीपा-पोती करने पर क्यों तुली है? तूं कुछ भी कर ले, तेरा लगन मलेच्छ मनभावन से कभी ना हो पावेगा...।"

उसके बाद भिनगा बड़े रोब से कंधे पर लाठी तानकर, बड़बड़ाते हुए डीह बाबा की और निकल गया था, "बुजरी, क्या सोच रखी है कि भिनगा कहार अपनी बिटिया का बियाह कौनो छोट जात में कर देगा? हमारे पुरखे राजा-महाराजा के इहाँ बड़े ठाठ-बाट  की नुकरी करते थे। आज भी हम बड़ी-बड़ी कोठियों में डूटी बजाते हैं। लेकिन, बब्बन हजाम के छोरे की ढिठाई तो देखो कि ऊ साला इतने बड़े खन्दान की लौंडिया से लगन कराने का सपना पाल-पोस रहा है। ऐसा हरगिज नहीं होगा।"

उसके नथुने गुस्से में फरकने-फुलने लगे। तब तक वह डीह बाबा के समाधि स्थल पर पहुँच चुका था जहाँ गाँव के कम से कम डेढ़-दो सौ लोग बरखा न होने पर, आसन्न सूखा-अकाल से निपटने के लिए तंत्र-मंत्र और नानाविध कर्मकांडो पर विचार-विमर्श में मग्न थे।

सूखे-अकाल की चिंता में तो बब्बन हजाम के जबर-जवान गदेला--मनभावन ने डीह बाबा के सामने धरती पर अंगद की भाँति पैर पटका और यह भीष्म-प्रतिज्ञा की कि सोमवार से पहले अगर दऊ प्रसन्न नहीं हुए और बरखा नहीं हुई तो वह उस दिन ही शिवाले जाकर अपनी गरदन काटकर भोलेनाथ को भेंट चढ़ा देगा। क्योंकि भदेसर पाड़े ने ऐलान कर रखा था कि दऊ को रिझाने का बस एक ही नुस्खा कामयाब हो सकता है कि गाँव का कोई जवान छोरा शिवाले में जाकर भगवान शिव के आगे अपनी बलि चढ़ाए।

सारे गाँव के बूढ़े-जवान, औरत-मर्द डीह बाबा के समाधि-स्थल पर इकट्ठे होकर भदेसर पाड़े का यह ऐलान सुनने के बाद दुम दबाकर भाग खड़े होने को आतुर हो रहे थे। भीड़ में गाँव के कम से कम चालीस-पचास जवान भी मौज़ूद थे जो पंडिज्जी का ऐलान सुनकर धीरे-धीरे सारे खिसक लिए। पर, मजाल क्या कि किसी लौंडे में इतना दमखम हो कि गाँव के लिए अपनी जान देने के लिए ताल ठोककर आगे आ जाए? गाँव की भलाई करने का पाखंड करने वाला ठाकुर कप्तान सिंह का छोरा--जब्बर सिंह भी धीरे से कन्नी काटकर कब रफू-चक्कर हो गया, इसकी भनक किसी को नहीं लगी।

ऐसे में, मनभावन की दिलेरी की दाद दी जानी चाहिए जिसने आव देखा न ताव, फटाफट भीड़ से निकलकर और सभी उपस्थित जनों के सामने सीना ठोककर गरज उठा, "अगर गाँव के कल्याण के लिए हमारी बलि चाहिए तो हम भीष्म प्रतिज्ञा करते हैं कि जदि दो दिनों के भीतर बरखा नहीं हुई तो हम शिवाला जाकर अपनी बलि चढ़ा देंगे। हमारी आत्मा को गाँव में अपने लोगों के ख़ातिर और गाय-गुरुओं, खेती-बाड़ी को बचाने के लिए अपनी कुर्बानी देके बड़ा सुकून मिलेगा।"

उसका ऐसा कहना था कि भुतही लू और नटई टीपने वाली गर्मी से बिलबिलाती भीड़ में हर्षोल्लास की लहर फैल गई। लोग-बाग़ जात-पात का पाखंड तजकर बिना भेदभाव के मनभावन को गले लगाने लगे और उसकी मर्दानगी का यशगान करने लगे। जो जवान लौडे भदेसर पाड़े का ऐलान सुनकर फुर्र से उड़न-छूं हो गए थे, वे भी धीरे-धीरे जमा होने लगे और मनभावन की दिलेरी की वहवाही करने लगे।

उससे हमेशा जला-भुना रहने वाला जब्बर सिंह भी एकबैक सामने प्रगट हो गया। अपनी बुज़दिली पर पर्दा डालने के लिए वह इतने अच्छे मौके से कैसे चूक सकता था? वह झट मनभावन को अपने सीने से लगाते हुए भरे गले से बोल उठा, "मनभावन, हमा माफ़ी दई दो। हम तो नाहक तुम्हारे और तुम्हारी मनरौतिया के पियार के बीच जमराज बनके आ गए थे। अब हमको बड़ा पछतावा हो रहा है। हम तुमको बचन देते हैं कि जदि सोमवार से पहिले बरखा हो गई और तुम जिंदा बच गए तो हम तुम्हारा मिलाप मनरौतिया से कराने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। जमीन-आसमान के कर देंगे। अब ई बूझ लो तुम हमारे भइया भए और मनरौतिया हमारी भौजी...।"

वहाँ मौज़ूद ग्रामप्रधान कप्तान सिंह अपने बेटे जब्बर की बात सुनकर ख़ुद आगे आए और उन्होंने मनभावन की पीठ थपथपाई, "बबुआ, सारा गाँव तुम्हारा कर्ज़दार रहेगा। तुम्हारी बलि से अगर बरखा हो गई तो ई जान लो हम तुम्हारी याद में एक बहुत बड़ा स्मारक बनवाएंगे और अगर तुम्हारी बलि से पहले ही इन्दर भगवान खुस हो गए तो हम सब रीति-रिवाज़ और जात-पात पर लात मारके तुम्हारा लगन मनरौतिया से कराने में उसके ज़िद्दी बाप को मजबूर कर देंगे। तुम्हारे ब्याह में सारे गाँव को नचाएंगे। ई बूझ लो कि हम ठाकुर हैं और ठाकुर का बचन कभी खाली नहीं जाता है।"

मनभावन का सीना तो सबकी बातें सुन-सुनकर चौड़ा हुआ जा रहा था। जहाँ सारे गाँववाले मनरौतिया के साथ खेली जा रही उसकी रास-लीला से अभी थोड़ी देर पहले आग-बबूला हो रहे थे, वहीं आज उसकी तारीफों के पुल बाँधते नहीं अघा रहे थे। अभी दो ही दिन पहले ठाकुर कप्तान सिंह तो पंचायत बैठाकर उसे सख़्त से सख़्त सज़ा दिलवाने की वक़ालत कर रहे थे। कह रहे थे, "मनरौतिया से इशक लड़ाने का नतीज़ा बड़ा बुरा होगा। मनभावन के कुकर्मों का ख़ामियाज़ा सारा गाँव भुगत रहा है।"

पर, आज उनका भी सुर बदल गया, "मनभावन ने गाँववालों और ख़ासतौर से जवान लौंडों की इज़्ज़त बचाई है। ऐसे में, दूसरे गाँवों में जब अफवाह का बवंडर पहुंचता कि ठकुराने गाँव में भदेसर पाड़े की चुनौती का जवाब देने वाला मरद पैदा ही नहीं हुआ है और उन्हें जनानियों की तरह चूडियां पहन लेनी चाहिए तो हमारा सिर कितने सरम से झुक जाता है..."

मनभावन तो कुंतलों खुशामद के बोझ से दबा जा रहा था। उसने तत्काल पहले ठाकुर कप्तान सिंह के पैर छुए और फिर, पंडित भदेसर के और उनका आशीर्वाद लेकर गदगद हो उठा। सोच रहा था कि क्या हुआ, दो ही दिन की ज़िंदगी सही; अगर उसकी बलि से दीन-दुनिया का कल्याण हो जाता है तो उसका अहोभाग्य होगा!

लेकिन, उसकी प्रतिज्ञा से जिस आदमी सबसे झ्यादा खुशी हो रही थी, वह था--भिनगा कहार जो मनरौतिया का बाप था। उसकी खुशी का राज यह नहीं था कि मनभावन की बलि से बरखा होगी और सारा प्यासा गांव आकंठ पानी से तर-बतर हो जाएगा। दरअसल, बात यह थी कि इसी बहाने सही, उसके सबसे बड़े दुश्मन--मनभावन का सफाया हो जाएगा जो गांव-जवार में उसकी इज़्ज़त पर लीपापोती करने पर आमादा था। अब पानी बरसने वाला नहीं है। सावन भी सूखा चला गया। ऐसे में भादौ से क्या उम्मीद की जा सकती है कि मेघ फिर वापस लौटकर बरसने लगेगा? वह तो मन ही मन उफ़नती गरमी को दिल से धन्यवाद देने लगा कि उसकी कृपा से अब उसकी दिली मंशा पूरी होने वाली है। वह पहले तो भदेसर पाड़े की मूढ़ता पर मुस्कराया, "भला, आज तक कभी ऐसा हुआ है कि किसी की बलि चढ़ाने से दऊ मेहरबान हो गए हों। सूखा-अकाल तो पड़ता ही रहता है जिसे रोकने के लिए बड़े-बड़े कर्मकांड किए जाते हैं। लेकिन, बरखा इतनी आसानी से नहीं होती। जादू-मंतर से खेत कभी नहीं लहलहा सकते। अब तो मनभावन के पाप का ऐसा दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा कि गाय-गोरू प्यासे मर जाएंगे, गाँववाले रोजी-रोटी जोहने शहर को निकल जाएंगे और जो ग़रीब गाँव में रह जाएंगे, उनका 'राम-नाम सत्त' हो जाएगा।"

     फिर, उसने सिर उठाकर ढल रहे दहकते सूरज की और देखा और आँखें मूँदकर प्रार्थना की, "हे सूरज महराज! अब हमरी इज्जत आपके हाथ है। कम से कम सोमवार तक ऐसी चटख आग के गोले बरसाना कि इंद्र देउता, मेघों को बरसने की हुकुम पास न कर सकें..."

     भिनगा कहार के जाते ही, मनरौतिया की माई जसमतिया उसे समझाने बैठ गई, "ई सब पियार-मोहब्बत का चक्कर सहरी छोरा-छोरियों को सोहता है जिनके लिए रीति-रिवाज, धरम-करम का कोई माने नहीं होता है। हम ठहरे ठेठ-गंवार। ऊँच-नीच मानने-जानने वाले। अपने बाऊ का ख़न्दानी ग़ुमान तो तुम खूब जानती-बूझती हो। ऊ तुम्हारा मनभावन से मिलाप कबहूँ नहीं होने देंगे? भले तूं नाक रगड़ ले, पाथर पे माथा फोड़ ले।"

     उसके बाद जसमतिया ने मनरौतिया का जबरन दतुवन-कुल्ला करवाया और नहलाया-धुलाया। उसके सिर पर तेल थपथपाते हुए उसकी चोटी गुंथी। निःसंदेह, वह अपनी सुघड़ बिटिया पर बड़ा तरस खा रही थी। थोड़ी देर तक वह उसकी पीठ सहलाती रही। फिर, उसके आगे छिपली में लिट्टी-चोखा परोसने के बाद कुएं से पानी काढ़ने चली गई। वहाँ, कुछ समय तक जी बहलाने के लिए मनरखनी से उटका-पुरान करती रही और उसकी ननद-देवरानी के बीच लफ़ड़ों पर राजनीति बतियाती रही। जब वापस घर लौटी तो उसे बड़ी हैरानी हुई कि रोज तो मनरौतिया छः सात लिट्टियाँ भकोस जाती थी; फिर भी, उसका भड़सांय-सरीखा पेट नहीं भरता था और वह छिपली चाटती रह जाती थी। लेकिन, आज तो वह सिर्फ़ दो लिट्टियाँ ही खाकर ओसारे में बँसखट पर खरहरी सो रही है। उसका जी हो रहा था कि वह उसके सोते में ही उसकी बाँह उमेठकर उसे घसीटते हुए कोठरी में ले जाकर धड़ाम से कद्दू की तरह पटक दे। भला, जवान छोरी को इस तरह उघारे बदन सोना अच्छा लगता है क्या? गाँव का कोई जब्बर सिंह सरीखा लहेड़ा लौंडा देख लेगा तो इसकी जवानी का काम-तमाम कर देगा। जवान लौंडिया के सोने का भी एक ढंग-तरीका होता है।

उसने उसे झिंझोड़कर उठाया और उसे जोर से डपटते हुए कोठरी में जाकर सोने का हुकुम जारी कर दिया।

फिर, जसमतिया ओसारे में अपने मनसेधू के फटे कुर्ते में पैबंद लगाने का जुगत भिड़ाते हुए दिनभर की घटनाओं को याद करने लगी और बिचारी मनरौतिया की बदकिस्मती पर तरस खाने लगी कि अगर बबुनी पर बचपन से लगाम कसा गया होता और उसे मनभावन के कुसंग से दूर रखा गया होता तो वह कभी उस मुरझौंसे के पियार में इतनी बावली नहीं होती। वह मन ही मन भिनगा को सरापने लगी कि अगर हमारे कहने पर, वह बिटिया का ब्याह आठ बरिस में ही कर दिया होता तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। उसके वास्ते कितने रिश्ते आए थे! पर, वह तो बार-बार यही कहता रहता, "अरे, जसमतिया! तूं काहे को चिंता में सिर खपा रही है? जब तलक मनरौतिया घर में है, घर कितना मनसायन और गुलजार लगता है। उसके जाने के बाद तो घर में भूत लोटने लगेगा। उसके बियाह के बाद घर में बस, हम-तुम ही रह जाएंगे। तूं मजूरी पर निकल जाएगी औ' हम राय सा'ब के इहाँ डूटी बजाने चले जाएंगे। उसको तो ससुराल पठाने का जिम्मा हमारा है। तूँ काहे को हरदम बकवास कर-करके हमारा कान कुतरती रहती है?

वह फिर सोचने लगी, 'दूसरी जातियों में ब्याह करने का रिवाज तो सिर्फ़ कायथ-ठाकुर और भुमिहारों में होता है। बाँभन ऐसे ब्याह से नाक-भौंह सिकोड़ते हैं। कभी-कभार ही कोई बाँभन का मनचला छोरा कुजात की लौंडिया से ब्याह रचाता है। लेकिन, जमाना बदल रहा है। गाँव के छोरे सहर जाकर अपने साथ कोई न कोई लांडिया बाँध लाते हैं। पहले तो उनके पलिवारवाले ना-नुकुर करते हैं; फिर, उस लौंडिया को अपनी बहू मान लेते हैं। वैसे भी, मनभावन, हजाम बिरादरी का है तो क्या हुआ? वह चतुर-सुजान है, गबरू-जवान छोरा है। हाईस्कूल फेल है और कोठी में दरबान की डूटी बजाता है। अच्छा खाता-कमाता है। बस, उसमें एक ही कमी है कि ऊ हमसे नीच जात है, नहीं तो मनरौतिया के लिए उससे बढ़िया लड़का बत्ती लेके ढूँढने से भी नहीं मिलेगा...'

जसमतिया की आँखें गीली हो गईं। उसने अपने पल्लू से आँखें पोछीं और फिर भिनगा के पाजामे में जारबंद डालने लगी। उसके बाद, वहीं आँखें मलते हुए जमीन पर लेटकर अपना बदन तोड़ने लगी और ख्यालों में खो गई, 'आखिर, मनरौतिया भी मनभावन से किसी मामले में कमतर नहीं है। देखने में गोरी-चिट्टी है। बदन भी इतना गदराया हुआ है कि बस, देखने में किसी ठकुराइन से कम नहीं लगती। लेकिन, इसमें झूठ भी क्या है? उसका मनसेधू--भिनगा तो नामर्द है नामर्द। उसके बलबूते पर तो वह आज आज भी माई नहीं बन होती। अगर ठाकुर भैरव सिंह से टाँका नहीं भिड़ा होता तो वह आज भी बेऔलाद होती। सब ऊपरवाले की मेहरबानी है।'
भैरव सिंह का ध्यान आते ही वह मायूस हो गई। उसे वह दिन आज भी भुलाए नहीं भूलता जबकि गाँव में फैले हैजे ने भैरव को काल का ग्रास बना लिया था। वह रुआँसी होकर भगवान को कोसने लगी। दोनों के बीच बरसों से प्रेम-प्रपंच चल रहा था। लेकिन, किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। भैरव सिंह वहीं शिवाले में ही रहते थे। महादेव बाबा की पूजा-अर्चना में उनका इतना मन रम गया था कि वह इसी ठकुराने गाँव में अपनी तिमंजिली कोठी त्यागकर शिवाले में रात-दिन धूनी रमाए बैठे रहते थे। जसमतिया तो उनकी शिव-भक्ति पर लट्टू हो गई थी। बहरहाल, विधाता ने जो लिख दिया था, उसे कैसे टारा जा सकता था? वह भी जसमतिया के फेर में तभी से पड़ गए थे जब वह बारह साल की कुआंरी छैल-छबीली छोरी थी और योग्य वर की कामना लिए हर सोमवार शिवाले शिवजी को जल चढ़ाने जाया करती थी।

उसकी आँखों में आँसू छलछला उठे। भोलेनाथ की कृपा से उसका लगन भिनगा कहार से तो हो गया; लेकिन, वह भैरव की दीवानी उसके मरने तक रही। वह बड़बड़ाने लगी, "मनरौतिया करमजली नहीं है, बल्कि हम खुद है। मनरौतिया के पास अभी भी मौका है कि वह भाग-परायके मनभावन से ब्याह कर सकती है। लेकिन, हमारा पिंड नामर्द भिनगा से मरते दम तक नहीं छूटेगा।"

जसमतिया अचानक उठ बैठी और सोचने लगी कि मनरौतिया तो आधी ठकुराइन है और आधी कहारिन। लेकिन, उसमें ठकुराइन के लच्छन कुछ ज़्यादा ही मिलते हैं। तभी तो ठाकुर कप्तान सिंह का छोरा जब्बर सिंह उस पर डोरे डालने, उसके साथ छेड़खानी करने और सरेआम यह ऐलान करने से बाज नहीं आता कि वह एक न एक दिन मनरौतिया को भगा ले जाएगा। जसमतिया को इस बात से बड़ा गुमान होने लगा कि उसकी छोरी का आशिक कोई ऐरा-गैरा नहीं, बल्कि ठाकुर है। ऐसा सोचकर उसकी छाती बड़े दर्प में तन गई। तभी, उसे अचानक मनभावन से नफ़रत-सी होने लगी। जब्बर सिंह के आगे वह कैसे लोमड़ी-सरीखा दुम दबाकर भाग खड़ा होना चाहता है?

उसे अच्छी तरह याद है कि जब मनरौतिया, मनभावन के साथ ठाकुर के खेत-खलिहान में छुआ-छुअंता, कंचा-गोली, गुल्ली-डंडा खेला करते थे तो दोनों की जोड़ी कितनी भली लगती थी! बब्बन ने उसके मरद से एक बार बात-बात में कह दिया था, "भिनगा भइया! मनभावन और मनरौतिया की जोड़ी कितनी बढ़िया लगती है!"

उसकी बात सुनकर तो भिनगा गुस्से में एकदम बौरा गया था, "बब्बन! हमार बिटिया को अपनी बहू बनाने का सपना कभी मत देखना; नहीं तो, बात मरने-मारने तक आ जाएगी..."

तब से आज तक दोनों में जो बोलचाल बंद हुई, वह आज तक फिर शुरू नहीं हुई। लेकिन, जवानी में कदम रखते ही मनरौतिया के पैरों में पंख उग आए। बचपन का खेल-खिलवाड़ प्यार में बदल गया। उस पर डाँट-फटकार का कोई असर होने वाला नहीं था। किसी ठकुराइन की तरह वह छाती तानकर बाऊ से जबानज़दगी करने पर उतारू हो जाती है। यह तो अच्छा हुआ कि वह लड़की जात है; नहीं तो भिनगा पहलवान उसकी तुड़ाई करके लूली-लंगड़ी बना देता। दरअसल, बेलगाम तो हमने ही उसे छोड़ रखा था। पतंग और परेती लेकर पतंग उड़ाने के बहाने वह मनभावन के साथ कहाँ-कहाँ, किस-किस खेत-खलिहान में क्या-क्या करने नहीं चली जाती थी, यह तो तब पता चला जबकि भदेसर पाड़े ने भिनगा कहार के कान भरे।
उस दिन भिनगा, राय साहब की कोठी से काफी देर से लौटा था। उसकी नाक पर गुस्सा पालथी मारकर ऐसे बैठा हुआ था जैसेकि वह किसी गरदन अभी गड़ाँसे रेत देगा। सबसे पहले वह घर में घुसते ही सारे कोने झाँक आया। जसमतिया माज़रा समझ नहीं पा रही थी। बेशक, भिनगा के हाथ एक मोटा-सा सोटा लग गया था। इतना उत्तेजित वह तभी दिखाई देता था जबकि कोई गेहुअन साँप नज़र आ जाता था। लेकिन, कोई बरसात तो हो नहीं रही है कि साँप-बिच्छू पानी से बिलबिलाकर बाहर निकल आएं और काट-खाने को दौड़ें। जसमतिया थर-थर काँप रही थी कि अगर उसने उससे उसके गुस्से का कारण पूछ लिया तो उसकी ख़ैर नहीं।

तभी भिनगा भड़क उठा, "ई मनरौतिया कहवाँ बिलाय गई है? कहऊँ नज़र नहीं आ रही है? भदेसर पांड़े बता रहे थे कि ऊ करमजली, मनभवना हज्जाम के संग हेने-होने उसकी परछाई जैसी डोलती फिर रही है। ई गाँव में आज तलक कोई प्रेम-पच्चीसी नहीं खेली गई है। जदि हमरे खन्दान पर कौनो दाग-धब्बा लगा तो ई बूझ लेना कि हम मनरौतिया की बोटी-बोटी काटके खबरहे कुकुरों को खिला देंगे।"

उसकाई भड़ांस सुनकर जसमतिया को तो डर के मारे पसीना आने लगा। उससे कुछ कहते नहीं बना तो यह बहाना बना दिया, "ऊ तो सुबेरे से कोठरी में हनुमान चलीसा बाँच रही है। मिन्ट भर पहले हम उसको भुल्लन तेली के इहाँ नून-तेल खरीदने भेजे हैं। ऊ बस आती होगी। पांड़े तो एक नंबर का झुट्ठा है।"
उसने घूरकर उसकी आँखों में आँखें डालकर देखा। शायद, उसे उसकी बात से तसल्ली हो गई थी। इसलिए, वह भीतर कोठरी में सुस्ताने चला गया। जसमतिया की साँस में साँस आई कि बिचारी मनरौतिया आज लात-मार खाने से बाल-बाल बच गई। वह ओसारे से बाहर निकलकर सामने बड़ी बेसब्री से रास्ता निहारने लगी कि तभी मनरौतिया आते हुए दिख गई। उसने भगवान को धन्यवाद दिया।

मनरौतिया के पास आते ही वह गुस्से में लाल-पीली हो गई, "मुरझौंसी, कहवाँ गई थी? मनभावन के साथ लुकछिप के चूमा-चाटी और ऊ करने गई थी क्या? देख, तुम्हार बाऊ का कोप एकदम बेकाबू भया जा रहा है। हम तो आज तोहें बहाना बनाके बचा लिए। ऊ सोटा लिए तुम्हारी धुनाई करने को बेचैन हो रहे थे। अब तूं चुम्मारके ओसारे में बैठ जा। जब बाऊ भीतर से इहाँ आएंगे तो बता देना कि हम भुल्लन तेली के इहाँ नून-तेल खरीदने गए थे...।"

'लेकिन, आज मनरौतिया बड़ी उदास दिख रही है, जरूर उस मलेच्छ ने कुछ उल्टा-सीधा करतूत किया होगा'--ज्समतिया ने मन ही मन कहा। वह ओसारे में उसके बगल में बैठकर बड़े स्नेह से उसका सिर सहलाने लगी।

तभी, मनरौतिया एकदम से घिघियाकर बिलख उठी, "माई रे, हमार जिनगी तो तबाह होइ गई है...।"
"ऊ कइसे?" जसमतिया ने अचरज से अपना मुँह बा दिया।
"ऊ मनभावन ने डीह बाबा के ठाँव पर सैकड़ों जने के सामने पैर पटकके ई कसम खा लिया है कि अगर सोवार तलक बरखा नहीं हुई तो ऊ शिवाले में जाके ऐन सोमवार के दिन अपनी जिनगी का भेंट चढ़ा देगा।"

उसकी बात सुनकर, पलभर के लिए जसमतिया ऐसे चिहुँक उठी जैसेकि बिच्छू ने उसे डंक मार दिया हो। लेकिन, अगले ही पल वह मन ही मन खुश होने लगी--चलो, बहुत बढ़िया हुआ। उस छुछुंदर मनभावन से अब छुटकारा मिल जाएगा। उसके कारण हमारे पलिवार का कितना छीछा-लेदर हुआ है! हम तो इहै चाहते हैं कि जब्बर सिंह हमारी बिटिया को भगा ले जाय। इससे बढ़िया बात क्या होगी कि एक कहारिन का रिस्ता ठाकुर घराने में हो जाए? अब ई बात तो तय है कि जब बरखा के मौसम में बरखा नहीं हुई तो सोमवार से पहले बरखा कैसे हो जाएगी।"

पर, मनरौतिया की आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी। वह फ़फ़क उठी, "जदि हमारा मनभावन गाँव में बरखा के वास्ते अपनी जान देगा तो हमहूँ पीछे नहीं हटेंगे। हम भी अपने जिसम पर किरासन का तेल ढारि के खुद को भसम कर देंगे। ई बात हम महादेव बाबा की कसम खाके बोल रहे हैं...।"

उसके गंभीर उवाच से साथ जसमतिया के सीने पर साँप लोट गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए। इकलौती संतान के मोह ने उसकी रूह कँपकपा दी। वह अपनी धोती के पल्लू से मनरौतिया के आँसू पोछते हुए इसे फुसलाने लगी, "आख़िर, मनभावन में क्या लाल लगा हुआ है कि तूँ उस पर लट्टू हुई जा रही है?"
"माई, मनभावन में हमारा जान बसता है। जदि मनभावन नहीं तो समझ लो कि हम भी नहीं।"
उसके चेहरे पर अडिग निश्चय के भाव से जसमतिया फिर सिहर उठी। लेकिन, उसने उससे कुछ बात का बतंगड़ बनाने से चुप रहना ही बेहतर समझा और भाव-विह्वल होकर उसे अपनी बाँहों में भींच लिया।

पंडित भदेसर सुबह से ही शिवाला में डटे हुए थे। वह महादेव के आगे सारे कर्मकांड के ज़रूरी चीज़ें, जैसे धूपबत्ती, दसांग, सुपारी, कपूर, आम, पान और केले के पत्ते, गंगाजल वग़ैड़ह इकट्ठा करके सभी करीने से लगाने में तल्लीन थे। वह बीच-बीच में बिलौटा को गुहार-गुहार हुकुम देते जा रहे थे कि--"सुद्ध देसी घी ला...अच्छत और रोली ला...ठाकुर साहेब के इहाँ से भागके फूल औ' तुलसी की पत्ती ला...हाँ, मनभावन आ गिया हो तो उसको नहला-धुलाके सफ़ेद धोती-कुर्ता पिन्हा दे...और असलम कसाई के इहाँ से गड़ांसा लाना मत भूलियो...।"

मंदिर का नौकर--बिलौटा अपनी खोपड़ी पर हाथ फेर-फेरकर सारी चीज़ें याद करता जा रहा था ताकि उसे कोई भूली हुई चीज़ लाने के लिए फिर दोबारा न भागना पड़े क्योंकि वह सबेरे से कभी हाट तो कभी किसी के घर भाग-भागकर थक गया था। वह थैला लिए बाहर निकला ही था कि मनभावन नहा-धोकर झक्क सफ़ेद धोती-कुर्ता पहने पंडित भदेसर के सामने एक निरीह बकरे की भाँति उँकड़ू बैठ गया। पल भर के लिए पंडित भदेसर ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारा और फिर, उसके माथे पर चंदन का लेप लगाते हुए जैसे ही कुछ मंत्र पढ़ते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और यह बताया कि "अभी इगारह बजा है; बलि का मुहूरत तीन बजके सतरह मिन्ट से चार बज के छः मिन्ट तक है," वैसे ही मंदिर के बाहर गाँववालों के हुजूम का कोलाहल बेतहाशा बढ़ गया। क्योंकि उन्हें मालूम हो गया था कि बलि का बकरा आ चुका है और बस, सारे कर्मकांड को अंजाम दिए जाने की ज़रूरत है।

पंडित भदेसर बलि की वेदी को ठीक शिवलिंग के सामने स्थापित करने के बाद बाहर का ज़ायज़ा लेने निकल पड़े कि तभी बब्बन हजाम सामने दिख गया। पंडितजी भुनभुनाने लगे, "ई ससुरा दिशाशूल कहाँ से आ गया?"

बब्बन रोता-बिलखता साष्टांग उनके पैरों पर गिर पड़ा, "पंडिज्जी महराज, हमारे बबुआ की जिनगी बख़श दीजिए। ऊ इस बूढ़े की एकलौती लाठी है। रउवाँ तो जानते ही हैं कि हमारी लुगाई पाँच बरिस पहिले, संक्रांति के दिन नहाते समय गंगा मइया की गोदी में समा गई थी। तब से हम, मनभावन के आसरे ही जी रहे हैं...।"
वह गिड़गिड़ाते हुए मखाकर भाँय भाँय रोने लगा।

पंडित भदेसर अपने पैरों के उसके माथे से छू जाने की आशंका से मुँह बिचकाते हुए झट दूर खड़े हो गए। फिर, अपने जनेऊ पर हाथ फेरते हुए पुराण बखानने लगे, "बब्बन हजाम! तूँ कितना भाग्यसाली है कि तेरे लौडे की बदौलत इतना बड़ा जनकल्याण होने जा रहा है। ग्रंथ-पुराण में नरब्लि का बड़ा महात्तम बखाना गय है और ई बूझ लो कि मनभावन की बलि से तुझे बड़ा पुन्य मिलेगा। और तूं खुद को एतना बेसहारा काहे समझता है? ई गाँव के सारे लौंडे तेरी देखभाल मनभावन से कम नहीं करेंगे। तूं उनकी सेवा से अघा जाएगा।"

बब्बन, ठाकुर कप्तान सिंह समेत गाँव के सभी बड़े लोगों के सामने अपनी नाक रगड़ आया था कि उसके मनभावन को बलि का बकरा बनने से बचा लिया जाए। पर, उसकी जुबान घिस गई और होठ झुरा गए; लेकिन, किसी को उस पर तरस नहीं आई। वह समझ गया कि अब उसका कोई चारा चलने नहीं वाला है। इसलिए, वह हाथ जोड़कर पंडित भदेसर के सामने एक आख़िरी गुहार लगाने के लिए खड़ा हो गया, "अच्छा, पंडिज्जी! जब तलक मनभावन को हलाल नहीं किया जाता है, हमको उसके पास बैठने की इजाजत तो दे दीजिए..."

पंडित भदेसर अपना सिर नकारात्मक में हिलाते हुए फिर, नेम-धरम बाँचने लगे, "अइसा कइसे होगा? अब मनभावन भोलेबाबा का भोग है। उसका बलि के लिए सुद्धिकरण कर लिया गया है। हमारे सिवा अगर कोई और उसको देख लेगा तो भोलेबाबा उसकी बलि स्वीकार नहीं करेंगे...।"
फिर, उन्होंने दो मुस्टंडे लौंडों को कनखियाकर इशारा किया कि 'इस अपशकुन को जल्दी से दूर करो, नहीं तो सारा कर्मकांड बिरथा चला जाएगा।'

बब्बन भल्ल-भल्ल आँसू बहाता रहा; लेकिन, उन लौंडों ने उसे घसीटते-धकियाते-लतियाते हुए भीड़ से बहुत दूर खदेड़ दिया।

लोगबाग बड़ी बेसब्री से बलि के शुभ मुहुर्त का इंतज़ार कर रहे थे। उनका एक-एक पल घंटों-घंटों की भाँति गुजर रहा था। ठाकुर कप्तान सिंह बीड़ी की लंबी-लंबी कश भरते हुए बड़ी बेचैनी से इधर-उधर पैंतरे बदल रहे थे। जब उन्होंने पंडित भदेसर की भीड़ चीरकर अपनी और आते हुए देखा तो उन्होंने बीड़ी फेंककर कंधे से लटकते गमछे को अपने सिर पर बाँधा और फटाफट उनके पास आ धमके।

"पंडिज्जी! क्या अभी बलि नहीं दी जा सकती है? देखिए ना, लोग कितने बेताब होते जा रहे हैं! हाँँ, एक ख़ास बात हम आपको बताने जा रहे हैं कि मनरौतिया, मनभावन के वास्ते आत्मदाह करने पर आमादा है। लेकिन, आप घबड़ाइए मत, हमने अपने छोरे जब्बर को उस पर काबू पाने के लिए पहिले ही उसके इहाँ पठा दिया है।"

भीड़, पंडित भदेसर को ठाकुर के संग बतकही करते देख और भी अनियंत्रित हो गई। वे तत्काल नरबलि के लिए चीख-चिचिया रहे थे ताकि दऊ प्रसन्न होकर उन्हें यथाशीघ्र बरखा के पानी से आकंठ निमग्न कर दें! उत्तेजित भीड़ अब 'हर-हर महादेव' और 'जय काली मइया' का कर्णस्फ़ोटक जयघोष करते हुए चारो दिशाओं में सिंहनाद का बवंडर भी फैलाने लगी थी। ऐसा लग रहा था कि आसमान फट जाएगा औधरती, पाताल में समा जाएगी। यह सब चल ही रहा था कि तभी हवा के एक तेज झोंके ने भीड़ के जयघोष को सुदूर दूसरे गाँवों तक फैला दिया।

भीड़ ने पहली बार हवा में शीतलता का अहसास किया। किसी ने व्यंग्य कसा, "लगता है कि पंडिज्जी के कर्मकांड के पहिले ही दऊ अपनी करामात दिखा देंगे..." भदेसर पांड़े अपने नथुने फड़काते हुए भुनभुनाने लगे, "हमें तो ई मौसम का कोई अच्छा लच्छन दिखाई दे रहा है!" ठाकुर कप्तान सिंह ने पूरब दिशा से उठती तेज धूलभरी आँधी को देख विस्मित हो गए, "एकबैक ई मौसम को क्या हो गया?" पंडित भदेसर शेखी बघारने लगे, "ई कोई करिश्मा नहीं, हमारे कर्मकांड का नतीजा है। अभी देखिए, बलि चढ़ाते ही आसमान से पानी का फौव्वारा फट पड़ेगा?"

अगर चैत और बैसाख की कड़ाके की गर्मी में आसमान से मेघ नदारद हो और अचानक सावन के बीतते-बीतते रिमझिम बरखा होने लगे तो किसके मन में खुशी की बयार नहीं बहने लगेगी? अरे! कुछ ही दिन पहले तो गाँव-जवार के लोग यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ और इंद्र देवता को रिझाने के लिए क्या-क्या कर्मकांड नहीं कर रहे थे? आख़िरकाड़, बरखा रानी भी इनके कर्मकांडों से रीझे बग़ैड़ नहीं रह सकी।

कुछ ही देर बाद आसमान अंधड़-तूफ़ान से ढंक गया। सूरज भी पता नहीं कहाँ ग़ुम हो गया? भीड़ ने सिर उठाकर देखा तो सबके मुँह से एक-साथ एक चीत्कार निकल पड़ा, "अरे, यह कोई बवंडर नहीं, मेघों का ज़बरदस्त जमावड़ा है।"

पंडित भदेसर सोचने लगे, "अब क्या करें? हमारी सारी कोशिशें तो खटाई में पड़ने जा रही हैं। अब हमारे गोरखधंधे का क्या होगा? हम नाहक मुहूरत देखने लगे। हमें तो सुबेरे-सुबेरे ही मनभावन को ज़िबह कर देना चाहिए था...।"

उसने देखा कि कप्तान सिंह उसके मन में उठने वाले भावों को बखूबी पढ़ रहे हैं। उन्होंने बहटियाते हुए अपना सिर खुजलाया और मंदिर की और तेजी से भागने लगे। लेकिन, तब तक तूफ़ान थम चुका था और उमस के बाद पानी की मोटी-मोटी बूँदे गिरने लगीं। मनभावन को भी आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वह सोचने लगा, "मनरौतिया के लिए हमारा सुच्चा पियार देखके भगवान भी टिघर गए हैं।" अपनी प्रेम-साधना और प्रेम-योग का करामात देखने के लिए वह बाहर निकल आया। इसी समय बिलौटा भी झोले में सामान लिए हुए और अपने कंधे पर गड़ांसा ताने हुए  भदेसर पांड़े के आगे रास्ता रोककर खड़ा हो गया। उसे देखते ही भदेसर फट पड़े, "मनहूस कहीं का, तूं अब आ रहा है जबकि हमारी सारी पंडिताई छीछालेदर हो गया?"

बगल में खड़े मनभावन ने उसके शब्द साफ सुने और नफ़रत से उसके आगे मुँह का सारा खखार उगल दिया। भीड़ में वह भी शामिल होकर बरखा से अपना बदन भिंगोने लगा। उसकी खुशी का थाह नहीं था क्योंकि एक तो उसकी जान बच गई; दूसरे, अब उसका मनरौतिया के साथ लगन होना पक्का हो गया था।

कोई तीन घंटे तक मूसलाधार बारिश होती रही। ऐसा लग रहा था कि बरखा रानी भूलवश सावन को जेठ महीना समझकर यह घोषणा कर रही थी कि बरखा का मौसम तो अब शुरू हुआ है। मनभावन सोच रहा था कि हमारे प्यार को साकार होना था; तभी सूखा पड़ा और उसके बाद यह सुहावनी बरखा। अब पूरे गाँव-जवार में उसे आशिक और दीवाना वाला गाना गाने से कौन रोक सकेगा? उसे अपने बदन पर गिरती बरखा की बूँदे ऐसी लग रही थी जैसेकि मनरौतिया अपनी नरम-नरम अंगुलियाँ उसके अंग-प्रत्यंग पर नचा रही है।

बूढ़े बब्बन हजां को भी इस अहसास से बेहद खुशी हो रही थी कि उसके बेटे को उसकी मनचाही छोरी और उसे गुनबारी बहू मिलने वाली है। तभी उसके हाथों में कैसे इतनी ताकत आ गई कि वह अपने बबुआ--मनभावन को बार-बार अपनी बाँहों में उठाकर तब तक बिरहा और चइता गाता रहा जब तक कि पानी की बौछार मद्धिम नहीं पड़ गई? पर, आसमान में घुमड़-उमड़ रही.


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