डॉ.अरविंद श्रीवास्तव:कवि की प्रगतिशीलता भी यहाँ खूब उभर कर सामने आयी है। - अपनी माटी

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डॉ.अरविंद श्रीवास्तव:कवि की प्रगतिशीलता भी यहाँ खूब उभर कर सामने आयी है।


ये कवितायेँ  हमें  लोकतांत्रिक ढ़ंग से सोचने और विचारने  को प्रेरित करती है।कथ्य में न केवल देश बल्कि तमाम कवितायें वैश्विक परिदृश्य को भी अपने केंद्र में लाती है।नए शब्दों के प्रयोग के स्तर पर  यहाँ ग्रामीण  परिवेश कहीं से कहीं से झांकता है।ये बात कवि के गाँव के इलाके में रहने को रेखांकित करता है।कवि की प्रगतिशीलता  भी यहाँ खूब उभर कर सामने आयी है।

 डॉ.अरविंद श्रीवास्तव जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है।



बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।यहाँ आपके सध्य प्रकाशित कविता संग्रह 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'  से कुछ कवितायेँ प्रकाशित की जा रही है .मूल रूप सेराजधानी में एक उज़बेक लड़कीसमसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशियाक्ष महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया.



साँकल

आसान नहीं था विस्मृत करना
सभी बातों को

किसी ने सहेज रखा था
उनचालिस के युद्ध को
किसी ने छह और नौ अगस्त की
आणविक बमबारी को
किसी ने वियतनाम को याद रखा था
किसी ने बगदाद को
किसी ने नौ-ग्यारह तो किसी ने छब्बीस-ग्यारह को
किसी ने अयोध्या, किसी ने बामियान

सभी ने सहेजा है सिर में
सालन-सा सुर्ख भुना
समय का छोटा-छोटा टुकड़ा

यहाँ जब भी खोलता है
कोई अपना साँकल
दिखता है सामने
एक खौफनाक चेहरा
जिसे वह देखना नहीं चाहता !




बंद नाक

किरकिरा है मन
नासिका मार्ग को अवरूद्ध कर
समझौता कर लिया है आपस में
इड़ा और पिंगला ने
बगैर किसी घोषणा के

अभी आइसक्रीम को हाथ नहीं लगाया
गाँव से आये दही में
मुँह नहीं डाला था
भींगा नहीं मेंघ मे झमाझम
धूल-धूएँ से बचाए रखा सबकुछ
बगैर किसी चेतावनी के
बन्द हो गयी नाक

कमाल था यह
हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का।


चतुराई 

कंपकपाती ठंढ़ में आग की बोरसी
दहकती गर्मी में
ताड़ के पंखे
और अंधेरे में लालटेन हैं मेरे पास

लाता हूँ रोज-रोज चोकर-खुद्दी
खिलाता हूँ साग-पात
धर में बकरियों-सी बेटियों को
गाय-सी पत्नी
और घोड़े-से बेटे को

और क्या कर सकता है चतुराई
एक अस्तबल का
फटीचर साईस !


शहर जंगल

उसकी साँसे गिरबी पड़ी है मौत के घर
पलक झपकते किसी भी वक्त
लपलपाते छुरे का वह बन सकता है शिकार

पिछले दंगे में बच गया था वह

अभी उसने रोटी चुराई है
उसके जिस्म पर चोट के और
नीचे पत्थर पर
खून के ताजे निशान हैं
उसने गुत्थमगुत्थी-सा प्रयास छोड़ दिया है
उसकी आँखें आँसू से लबालब हैं
वह तलाश रहा है किसी मददगार को

कुछ बहशियों ने पकड़ रखा है उसे
पशु की मानिंद
उनकी मंशाएँ ठीक नहीं लगतीं

चाहता हूँ मैं उसे बचाना
पास खडे़ पुलिस की गुरेरती आँखें                              
देख  रही है मुझे !


हमारा प्रेम

इतिहास से पढ़ाई की और करता हूँ चाकरी
कविता की

करता हूँ चौका वर्तन
झाड़ू - बहारू
रोपता हूँ फूल - पत्तियाँ
लगाता हूँ उद्यान

सौंपता हूँ उसे दिल - दिमाग
शौर्य - पराक्रम
सपने सारे के सारे

करता हूँ इतना ज्यादा प्रेम
कि अक्सर सहमी,
सशंकित आँखों से
देखती है कविता मुझे !


मजे में हैं सारे

मजे में हैं ईश्वर सारे
ब्रह्मांड के ज्ञात-अज्ञात सहचर
कीट-पतंग, अंधे-बहरे
बाबा-भिखारी, ग्रीष्म और शरद
माऊस की-बोर्ड
प्रेमी युगल
साँसें धड़कने
पत्ते टहनियाँ
शब्द मुहावरे
सुख दुख
स्वर्ग नरक
समुद्र हवा
उम्मीद और सपने सारे
मजे में हैं
कविता परिवार का हिस्सा होने से !


प्रकाशक 


यश पब्लिकेशन्स
1/10753,गली न.3,
सुभाष पार्क ,
नवीन सहादरा,
कीर्ति मंदिर के पास 
दिल्ली-110032,
मो-09899938522
वेबसाईट-www.yashpublications.com
ई-मेल-yashpublicationsdelhi@gmail.com
सजिल्द मूल्य-195/-

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