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वर्ग संघर्ष की कहानी कहते हुए असल तस्वीर उतारती डॉ.अरविंद श्रीवास्तव श्रीवास्तव की कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, जून 23, 2012 | शनिवार, जून 23, 2012


ये कविताओं जिस संग्रह का हिस्सा है उसे समग्र रूप में पढ़ने से ही कवि के विचारों के ताप से असल रूप में परिचित हुआ जा सकता है।खैर
वर्ग संघर्ष की पीड़ा यहाँ बखूबी उभरी है।कवितायेँ अपने आसपास के समाज का बारीक निरिक्षण करती साबित होती है। मीडिया के बारे में यदा-कदा की गयी छिटपुट टिप्पणियाँ भी कविताओं के कथ्य का हिस्सा है।कुछ कविताए ऐसी भी जान पड़ी जहां बिम्ब का सही अर्थ  थाह पाना थोड़ा मुश्किल  है।'कवि की हत्या' जैसी प्रतिनिधि कविता,आज के कड़वे सच के रूप में  तथाकथित बड़े कवियों के लिए एक चिंता हो सकती है।


 डॉ.अरविंद श्रीवास्तव जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है।



बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।यहाँ आपके सध्य प्रकाशित कविता संग्रह 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'  से कुछ कवितायेँ प्रकाशित की जा रही है .मूल रूप सेराजधानी में एक उज़बेक लड़कीसमसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशियाक्ष महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया.


विचार

खाली था उदर जिनका
उनके लिए विचारों के स्तवक बने थे

उन्हें विचारों की जरुरत है
विचारकों ने महसूसा था इसे
और उम्दा-उम्दा विचारों की
संरचना की थी

जिन्हें जरुरत थी अन्न की उन्हें
विचार मिले थे, शब्द नहीं
और प्रायोजक अपनी पवित्रता कायम रखने में
सफल हुए थे

क्योंकि विचार सत्ता की कुंजी थी
जहाँ भुक्खड़ पहुँचाते थे
दुनिया के सबसे पेटू लोगों को।





खबरिया


पहले से मसहरी में डेरा जमाए
दस-बारह मच्छरों को
मैंने मार गिराया

भोजन के बाद बाहर
पिता जी अब भी टहल रहे थे
चौपाई आदि गुनगुनाते

ठहर-ठहर कर आवाज आती है
किचन से
खटर-पटर की

आज समाचार चैनलों ने
कोई धमाकेदार खबर नहीं सुनायी
इसलिए भी सूना-सूना सब कुछ
विषादमय लग रहा है कि जैसे
हमने दिमाग को
गिरवी रख दी हो
खबरियों के पास!



इसी शहर में
चाहता हूँ उसी शून्य से करूँ शुरुआत
जहाँ हम नहीं हों
हमारी उपस्थिति का अहसास मात्र हो
हो हमारी गंध और
सिर्फ और सिर्फ हमारा प्रतिबिंब

शुरुआत हो उसी विजन से
जहाँ बेशुमार हो आबादी
खचाखच भरे लोग
कि जैसे इस महानगर में
एक छोर पर करते हैं गुप्तवास
एक नामालूम कवि
और दूसरी छोर पर
अविदित एक कवियत्री

दोनों रहते हैं इसी शहर में।






देह के अन्दर देह और साँस के अन्दर साँस

कि जैसे देह के अन्दर एक और देह
साँस के भीतर एक और साँस
कि जैसे रंगों में छिपा होता है
कई-कई रंग
रोशनी में रोशनी और
लहरों में लहर

विस्मृति के अन्दर अनंत स्मृतियाँ
दबी होती है
दबी होती है सभ्यता के भीतर
कई सभ्यताएँ
दुनिया के भीतर दुनिया

तुम्हारे कोमल हृदय से निकलकर
प्रेम का कोई शावक
आना चाहता है हमारे करीब
शिकारी आँखों से छिपते हुए
और दुनिया की डरावनी खबरें
दबोच लेती है उसे

तब इसी उम्मीद और हौसले से
चलती है दुनिया कि
देह के अन्दर होती है देह
और साँस के अन्दर साँस।




कवि की हत्या

नहीं थी धमाके की कोई आवाज
उठा-पटक के निशान भी नहीं थे
क्योंकि हत्या बड़ी साफगोई से हुई थी
एक कवि की

वह किसी अवसाद की गिरफ्त में नहीं आया था
किसी कलह का शिकार भी नहीं था वह
हौसले पस्त दबंगों ने
हत्या की सुपाड़ी देने का ख्याल
निकाल दिया था मन से

उस कवि की हत्या हुई थी
जो कभी
उम्मीद के फाहे से
ओस की कोमल बूँदे
करता था इकट्ठा
वह करता था धरती की नक्काशी
सुन्दर-सुन्दर शब्दों से
बोता था शब्दों का बीज
वह जंगल को हरियाली और नदियों को
रास्ता देता था
वह बैठाता था जुगात
दुनिया की बेहतरी के लिए

मारा गया कवि चुपचाप
बड़ी बारीकी से
किसी बड़े कवि के हाथों !




घटनाएँ बगैर कौतूहल


जब अचंभित नहीं होंगे हम
और समाप्त हो जाएँगे
दुनिया के तमाम कौतूहलें
तब मेरी हथेली पर काँच गड़ाकर तुम पूछोगे
- बताओ यंत्रणा कितनी है पीड़ादायक
और कहूँगा मैं - मौसम आज सुहावना है बहुत

तब शेष कुछ नहीं बचेगा
कहने और सुनने के लिए
जैसे बम के धमाके
किसी अगवे बच्चे का क्रंदन
सुनामी सी खबरें
हम घटनाओं की व्याख्या में
वक्त जाया नहीं करेंगे
हम ब्रह्मांड की ऊँचाई और
समुद्र की गहराई
मापने की जिद छोड़ देंगे
आकर्षण और विकर्षण भी
कौतूहल के दायरे से मुक्त होगा
और होगा हृदय वर्फ
तीली नदारत
कुंडी के भीतर होंगे
प्रेम और आत्मीक शब्द
अलौकिक कुछ भी नहीं दिखेगा
चाहे परीक्षा-परिणाम जैसा भी हो

धटनाएँ अर्थहीन, उदेश्यहीन आकस्मिक
कौतूहल बनने की लालसा में भटकेंगी
हमारे इर्दगिर्द!



नींद के बारे में उनींदा विचार

सेहत के लिए नींद की जरूरत थी
लेकिन नींद के लिए
सेहत की नहीं

नींद सनातनी थी
सभी के लिए विस्तर पर
आलिंगन में, धरती और कंधों पर
आषाढ़ के दिन और पूस की रातें
देती थी दावत महामहिम को
कौवे और बाबा की कानी कुतिये को
सदियों से आती है नींद दबे पाँव
नयी बहुरिया-सी
तानाशाह और कवियों की आँखों में भी
सभ्यताओं का अनुबंध पक्का था
नींद से
बगैर किसी लिखित दस्तावेज़ के।




प्रकाशक 


यश पब्लिकेशन्स
1/10753,गली न.3,
सुभाष पार्क ,
नवीन सहादरा,
कीर्ति मंदिर के पास 
दिल्ली-110032,
मो-09899938522
वेबसाईट-www.yashpublications.com
ई-मेल-yashpublicationsdelhi@gmail.com
सजिल्द मूल्य-195/-
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