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परदेश में नौकरी और घर का मोह

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जून 28, 2012 | गुरुवार, जून 28, 2012


निबंध: ये शहरों से आने-जाने वाले



डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो.08290479063,ई-मेल

(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से    रचनाकाल: दिसम्बर,1998  प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )

कुछ वर्षों पहले तक हमारे यहां यदि किसी सेवारत शहरी राज्य कर्मचारी का पदस्थापन किसी छोटी जगह हो जाता था, तो वह सामान्यतः सपरिवार वहीं जा बसता था। इस अधिक पढ़े-लिखे एवं आधुनिक जीवन के तौर-तरीकों से परिचित व्यक्ति तथा उसके परिवार का छोटी जगह जा बसना उस जगह के विकास का एक महत्त्वपूर्ण कारक सिद्ध होता था। बाहर की दुनिया से अपना सम्पर्क  बनाए रखने के लिए, अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए, अपने एवं अपने परिवार की चिकित्सा, आवास और मनोरंजन के लिए, अपने बौद्धिक एवं सांस्कृतिक परितोष के लिए तथा अपने नागरिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए वह जो कुछ भी करता था, उससे  उस छोटी जगह का समूचा वातावरण किसी न किसी तरह प्रभावित होकर बदलाव महसूस करता था। इस नौकरी पेशा व्यक्ति के स्थाई रूप से छोटी जगह जा बसने से इस जगह की अर्थव्यवस्था को भी थोड़ा बहुत पोषण मिलता था। यह व्यक्ति अपनी ज़रूरत की उन तमाम चीज़ों को इस जगह लाने की कोशिश करता था, जो उसे वहां अनुपलब्ध होती थीं। उस छोटी जगह की प्रगति और कल्याण में यह व्यक्ति तहेदिल से रुचि लेता था क्योंकि इसी में उसकी स्वयं की प्रगति और कल्याण भी निहित होता था।


किन्तु जैसे-जैसे आवागमन के साधनों में वृद्धि हुई है, जैसे-जैसे शहरों के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ा है, वैसे-वैसे उन व्यक्तियों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा हुआ है, जो छोटी जगहों पर अपने पद स्थापन के बावजूद शहरों में ही निवास करते रहते हैं और नौकरी के लिए प्रतिदिन अपनी नियुक्ति के स्थान पर आते-जाते रहते हैं। यह आवश्यक नहीं कि इन शहरी लोगों का पदस्थापन उनके शहरों के बहुत करीब ही हो। इन नौकरीपेशा लोगों में कुछ तो आपको ऐसे भी मिल जाएंगे, जो अपनी नौकरी के लिए प्रतिदिन सौ किलोमीटर या उससे भी अधिक दूर जाने और प्रतिदिन वापस अपने शहर लौट आने तक से परहेज़ नहीं करते।


बहुत-सा पैसा और समय खर्च करके और प्रतिदिन एक जगह से दूसरी जगह यात्रा की यह ज़हमत उठा कर भी लोग जिन कारणों से शहरों में ही बसे रहना चाहते हैं, उन्हें हम सभी जानते हैं। शहरों की आधुनिक संस्कृति से परिचित आज का व्यक्ति किसी भारतीय गांव या छोटे कस्बे को स्वाभाविक रूप से अनेक साधन-सुविधाओं से शून्य पाता है। वहां के बौद्धिक, सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण को वह अपने या अपने परिवार की प्रगति के लिए अनुकूल नहीं पाता। वहां उसे अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उपयुक्त शिक्षण संस्थाएं या प्रतिस्पर्द्धात्मक माहौल नहीं मिलता। बीमार पड़ जाने पर कई बार उसे अपने या अपने परिवार के सदस्यों के लिए पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। अपने मौज-शौक और मनोरंजन के लिए उसे इन छोटी जगहों  पर आवश्यक साधन-सामग्री नहीं मिल पाती। इन जगहों पर वह दूसरों को कुछ देने की स्थिति में ही अधिक रहता है, स्वयं कुछ पाने की स्थिति में बहुत कम। छोटी जगहों पर व्याप्त अनेक सामाजिक बुराइयों, कुरीतियों और अभावों से भी उसे निरन्तर संघर्ष के लिए तैयार रहना पड़ता है। इन तमाम कमियों और असुविधाओं से घबराने वाला व्यक्ति स्वभावतः इन छोटी जगहों से पलायन का इच्छुक रहता है।


किन्तु इस बात को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता कि नौकरी की भी अपनी नैतिकता है और छोटी जगहों के अभावों से घबराकर उनसे पलायन का निषेध एक तरह से वहां की जाने वाली नौकरी की आचरण संहिता में निहित होता है। अधिक पढ़े-लिखे, कुशल और जानकार लोगों को इन छोटी जगहों के पिछड़ेपन और अभावों को दूर करने के लिए ही बड़ी-बड़ी तनख्वाहें देकर वहां भेजा जाता है। ये लोग ही वस्तुतः इन जगहों की प्रगति के वाहक और वहां होने वाले परिवर्तनों के अग्रदूत होते हैं। अपने वेतन के एवज़ में इन छोटी जगहों को पर्याप्त मात्रा में अपनी सेवाएं देना स्वाभाविक रूप से वहां पद-स्थापित हर नौकरीपेशा व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य होता है। 




    इस बारे में बहस की कोई गुंजाइश नहीं है कि शहरी व्यक्ति के अपनी नौकरी के स्थान पर न बने रहने से और प्रतिदिन के इस आने-जाने से उसकी सेवा किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। यदि कोई डॉक्टर अपने पद-स्थापन के स्थान पर निवास नहीं करता, तो उस स्थान के निवासियों को उस डॉक्टर की वजह से मिलने वाली राहत में स्वाभावतः कमी आ जाती है। इसी तरह किसी गांव में पद-स्थापित किसी अध्यापक के वहां नहीं रहने से उस गांव के बौद्धिक वातावरण को बदलने में संस्था से बाहर उस अध्यापक की भूमिका लगभग शून्य ही हो जाती है। किसी छोटी जगह नौकरी करने वाले शहरी का अपने पद-स्थापन के स्थान पर न बसना उसके पास वहां के निवासियों से मेलजोल और वहां के जनजीवन में प्रवेश के लिए कोई समय ही नहीं छोड़ता क्योंकि इसके लिए उपयोग किया जा सकने वाला उसका समय या तो उसकी प्रतिदिन की यात्रा में खर्च हो जाता है या फिर वह दूर उसके अपने ही शहर में व्यतीत होता है। शहरी व्यक्ति के गांव में न बसने से गांव के साथ उसका एक अलगाव निरंतर बना रहता है। अपने आपको शहरवाला और इसीलिए गांव वाले से अपने आपको कुछ हद तक उच्चतर व श्रेष्ठतर समझने का भाव उसका पीछा नहीं छोड़ता। उसे अपनी इच्छित वस्तुएं चूंकि शहर में सहजता से उपलब्ध होती हैं उन्हें उस छोटी जगह लाने-मंगवाने की कभी कोई इच्छा उसके मन में पैदा नहीं होती। उसके व उसके परिवार के शहर में बसे होने की वजह से उस छोटी जगह के कल्याण में उसका स्वयं का कल्याण सीधे निहित नहीं होता। अतः इस छोटी जगह की प्रगति और विकास में भी उसकी रुचि बहुत गहरी नहींे रह जाती। यह छोटी जगह इस तरह इस बाहरी व्यक्ति के सम्पर्क और क्षमता की बदौलत हो सकने वाली प्रगति और परिवर्तनों से पूरी तरह वंचित रह जाती है। 


छोटी जगह पद स्थापित व्यक्ति के प्रतिदिन शहर से वहाँ तक की यात्रा करने में जितना समय और जितनी ऊर्जा खर्च होती है, उसका असर भी उसकी सेवा पर पड़े बिना नहीं रहता। बसों या टेªनों की भीड़भाड़, धक्कामुक्की और कई बार खड़े-खड़े यात्रा करने की विवशता नौकरीपेशा व्यक्ति की नौकरी को अतिरिक्त रूप से कठिन व श्रमसाध्य बना देती है। आवागमन के साधन को समय पर नहीं पकड़ पाने, उसके समय पर रवाना नहीं हो पाने, या उसके मार्ग में किसी कारण कोई रुकावट आ जाने की चिन्ता इस आने जाने वाले के मन में निरंतर बनी रहती है। इसी तरह वापस जल्दी से जल्दी घर लौटकर पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के निर्वाह की चिंता आने जाने वाले नौकरीपेशा व्यक्ति को, खास तौर से नौकरीपेशा महिलाओं को अपनी संस्था में रुकने के लिए भी अधिक समय नहीं देती। किसी संस्था का नियंत्रक अधिकारी यदि आने जाने वाला हुआ, तो उस संस्था के कार्य समय में भी कभी-कभी आपको उस पर ताला लगा मिल सकता है। शहर से नौकरी के लिए छोटी जगह जाने वाले अक्सर अपनी संस्था के लिए शहर में किसी काम के उन बहानों की भी तलाश में रहते हैं, जो उन्हें कुछ अतिरिक्त समय शहर में रुकने का अवसर दे सके। नौकरी के लिए इन लोगों के प्रतिदिन आने-जाने का समय भी कई बार इनकी संस्था के कार्य समय के बजाय उन्हें उपलब्ध आवागमन के साधनों की समय सारिणी तय करती है। 


    जो लोग किसी छोटी जगह की वास्तविक प्रगति व कल्याण में रुचि लेने के बजाय केवल वहां किसी तरह अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने और उनकी संस्था को पर्याप्त सेवा दिए बग़ैर अपना नियमित वेतन उठाने के इच्छुक रहते हैं उनकी आत्मकेन्द्रितता और स्वार्थीपन स्वतः सिद्ध है। इस प्रवृत्ति की वजह से छोटी और पिछड़ी जगहों के कल्याण के लिए लगाए जाने वाले धन का भी शहरी लोगों द्वारा दोहन होता रहता है। यह एक तरह से हमारे उन विदेशी शासकों की औपनिवेशिक प्रवृत्ति का ही अनुकरण है, जिनके जुए को उतार फेंकने के लिए हमारी आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी। ग़रीबों और वंचितों की उन्नति के लिए निर्धारित धन का समृद्धतर लोगों द्वारा इस प्रकार दोहन निश्चय ही हमारे समानता के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में गंभीर बाधा उत्पन्न करके हमारे यहां वर्ग वैषम्य को बढ़ावा देता है। 


यह सच है कि ग्रामीण क्षेत्रों या छोटी व अविकसित जगहों पर आज भी केवल वही व्यक्ति बसने की इच्छा कर सकता है, जिसके मन में इस समूचे राष्ट्र के विकास की इच्छा तथा निर्धन, अशिक्षित व वंचित भारतीयों के प्रति हमदर्दी हो। हमें इस सत्य को भी स्वीकार करना पड़ेगा कि आज लोगों के मन में सबको सुखी करने की इच्छा का स्थान किसी भी तरह अपने लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएं जुटा लेने की कामना लेती जा रही है। एक तरह की उपभोक्तावादी व भोगवादी संस्कृति के विस्तार से निजी प्रगति और भौतिक उपलब्धियां ही आज व्यक्ति के लिए सफलता का मापदंड बनती जा रही हैं। राष्ट्र अधिकांश लोगों के लिए आज एक अमूर्त व अवास्तविक अवधारणा में परिवर्तित होता जा रहा है और व्यक्तिगत हित ही हर जगह प्राथमिकता पा रहे हैं। शहरों से आने-जाने वाले चूंकि पिछड़े इलाकों की तुलना में अधिक समृद्ध व प्रभावशाली वर्ग के होते हैं वे अपनी बात मनवाने के लिए अपने ऊपर वालों पर हर तरह का दबाव डलवाने में भी समर्थ होते हैं। उनकी चतुराइयों, अटकलों और उनके  व्यक्तिगत संबधों के कारण कोई भी सरकार अंततः उनके आगे घुटने टेकने और सेवा नियमों में उनकी सुविधा के अनुकूल परिवर्तन के लिए विवश हो जाती है। 


जनसामान्य के सोच में आज राष्ट्र की तुलना में चूंकि व्यक्ति अधिक महत्त्वपूर्ण है, शहरों से आने-जाने वाला व्यक्ति अपने सहकर्मियों, नियंत्रक अधिकारियों, नियोजकों  और राजनेताओं से भी हर उस काम में सहयोग व सहानुभूति की अपेक्षा रखता है जो राष्ट्र के लिए अहितकर होते हुए भी उसे या उसके परिवार को राहत या लाभ दिलवा सके। हमारे नेता भी आज किसी व्यक्ति पर कोई एहसान करने से पहले किसी संस्था, समाज या राष्ट्र के हितों की शायद ही कभी चिन्ता करते हैं। वे किसी व्यक्ति के कष्ट या कठिनाइयों को तो देख पाते हैं, किन्तु किसी गांव, समाज या समूचे राष्ट्र की अवनति या विपन्नता उनकी आंखों से ओझल रहती है। उसके अभावों, उसकी विकृतियों और उसकी गुणवत्ता में आने वाली गिरावट को वे देख नहीं पाते। यही वजह है कि आज जहां एक ओर व्यक्ति अधिक बलशाली व समृद्ध लगता है वहीं दूसरी ओर हमारी संस्थाएं, समाज और हमारा राष्ट्र हमें पहले की तुलना में अधिक कमज़ोर नज़र आते हैं।


सच्चाई यह है कि देश प्रेम और व्यक्तिगत त्याग व बलिदान की हमारे देश को आज भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी कि उसे हमारे स्वतंत्रता संग्राम के दौर में थी। राष्ट्र की प्रगति आज भी हमसे अपने व्यक्तिगत व पारिवारिक स्वार्थों से ऊपर उठ कर अधिक व्यापक संदर्भ में विचार की मांग करती है। हमारी स्वयं की प्रगति व सुख के अत्यधिक मोह का परित्याग एवं देश के प्रति समर्पण भाव आज भी पहले जितना ही ज़रूरी है। हमारी आज़ादी की लड़ाई वस्तुतः अब तक भी अधूरी है। गरीबों और पिछड़े लोगों के प्रति सच्ची सहानुभूति आज भी इस देश के कई सपूतों को दूरस्थ स्थानों में रह कर उनके उत्थान में हाथ बंटाने को प्रेरित कर रही है। आज भी अनेक स्वैच्छिक संस्थाएं, देशप्रेमवश दलितों व वंचितों के उत्थान में लगी हैं। शहरों से आने-जाने वालों के संदर्भ में अंततः यही कहा जा सकता है कि इस गला काट प्रतियोगिता के युग में स्वयं को आगे ले जाने के लिए व्यक्ति कभी-कभी तमाम नैतिकता को ताक पर रख सकता है; किन्तु यदि हम सचमुच इस राष्ट्र की प्रगति में भागीदारी के इच्छुक हैं, तो वैसा हम अपने व्यक्तिगत सुखों और प्रगति में कुछ कटौती को अंगीकार करके तथा सार्वजनिक हितों को अपने व्यक्तिगत व पारिवारिक हितों से ऊपर रख कर ही कर सकते हैं।  
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