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''फिल्म कैसी आयेगी, यह दर्शक डिसाइड करता है.''-अनुराग कश्यप

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जून 25, 2012 | सोमवार, जून 25, 2012

अनुराग कश्यप
टीस जून की रात की बात कई साबरमती हॉस्टल में फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप आये थे. कार्यक्रम विगत कई कार्यक्रमों की भांति अविनाश दास- प्रकाश के.रे. की अगुवाई में हुआ. हॉस्टल मेस में. बातचीत प्रश्नोत्तर शैली में हुई.अनुराग कश्यप की इमेज एक ऐसे निर्देशक के रूप में बनी हुई है जिसने नई जमीन बनाने की कोशिश की हो. इस बात का सम्मान फिल्मों के गंभीर दर्शकों ने सदैव किया है. पर अफ़सोस कि अनुराग कश्यप से हम जिस उम्मीद के साथ मिलने गए थे वे उस पर खरे नहीं उतरे. उनकी बातें चौंकाने वाली लगीं.अनुराग जी हिन्दी समाज में फिल्मों का स्तर गिरा होने का कारण दर्शकों को मानते हैं. वे दो टूक कहते हैं कि फिल्म कैसी आयेगी, यह दर्शक डिसाइड करता है. यानी खराब फ़िल्में रही हैं तो उसकी वजह निर्देशन-परिवेश कतई नहीं बल्कि दर्शक-परिवेश है. अनुराग जी की इस बात का पचा पाना कठिन है. हमें देखना होगा कि इस दर्शक-समाज को बनाया किसने है. खराब फिल्मों में अपने को गुमाना क्या इस दर्शक-समाज  का मूल स्वभाव है या यह अब तक निर्देशकों द्वारा निर्मित की हुई दीर्घकालिक प्रक्रिया की पैदावार है


फिर यदि ऐसे ही यथास्थितिवादी तर्क/उत्तर हमें मिलने हैं तो हमारे लिए अनुराग कश्यप जैसों का क्या मूल्य/मतलब! अंततः आप उसी तर्क की ओर बढ़ रहे हैं जो बाजारू-निर्देशकों का होता है यानी नशा मांगे कोई तो उसे नशा परोसो, कमाओ. सवाल हो तो कहो कि यही दर्शकों की मांग है. ऐसी स्थिति में 'दबंग' का निर्देशक और 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' का निर्देशक यथास्थितिवादी तर्कों के सामान धरातल पर दिखते हैं.

दर्शक क्या चाहता है? यह एक विचारणीय प्रश्न है. इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती. लेकिन इस सवाल पर जैसा साधारणीकृत बयान अनुराग साहब दे रहे हैं वह ब्लाइंड किस्म का जनरलाइजेशन है. क्या पेज-थ्री, तारे जमीन पर आदि फिल्मों के लिए दर्शक-वर्ग गायब हो जाता है? हिन्दी दर्शक-वर्ग पर इस तरह एकतरफा निष्कर्ष नहीं रखा जा सकता कि वह अच्छी फिल्मों का विरोधी है. अनुराग कश्यप हिन्दी दर्शक-वर्ग से खासे निराश हैं, शायद इसीलिये दो-तीन दिन पहले दिए एक साक्षात्कार में वे अपनी फिल्मों के लिए हिन्दी दर्शक वर्ग से ज्यादा विदेशी दर्शक वर्ग को तरजीह देते दिखे, शायद इसीलिये वे 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में विषय-निर्वाह और कहानी की कसावट को भाषा की छौंक-बघार से पूरा करने की कोशिश में दिखे, शायद इसीलिये वे बातचीत में कहते हैं कि 'मुझे कई बार लगता है कि मैं अपना बेस्ट दे चुका हूँ अब आगे आने वाली पीढी इसे बढ़ाए', शायद इसीलिये वे बाजारू तर्क-विन्यास में उलझते हुए दीखते हैं! यह तो एक पक्ष है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी सिद्धान्त-निष्ठा का इजहार अक्सर इंटरव्यू में  करते रहते हैं, जैसे मैं समझौतापरस्त फ़िल्में बनाने के कारण उधार में रहता हूँ, मेरा घर,गाड़ी भी नहीं ले पाता ...आदि-आदि. ये तमाम विरोधाभास क्यों!

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

जवान है, नई सोच के साथ 
दिल्ली में ज्ञान ले रहे हैं। 
लोनाखार का पुरवा,
सेवरा (फैजाबाद) 
के मूल निवासी हैं 
फिलहाल डेरा 
दिल्ली में हैं। 
अब तक देश के नामी 
विश्वविद्यालय जे.एन.यूं. से 
एम्.ए., एम. फिल. किया 
अब पी.एचडी. जारी है।
नामक ब्लॉग छापते हैं। 
इनसे सम्पर्क यहाँ ईमेल 
amrendratjnu@gmail.com 
पर कर सकते हैं।

फिलहाल बातचीत से यह समझने में आया कि सारी जद्दोजहद फन्ने-खाँ  बन पाने  तक ही है. ये (कला माध्यमों की) क्रांतिकारिता/परिवर्तनकामना ख़ास पायदान तक के पहले का मंगलाचरण हुआ करती है. उसके बाद तो बदलाव आता ही है. निर्देशक का व्याकरण/खेल-नियम बदल जाता है. इससे क्या इंकार कि  प्रकाश झा भी कभी अनुराग कश्यप जैसा महसूस किये हों कि मैं 'दामुल' में अपना बेस्ट दे चुका हूँ अब आगे आने वाली पीढी इसे बढ़ाए! यह बदलाव उन्हें भले शोहरत और बड़ा दर्शक-वर्ग दे देता हो लेकिन बनती हुई नयी जमीन को, वैकल्पिक जमीन को बंजर जरूर बना देता है

अगली पीढी के लिए बढ़ाने की संभावना को बड़ी रुकावट यही डाल दी जाती है. एक दर्शक-वर्ग, जो संख्या में भले कम हो लेकिन होता है उतना ही समर्पित, इससे छला हुआ महसूस करता है. यह हिन्दी सिनेमा का दुर्भाग्य है कि अपना व्याकरण/खेल-नियम बदलकर छलने वाले निर्देशक बहुतेरे हुए हैं. यहाँ सार्थक बदलाव, परिवर्तन-कामना कभी भी मुख्यधारा का सत्य नहीं बन सकी, अकाल मौत पाती रही. मुझे लगता है कि गंभीर-सार्थक सिनेमा का बड़ा दर्शक वर्ग होने का असली कारण यही  है जिसे चालाक निर्देशकों द्वारा दर्शक-वर्ग की ख़ामी बताकर पेश किया जाता है.
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