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किशोर चौधरी की डायरी से:''औरत होने से आदमी होना आसान होता है''

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जून 28, 2012 | गुरुवार, जून 28, 2012


किशोर चौधरी 
किसी ज़माने में जोधपुर में एक अखबार से पत्रकारिता की हुरुआत करने वाले किशोर,आकाशवाणी जैसे नामचीन विभाग में उदघोषक हैं.पहले सूरतगढ़ स्टेशन के बाद अब फिलहाल बाड़मेर केंद्र पर पदस्त हैं. हथकढ़ नामक ब्लॉग के ज़रिये डायरी लेखन करते हैं. जीवन के सभी पड़ाव पर अपने आस-पास को देखने की नई दृष्ठि रखते हैं.महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय,अजमेर से कला स्नातक और कोटा ओपन से जर्नलिस्म में मास्टर डिग्रीधारी हैं.उनका फेसबुक खाता ये रहा 

हर शाम ऐसी नहीं होती कि उसे भुलाया जा सके. उस दिन मौसम बेहतर था. वक़्त हुआ होगा कोई सात बजे का और गर्मी के दिन थे. शेख कम्प्यूटर्स के आगे दो कुर्सियों पर लड़कियां बैठी हुई थी. उन कुर्सियों पर अधपके कवि, कथाकार और नाट्यकर्मी मिल जाते थे. मैंने उनके साथ बेहतरीन शामें बितायी थी. हम यकीनन दुनिया की बेहतरी की बातें नहीं करते थे मगर मनुष्य के छोटे-मोटे, सुख- दुःख बातों का हिस्सा जरुर हुआ करते थे. 

उन दो लड़कियों के ठीक सामने की कुर्सी खींच कर बैठते हुए पाया कि आज दोस्तों की गैरहाजिरी है. वे दो लड़कियां छोटी और राज़ भरी बातें बाँट रही होंगी कि बातों के टुकड़े पकड़ कर मुस्कराने लगती और ऐसा लगता कि बात पूरी होने से पहले ही सुनने वाला समझ गया है. दोनों लड़कियों ने सलवार कुरते पहन रखे थे. उनके पांवों में स्पोर्ट्स शू थे. वे कुछ इस बेखयाली में बैठी थी कि उनको देखते हुए लगता था. अब छुई-मुई लड़कियां बीते दिनों की बात है. 

मैं उनसे बात करने लगा. वे एकदम सपाट ज़ुबां वाली थी. ऐसी लड़कियां आपको चौंका देती हैं. वे छोटे और सलीके वाले जवाब दे रही थी. थोड़ी ही देर बाद मालूम हुआ कि वे पुलिस में कांस्टेबल हैं. पडौस वाले रेडियो मेकेनिक के यहाँ अपना टू इन वन ठीक हो जाने का इंतज़ार कर रही थी. मैंने उनसे पूछा कि कितनी कठिन है आपकी नौकरी? जिस लड़की के बाल छोटे कटे हुए थे. उसने कहा "सर, ज़िन्दगी में आसान क्या होता है." मुझे लगा, मैं उससे कहूं कि औरत होने से आदमी होना आसान होता है. मगर मैं चुप रहा. 

एक लड़की अपने सेल फोन पर बात करने लगी. इस बातचीत में उसने किसी बेहूदा आदमी के लिए चार बार गाली दी. कुछ और लोगों की बखिया उधेड़ी. जो गाँव में उसके बारे में कुछ गलत बातें घरवालों को कहते होंगे. फिर उसने आखिर में कहा कि मैं इस बार गाँव आउंगी तब उसे देख लूंगी. उस वार्तालाप को सुनते हुए आप चौंक जाते कि रेगिस्तान के इस हिस्से में लड़कियां ऐसी तो न थी. मैंने स्कूल के दिनों में स्त्री विषयों पर बोलते हुए, अबला तेरी यही कहानी... को जाने कितनी ही बार दोहराया था क्योंकि डिबेट वाले सर ने यही सिखाया था. मगर उस शाम सामने कुर्सी पर न अबला थी ना उसकी वही कहानी थी. 

हम फिर बात करने लगे. गाँव कौनसा है, आपका? दोनों ने अपने गाँव के नाम बताये. इस मरुस्थल में सनावड़ा, हाथी का तला, डुगेरों का तला गाँव के स्कूल की लड़कियां हर साल विभिन्न खेलों में राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया करती है. मैंने पूछा कभी खो खो खेला है. उनमें से एक लड़की मुस्कुराई. सर, नेशनल तक... और मुझे याद आने लगा कि मैं सनावड़ा सीनियर स्कूल की लड़कियों का आकाशवाणी के लिए इंटरव्यू कर रहा हूँ. वे शर्मीली लड़कियां राष्ट्रीय स्तर तक खेलने के बाद पूरी तरह बदल चुकी थी. दसवीं की एक लड़की से पूछा. बड़ी होकर क्या बनोगी? और वह कहती है, अध्यापक. स्कूल का सारा स्टाफ मुस्कुराने लगता है. उस मुस्कान को टेप पर दर्ज नहीं किया जा सकता था मगर वह दिल से कभी मिटाई भी नहीं जा सकती. 

मेरे सामने जो लड़कियाँ बैठी थी, उसके क़दमों के नीचे वैसी ही ज़मीन थी, जैसी मेरे क़दमों के तले थी. उनके पास दो मजबूत पांव थे. उसके पास हौसला था कि बेहतरी से जीवन जीने का सभी को समान रूप से हक़ है. हम फिर बातें करने लगे. वे लड़कियां अपने घरों की देख भाल कर रही थी. उन्होंने अपने छोटे भाइयों के लिए बेहतर शिक्षा के प्लान बना रखे थे. एक चाहती थी कि गाँव के बच्चों को भी सिविल सर्विस परीक्षा के बारे में मालूम होना चाहिए. 

मैंने कहा कि हमारा समाज लड़कियों को पसंद नहीं करता. एक हँसते हुए कहती है. इतना पसंद करते हैं कि पीछे घूमते हैं, लोग. हम थोड़ा मुस्कुराने के बाद फिर उसी बात पर आये कि लड़कियां अक्सर चिंता की तरह आती है. इतने में मेकेनिक ने आवाज़ दी. वे उठ कर चल दी. मैं शाम के नए रंग को देखता रहा. अचानक मेरी बेखयाली को उनमें से एक की आवाज़ ने तोड़ा. सर, हमारे गाँव में लड़कों से ज्यादा लड़कियां नौकरी करती है. वे मुझसे विदा लेने आई थी. एक शिकायत भी कर गयी "आपने फोन इन कार्यक्रम पेश करना क्यों बंद कर दिया? आप वैसे ही बोलते हैं जैसे आज आपने हम से बात की... सर, फिर से फोन इन करना, आपको सुनना अच्छा लगता है." 

वे लड़कियां किसी कॉन्वेंट या मिशनरी स्कूल में पढ़ कर प्रबंधन में स्नातक की डिग्री लिए हुए नहीं थी. उन्होंने दसवीं पास की, पचास नंबर की एक परीक्षा दी, तीन किलोमीटर की दौड़ लगायी और पन्द्रह फीट दूर तक गोला फैंक कर पुलिस में भर्ती हुई थी. उन्होंने मुझमे एक यकीन का बीज रख दिया. गाँव में बेटियों को बोझ नहीं समझा जाता मगर उनके साथ पेश आने वाली तकलीफों के कारण माएं सोचती है कि लड़का हो तो अच्छा. अब वक़्त बदल गया है. ढाणियों में बसे हुए लोग जानने लगे हैं कि बेटियों को पढ़ाया जाये तो वे ज्यादा मजबूत लाठी बनती हैं. कन्या भ्रूण हत्या, एक कुत्सित आपराधिक विचार है, यह हमारे गाँव का तो नहीं हैं... बेहतर है कि इसे "न्यात-बार" ही रखा जाये. सच कुछ शामें भूलने लायक नहीं होती. 
* * *

इस रेगिस्तान के एक गाँव की जाट खांप पंचायत ने हुक्म दे रखा है कि जो भी व्यक्ति बेटी को स्कूल नहीं भेजेगा या स्कूल छुड़वा देगा, दंड का भागी होगा. इसका पालन इतना कड़ाई से हो रहा है कि सौ फीसद लड़कियां दसवीं तक पढ़ी है या पढ़ रही है.
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