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डॉ.मनोज श्रीवस्तव की एक ज़रूरी कविता 'उफ़्फ़! आह!! हाय!!!'

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जून 25, 2012 | सोमवार, जून 25, 2012

डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.

लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249,drmanojs5@gmail.com)



उफ़्फ़! आह!! हाय!!!
--एक--
निरापद रहने के लिए
यह दौर है ग़ाफ़िल होने का...
वर्ना, पल-पल में बसा दानवी दहशत
आमरण सनसना देगा धमनियों में रक्त,
जबकि मौत का जोंक चिपका रहेगा
ज़ेहन से...बेख़ौफ़

--दो--

बेशक, यह दौर है
ख़ुद को रैप सांग में
ख़फ़्तुलहवास रखने का,
ईयरफोन से सुनते हुए
कामोद्दीपक संगीत-गर्जना
उत्तेजक मादा अंगों पर
बकुल ध्यान लगाए रखने का

इस पल भूल जाओ--
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का धूल चाटना
और ताज पैलेस का लहू-लुहान होना
वर्ना, फ़तवों का फ़ुफ़कारता ज़िन्न
कर ही देगा तुम्हारा सिर छिन्न-भिन्न

--तीन--

अरे, सुनो! तुम्हें पचाना होगा
असीमानन्द का ख़ूनी प्रतिशोध
अन्यथा, भगवा भूत
निगल जाएगा तुम्हें साबूत,
हाँ, भूलना ही होगा
धर्मांतरणों से शैतान गढ़ने का
आततायी अभियान

--चार--

स्मृति-पन्नों से धो डालो सदा के लिए
कि राजा से मिलेगी सुरक्षा
संतों-फकीरों से होगा लोकोद्धार
प्रेम से उपजेगी कविता
माँ से छलकेगी ममता
पिता से मूसलाधार बरसेगा वात्सल्य
संगीत से मिलेगा सुकून
कला संजोएगी सांस्कृतिक धरोहर
साहित्य संवारेगा समाज

अंतःनाद को ख़ामोश कर
भूलना ही होगा कि
गांधी से अंहिसा व्यापी होगी
'बुद्धम शरणम' से स्थापित होगी विश्व शांति
कर्ण से अपेक्षित होगी दानशीलता
राम से तरेंग़ी अहिल्याएं
कृष्ण से संवरेंगी कुब्जाएं
जरथ्रुस्ट मौत से देगा ज़िंदगी को मात
ईशपुत्र से पीड़ामुक्त होगी धरती
सांई हर अनिष्ट से देंगे निज़ात
नानक बनेंगे सद्भाव की प्रतिमूर्ति
कबीर सिखलाएंगे सहिष्णुता
'बार्ड आफ़ एवन' करेगा
मानवीय भावनाओं का संचार
तुलसी फिर करेंगे रामराज्य की संकल्पना
सूर दिखलाएंगे प्रेमपगी गोपिकाओं का संसार

--पाँच--

हाँ, डालनी ही होगी आद्योपांत
भूलने की आदत
इस ठहरे समय में
जबकि बेहया डार्विन
भौंकता ही जा रहा है सरेआम
और स्वयं शिव घोंट रहा है
पर्यावरण का गला,
यों तो, भगीरथ पछताकर क्या कर पाएगा
भस्मावशेष गंगा के मध्य खड़े-खड़े
यह सोचते हुए
कि 'आख़िर, मैं क्यों बना
एक विफ़ल जगतारिणी का जघन्य हत्यारा'

लेकिन, भूलने के लिए
उंगलियों पर रखना होगा याद
कि संधि-वार्ताओं से पैदा होते रहेंगे लादेन
'सार्क' सम्मेलनों से उर्वर होती रहेगी
अनिर्णीत युद्धों की जमीन
जहाँ गरजेंगे सहस्रों रावण,
'यूनेस्कों' नहीं मिटा सकेगा
सांस्कृतिक बहरापन,
'नाम' डालेगा राष्ट्रों के दिलों में सख़्त गांठ
'नाटो' से होगी आतंकियों की साठगांठ
क्योंकि कुछ और डिगो गार्सिया
सृजन की प्रक्रिया में हैं,
कुछ और रूस
बिखरने के ज़द्दोज़हद में हैं,
कुछ और कश्मीर
गले की हड्डी बनने की ज़द में हैं
--छः--

मिथ्यावादी मीडिया के कर्णस्फ़ोटक दौर में
क्या भूलना ज़रूरी होगा
क्या याद रखना वैकल्पिक होगा
इसकी बनानी होगी एक लंबी फ़ेहरिस्त
और दीन-दुनिया की चिंता छोड़
खुद को चेताना होगा कि
हर शख्स के इरादे विष-बुझे हैं
सो, इस सतत भयाच्छादित परिवेश में
बाज आ जाओ--सह-अस्तित्व की विडंबना से
क्योंकि इस अकेला चलो के दौर में
परछाइयों को भी धमकाना होगा कि
हमारा पीछा करने की
सनातनी प्रथा तोड़ दें वे,
उनकी बदनीयती के हम कायल हैं
निश्चय ही वे बम बन, फट पड़ेंगी
और हमारा बाकी वज़ूद भी मिटा देंगी

      --सात--

गिरगिटिया चाल के आलम में
मुकम्मल याद रखना होगा कि
सियासतदारी के मुनाफ़ेदार धंधे में
नए देसी ब्राह्मण विदेशी कुबेर बन
बुनेंगे एक नई आक्टोपस वर्ण-व्यवस्था
जिसमें बिंधकर समाज का होगा अंग-भंग
और चौपड़-चाल के मकड़जाल में उलझाकर
चौधरानी मकड़ियां चूसेंगी मानवता का रक्त
पुराण-सम्मत दलितजन
कीट-पतंगों में परिणत होंगे
जो ढोते हैं मल-मूत
वे उसे खाकर मुस्टंडे बनेंगे,
राजमकड़ियों के इस पाखंडतंत्र में
हर सहमे हाथ में थमाया गया होगा
शांति-ध्वजों के एवज में
इस वादे का लालीपाप
कि उन्हें कालाहांडी तक पहुंचाकर ही
दम लिया जाएगा...


--आठ--
एसएमएस से कतरी गई
भावनाओं के दौर में
शिव के वरदान से हर शख्स भस्मासुर होगा
जो अपने ही सिर पर हाथ रखने की
फिर नहीं करेगा अक्षम्य गलती
और वह क्षण दूभर नहीं
जबकि हरेक का हाथ
हर दूसरे के सिर पर होगा
और इसका नतीज़ा साक्षात सामने होगा
यानी, पछताने का एक पल भी
मयस्सर नहीं होगा,
अरे हाँ, राजमकड़ियों के पाखंडतंत्र का
यही हश्र होगा

--नौ--

इतना पापोन्मुख समय है यह
कि एक बहु-प्रचलित धारणा के विपरीत
धर्म की आत्यांतिक हानि पर भी
कोई भगवान अवतरित नहीं होगा,
यह समय इतना हठधर्मी है कि
सहस्रों वर्षों बाद भी
विधाता नव-सृजन नहीं दोहरा पाएगा,
यह समय इतना बधिर है कि
परमेश्वर के दस आदेश
सुने जाने से पहले ही
चनककर, टूट जाएंगे, छितर जाएंगे,
यह समय इतना निर्मम है कि
उसके दमनचक्र पर
दिशाएं ठठाती जाएंगी,
यह समय इतना तिलस्मी है कि
एक ख़ौफ़नाक़ ज़ादुई करिश्मा के तहत
धर्मग्रंथों के कथ्य अचानक़ बदल जाएंगे
और लोग नए सिरे से
पढ़ेंगे, श्रुतगान करेंगे
उसमें वर्णित महायुद्धों में
महारक्तपात के गीत
जिनके नायक होंगे
बुद्ध, लाओ त्से, जान पाल और गांधी
जहाँ अविरल प्रवाहमान रक्त नदियों में
सुपरमैन की ख़्वाहिश लिए
बच्चे सुकून से नहाएंगे,
यह समय इतना बंजर है कि
सदाचार के शेष बीज भी
सदा के लिए कंडम हो जाएंगे,
पर, यह ऊसर समय उर्वर है
नेपोलियन, हिटलर और
गद्दाफ़ी की फ़सल के लिए
जबकि पंडे, मुल्ले, पादरी और गुरु
साझे में उनकी खेती करेंगे
जिनकी ग्लोबल मार्केटिंग के जरिए
वे अपनी अस्मिता महिमामंडित करेंगे

--दस--
आह, यह शोख समय!
क्या आत्ममंथन के कटकघरे में
तुम्हें खड़ा करूं?
उफ़्फ़, यह दुष्कर दौर!
क्या तुम्हे परे रखने के लिए तुम्हे दुतकारूं?
हाय, यह आततायी आलम!
तुम्हारे आक्रमण से बचाव के लिए
सुरक्षा-कवच कहाँ से लाऊं?
क्या करें, क्या भूलें
क्या न करें, क्या न भूलें
तुमसे अछूता रहने के लिए
खुद को कहां आहूत करें! 
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