Latest Article :
Home » , , , » डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय का निबंध:-इस दौड़ में 'फुरसत' बहुत पीछे छूट गयी है

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय का निबंध:-इस दौड़ में 'फुरसत' बहुत पीछे छूट गयी है

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, जून 20, 2012 | बुधवार, जून 20, 2012

निबंध: कहां गए फुरसत  के क्षण ?



डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो.08290479063,ई-मेल

(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से   रचनाकाल: अगस्त, 1998  प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )

अधिकाधिक उत्पादन और उपभोग पर बल देने वाली जिस सभ्यता का विकास हमारे यहां पिछले कुछ समय में हुआ है, उसने लोगों की  फुर्सत में कमी ला दी है। जिस  फुर्सत का उपयोग करते  हुए पहले वे अक्सर  अपने रिश्तेदारों से मिलते थे, गोष्ठियों या कॉफी हाउस में दोस्तों के साथ गपशप का आनंद लेते थे, अपने किसी कलात्मक शौक को पूरा करते थे तथा और भी कई तरह से अपनी ज़िंदगी में रंग भरने का प्रयत्न करते थे, वह  फुर्सत अब बहुत कुछ उनसे छिन गई है।

यह देख कर बड़ा आश्चर्य होता है कि हमारे देखते देखते  फुर्सत पिछले कुछ वर्षों में ही हमारे शहर व कस्बों से कैसे का फुर्र हो गई है। आज किसी व्यक्ति से आप सप्ताह में एक बार नियमित रूप से सिर्फ़ एक घंटे का समय किसी अच्छे काम के लिए मांग कर देंखे, मेरा दावा है कि निन्यानवे फीसदी से भी अधिक लोगों से आपको इस मामले में निराशा ही हाथ लगेगी। लोग आपको चंदे में सौ पचास रुपए देने को तैयार हो जाएंगे पर नियमित रूप से थोड़ा समय देने को वे बड़ी मुश्किल से ही तैयार होंगे। 

असल में आज हर आदमी अपनी   फुरसत को किसी न किसी भौतिक उपलब्धि के रूप में भुना लेने के चक्कर में पड़ा है। यदि किसी गृहिणी को आज थोड़ी  फुर्सत उपलब्ध है तो वह उसे किसी नौकरी या छोटे-मोटे व्यवसाय में लगा कर उससे दो पैसे कमा लेना चाहती है। यदि किसी बच्चे के पास उसके माता-पिता को थोड़ी भी  फुर्सत नज़र आती है, तो वे इस   फुरसत   को तुरंत उसे किसी कम्प्यूटर प्रशिक्षण या किसी प्रतियोगी परीक्षा में लगाने की प्रेरणा देने लगते हैं। नौकरी पेशा आदमी अपने   फुरसत   के समय में कुछ ओवरटाइम करके या ट्यूशन जैसा कोई धंधा करके थोड़ी अतिरिक्त आय कर लेना चाहता है, ताकि उपभोक्ता बाजार में उसे आकर्षित करने वाली अनेक भौतिक सुविधाओं में से कुछ को वह अपने लिए भी जुटा सके। वस्तुतः उपभोग की ये भौतिक वस्तुएं ही आज हर आदमी का लक्ष्य बनती जा रही हैं। विडम्बना यह है कि काम को शीघ्रता से निबटा कर  फुर्सत की इच्छा करने वाला व्यक्ति कई बार अपनी  फुर्सत को  फुरसत दिलाने वाले कुछ साधनों की प्राप्ति के लिए ही भेंट चढ़ा देता है। 

आज की व्यस्त जीवन शैली ने जिस तरह के सोच को जन्म दिया है, उसमें  फुर्सत वाले व्यक्ति को फालतू समझा जाता है पर यह विचारणीय है कि जो लोग अत्यधिक व्यस्त हैं वे भी कहीं इधर की ईंटें उधर और उधर की ईंटें फिर से इधर रखने जैसे किसी निरर्थक कार्य में तो अपना समय जाया नहीं कर रहे?

इस बात से इन्कार करना मुश्किल है कि जीवन के बहुत से नायाब अनुभवों तक मनुष्य की रसाई तब तक असंभव है जब तक उसके पास उनके लिए पर्याप्त  फुर्सत न हो। जिस व्यक्ति के पास खुले आकाश के नीचे सोने या पहाड़ों की ऊंचाई से चीज़ों को देखने के लिए बहुत समय नहीं है, वह निश्चय ही अपनी तमाम भौतिक उपलब्धियों के बावजूद अपेक्षाकृत दरिद्र व निम्नस्तरीय जीवन जीने की अभिशप्त है। 

मानव जीवन को केवल पैसा या भौतिक उपलब्धियां ही समृद्ध नहीं बनातीं। उच्चतर जीवन के लिए व्यक्ति की संवेदना का भी उच्चस्तरीय होना आवश्यक है।  फुर्सत के अभाव में जिन लोगों का सौन्दर्यबोध अविकसित रह गया है अथवा जो पर्याप्त प्रशिक्षण व अनुभव के अभाव में श्रेष्ठ साहित्य, संगीत, कला आदि की पहचान में असमर्थ हैं मानव के रूप में उनका विकास निश्चय ही अधूरा कहा  जाएगा।

उन बहुत सी उपलब्धियों पर, जो भौतिक उपलब्धियों की भांति दृश्य और मूर्त तो नहीं हैं किन्तु उनके अदृश्य और अमूर्त होने के बावजूद भी जीवन में जिनके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता, आज मानव की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है। वस्तुतः उन अमूर्त उपलब्धियों के लिए भी   फुरसत  की उतनी ही ज़रूरत होती है जितनी कि ठोस और भौतिक उपलब्धियों के लिए। उदाहरणार्थ घनिष्ठ मैत्री भी लोगों से उनके अधिकाधिक समय को साथ-साथ बिताने की मांग करती है। किसी अच्छी कविता के मर्म तक पहुंच कर उसके रसास्वादन के लिए भी उसे काफ़ी   फुरसत  से और कई कई बार पढ़ना आवश्यक हो सकता है। चिन्तन, मनन, प्रेम और प्राकृतिक सौंदर्य के आस्वाद के लिए भी व्यक्ति के पास पर्याप्त  फुर्सत का होना ज़रूरी है। 

ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के समय के प्रसिद्ध कवि वुडवर्थ ने जब अपनी एक कविता में यह कहा कि हम केवल कमाने और खर्च करने में अपनी शक्तियों को नष्ट कर रहे हैं और प्रकृति में उसे नहीं देख पा रहे हैं जो कि हमारा अपना है, तब उसने संभवतः जीवन में  फुरसत के अभाव से उत्पन्न दारिद्र्य को महसूस किया था। हमारी ही सदी के एक अन्य अंग्रेज़ कवि डब्ल्यू.एच. डेविस ने   फुरसत  के अभाव से दुखी होकर लिखाः

   कैसा जीवन फिक्र भरा यह
जिसमें कोई वक्त नहीं है ज़रा ठहर कर
यूं ही तकते रह सकने का
पेड़ों की डालों के नीचे
खड़ी हुई भेड़ों-गायों की भांति
वक्त कहां अब सुन्दरता से नज़र मिला पाने का
देख पाने का कैसे पांव कर रहे नृत्य
आंखों की मुस्कान होंठ तक पहुंचे
इतनी देर प्रतीक्षा कौन करे अब
 निश्चय ही जीवन दरिद्र यह
फिक्ऱ भरा यदि
ठहर कर थोड़ी देर देखते रह सकने के
अवसर से यदि शून्य


 बढ़ती हुई जनसंख्या और प्रतिस्पर्द्धा ने आज शायद हमारी  फुर्सत को सर्वाधिक प्रभावित किया है। लोगों का बहुत सा समय आज दूर-दूर के स्थानों से अपने काम के स्थानों पर जाने-आने में व्यय हो जाता है। बच्चों को आगामी कक्षा में प्रवेश के लिए आज सत्तर-अस्सी प्रतिशत तक अंक चाहिए जो उनसे जी तोड़ मेहनत की मांग करते हैं। हर चीज़ को प्राप्त करने के लिए आज आपको लम्बी लाइन में लगना होता है फिर वह चाहे रेल यात्रा के लिए आरक्षण हो या बिजली के बिल का भुगतान। जहां आबादी कम है वहां अब भी लोगों के पास  फुरसत  है।  फुरसत  आज शहरों से भाग कर गांवों में सर छिपाने की कोशिश कर रही है। 

लोग अब यह भी महसूस करने लगे हैं कि जो लोग सावधान नहीं हैं उनकी बहुत सी   फुरसत  को आज टेलीफोन जैसे दूरसंचार के साधन या टीवी जैसे दृश्य मीडिया चुपचाप लीलते रहते हैं। यह सच है कि आज का मीडिया मनुष्य की सक्रिय सृजनात्मकता को बराबर एक प्रकार की निष्क्रिय यांत्रिकता में बदलने की कोशिश करता रहता है। 

फुरसत  के सही उपयोग की एक कसौटी शायद यह हो सकती है कि उसके द्वारा व्यक्ति निजी स्तर पर कुछ ऐसा हासिल कर पाने का अनुभव करे, जो उसे दूसरों के हासिल से भिन्न लगे। सृजनात्मकता का आनंद ही वस्तुतः मानव को उसकी वास्तविक प्रगति का एहसास करवाता है और उसके जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। इस सृजनात्मकता के अनुभव को साधने और उसे जीवित रखने के लिए हमारी अनेक व्यस्तताओं के बीच भी इसलिए कुछ  फुर्सत को बचा कर रखना हमारे लिए आज बहुत ज़रूरी है। 
                                 
Share this article :

1 टिप्पणी:

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template