Latest Article :
Home » , , , , , » अरुण प्रकाश :एक SMS जो बैचन कर गया

अरुण प्रकाश :एक SMS जो बैचन कर गया

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जून 28, 2012 | गुरुवार, जून 28, 2012


अनंत विजय की डायरी में अरुण प्रकाश 
अठारह जून सोमवार की दोपहर मित्र संजय कुंदन का एसएमएस आयाकथाकार अरुण प्रकाश का निधन सहसा यकीन नहीं हुआ फौरन पलटकर उनको फोन किया तो पता चला कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पास पटेल चेस्ट अस्पताल में अरुण प्रकाश जी ने अंतिम सांसें लीं अरुण प्रकाश जी लंबे समय से बीमार थे और दमे की वजह से कई वर्षों से बार आना जाना भी नहीं हो पा रहा था उन्हें सांस में तकलीफ की वजह से बहुधा ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती थी वो घर पर ही हमेशा ऑक्सीजन सिलिंडर के साथ ही रहा करते थे अरुण प्रकाश से मेरा परिचय नब्बे के आखिरी दशक में हुआ था तब मैं दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक के लिए कथाकारों से बातचीत के आधार पर एक स्तंभ- मेरे पात्र- लिखा करता था पहली बार अरुण प्रकाश जी से फोन पर बात हुई मैंने फोन करने का उद्देश्य बताया  

दिल्ली के साहित्य अकादमी के दफ्तर में मिलना तय हुआ वहां उनसे उनके पात्रों पर बातचीत हुई जो उस वक्त प्रमुखता से छपी थी अरुण जी बेहद खुश हुए थे तबतक अरुण जी कई शानदार कहानियां लिखकर हिंदी साहित्य के आकाश पर छा चुके थे उसके बाद बातों और मुलाकातों का सिलसिला चल निकला गोष्ठियों के अलावा भी हमलोगों की कई मुलाकातें हुई अरुण जी बिहार के बेगूसराय जिले के रहनेवाले थे और मेरा बचपन भी मुंगेर अंचल में बीता था जिला बनने से पहले बेगूसराय भी मुंगेर जिले का ही हिस्सा होता था लिहाजा दोनों इलाके की बोली एक ही थी दो तीन मुलाकातों के बाद अरुण जी से मेरी बातचीत अंगिका में होने लगी थी जो हमारे इलाके की बोली थी वो बातचीत के क्रम में पट्ठा शब्द का खूब इस्तेमाल करते थे मिलते ही बोलते थे - और पट्ठा की हाल छै ठीक छियै के जवाब के बाद ही बात आगे बढ़ती थी अरुण प्रकाश की कहानियों से मेरा पहला परिचय उनकी कहानी- बेला एक्का लौट रही हैं- से हुआ था जो 1986 में छपी थी इस कहानी पर बाद में अरुण प्रकाश को कृष्ण प्रताप स्मृति सम्मान मिला था उसके बाद मैंने उनकी दो तीन और बेहतरीन कहानियां पढ़ी जिसमें जल प्रांतर और भैया एक्सप्रेस मेरे जेहन में अबतक हैं अरुण प्रकाश से जब उनकी कहानियों पर बात हुई थी तो उन्होंने विस्तार से बताया था कि वो अपने पात्रों को वास्तविक और काल्पनिक जीवन से उठाते हैं उन्होंने यह माना ता कि वास्तविक जीवन के पात्रों को उठाने के बाद कहानीकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस पात्र की वास्तविकता को मिटाने की रहती है अरुण जी ने तब यह कहा था कि वो एक ऐसा पात्र गढ़ना चाहते थे जो कहानी के प्लाट के उपयुक्त राजदूत हो, बल्कि गोर्की की मदर की तरह युग का भी प्रतिनिधित्व कर सके पता नहीं अरुण प्रकाश की ये ख्वाहिश पूरी हो पाई या नहीं

अरुण प्रकाश बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे उन्होंने कहानियों के अलावा फिल्मों के लिए भी जमकर लेखन किया उनहोंने कई आलोचनात्मक लेख भी लिखे अखबारों में भी नौकरी की बाद के दिनों में अरुण प्रकाश साहित्य अकादमी की हिंदी पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के संपादक बने अरुण प्रकाश को कमलेश्वर बेहद पसंद करते थे   वो दौर साहित्य अकादमी में गोपीचंद नारंग और कमलेश्वर की जुगलबंदी का था एक दिन मैं और मेरे मित्र जयप्रकाश पांडे उनसे मिलने साहित्य अकादमी के दफ्तर में पहुंचे अरुण जी संपादक की कुर्सी पर विराजमान थे, बीड़ी पी रहे थे बातचीत हुई लेकिन उस वक्त अरुण जी हमसे बेहद अनमने ढंग से मिले पता नहीं क्यों मुझे लगा कि हमारे वहां आने से वो खुश नहीं हुए थे मुझे लगा कि ये वो अरुण प्रकाश नहीं हैं संबंधों की गर्माहट और अपनापन के बीच संपादक की कुर्सी चुकी थी मैंने जब उनसे अंगिका में बोलना शुरू किया तो वो विशुद्ध हिंदी में बात करने लगे मुझे लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है काफी देर सोचा लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका साहित्य अकादमी से बाहर निकने के बाद मन टूट चुका था पांच साल के उनके संपादकी के दौरान हमारा उनसे मिलना नहीं हो पाया बाहर भी मेल मुलाकात कम हो गया था, फोन पर भी बातें कम होते होते बंद हो गई गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक गोष्ठी में दो हजार चार में मेरी अरुण जी से अंतिम मुलाकात हुई थी। उसके बाद उनसे मुलाकात नहीं हो पाई।

अरुण जी से गांव दियार की बातों के अलावा साहित्य की राजनीति पर भी बातें होती थी उनकी बातों से हमेशा ये दर्द झलकता था कि हिंदी साहित्य के कर्ताधर्ताओं ने उनको वो जगह नहीं दी जिसके वो हकदार थे एक कहानीकार के तौर पर उनको लगता था कि वो अपने दौर के श्रेष्ठ कहानीकार थे उदय प्रकाश को लेकर उनके मन में एक ग्रंथि थी उन्हें लगता था कि उदय प्रकाश से बेहतर कहानीकार होने के बावजूद आलोचकों ने उन्हें अपनी नजरों से ओझल करने की कोशिश की। मेरा मानना है कि अरुण प्रकाश हिंदी के बेहतरीन कहानीकारों में से एक थे एक छोटे से उपन्यास कोंपल कथा के अलावा अरुण प्रकाश ने करीब चार दर्जन कहानियां लिखी उनकी कहानियों के तकरीबन दो सौ पात्रों में से भैया एक्सप्रेस का विशुनदेव, जल प्रांतर की माई और पुजारी, बेला एक्का लौट रही हैं की बेला, कहानी नहीं की सवितरी, गजपुराण के किला बाबू, विषम राग की कम्मो, स्वप्नघर की अंजलि साठे को हिंदी की आनेवाली पीढियां याद रखेंगी और युवा कहानीकारों के लिए उस तरह के पात्रों को रचना एक चुनौती होगी।

अरुण प्रकाश पहले दिल्ली शालीमार गार्डन इलाके में रहते थे कालांतर में वो मयूर विहार इलाके में रहने गए थे उनके आसपास कई वरिष्ठ साहित्यकार रहते हैं लेखक संगठनों के पदाधिकारी भी लेकिन जब दिल्ली के लोदी रोड शवदाह गृह में अरुण प्रकाश का अंतिम संस्कार किया जा रहा था तो उनके पड़ोसी साहित्यकार और लेखक संगठनों के पदाधिकारी वहां नहीं पहुंच पाए महानगरीय जीवन की आपाधापी में उन लेखकों को अरुण प्रकाश के अंतिम संस्कार में पहुंचने का वक्त नहीं मिल पाया हां इतना अवश्य किया कि अरुण प्रकाश के निधन पर अखबारों के लिए बयान जारी कर दिया, लेखक संगठनों के नाम पर अरुण प्रकाश के निधन से एक बार फिर से लेखक संगठनों के होने पर सवाल खड़े हो गए हैं मैं कई बार इस बात को उठा चुका हूं लेखक संगठन लेखकों की मौत के बाद एक शोक संदेश जारी कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं बहुत हुआ तो एक शोकसभा की रस्म अदायगी भी कर लेते हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या लेखक संगठनों से जुड़े उनके पदाधिकारी लेखकों में मानवीय संवेदना बची है या फिर वो मशीनी तौर तरीके से काम करते हैं क्या किसी भी लेखक संगठन ने ये जानने की कोशिश की कि अरुण प्रकाश के परिवार को किसी तरह की कोई जरूरत है या फिर दिल्ली जैसे महानगर में जिस परिवार पर दुख का पहाड़ टूटा है उसको ये एहसास दिलाया गया कि पूरी लेखक बिरादरी दुख की इस घड़ी में उनके साथ है कतई नहीं तो फिर इन लेखक संगठनों का क्या औचित्य है  

क्या ये लेखक संगठन चंद मठाधीशों के चंगुल में हैं जो अपने लाभ के लिए इस मंच का इस्तेमाल करते हैं अब वक्त गया है कि हिंदी के युवा लेखकों को इन संगठनों पर काबिज बुढ़ाते लेखकों से ये सवाल पूछना चाहिए कि कब तक इस तरह से चलता रहेगा या फिर जिस तरह से इन लेखक संगठनों के राजनीतिक आकाओं को जनता ने नकार दिया है उसी तरह से हिंदी के लेखक भी इन संगठनों को नकार दें अब वक्त गया है कि हिंदी समाज लेखक संगठनों से हिसाब पूछेगा कि आखिर इनकी पॉलिटिक्स क्या है






अनंत विजय
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के दाँव-पेच सीखने वाले कलमकार हैं.आई.बी.एन.-7 के ज़रिये दर्शकों और पाठकों तक पहुंचे अनंत विजय साल दो हज़ार पांच से ही मीडिया जगत के इस चैनल में छपते-दिखते रहें हैं.उनका समकालीन लेखन/पठन/मनन उनके ब्लॉग हाहाकार पर पढ़ा जा सकता है.अपनी स्थापना के सौ साल पूर चुकी दिल्ली के वासी हैं.-journalist.anant@gmail.com

Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template