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धर्मनिरपेक्षता Vaya व्यंग आलेख By संजीव निगम

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, जून 12, 2012 | मंगलवार, जून 12, 2012



वे कोई आम नेता नहीं थे बल्कि  सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि से घोषित रूप से धर्मनिरपेक्ष नेता थे. अक्सर अखबारों में उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि फोटो समेत छपती रहती थी. शहर के प्रायः सभी धर्मनिरपेक्षता सम्बन्धी समारोहों में वे ऐसी  ही प्रमुखता से सुशोभित होते थे जैसे किसी डिस्कोथीक में डीजे . इसी प्रकार वे निरपेक्ष  भाव से   शहर की  समस्त धर्मनिरपेक्ष संस्थाओं व दलों को अपनी उपस्थिति से उपकृत करते रहते थे.दूरदर्शन पर जब भी कोई धर्मनिरपेक्षता सम्बन्धी कार्यक्रम होता तो उसमे वे हमेशा मौके की जगह बैठे हुए सीधे कैमरे में झांकते दिखाई पड़ा करते थे.

मुझे उनकी यह सर्वव्यापी छवि हमेशा आकर्षित करती रही थी. इसलिए एक दिन जब वे अचानक मेरे सामने पड़ गए तो मैंने आव देखा न ताव और किसी लक्ष्यभेदी मिसाइल की तरह सीधा उनके चरणों में जा गिरा.  श्रद्धा के इस अप्रत्याशित हमले से वे  जब तक संभलते , तब तक मै उनके धूल धूसरित चरणों की धूल कुछ कम कर चुका था. अब तक वे भी प्रसन्न हो गए थे.

मैंने किसी घिसे हुए चमचे से गदगदाए स्वर में उनसे कहा, " मान्यवर, मै आपका बहुत बड़ा और बहुत पुराना प्रशंसक हूँ. और आपकी विचारधारा से तो सौ फीसदी प्रभावित हूँ." यह सुनकर वे आदतन मुस्कराए और फिर बड़प्पन से बोले, " लाखों लोग हमसे प्रभावित हैं.इसमें नयी बात क्या है." मैंने अपने जुड़े हुए हाथों को उनके कमल नयनो के फोकस में लाकर कहा," नयी बात है प्रभु, नयी बात है. आपकी विचारधारा ने मुझ पर वह जादू कर रखा हैकि मैंने आपको अपना द्रोणाचार्य और खुद को आपका एकलव्य मान रखा था . पर मै चाहता हूँ कि अब ये विडियो कोंफेरेंसिंग टाइप रिलेशनशिप ख़तम हो और आप मुझे अपनी सीधी शागिर्दी में ले लें."
वे कुछ जल्दी में थे , बोले,"बेटा , अभी ज़रा मै जल्दी में हूँ. एक मंदिर निर्माण समिति की बैठक में भाग लेने जाना है. फिर कभी फुर्सत से बात होगी." यह कह कर उन्होंने कदम आगे बढाया ही था कि मैंने पालतू कुत्ते की तरह लपक कर  उनका कुर्ता पकड़ लिया. मैंने कहा ,"अच्छा , मंदिर निर्माण समिति की बैठक में जा रहे हैं, तो फिर वापसी में किसी मस्जिद निर्माण समिति की बैठक में भी अवश्य जायेंगे. अक्सर अखबारों में पढता  रहता हूँ कि आप अपनी धर्मनिरपेक्षता को साबित करने के लिए सभी धर्मों के धर्मस्थलों का  दबादब दौरा करते रहते हैं." मैंने यह कह कर इस धर्म प्राण  देश के धर्मनिरपेक्ष आन्दोलनों पर अपनी गहरी पकड़ प्रर्दशित करनी चाही.

उन्होंने मुझे उपेक्षा की दृष्टि से देखा और कहा," बेटा,  भावुकता के स्वीमिंग पूल में गोते मत लगाओ. तुमने जो पढ़ा  है वह हमारा सार्वजनिक जीवन है और ये जो तुम देख रहे हो वह हमारा निजी एवं गोपनीय जीवन है."  किसी गुप्तरोग जैसे उनके इस छिपे रूप ने मुझे और भी ज्यादा प्रभावित किया.धरम और निरपेक्षता का कैसा अद्भुत सामंजस्य था.मै उनका चेला बनने के लिए उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया था. वे जहाँ कहीं भी अपनी धर्मनिरपेक्षता के फूल बिखेरने जाते , मैं उनके साथ ऐसे चिपका रहता था जैसे अमिताभ के साथ अमरसिंह चिपका रहा करते थे  . अब दूरदर्शन पर उनके ठीक पीछे बैठे हुए मेरा दिखना भी अनिवार्य सा हो गया था. उनकी सभाओं में उपस्थित रहनेवालों की सूची में मेरा नाम स्थायी रूप से दर्ज हो गया था.

उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि के मद्देनज़र उन पर चुनाव लड़ने के लिए सभी धर्मनिरपेक्ष दलों की ओर से भारी दवाब था.आखिरकार एक दिन वे एक धर्मनिरपेक्ष दल की ओर से चुनावी रणभूमि में कूद पड़े. ज्यों ज्यों चुनाव प्रचार तेज होता गया, उनकी धर्मनिरपेक्षता में भी निखार आता गया.वे किसी नक्षत्र की तरह मंदिरों,मस्जिदों,गिरजाघरों की निरंतर परिक्रमा करने लगे थे.कभी वे किसी देवी जागरण में मुख्य अतिथि होते तो कभी किसी मस्जिद के बाहर खड़े नमाज़ ख़त्म होने का इंतजार कर रहे होते थे. बीच में समय निकाल कर गुरूद्वारे की सीढियाँ भी  धो डालते थे. उन दिनों वे जहाँ भी जाते थे उसी धर्म के गुण गाने लगते थे.लेकिन अपनी इस धर्मनिरपेक्ष धार्मिकता के बावजूद वे चुनावी संग्राम में वीरगति को प्राप्त हो गए . उन्होंने टीवी कैमरों के सामने इसे सांप्रदायिक ताकतों का षड्यन्त्र बता कर जी भर कर अपनी भड़ास निकाली.कुछ दिनों तक मातम मनाने के बाद, वे चुनावी शहीदों को इकट्ठा करके कोई सातवाँ - आठवाँ मोर्चा बनाने में जुट गए और मैं अपने लिए कोई नया भविष्य तलाशने में जुट गया था. 

काफी दिनों बाद उनसे पुनः भेंट हुई तो वे कुछ दुखी से दिखे. मैंने औपचारिकता वश कारण  पूछा तो वे फट पड़े, बोले," क्या बताऊँ आजकल अपना बेटा एक विधर्मी लड़की के चक्कर में पड़ा हुआ है और शादी करने की जिद कर रहा है." मैंने कहा ," तो इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है?वह तो आपकी सार्वजनिक छवि  को ही मजबूत कर रहा है." उन्होंने इस बार अपने ओसामा नेत्रों से मुझे घूरा और आगे बढते हुए बोले,"ऐसी की तैसी साले सिद्धांतों की. मैं तो ये सोच कर परेशान हूँ कि किसी दूसरे धरम की लड़की के हाथ की रोटी कैसे खाऊँगा." इस बार फिर से उनकी धर्मनिरपेक्षता मुझे चक्कर में डाल गयी थी.


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
संजीव निगम 

हिंदी के चर्चित रचनाकार.  कविता, कहानी,व्यंग्य लेख , नाटक आदि विधाओं में सक्रिय रूप  से  लेखन कर रहे हैं. अनेक पत्रिकाओं-पत्रों में रचनाओं का लगातार प्रकाशन हो रहा है. रचनाएं कई संकलनों में प्रकाशित. कई सम्मान प्राप्त.कुछ टीवी धारावाहिकों,18  कॉर्पोरेट फिल्मों का लेखन.आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से 16 नाटकों का प्रसारण.

मूलतः दिल्ली निवासी पर अब मुंबई में स्थायी निवास. यहाँ की कई साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए.एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मुख्य प्रबंधक [मार्केटिंग, प्रचार व जनसंपर्क ] के  पद से स्वेच्छा से त्यागपत्र देकर अब सक्रिय रूप से स्वतंत्र लेखन. विज्ञापन जगत से जुड़े हुए. जनसंपर्क  व विज्ञापन विशेषज्ञ 


डी - २०४,संकल्प-२,पिम्परिपाडा,
फिल्म  सिटी रोड,
मलाड [पूर्व], मुंबई-४०००९७. 
ई -मेल :sanjiv_nigam@yahoo.co.in

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