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हमारे चारों तरफ जो बाज़ार है किसी को नहीं छोड़ता Vaya 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जून 28, 2012 | गुरुवार, जून 28, 2012


लम्बाई /ऊंचाई के साथ ही वैचारिक स्वरुप में हर कद की कविताओं के इस संग्रह में देखा कि ये हमारे चारों तरफ जो बाज़ार है किसी को नहीं छोड़ता।और मिलने वालों के साथ ही सगे संबधियों को तो बिल्कुल भी नहीं टिकने देता।तमाम रिश्ते ताक में रख कर ये लूटना-खसोटना जानता है।ये सभी विचार बहुत सलीके से अपनी कविताओं में शामिल करने का हुनर डॉ.अरविंद में यहाँ हमने पाया है।बाज़ार के इसी परिदृश्य में मानवीय रिश्तों के बीच घटती भीतर और बाहर की परिस्थितियाँ आदमी को बहुत कुछ सोचने को प्रेरित करती हैं।यहाँ बाज़ार से बिना प्रभावित हुए प्रकृति में कुछ गतिविधियाँ स्वत;  भी चलती रहती है।इस सच का भी यहाँ पुनर्स्थापन हुआ है।-  सम्पादक 


 डॉ.अरविंद श्रीवास्तव जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है।



बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।यहाँ आपके सध्य प्रकाशित कविता संग्रह 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'  से कुछ कवितायेँ प्रकाशित की जा रही है .मूल रूप सेराजधानी में एक उज़बेक लड़कीसमसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशियाक्ष महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया.


बाजार 

1.
पहले दबोचा
फिर नोचा कुछ इस तरह
कि
मजा आ गया!

2.
उड़ा ले गयी
छप्पर का पुआल
देह की मिरजई

बाजार वेपर्द करती है
बेरूखी से।

3.
पहले खरीदता हूँ
चमकीले
काँच के टुकड़े
बिखेड़ता हूँ जिन्हें
फर्श पर
बीनता हूँ फिर
बारीकियों से

किसी खतरे के अंदेशे में।



प्रेम

1.
अच्छा लगा
प्रेम में पहाड़ बनना

और अच्छा लगा
उस पहाड़ का
प्रेम में
पिघल जाना।

2.

प्रेम में पराजित हुआ
तो क्या हुआ ?

प्रेम के लिए
युद्ध तो लड़ा !


राजधानी में

राजधानी के सबसे व्यस्त और चर्चित नर्सिंग होम में
माँ ने दम तोड़ दिया

वह अनेमिया से पीड़ित थी और उसे
तुरंत जरूरत थी खून की

स्थापित ब्लड-बैंकों में खून के बदले खून
एक दस्तूर था, एक परंपरा थी और थी
उसकी मजबूरी

राजधानी में इक्का-दुक्का ताल्लुकात थे मेरे
चंद फ्राड किस्म को छोड़
शेष ने चिरौरी और मिन्नतों के पश्चात
दिये खून
फिर जाकर खून मिला माँ के मैचिंग का

चिकित्सकों ने और ज्यादा खून की जरूरत बतायी
बढ़ गयी मेरी बेचैनी
खून की तलाश में भटकते-भटकते
निचुड़ चुकी थी मेरी ताकत

मेरी ताकत
जो कभी
मेरी माँ हुआ करती थी।




किस्से का एक मामूली आदमी

बतौर एक मामूली आदमी
शामिल होता है वह इस किस्से में
मानवीय गुणों के अनुरूप
उसके अन्दर भी होती है अनन्त जिजीविषाएँ
और नायकत्व की सारी खूबियाँ
चाँदनी और अंधेरी रातों में चलने का हुनर
संवेदनाओं को पालने और सुविधानुसार
चबाने का इल्म
किसी लाचार कुत्ते और दबंग बाघ से गुर
नायकत्व की दावेदारी में
अब उसे कातिल बनने से गुरेज नहीं है
जानता है वह नायक बनने के लिए
खलनायक बनने की अनिवार्यता

वह सबसे पहले हत्या करता है उसकी
जिसकी बदौलत वह शामिल हुआ किस्से में
किरदार निभाने के लिए

वह एहतियातन हमसफरों पर एतबार नहीं करता
करता है वह मकसद के लिए उठाईगीरी
और कई-कई हत्याएँ
अपने बेजोड़ और गैरमामूली अभिनय से

बटोरता है तालियाँ और छा जाता है
कथा पटल पर

जिसे बड़े ध्यान से देख रहा होता है
इस किस्से में शामिल होने वाला
एक मामूली नया किरदार!


पुतली

इकट्ठे हो रहे हैं सपने
उम्मीद और कविताएँ
धरती के सारे रंग-रोगन
अक्षर और चित्रकारी
चिड़िया और गुब्बारे
मॉल-सड़कें
नदी-पहाड़
स्त्रियाँ-बच्चे
प्रेम और अवसाद
अदमी और सभ्यताएँ
इकट्ठे हो रहे हैं
आँखों की पुतली में

पुतली का आंगन कितना बड़ा है
और कितने छोटे हैं हम
कि तनिक भी नहीं
सहेज पा रहे इन चीजों को




बगैर सूचना

मैने धरती को ठगा
और आ गया धरती पर

ओस बूँदे अभी-अभी टपकी थी धरती पर
अभी-अभी मादक हुई थी हवाएँ
स्वच्छ निर्मल जल अभी था अछूता
अभी था आकाश विश्राम की अवस्था में
और मैं आ गया

यह कोई वक्त नहीं था
मैंने कोई आदेश नहीं लिया
क्षमा करना मुझे
नहीं भेजा कोई प्रार्थना पत्र
नहीं कटाया किसी प्रकार का टिकट कोई
और नहीं किया धरती को हमारी जरूरत या
गैर जरूरत पर विचार किसी ने

बस मैंने धरती को ठगा
और आ गया धरती पर
देवताओं को साथ लेकर !

कला


अदृश्य होने की कला
इंसानों में नहीं होती है
राजनीतिज्ञ है तो
बात ही जुदा!




बचपन

जब मैं बहुत छोटा था
खेलता था
आकाश के साथ !

प्रकाशक 


यश पब्लिकेशन्स
1/10753,गली न.3,
सुभाष पार्क ,
नवीन सहादरा,
कीर्ति मंदिर के पास 
दिल्ली-110032,
मो-09899938522
वेबसाईट-www.yashpublications.com
ई-मेल-yashpublicationsdelhi@gmail.com
सजिल्द मूल्य-195/-


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