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कहावतों में मोहन थानवी का हाथ-2

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, जुलाई 10, 2012 | मंगलवार, जुलाई 10, 2012


मोहन थानवी
साहित्यिक अभिरुचि
 संपन्न पत्रकार,
वर्तमान में हिंदी दैनिक
 के उप-सम्पादक

हिन्दी, सिन्धी एवं 
राजस्थानी साहित्यकार
विश्वास वाचनालय, 82,
सार्दूल कॉलोनी बीकानेर 
mohanthanvi@gmail.com














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गिरे पड़े वक्त का टुकड़ा  
आजकल लोग बचत की महत्ता खूब जान गए हैं। ऐसे ऐसे झटके सरकार और बाजार ने दिए हैं कि लोग पेट्रोल के खर्च पर भले ही अंकुष नहीं लगा पाते लेकिन पेट्रोल पंप वाले तेल देखो तेल की धार देखो को मानते हुए कीमतें बढ़ने की ब्रेकिंग न्यूज की चलती पट्टी के पहले राउंड को पूरा करने से पहले ही तेल का स्टॉक बचा कर ‘नो स्टॉक’ का बोर्ड तान देते हैं। लेकिन यह बचत नहीं नहीं लोगों पर चपत है। लोक जीवन में बहुत सी बाते अमीर - गरीब सभी वर्गों के लोगांे पर लागू होती हैं। गरीब से गरीब व्यक्ति भी आने वाले समय के लिए कुछ न कुछ बचा कर रखना चाहता है। अमीर लोग बचत को निवेष करते हैं। वक्त बीत गया लेकिन इस व्यवस्था में कोई नया ‘वाद’ नहीं आया। राजे महाराजे बि गरीब की भलाई और भविष्य के लिए योजनाएं लागू करते ही थे। आज लोक तंत्र में भी ‘सामुदायिक सरकारें’ ऐसा करती हैं। राजषाही में धनिक और महाजन ‘ठाठ’ करते थे और आज भी गरीबी से जूझते लोग ‘टाट’ पर जीवन बिता देते हैं। अपने अपने कर्मां के फल की बात विद्वान लोग कहते ही रहे हैं और समाज के लोग मानते ही रहे हैं। बावजूद इन सब के, हरेक आदमी के काम तो गिरे पड़े वक्त का टुकड़ा ही आता रहा है। यानी समय पर काम में लेने के लिए बचा कर रखा गया धन और सुयोग्य व कमाने वाला बेटा। और बेटियां भी बेटे से कम नहीं होती यह बात भी समाज जानता है भले ही उसे बेटी को ‘पराया धन’ कहा जाता रहा हो। 

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... इन्हें भेंट बिन जो मिले, होय न पूरन काज 
अब कौन बीते वक्त को याद करता है लेकिन ‘गुजरा हुआ जमाना’ है कि जबरदस्ती बातचीत में घुस ही जाता है। लोग भूल जाते हैं कि बीते ताही बिसार दे आगे की सुधि ले। ऐसा खासतौर से तब होता है जब ‘‘बंदे को बंदे में नहीं बात में दम’’ दिखाई देता है। आज भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए गली कूंचे से जन सैलाब ‘‘राजभवनों’’ की ओर बढ़ रहा है लेकिन कुछ लोग ‘‘ सुनहरे बीते जमाने का याद कर अपना लेनदेन का काम’’ जारी रखे हुए हैं। आस्था और सेवा भावना से ‘‘गुरुजनों’’ या ‘‘’समाजसेवियों’ को दान दक्षिणा देना तो परंपरा है। सामाजिक व्यवस्था का अंग भी कह सकते हैं क्योंकि सही मायनों में पात्र लोगों को दान दक्षिणा के बिना उनका जीवन यापन प्रभावित होने का अंदेषा रहा जबकि वे भी सही मायनों में समाज की भरसक सेवा करते रहे। बड़े बुजुर्गों ने इन समाज सेवकों एवं विद्वजनों के बीच कुछ और लोगों को भी दान दक्षिणा का आदी बनते देखा तो नई पीढ़ी तक संदेष कुछ इस तरीके से पहुंचा - 

गुरु, बेद और जोतसी, देव, मंत्री, अरु राज। 
इन्हें भेंट बिन जो मिले, होय न पूरन काज। 

अब बीते वक्त की इन बातों में विद्वानों के साथ षामिल मंत्री और राज वर्ग के ‘‘बंदो’’ को ‘‘दम’’ नजर आता है तो ‘‘तहलका’’ मचता ही है। भला इसमें उनके फालतू खर्च के बढ़ते बिल का क्या कसूर ....! जिसकी पूर्ति के लिए कई बार वे रंगेहाथ भी सामने आते हैं... !

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ताज़ी को मारा और तुरकी कांपा  
आज किसी को गाय - भैंस या घोड़े पालने की सूझती भी नहीं । ताज़ी और तुरकी घोड़ों के मालिक आज भी धनिक कहलाते हैं लेकिन जो लोग पषु पालन कर सकते हैं वे भी गांवों से इस ओर से मुंह मोड़ कर षहर में बाइक पर फर्राटे भरने की मंषा रखते हैं। सरकार भले ही पषुपालन विकास के लिए सौ तरह के जतन कर ले। दरअसल जब बाजार में दूध मिलता है तो गाय पालने का झंझट कौन उठाएं वाली बात समाज में बड़े वर्ग की मानसिकता बन गई है। तेज रफ्तार जमाने के साथ चलने के लिए आज बैल गाड़ी नहीं बाइक और कार जीप की जरूरत है। असल में आधुनिक होते जमाने के साथ गाय भैंस और घोड़े आधुनिक नहीं हो सके। वे बेचारे घास खाकर सेवाएं देते रहे जबकि लोगों की जरूरत धरती का दोहन कर निकले तेल से पूरी होने लगी है। भले ही वो तेल अब महंगा हो गया और जेब का तेल निकालने लगा है। अजीब बात तो यह है कि तेल की कीमतें बढ़ते ही पसीना इसलिए छूट जाता है, क्योंकि अब सभी चीजें महंगी होगी। इसी कारण लगता है बीते जमाने में अनुभवी लोगों ने कहा, ताज़ी को मारा और तुरकी कांपा। एक पर रोब जमा लेने से दूसरे पर भी रोब जम जाता है और धरती की गोद से बेरहमी से निकाला हुआ तेल इसे क्रियान्वित कर रहा है। 

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तिनके की चटाई, नौ बीघा फैलाई 
आदमी का स्वभाव वक्त बीतने के साथ बदलता है और हम कहते हैं वक्त बदल गया। लेकिन आदमी का दिखावा करने का स्वभाव कितना ही वक्त बीत जाए, बदलने का नाम ही नहीं लेता। कोई न कोई कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर दिखावा कर ही लेता है। किसी काम को बढ़ा चढ़ा कर भी पेष किया जाता है। तिनके की चटाई, नौ बीघा फैलाई। काम से अधिक प्रचारित करना। गंभीरता से किए जाने वाले कामों का भी ऐसा हश्र होता देख जानकार आदमी अफसोस जताता है। अक्सर सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार में ऐसा होता है। कुछ निजी क्षेत्र की कपनियां भी अपने लाभ को बढ़ाने के लिए अपने कामों को बढ़ा चढ़ा कर प्रचारित करती हैं। ऐसी ही प्रवृत्ति किसी व्यक्ति में भी दिख जाती है। बिजनेस के लिए प्रचार करना तो फिर भी समझ में आता है जैसे कि किसी सिनेमा के रिलीज होने के तीन चार महीने पहले से ही प्रतिदिन टीवी चैनल और अखबारों में रोजाना आठ दस बार प्रोमो दिखाना। इस तरह जितनी संख्या में प्रोमो दिखाया जाता है कुल उतने दिनों तक कोई फिल्म सुनहरे पर्दे पर टिकती भी है। इसकी जानकारी हो भी तो फर्क क्या पड़ेगा। हां, सीधा समाज और लोगों के हित से जुड़े सरकारी और अन्य क्षेत्रों के कामों के बारे में ऐसे प्रचार का असर पड़ता है। लोगों की जेब से ही निकाली गई राषि से भरी सरका की तिजोरी जो खाली होती है।
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