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कहावतों में मोहन थानवी का हाथ-3

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, जुलाई 14, 2012 | शनिवार, जुलाई 14, 2012


मोहन थानवी
साहित्यिक अभिरुचि
 संपन्न पत्रकार,
वर्तमान में हिंदी दैनिक
 के उप-सम्पादक
हिन्दी, सिन्धी एवं 
राजस्थानी साहित्यकार
विश्वास वाचनालय, 82,
सार्दूल कॉलोनी बीकानेर 
mohanthanvi@gmail.com










 
                                                                                           

बरसे सावन, तो हों पांच के बावन

कहावतों में बारिश - साहित्य की विविध विधाओं में लोकजीवन केन्द्रित ऐसी बातें समाहित हैं जिनसे भारतीय समाज की बौद्धिकता और अनुभव आने वाली पीढ़ी को राह दिखाते हैं। लोकरंजन के साथ हमारे पर्व त्योहार और तिथि-वारों की जानकारी भी साहित्य से मिलती है। कहावत और मुहावरे भाषा का गहना ही नहीं बल्कि आवश्यक तत्व भी हैं। वर्षा संबंधी बहुत-सी कहावतें हैं। वर्षा होने, न होने के लक्षण बताने के साथ ही ये इसका प्रभाव भी प्रकट करती हैं। पावस ऋतु में वार-त्योहार बहुत होते हैं और इसीलिए लगभग प्रतिदिन घर-घर पकवान-व्यंजन बनाए जाते हैं, तभी तो कहते हैं - - बरसात में कड़ाही घर घर। - सावन सिवा उपसा - सावन में शिवजी की उपासना की जाती है। पूर्व समय में पुरुष कमाने के लिए परदेस जाते थे और बारिश होने पर अपने खेतों पर लौटते थे, तभी से स्त्रियों में कहावत प्रचलित है- बरसात वर के साथ।          

उदाहरण के रूप में कुछ और दोहे और कहावतें -  

- स्वांत बूँद सीपी मुक्त, करदली भयो कपूर, कारे के मुख बिखर भयो, संगत सोभा सूर। 
- बरसे साढ़ तो बन जा ठाट 
- जेठ तपत हो बरखा गहरी, हंसे बांगरू, रोवे नहरी
- जो जल आषाढ़ लगत ही बरसे, नाज नियार बिन कोई न तरसे 
- जो सावन में बरखा होवे, खोज काल का बिल्कुल खोवे
- सूखे धानों पानी पड़ा, जब फसलों को पानी न मिले और वे सूखने के कगार पर हों तब बरसात होने पर कहा जाता है। 
- बिजली चमके मेेहा बरसे
- बरसे असौज, हो नाज की मौज
- बरसे सावन, तो हों पांच के बावन

खूब बरसेगा पानी तब...

- सावन षुक्ला सप्तमी, छिपके ऊगे मान। कहे घाघ सुन घाघनी, बरखा देव उठान। 
- कीड़ी कण आसाढ़ मै, मांय ले जाती देख, तो अन-त्रण री काळ व्है, ई मै मीन न मेख
- कीड़ा पड़ै गोबर रै मांय, पपइयो मीठो बोल सुणाय, अमल चामड़ौ गीलो होय, बिरखा हुवै नी संसै कोय।
- किरती अेक झबूकड़ौ, औगण से गळिया - मतलब, कृतिका नक्षत्र में बिजली चमकै तो पहले के सभी अपषकुन मिटा देती है

बरसात संबंधी ये कहावतें भी प्रसिद्ध हैं -

जो गरजते हैं वो बरसते नहीं। ऐसी ही एक और कहावत है - बरसा थोड़ी भभरौटी बहुत। मतलब साफ है। डींग तो बहुत मारना किंतु काम न के बराबर करना। बरसात के समय जिन्हें तकलीफ होती है उनमें ऊंट षामिल है - ऊंट की बरसात में कमबख्ती। कुछ और कहावतें जिनका अर्थ स्पष्ट है - आस-पास बरसे दिल्ली पड़ी तरसे। - सूखे सावन रूखे भादो। - सूखे मां झड़बेर घने हों, सम्मत मां अन ढेर घने हों। - सुखार दुहार आसमानी फरमानी है। - सावन मास बहे पुरवैया, बेचे बरदा कीनी गैया। - सावन घोड़ी, भादों गाय, माघ मास में भैंस बयाय, जी से जाय या खसमें खाय। 

बच्चे और युवा बरसात का आनंद अपने ही तरीके से उठाते हैं। बारिष और आए इस कामना के साथ कहते हैं - बरसो राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई फाके से। - बरसेगा, बरसावेगा, पैसे सेर लगावेगा बरसात और बारात में मौज मस्ती करने वाले युवाओं के लिए कहा जाता है - बरात का छैला, सावन का खैला। खूब बारिष की कामना तो हर कोई करता है किन्तु बीते जमाने में साहूकार के जाल में पड़े किसान यह भी कहते थे - बरसेगा मेह होंगे अनन्द, तुम साह के साह, हम नंग के नंग। 

और अंत में -
- बदली में दिन न दीसे, फूहड़ बैठी पीसे - बीते जमाने में अलसुबह मुंहअंधेरे महिलाएं घर के कामकाज निपटाती थीं। ऐसे में नादान महिलाओं को बादल छाये रहने के कारण सूरज निकलने का भान नहीं होता था और वे अभी भी सुबह न हुई समझ झाड़ू बुहारी में व्यस्त रहती थी।  - सावन हरे न भादों सूखे। यह प्रसिद्ध कहावत अपने आप में स्पष्ट है। 


पावस ऋतु में ध्यान रखें
- कै मारै बादळ री घाम, कै मारै बैरी रो जाम। मतलब बादल छाये रहने पर धूप-छांव का खेल होता है तब धूप स्वास्थ्य के लिए दुष्मन मानी जाए। तभी तो यह भी कहा जाता है कि - बदली की धूप जब निकले तब तेज। इसी के साथ यह भी प्रचलित कहावत है - सावन सोवे सांथरे, माह खुरैरी खाट, आपहि वह मर जाएंगे, जो जेठ चलेंगे बाट। इसी के साथ बड़े बुजुर्ग यह भी कहते हैं - आंधी आवे बैठ जाए, पानी आवै भाग जाए। सावन में खानपान संबंधी कहावत है - सावन साग न भादो दही, क्वार मीन न कातिक मही। यह भी कहा जाता है - सावन की न सीत भली, जातक की न पीत भली । 

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