''मैं समाजवादी व्यवस्था में ही वर्तमान संकट का हल देखता हूँ ।’'-भागीरथ भार्गव - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''मैं समाजवादी व्यवस्था में ही वर्तमान संकट का हल देखता हूँ ।’'-भागीरथ भार्गव


आलेख By डा0 शिबन कृष्ण रैणा

मानवीय गरिमा के कवि-भागीरथ भार्गव
जन्म 4 जुलाई 1937,स्वर्गवास 6 मार्च 2007

               कविता प्राचीनकाल से ही मानव की भावाभिव्यक्ति का सहज माध्यम रही है।सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ-साथ उसके रूप-विन्यास,भाव-लोक,अभिव्यक्ति शैली  आदि में परिवर्त्तन-परिष्कार होता रहा है।सहृदय व्यक्ति अपने परिवेश के प्रति सजग होकर जब चिंतन-मनन करता है तो प्रतिक्रिया स्वरूप उसके विह्वल एवं उद्वेलित मन से निःसृत होने वाले उद्गार या भाव कविता बन जाते हैं। ऐसी कविता युगबोध  की साक्षी बनकर कवि की सोच एवं उसकी दृष्टि को रेखांकित  करती है तथा मनुष्य एवं उसकी गरिमा इस कविता के केन्द्र में रहते हैं।

        अलवर अंचल के यशस्वी  कवि भागीरथ भार्गव सच्चे अर्थों में मानवीय सरोकारों के प्रबल पक्षधर एवं मानवीय गरिमा के सचेतन कवि थे और उनकी यह विशेषता उनकी कविताओं में यत्रतत्र देखने को मिलती है। ‘कवि-कविता’ शीर्षक  कविता में यह गरिमा कवि की पैनी जीवन दृष्टि को साकार कर व्यक्ति;कविमित्रद्ध की दोहरी मानसिकता पर यों प्रहार करती है-

प्रकृतिप्रेमी है कवि महाराज
       पेड़,मिट्टी,हवा,पानी,नदी और पहाड़
    सब पर चली है उनकी कलम....
    जमीन से जुड़कर चलते हैं सदा
             पर हर बार जमीन के लागों से कतराकर
 अलग-थलग चल पड़ते हैं।

               मानवीय गरिमा सामाजिक सरोकारों के लिए ज़मीन तैयार करती है तथा आगे चलकर कवि को सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त विषमताओं से जूझने की संकल्प-शक्ति प्रदान करती है। इसी गरिमा की रक्षा के लिए कवि ने एक  स्थान पर लिखा है-‘समाज को जानने,समझने और उसकी व्यवस्था के लिए मैं समाजवादी तौर तरीकों को पसन्द करता हूं...हर प्रकार के पोषण का विरोध मुझे सुख देता रहा है...मैं समाजवादी व्यवस्था में ही वर्तमान संकट का हल दंखता हूं...।’भागीरथजी की कविता ‘एक दस्तावेज़’ से उद्धृत कुछ पंक्तियां देखिए-

     मैं उनके लिए लिखता हूं
जो खेतों में हैं-खुले आसमान तले,
जो फैक्ट्रियों  में हैं- उत्पादन करते
जो खानों में हैं -कोयला खोदते
जो सड़कों पर हैं-पत्थर कूटते
जो इमारतो पर हैं-बत्तीसवीं मंज़िल तक बोझा ढोते,
.......
.......
जे अछूत हैं-दलित हैं
और बड़ों की खूंखार आखों की गिरफ्त में हैं
मैं इन सब की सुप्त चेतना को जगाना चाहता हूं।
               
             उपर्युक्त पंक्तियों से सहसा इस बात का एहसास हो जाता है कि कवि भागीरथ भार्गव की कविता आम आदमी की कविता है और आम जन की गरिमा की रक्षा हेतु वे बराबर सन्नद्ध रहे। ऐसी ही कुछ बात प्रान्त के प्रतिष्ठित  कवि स्व0 जयसिंह नीरज ने भागीरथजी के बारे में यों कही है-‘भागीरथ भार्गव एक ऐसा कवि है जिसने अपने परिवेश  और युग को अच्छी तरह से परखा,जिसने विषमताओं  से जूझने का प्रयास किया। जिसका मंथन उसे आम आदमी से जोड़ता है,जो मात्र दर्शक  नहीं है वरन् जो रक्त की अन्तिम बूँद  तक अपनी अभिव्यक्ति को नए आयाम देने के लिए प्रतिश्रुत है। कवि के षब्दों में-
यह सब देख मेरे षब्द
मौन दर्शक नहीं रह सकते
वे अभिव्यक्ति को देते हैं नए आयाम
अपने रक्त की अन्तिम बूंद तक।’

राजतरंगिणीकार कल्हण ने एक स्थान पर लिखा है-‘कवि स्वयं अपनी रचनाओं से जीवित रहता है और दूसरों को भी जीवित रखता है।राजा,सेनानायक, सामंत,सभासद् अधिकारीगण आदि सब के सब काल के गाल में समो जाते हैं किन्तु यह कवि ही है जो अपनी रचनाओं से अपने समय,स्थान और स्वयं अपने को अमर बना लेता है।’ भागीरथ भार्गव अलवर अंचल के ही नहीं अपितु समूचे राजस्थान प्रदेश के एक लोकप्रिय एवं चर्चित कवि थे।ऐसे कवि जिन्होंने अपने कविताकर्म से अलवर और प्रांत का गौरव तो बढ़ाया ही,साथ ही अलवर क्षेत्र के उदीयमान एवं रचनाशील लेखकों एवं संस्कृतिकर्मियों को एक मंच पर लाने की महती भूमिका अदा की।‘साहित्य संगम’ संस्था से वर्शों से वे जुड़े रहे और इस मंच से उन्होंने अलवर के साहित्य जगत की जो सेवा की उसकी जितनी प्रसंशा की जाए कम है।
कवि के लिए कहा गया है कि वह ‘दृष्टा’ होता है। कुछ काव्यशास्त्री उसे त्रिकालदर्शी  भी कहते हैं। भागीरथजी को शायद  इस बात का एहसास हो गया था कि उनका जीवन शनै:-शनै: उस पड़ाव की ओर बढ़ रहा है जिस ओर एक दिन सभी को जाना है। जाने-अनजाने में कवि  ऐसा कुछ कह देता है जो उसकी आत्मा से निकला हुआ सत्य होता है।‘समर्पण’ कविता की ये पंक्तियां कवि भागीरथ के दृष्टा होने की बात को बखूबी सत्यापित करती हैं-
अब,तुम पर निर्भर है-
ओ,मेरे डाक्टर-
  विलम्ब न करो और
सभी परीक्षण कर डालो।
लो समस्त अधिकार तुम्हें देता हूं शल्यक्रिया के
शपथपत्र  पर अंकित कर हस्ताक्षर।
आओ, किसी भी अंग को चीर-फाड़ डालो
और गले सड़े अंगों को काटकर दूर फेंक दो।
सच,ओ मेरे डाक्टर 
मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा है।

                 कविवर भागीरथ भार्गव आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनकी कविताएं हमारे साथ रहेंगी  और हमें प्रेरणा देती रहेंगी। उनके दिवंगत हो जाने से अलवर अंचल ने एक सहृदय  कवि तो  खोया ही है, साथ ही साथ एक कविमित्र को भी खो दिया है। उनकी स्मृति को मेरा शत-शत  नमन!
       
योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डा. शिबन कृष्ण रैणा
कोलेज शिक्षा में प्राचार्य पद से सेवानिवृत हुए हैं।सालों से राजस्थान में लिखते,पढ़ते और छपते रहे हैं।फिलहाल अलवर में साहित्यिक गतिविधियों को संभालती संस्था 'साहित्य संगम' के अध्यक्ष हैं।मूल रूचि और विषय हिंदी में ही निहित रहा है।भारतीय अनुवाद परिषद के द्विवागीश पुरस्कार,राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर के प्रथम अनुवाद-पुरस्कार तथा देश की विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत  हैं साथ ही बिहार राजभाषा विभाग द्वारा कश्मीरी की लोकप्रिय रामायण ‘रामावतारचरित’ के श्रेष्ठ हिन्दी- अनुवाद के लिए पुरस्कृत-सम्मानित  किया जा चुका है। इसके अलावा उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय आदि द्वारा  भी सम्मानित किया गया है। डा0 रैणा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में 1999 से लेकर 2002 तक अध्येता रहे हैं, जहां इन्होंने ‘भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद की समस्याएँ ’ विषय पर अनुसंधान-कार्र्य किया है। 
संपर्क-
2/537 अरावली विहार, अलवर,राज0301001
ई-मेल -skraina123@gmail.com,मो-09414216124
                                                        

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