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''धीरे-धीरे लघु समाचार पत्रों की संख्या अंगुलियों पर गिने जाने जितनी ही रह गयी है।''-प्रो. नन्द चतुर्वेदी

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, जुलाई 08, 2012 | रविवार, जुलाई 08, 2012


प्रो. नन्द चतुर्वेदी
समता संदेश की बीसवीं सालगिरह
(एक छोटे पाक्षिक का बड़ा संकल्प)
प्रो. नन्द चतुर्वेदी
समता संदेश ने गैर-बराबरी के विरूद्ध संघर्ष करते हुए बीस वर्ष पूरे कर लिए है इस साहसपूर्ण यात्रा के लिए मैं समता संदेश के संपादक हिम्मत सेठ को बधाई देता हूं। मैं हिम्मत सेठ के उन साथियों डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया, डॉ. नरेश भार्गव, भाई सुरेश पण्डित और अनेक साथियों को भी अपनी सराहना में शामिल करता हूँ जिन्होंने लगातार बराबरी की दुनिया बनाने के समता संदेश के संकल्प को मजबूत और सैद्धान्तिक समर्थन किया।
धीरे-धीरे लघु समाचार पत्रों की संख्या अंगुलियों पर गिने जाने जितनी ही रह गयी है। किसी समय उदयपुर में ही उनकी संख्या और प्रभावशालिता उल्लेखनीय थी। एक समय था जब चेतक चौराहे पर तोड़ावत पान भण्डार के सामने लघु समाचार पत्रों के सम्पादकों, कवियों, लेखकों, बुद्धिजीवियों का मेला सा लग जाया करता था। तब ‘‘स्माल इज ब्यूटीफुल’’ के गूंजते नारे के दिन थे। अब नगर में ‘‘समता संदेश’’ पाक्षिक के सिवाय कोई साप्ताहिक या पाक्षिक लघु-समाचार पत्र नजर नहीं आता। सारी छोटी जीवन इकाइयों पर वज्राघात हुआ है। छोटे गरीब लोग, छोटे बच्चे, छोटे गांव, बांध-पुल, सड़कें, छोटे समाचार पत्र, मदरसे, नये बाजारवाद के हत्थे चढ़ गये हैं। वे छोटे समाचार पत्र जो स्थानीय लोगों की परेशान आवाजों का प्रतिनिधित्व करते थे, विधायक और सांसद को खबरदार करते थे, वे धन्ना सेठों के अखबारों ने रौंद दिए हैं। पूंजीपतियों के अखबार की अघोषित तानाशाही भयावह होती है। छोटे लोगों के दुःखों की खबरे वहां रद्दी कागजों के ढेर में फेंक दी जाती है।
समता संदेश के बारे में मुझे समाजवादी नेता राजेन्द्रसिंह चौधरी ने बताया था। उन्होंने समता संदेश के संपादक हिम्मत सेठ का मुकदमा श्रम अदालत में जीत हासिल करने तक लड़ा था। हिम्मत सेठ उन दिनों फर्नीचर की दुकान चलाते थे। मैं कभी-कभी अपने लेख दुकान पर दे आता था और खुले में रखी ‘‘समता संदेश’’ के प्रति उठा लाता था। उन दिनों में उनकी राजनैतिक विचारों को जानता नहीं था और न उनमें मेरी कोई दिलचस्पी थी। उनसे कहीं ज्यादा मैं उनके छोटे भाई अभय सेठ को जानता था। अभय कोई पाक्षिक पत्र भी निकालते थे और सार्वजनिक मंचों पर जिम्मेदार पत्रकार की तरह भाषण करते थे। दुर्भाग्य से उनकी की कैंसर से अल्प आयु में मृत्यु हो गयी। समता संदेश को पढ़ते हुए मैं उनके सत्ता विरोधी चरित्र को पहचानने लगा था। राजेन्द्र जी कभी-कभी हिम्मत सेठ के बारे में बताते थे जिससे मुझे लगता कि वे शायद टेªड यूनियन के सक्रिय कार्यकर्ता है। तब भी उनके पत्र के प्रति मेरे मन में हमेशा जिज्ञासा और आकर्षण बना रहा। कभी-कभी यह आशंका होती कि प्रतिरोध का यह पाक्षिक एक आकस्मिकता है। वह कभी भी बंद हो सकता है। हिम्मत सेठ से उन दिनों समता संदेश की वैचारिकी या प्रतिबद्धताओं के बारे में बात नहीं हुई लेकिन राजेन्द्र जी हिम्मत सेठ की दोस्ती से यकीन होता गया कि वे गैर बराबरी बढ़ाने वाली सभी कट्टरताओं के विरोधी हैं। उनकी दोस्ती न केवल राजेन्द्र जी से ही थी बल्कि दूसरे कई समाजवादियों से भी थी। वे राजस्थान में समाजवाद के विचार को फैलाने वाले वरिष्ठ नेता साथी हीरालाल जैन नीमच मध्यप्रदेश के नेता अधिवक्ता कन्हैयालाल डूंगरवाल के मित्र और प्रशसंक थे। वे जब उदयपुर आते हिम्मत सेठ संमता संदेश के मंच से उन के व्याख्यान या विचार गोष्ठी का आयोजन करवाते। 
हिम्मत सेठ 
महावीर स्वामी के अनुयायी होने के कारण हिम्मत सेठ ने अपने पाक्षिक को समता के साथ अहिंसा के प्रबल समर्थक गांधी, लोहिया, जय प्रकाश के साथ जोड़े रखा। समता संदेश मूलतः उस संस्कृति और समाज रचना का विरोध करता है जो गैर बराबरी और हिंसा आधारित है। आधुनिक समाज रचना जो शोषण और हिंसा से गुरेज नहीं करती ‘‘समता संदेश’’ के लेखक उसका प्रबल विरोध करते हैं वे सर्वसत्तावादी राज्य व्यवस्था के भी विरोधी है जो व्यक्ति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति का निषेध करते है। संक्षेप में ‘‘समता संदेश’’ की वैचारिक प्रतिबद्धता समता और स्वाधीनता से जुड़ी है जिसे रोज़ा लक्जम वर्ग ने ‘‘रोटी और गुलाब के फूल’’ कहा है।
मुझे ठीक से याद नहीं आता कि हिम्मत सेठ समाजवादी पार्टी या कि जनता दल के विधिवत सदस्य बने या नहीं किन्तु लोहियावादी वे अवश्य नजर आते है। समता संदेश में प्रायः लोहिया जी के लेख छपते है। उनके सौंवे जन्मोत्सव पर समता संदेश ने ‘‘शतायु लोहिया’’ प्रकाशित की। लोहिया जी के विचारों की प्रासंगिकता को आधुनिक राजनीति के साथ समझने के लिए लोहिया विचार मंच गठित किया। मंच को सक्रिय रखने में हिम्मत सेठ की महत्वपूर्ण भूमिका थी। मंच ने स्मृति शेष साथी राजेन्द्रसिंह चौधरी को 15 हजार रूपए की थैली समर्पित की। गोष्ठियां तो नियमित होती ही थी।
‘‘समता संदेश‘‘ का सबसे महत्वपूर्ण अवदान प्रतिवर्ष होने वाला लेखक सम्मेलन है जिसके बारह अधिवेशनों में लेखकों ने आधुनिक निठल्ली लम्पट उपभोक्तावादी व्यवस्था का प्रतिरोध किया है और 
नये समाजवादी, सांस्कृतिक मूल्यों की पक्षधरता की है। लेखक सम्मेलन में सर्वश्री सुरेन्द्र मोहन, प्रभाष जोशी, डॉ. सुनीलम्, ओम प्रकाश वाल्मीकि, डॉ. राम शरण जोशी, मंजू मोहन, प्रो. मोहम्मद शफी अगवानी, श्रीमती सौभाग्यवती, डॉ. सुधा चौधरी, प्रो. शिव कुमार मिश्र, डॉ. रत्नाकर पाण्डेय, रघु ठाकुर, वेद व्यास, कनक तिवारी, डॉ. अरूण चतुर्वेदी, डॉ. नरेश भार्गव, सुरेश पण्डित, डॉ. जेनब बानू, रेवती रमण शर्मा, कालीचरण यादव, राजाराम भादू, कवि हंसराज चौधरी, हेमेन्द्र चण्डालिया, प्रमिला चण्डालिया, रजनीकान्त वर्मा, रमणिका गुप्ता, सोहन शर्मा, डॉ. कमल नयन काबरा, डॉ. असगर अली इंजीनियर, संतोष चौबे, अनिल चमड़िया, पंकज बिष्ट, मदन मदिर तथा अन्य अनेक प्रतिष्ठित, विद्वानों, बुद्धिजीवियों ने शिरकत की है। लेखक सम्मेलन समता के साथियों में से उल्लेखनीय काम करने वाले किसी एक साथी का प्रतिवर्ष ‘‘राष्ट्रीय समता  सम्मान पुरस्कार’’ से अभिनंदित करता है। इन पंक्तियों के लेखक को प्रथम समता सम्मान पुरस्कार पाने का सौभाग्य मिला है।
‘‘समता संदेश’’ के सम्पादक को यह भ्रम नहीं है कि उनका यह पाक्षिक कोई क्रान्ति या बदलाव का भूंकप लाने वाला है। बाजार की विनाशकारी और सत्ता तन्त्र की असीम लालची पूंजीवादी शक्तियों के विरूद्ध जो साहसिक आवाज उठा रहे है उन्हें निरन्तर एक मंच देने का काम ही समता संदेश के प्रकाशन की भूमिका है।
विज्ञापन रहित इस पाक्षिक को निरंतर संपादित करने वाले हिम्मत सेठ की जिद और संकल्प शक्ति से ही महावीर समता  संदेश बीस वर्षों तक समाजवादी देश और दुनिया बनाने की ऊर्जा देता रहा है। वह अधिकाधिक शक्तिशाली हो यही उसके पाठकों को मेरी शुभकामना है।

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1 टिप्पणी:

  1. हिम्म्त सेठ की हिम्मत ही उन्हें महावीर बनाती है।
    इस अदम्य साहस को सलाम

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