कुछ लोग बड़े दु:खों को भी नियति मान कर सहते रहते है - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

कुछ लोग बड़े दु:खों को भी नियति मान कर सहते रहते है

भाव:-दुखवा का से कहूँ
आलेख-एस.निर्मला

दु:ख से जगत का कोई प्राणी अनभिज्ञ नहीं है उसकी अपनी सत्ता है अपना शासन जहाँ वह प्राणी के किसी भी भाव से निर्लिप्त अपना वर्चस्व बनाए रखता है। व्यक्ति या प्राणी का कोई भाव उसके तेज को प्रभावित नहीं करता । बिन बुलाए अतिथि की भांति  वह आता ही जाता है। हम उसका कितना ही तिरस्कार करे पर वह बडी क्रूरता से हमें अपने अधीन कर लेता है।एक दुख से मुक्ति पाने  तक दूसरे दुख का प्रारंभ हो जाता है. जो इनसे जूझ कर निकल जाते है. अपना जीवन जी लेते है और कुछ इनके समक्ष घुटने टेक कर अपना जीवन ही  समाप्त कर लेते हैं।

दुख कई प्रकार के होते है यहाँ परिस्थितियों से उत्पन्न दुख की अपेक्षा व्यक्ति सापेक्ष दुख कहना ज्यादा उपयुक्त होगा क्योंकि कुछ लोग बड़े दुखों को भी नियति मान कर सहते रहते है और कुछ छोटी छोटी उलझनों को दुख मान बैठते है। हमारे देश में रोजी रोटी की समस्या एक बड़े वर्ग का दुख है तो दूसरा वर्ग उसे हजम न कर पाने के दुख से चिंतित है। मध्यमवर्गीय समाज के लिए बस की भीड़ राशन की लाइन एक बड़ी उलझन है परंतु कुछ इसे भी बड़े दुखों की भांति व्यक्त करते है और दुखों की सूची में डाल देते हैं।।मध्यमवर्गीय समाज के लिए रोजगार,पानी,बच्चों की फीस व घर की समस्यएँ उन्हें दुखी करती हैं।और उच्च्वर्गीय समाज में प्रदूषित पानी  से फैली बिमारियों का डर बच्चों के बिगड़ने की चिंता और घर की सुरक्षा उनके दुख का विषय होता है।इसके विपरीत  गरीब  के पास दुखी होने का भी समय नहीं है। इस विषय में सोचे कि अगले पहर के भोजन की।

इन सब के अतिरिक्त यदि भारतीय परिवेश पर विचार करें तो स्त्रियों की समस्याओं से वे दुखी हैं जो स्त्रियाँ इस दुख को सहन करती हैं। वे ढेर सारी उठी हुई ऊँगलियों को जवाब देती हुई भी आगे बढ़ रही है। स्त्रियों ने अपने दुखों को दूर करने की कई संभावनाऐ विकसित की हैं। उसी प्रकार समाज में व्यक्तिगत जीवन के स्तर पर उत्पन्न दुख को दूर करने का एकमात्र उपाय सुखी पारिवारिक जीवन है परंतु व्यक्ति जीवन की आवश्यकताओं की दौड़ में बहता हुआ अपने परिवार के लिए समय निकलने में असमर्थ है।      

यह भी एक तथ्य है कि बचपन से समस्याओं को सहते गरीब बच्चे होनहार अफसर बनते है कठिन से कठिन परिक्षा में उत्तीर्ण होकर अपने आपको सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं।इसका अर्थ है कि  इस  दुख ने  उन्हें सीख दी है कि जीवन में इससे  बढ़कर कठिन परिक्षा और कोई नहीं है। परंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं  कि बच्चों को दुःख झेलने की परिस्थितयों का निर्माण किया जाय ।इसका अर्थ सही तौर पर यही है कि दुख  अपने साथ  ही विकास की कई संभावनाऐं विकसित करता  है व्यक्ति के विकास की Êउसके आंतरिक शक्तियों के उदघाटन कीÊ शक्तियों को जागृत करने की प्रेरणा दुख ही देता है । मुझे याद है बचपन में मेरे दादाजी कहा करते थे कि यदि तुम एक किलो का   वजन उठा सकते हो  तों तुम दस किलो का वजन  भी उठा सकते हो उठा कर तो देखो ?

कभी कभी  दुख से बदले की भावना भी जागृत होती है और यदि दुख का कारण अपमान हो तो बदला लेने की इच्छा और भी बढ़ जाती है द्रौपदी इसका उदाहरण है द्रौपदी के प्रतिशोध की भावना भी महाभारत युद्ध के होने के कई कारणों में से एक है।इनके विपरीत जब राम जैसे शांतिप्रिय राजा को सीता के वियोग का दुख झेलना पड़ा तो रावण जैसे दुष्ट का संहार हुआ।उसी प्रकार दक्षिण अफ्रिका में भारतीयों के दुख से दुखी मोहनदासÊमहात्मा बने।ऐसी परिस्थितियाँ बहुधा ही होती है  परंतु जब ऐसे व्यक्ति दूसरों के दुख को दूर करने पर उतर आते हैं। तो इतिहास रचा जाता है और उससे उत्पन्न परिवर्तन की गूंज सदियों तक सुनाई पड़ती है।परंतु हमेशा दुख इतना सृजनात्मक नहीं होता दुख की पीड़ा व दंश के सहते हुए कुछ उसके प्रति उदासीन हो जाते है और कुछ अवसाद ग्रस्त हो जाते है।जिसका अंत आत्महत्या या फिर शारिरिकÊ मानसिक बिमारियों से होता  है।परमाणु बम के विध्वंस ने जापान जैसे देश को अपने पुर्ननिर्माण हेतु प्रेरित किया ।इस प्रकार दुख की पीड़ा से उत्पन्न सकारात्मक विचार ही उस व्यक्ति के उज्जवल भविष्य को निर्धारित करती है। यह बात अजीब है  कि मनुष्य जीवन पर्यन्त जिस दुख से बचने का प्रयत्न करता रहता है  उससे कितना कुछ सीखा  जा सकता है  संभवतः यह ईश्वर द्वारा मनुष्य को अपनी स्थिति को सुधारने हेतु प्रेरित करने का विधान है।  दूसरों  द्वारा पँहूचाए जाने वाला दुख  उनकी पहचान करता है और अपनों द्वारा पहूँचाए जाने वाला दुख अपने व परायो का बोध कराता है । कहा जाता है दुख बांटने से आधा होता है और सुख दुगुना। इसलिए अपने दुख को अपनो से बांटने पर अवसाद की स्थिति से बचा जा सकता है। किंतु कुछ लोग तो दुख बांटने से भी कतराते है  इसलिए किसी शायर ने कहा है

जलने को दिल तो दे दिया
दिल को जुबा न दी 
देखें  है हमने हौसले परवदिगार   के 

किंतु यह सत्य है कि दुख योग्य व्यक्तियों से यदि  बांटा जाए तो उसका निवारण संभव है। इस निवारण हेतु भी आशावादी होने की आवश्यकता है।किसी  भी पूर्वाग्रह से मुक्त  होकर अपनी समस्या के निवारण का उपाय खोजें। इसलिए अब किसी ‘दुख’ का तिरस्कार न करें,प्रतिक्षा करे कि यह हमें कौन सी सीख देने वाला है और भविष्य में इनसे बचने के क्या क्या उपाय है। 
      
एस.निर्मला
      सैप प्रोजेक्ट फैलो और  पी.एचडी. शोधार्थी
      विशाखापटनम,आंध्रप्रदेश 
      मो-9701610019

5 टिप्‍पणियां:

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here