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वैचारिक-साहित्यिक पत्रिका 'धरती'

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, जुलाई 14, 2012 | शनिवार, जुलाई 14, 2012


लघुपत्रिकाएं पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। 
  
'धरती' (अनियतकालीन) :
धनात्मक-वैज्ञानिक सोच
का अनियतकालिक आयोजन
संपादक - शैलेन्द्र चौहान,
34/242, प्रतापनगर, सेक्टर-3,
जयपुर, (राजस्थान)-303033,
एक प्रति-25 रु.,
मो.-07838897877,
आज के समय में मुख्यधारा की पत्रिकाएं व अखबार कारपोरेट जगत व सम्राज्यवादी ताकतों के प्रभाव में समाहित हो रही है। इस वजह से देश के चौथे स्तंभ के प्रति पाठकों में संशय उत्पन्न होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में लघु पत्रिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैक्नोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे उतने ही बेहतर ढ़ंग से लघुपत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघुपत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को सुरक्षित रखा है। लघुपत्रिकाएं पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। लघु पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, ये पत्रिकाएं मौलिक सृजन का मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो अथवा ग्लोबलाईजेशन का प्रश्न हो हमारी व्यावसायिक पत्रिकाएं सत्ता विमर्श को ही परोसती रही हैं। सत्ता विमर्श व उसके पिछलग्गूपन से इतर लघु पत्रिकाएं अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता, संघर्षशीलता व सकारात्मक सृजनशीलता की पक्षधर हैं। इन बातों के मद्देनज़र इतना स्पष्ट है कि लघु पत्रिकाओं की आवश्यकता हमारे यहां आज भी है, कल भी थी, भविष्य में भी होगी। 

"धरती" पत्रिका एक प्रतिबद्ध एवं स्तरीय लघु पत्रिका है। आज चकाचौंध वाले इस विमर्शवादी युग में जब अन्य पत्रिकाएं व्यवसायिकता और बाज़ार के प्रभाव में आती जा रही हैं ऐसे वक़्त में भी 'धरती' अपनी विशिष्ट पहचान बचाएहुए है। सादगी, सहजता और जनोन्मुखी स्तरीय सामग्री से समाहित यह पत्रिका अलग से ही पहचान में आ जाती है।  सन १९७९ में 'धरती' पत्रिका का पहला अंक विदिशा जैसी छोटी जगह से प्रकशित हुआ था । उसके बाद कई महत्वपूर्ण अंक धरती ने प्रकाशित किये हैं जिनमें सन १९८० में हिंदी ग़ज़ल विशेषांक, १९८१ में समकालीन जन-कविता अंक, १९८२ में आलोचना अंक, १९८३ में त्रिलोचन  अंक, १९८९ में जनकवि 'शील' अंक, २००० में स्मरण अंक, २००२  में समकालीन जन-कविता विशेषांक, २००६ में शलभ श्रीराम सिंह  अंक, २००८ में 'साम्राज्यवादी संस्कृति बनाम जनपदीय संस्कृति' अंक एवं २०१२ में 'कश्मीर केन्द्रित' अंक उल्लेखनीय हैं। 

'धरती' पत्रिका का हिंदी साहित्य में न केवल विशिष्ट योगदान है बल्कि विद्यार्थियों के  लिए सदैव इसकी शोधपरक आवश्यकता रही है। 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. Laghu Patrikaon ke jagat mein sahitya Aur vimarsh ko 'DHARTI' ka yogdan mahatwapoorna hai. Isme koi sandeh nahin.
    ------Dr, Wahab, Islamiah College, Vaniyambadi - T.N.
    wahab_shaik@yahoo.com

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