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पाठकीयता और किताबों की दुकानें

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, जुलाई 15, 2012 | रविवार, जुलाई 15, 2012


अनंत विजय का आलेख:लघु पत्रिका आन्दोलन और पाठकीयता  

हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका साहित्य अमृत के अपने संपादकीय में त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी ने लिखा हैदिल्ली में हिंदी साहित्य की पत्र-पत्रिकाओं के मिलने का कोई एक स्थान नहीं है, जहां पाठक पन्ने पलटकर अपनी पसंद की कोई पत्रिका खरीद सके त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी के लंबे संपादकीय में यह छोटी सी टिप्पणी पूरे हिंदी समाज में साहित्यक किताबों और पत्र-पत्रिकाओं की उपलब्धता के बारे में सटीक लेकिन कड़वी हकीकत बयान करती है आज हमारे समाज में हिंदी साहित्य की किताबों को लेकर जो एक उदासीनता, खासकर नई पीढ़ी में, दिखाई देती है उसके पीछे किताबों और साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की अनुपलब्धता बड़ी वजह है आज अगर हिंदी साहित्य का कोई नया पाठक प्रेमचंद से लेकर अज्ञेय से लेकर संजय कुंदन तक की रचनाएं पढना चाहता है तो उसे उसके आसपास मिल नहीं पाता है अपने पसंदीदा लेखक की किताब के लिए पाठक को कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है या फिर इतना श्रम करना पड़ता है कि पढ़ने का उत्साह ही खत्म हो जाता है अब जरूर एक नया विकल्प इंटरनेट के जरिए ऑर्डर देकर किताबें मंगवाने का है लेकिन वहां यह आवश्यक नहीं है कि मनचाही हिंदी की किताबें मिल ही जाएं

दिल्ली और मुंबई, जैसे महानहरों के अलावा अगर हिंदी पट्टी के बड़े शहरों मसलन लखनऊ, पटना,इलाहाबाद, कानपुर, भोपाल, जयपुर आदि की भी बात करें तो हर जगह कमोबेश एक ही तरह की स्थिति है छोटे शहरों में जरूर कुछ स्थिति बेहतर है वो भी इस लिहाज से कि वहां की जनसंख्या और शहरों के फैलाव के अनुपात में एक भी साहित्यिक पत्रिकाओं की दुकान से पाठकों को देर सबेर कुछ ना कुछ मिल ही जाता है दिल्ली के केंद्र में स्थित श्रीराम सेंटर में वाणी प्रकाशन की किताबों और पत्रिकाओं की एक दुकान हुआ करती थी जहां हर तरह की पत्र-पत्रिकाएं मिल जाया करती थी वहां पाठकों को बाहर बैठकर किताबों को देखने पलटने की भी सहूलियत भी थी लेकिन कारोबारी वजहों से वो सेंटर बंद हो गया और हिंदी की साहित्यक पत्रिकाओं और साहित्य की किताबें ढूंढना दिल्ली में एक श्रमसाध्य काम हो गया कड़वी सचाई यही है कि साहित्यक पत्रिकाओं का कोई भी केंद्र दिल्ली में नहीं है जहां आपको देशभर की किताबें मिल सकें  
पाठकों तक किताबों को पहुंचाने और उसकी उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में ना तो हिंदी के प्रकाशक और ना ही सरकार की तरफ से कोई पहल हो रही है नतीजा हो रहा है कि हिंदी जगत में पुस्तक संस्कृति विकसित नहीं हो पा रही है पहले तो पुस्तकालयों के माध्यम से ये संभव हो जाता था, लेकिन अब तो पुस्तकालय भी भगवान भरोसे ही हैं  

दरअसल पुस्तक संस्कृति के फैलाव से नई पीढ़ी में एक तरह के संस्कार पैदा होता है जो अपनी समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं का ज्ञान कराता है जब आपको अपनी परंपरा का ज्ञान होगा तो उस पर आप अभिमान कर पाएंगे प्रकाशक तो संसाधनों की कमी का रोना रोकर इस पहल से पल्ला झाड़ लेते हैं प्रकाशकों के संगठनों के सामने फ्रांस का उदाहरण है जहां प्रकाशकों के संगठनों ने शानदार पहल की और किताबों की दुकान को लेकर सरकार को एक ठोस नीति बनाने के लिए मजबूर कर दिया फ्रांस में हर गली मोहल्ले में आपोक किताबों की दुकान मिल जाएगी एक अनुमान के मुताबिक फ्रांस में पिछले दस साल में किताबों की बिक्री में सालाना सात फीसदी इजाफा हुआ है किताबों के कारोबार को लोकप्रिय बनाने में फ्रांस के संस्कृति मंत्री रहे जैक लैंग की महती भूमिका रही है लैंग लॉ फ्रांस का मशहूर कानून है जिसकी दुहाई पूरे यूरोप में दी जाती है और उसे पुस्तकों की संस्कृति विकसित करने की दिशा में एक आदर्श कानून माना जाता है  जैक ने सबसे पहले एक काम किया कि कानून बनाकर किताबों की कीमत तय करने का एक मैकेन्जिम बनाया नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में किताबों की कीमत में एकरूपता गई वहां कोई भी प्रकाशक सूची में प्रकाशित मूल्य से पांच फीसदी से ज्यादा की छूट नहीं दे सकता है  

अमेजोन और दूसरे बेवसाइट पर भी इतनी ही छूट दी जा सकती है इससे ज्यादा देने पर वो गैरकानूनी हो जाता है हिंदी में यह स्थिति नहीं है कारोबारी कमीशन से इतर पाठकों को भी प्रकाशक अपनी मर्जी से बीस से पच्चीस फीसदी तक छूट दे देते हैं पुस्तक मेले में तो ये छूट बढ़कर पच्चीस फीसदी तक पहुंच जाती है सरकारी खरीद में कितनी छूट दी जाती है ये तो प्रकाशक या फिर संबंधित विभाग को ही पता रहता है मूल्य निर्धारण की हिंदी में कोई सर्वमान्य प्रक्रिया भी नहीं है, लिहाजा किताबों के दाम बहुधा ज्यादा और सरकारी खरीद को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं कभी कभार तो ये आम पाठकों की पहुंच से बाहर होते हैं
दूसरी बात जो किताब की दुकानों की कमी को लेकर है यह कमी सरकारी उदासीनता और कोई ठोस नीति नहीं होने की वजह से हैं  

किताब की दुकान खोलने के लिए सरकारी या सरकारी सहायता प्रापत् स्वायत्त साहित्यक संस्थाओं की तरफ से कोई आर्थिक सहायता का प्रावधान नहीं है ना ही बैंको से रियायती दरों पर किताब की दुकान खोलने के लिए कर्ज मिलता है हमारे यहां कई गैरजरूरी चीजों पर सरकारी सब्सिडी मिल सकती है लेकिन किताबों की उपल्बधता बढ़ाने के लिए होनेवाले खर्च पर सरकार भी उदासीन है अगर हम फ्रांस की बात करें तो वहां कई सरकारी संस्थाएं रियायती दरों पर किताब की दुकान के कारोबार के लिए कर्ज देती है नतीजा यह होता है कि अगर कोई एक किताब की दुकान बंद होती है तो उसके पड़ोस में नई दुकान खुल जाती है   किताब के करोबार को हमारे यहां ना तो उद्योग और ना ही लघु उद्योग का दर्जा प्राप्त है हमारे देश की विडंबना यह है कि यहां किसी भी तरह की संपत्ति की बिनाह पर बैंक से लोन मिल जाता है लेकिन अगर किताबों के स्टॉक को गिरवी रखकर भी आप लोन लेना चाहें तो बैंक इंकार कर देते हैं प्रकाशन जगत में एक जुमला बहुत चलता हैछपने के पहले कागज चार रुपए किलो, छपने के बाद दो रुपए किलो ये कहावत हमारे देश में छपी किताबों को लेकर उससे जुड़े कारोबारियों की ममोदशा की ओर इशारा करता है   

पाठकों तक किताबें भेजने के लिए साहित्यक पत्र पत्रिकाओं के लिए डाक दरों में भी रियायत नहीं मिलती है खबर छापने वाली पत्रिकाओं को डाक दर में रियायत मिलती है रेलवे से किताब भेजने पर जितनी छूट पहले मिला करती थी वो भी अब लगातार कम होती जा रही है इन सबके पीछे जो वजह है वो यह कि किताबों को लेकर हमारे देश में कोई नीति नहीं है नीति तब बनती है जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा कोई शख्स उसमें रुचि लेता है जवाहरलाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे तो उनकी उन कला संस्कृति, पुस्तक लेखक और उनसे जुड़े सवालों में रुचि थी आज के राजनीति परिदृश्य में नेहरू जैसे शख्सियत कम ही हैं आजादी के पैंसठ साल बाद भी हमारे देश में किताबों को लेकर कोई ठोस नीति नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है आज हमारे देश में जरूरत इस बात की है कि किताबों को लेकर एक राष्ट्रीय पुस्तक नीति बने जिसमें उन सारी बातों और पहलुओं का ध्यान रखा जाना चाहिए जिससे देश में किताबों की एक संस्कृति का विकास हो सके इस नीति के पहले राष्ट्रीय स्तर पर एक बहस हो जिसमें लेखकों, प्रकाशकों और आम पाठकों की भागीदारी हो उस मंथन से जो अमृत निकले उसको लेकर आगे बढ़ा जाए ताकि हमारे देश में पुस्तक संस्कृति का निर्माण हो सके


दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के दाँव-पेच सीखने वाले कलमकार हैं.आई.बी.एन.-7 के ज़रिये दर्शकों और पाठकों तक पहुंचे अनंत विजय साल दो हज़ार पांच से ही मीडिया जगत के इस चैनल में छपते-दिखते रहें हैं.उनका समकालीन लेखन/पठन/मनन उनके ब्लॉग हाहाकार पर पढ़ा जा सकता है.अपनी स्थापना के सौ साल पूर चुकी दिल्ली के वासी हैं.-journalist.anant@gmail.com

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