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कम्यूनिस्म के प्रति पक्षधरता भी स्पष्ट झलकती है डॉ. अरविन्द की कविताओं में

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, जुलाई 07, 2012 | शनिवार, जुलाई 07, 2012


सच कहे तो ये बदलते दौर  के सही आंकलन और  एक ज़रूरी दस्तावेज़ के रूप में उभरी  डॉ.अरविन्द की कवितायेँ हैं।वक़्त  के साथ रेत  की मानिंद हाथ से रिपसती हमारी   अनूठी  प्रथाएं  भी  डॉ. अरविन्द की कविताओं का केन्द्रीय भाव बना हैं।  इस भेडचाल जीवन के सफ़र में  हमारे आसपास के  संक्रमण और मुसीबतों का ज़िक्र करते हुए भी संयम बरतने की अपील करती इन कविताओं में   हर  कद काठी  की  पंक्तियाँ अपने अपने ढंग से  वार करती हैं। अरविंद के लेखन में मुख्य तौर पर ज़मीनी सच बयानाते आपबीती के किस्से बार बार झांकते प्रतीत होते हैं।.वहीं पर ही उनकी कम्यूनिस्म के प्रति पक्षधरता  भी स्पष्ट झलकती है -      
 सम्पादक 


 डॉ.अरविंद श्रीवास्तव जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है।



बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।यहाँ आपके सध्य प्रकाशित कविता संग्रह 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'  से कुछ कवितायेँ प्रकाशित की जा रही है .मूल रूप सेराजधानी में एक उज़बेक लड़कीसमसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशियाक्ष महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया.



लुप्त होती चीजों को स्मरण करते हुए कुछ चीजें जनश्रुति, किंवदंती या अफवाह का हिस्सा नहीं बन पाती पारी- पारी से कार्य करती हैं धरती की सभी चीजें जैसे टाइप मशीन के सभी अक्षर एक साथ कागज पर नहीं उतरते जैसे नाटक का सभी दृश्य हम एक साथ नहीं देख पाते सैनिक सरहद पर एक ही बार में नष्ट नही करते अपने गोले बारुद बाजीगर अपने करतब को भी एक ही बार में नही दिखा पाता सुन्दरियों को भी चलना पड़ता है रैंप पर बार बार कि जैसे सभी ऋतुएँ एक साथ नहीं धमकतीं पर्वतारोही के पीछे ही चलना पड़ता है पर्वतारोहियों को क्रमशः पृथक - पृथक ढंग से सभी की अपनी - अपनी भूमिकाएँ निर्धारित होती हैं ढेर सारी बातें हस्तांतरित परम्पराएँ नहीं बन पाती जैसे कभी दरवाजे पर लटकने वाली पत्र - मंजूषा डाकिये से संदेशवाहकों तक का इंतजार करने वाला यह बक्सा कभी प्रबुद्ध और संभ्रान्त परिवार का परिचय देता और जिसे खोलता धर का मालिक कम से कम एक बार/ बार - बार अपनी बेचैनी के हिसाब से क्योंकि चिट्ठियां एस एम एस नहीं थीं तब! समय से बिछुड़ी हुई चीजों में ठहाको की वह दौड़ भी थम गयी जो पचास सौ मीटर दूर पान की दुकान से रह रह कर उढती विषय कुछ भी हो, हमें यह नागवार क्यों न गुजरता हो हँसने वाले हँसते थे समूह में, ठहाका मार कर अबकी तरह नहीं कि देख लेगा कोई! ठीक इसी तरह मौसम ने धो डाला झगड़ालू स्त्रियों की धंटो और कभी कभी, कई कई दिनों तक झांव झांव कर लड़ने की परम्पराएं हमारे यहाँ तिनटोलिया और पचटोलिया की वीरांगनाएँ कभी हाथ नचा नचा कर झगड़ने की कला में माहिर मानी जाती थीं धर - धर टीवी पहुँचने से पहले ! ये कुछ चीजें हठात् ही लुप्त नहीं हो रही हमारी जिन्दगी से ऐसी ढेर सारी परम्पराओं ने कोसों सफर तय किये जैसे प्रेमियो में खून से खत लिखे जाने के किस्से जैसे कवियों के लंबे धुँधराले बाल जैसे सन्नाटे में झिंगुर ।
प्रेम में प्रेम में कईयों ने खून से खत लिखे कईयों ने लिखी कविताएँ मैनें मैदान में दौड़ायी साइकिल लगाया चक्कर कई-कई बार हैंडिल छोड़ के! पीठ जिसे तुमने उधार ले रखा है मुझे मेरी पीठ वापस कर दो! कंधा
ईश्वर ने कंधा बनाया कंधे की जरूरत थी ईश्वर को! गुस्सा भरा समय
किसी खचाखच भरी यात्री गाड़ी में इंच भर टसकने के लिए बगल वाले से मिन्नतें और हाथ में मछलियों भरा एक्वेरियम चप्पे-चप्पे पर शिनाख्त करती आंखें लड़खड़ाते पैर अंतड़ियों की कुलबुलाहट उलाहनों से लपलपाती जीभ हर कोई अपने में अनुपस्थित हाथ सूत्र की तलाश में हर जगह, जगह के लिए उठा पटक स्त्री-स्पर्श की ललक घर में किरासन नहीं गैस के लिए गुहार कार्बन से भरा पेट सुबह कश्मीर पर अमरीकी मध्यस्थता का भय दोपहर पड़ोसी से कच-कच रात ड्रेगन की चिंता सब कुछ इसी सफर में जीवाश्म मन पर उम्मीदों का लोथा एजेण्डा में सभी कुछ लीडरों की लफ्फेबाजी दिन राई, रात राई पहाड़ कहीं नहीं शेष समय सेटेलाइट चैनलों की चिल्ल-पों सुन्दरियों की मस्त-मस्त मुस्कान आकर्षक-लुभावनी बड़ी-बड़ी दुकान गुस्सा भरा समय क्रोध से फटती सर की नस नब्ज टटोला ब्लड प्रेसर-लो हाय! हाय! ये हालात कितने नपुंसक हैं छी ! मुखौटा मैंने मारा अपने हृदय पर पश्चाताप का कोड़ा और लगायी दौड़ सरपट उस जगह की जहाँ मैं छोड़ आया था अपना मुखौटा ! रोटी रोटी जली तो क्या हुआ खुश्बू तो बिखड़ गयी ! आँखें (मकबूल फ़िदा हुसैन को समर्पित) इक्कट्ठे हो रहे हैं सपने धरती के सारे रंग-रोगन तूलिका-कैनवास, फ्रेम-अकृतियाँ शिल्प-कला बिंब और चित्र, चित्र के साथ नई-नई भाषा कई-कई नायक नायिका-अभिसारिकाएँ सारे कला दीर्घाओं मे हुसैन के इक्कट्ठे हो रहे हैं धरती के अश्व सारे गणपति-सरस्वती मदर टेरेसा और बच्चे अब्दुल और तांगा अमिताभ और शाहरूख देह और खौफ़ मुश्किल वक्त और बैचेन करती खबरें भी हुसैन की चित्रकारी में सौरमंडल-सा बड़ा है हुसैन का आंगन और कितनी छोटी है हमारी आँखें!
आधा सेर चाउर
आधा सेर चाउर पका बुढ़वा ने खाया - बुढ़िया ने खाया लेंगरा ने खाया - बौकी ने खाया कुतवा ने खाया चवर -चवर आध सेर चाउर नहीं पका बुढ़वा ने नहीं खाया, बुढ़िया ने नहीं खाया रह गया लेंगरा भूखा, बौकी भूखी कुतवा भूखा, बकरिया भूखी जो गया था चाउर लाने लौट कर नहीं आया आजतक ! मुश्किल है बचना नैतिकता के अन्तर्गत जो नियम व शर्तें रखी गयी थी उसे ढोते रहने की जिम्मेदारी किसी निविदा के तहत मानव संसाधन मंत्रालय ने हमें नहीं सौपा था और न ही वैसे नागरिको को पारितोषिक देने की घोषणा की थी फिर भी किसी सभ्य नागरिक को, जिस तरह की दिनचर्या होनी चाहिए मसलन कि साफ-सुथरा छोटा-सा मकान रोज दाढ़ी बनाना सुविधानुसार कमजोर दिखना शाम होते ही धर में चैनलों से दुनिया देखना फेसबुक पर बैठ जाना कम बोलना, कम हंसना और कम से कम राजनीतिक मसलों पर बिल्कुल चुप्पी साध लेना इन मापदंडों को फुलफिल करते हुए भी कहां बच पाते हैं हम चौराहे पर दिन काटते गुंडों की फब्तियों और अक्सर पुलिस की गुरेरती आंखों से।


प्रकाशक 


यश पब्लिकेशन्स
1/10753,गली न.3,
सुभाष पार्क ,
नवीन सहादरा,
कीर्ति मंदिर के पास 
दिल्ली-110032,
मो-09899938522
वेबसाईट-www.yashpublications.com
ई-मेल-yashpublicationsdelhi@gmail.com
सजिल्द मूल्य-195/-


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