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हेमंत शेष का नया कहानी संग्रह '‘रात का पहाड़’'

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जुलाई 16, 2012 | सोमवार, जुलाई 16, 2012


‘रात का पहाड़’
वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर से प्रकाशित हेमंत शेष का नया कहानी संग्रह

आम तौर पर लघुकथा के नाम पर जो रूटीन गद्य हिन्दी में इधर बहुतायत से रचा जा रहा है, उस से अलग ये कहानियां कथानक और कथाकार, दोनों ही की की ‘स्वैर-उड़ान’ के लिए पर्याप्त अवकाश पैदा करती जान पड़ेंगी. छोटी कहानियाँ भी पाठक की परंपरागत या रूढ-रूचि के सामने कैसा संकट पैदा कर सकती हैं- इस का प्रमाण हैंहेमंत शेष की ये रचनाएँ, जो ‘पुरानी’ कहानी जैसा उपक्रम न लगते हुए भी तीसरे पाठक की आलोचना या स्तवन की चिंता के बगैर, संभव और असंभव दृश्यों के बीच अपना रंग-ढंग, स्वाद और मुहावरा खुद हैं. अपनी ही एक शैली आविष्कृत करना चाहती इस कहानी को आप कई ऐसे समानांतर अर्थों में खुलता देख पाते हैं, जो वाक्यों के बीच की ‘अलिखित’ परतों में छिपे हैं ! 




ज़ाहिर है, कहे जा चुके के अलावा एक जगह और है- जहाँ इन रचनाओं का लेखक आप को ले जाना चाहता है. यहाँ कुछ ठेठ समकालीन भारतीय बिम्बों के ज़रिये, एक आम मध्यवर्गीय मनमानस की छोटी बड़ी विडंबनाओं, उत्सुकताओं, उल्लास, हताशा, खेद और उसकी आस्थाओं को सहजता से रूपायित किया गया है, इसलिए भी ये कहानियां हमारे अपने देशकाल को नए सिरे से जांचने की उत्सुकता जगाती कहानियां हैं! कुछ कहानियां खालिस निबंधात्मक हैं, तो कुछ कथाओं में कलेवर में संक्षिप्ति के बावजूद जीवन की विडंबनात्मकताओं को देखने की गहरी और आत्मीय लेखकीय दृष्टि हमें बरबस आकर्षित करती है, वहीं कुछ कहानियों में यथार्थ और कल्पना की मिली-जुली परछाइयाँ, अदम्य व्यंग्य-बोध की वजह से रचना को अलग सा अर्थ दे देती हैं. 

हिंदी-कविता में हेमंत शेष के नाम और काम से पाठक सुपरिचित हैं, और गल्प में अवतरण उनकी रचनाशीलता का एक नया अवतार. ‘रात का पहाड़’ उनका पहला कथा-संग्रह- हिन्दी-कहानी के ढंग को दूसरे ढंग से कहने का नवाचार है- अपने अनौपचारिक कथा-मर्म में एक सक्षम और वरिष्ठ कवि का गद्य-प्रवास




हेमंत शेष
(राजस्थान में प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही साहित्य जगत का एक बड़ा नाम है.लेखक,कवि और कला समीक्षक के नाते एक बड़ी पहचान.इनके कविता संग्रह  'जगह जैसी जगह' को बिहारी सम्मान भी मिल चुका है.अब तक लगभग तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.हाल के दस सालों में सात किताबें संपादित की है.साथ ही 'राजस्थान में आधुनिक कला' नामक एक किताब जल्द आने वाली है.)
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2 टिप्‍पणियां:

  1. गायब-गायिका



    दुलारी बाई? – एबसेंट
    मिस गुलाब ? - एबसेंट
    जहाँआरा कज्ज़न ? – एबसेंट
    मिस शैला. – एबसेंट

    तारा. पुष्पा बाई. गुलज़ार. बिब्बो बेगम. मिस बादाम. अनवरी. मिस गुले-गुलज़ार. राजकुमारी. छप्पनछुरी. अमीना बाई. हुस्न बानो. सब के सब- एबसेंट.....

    अमृतसर दिल्ली जयपुर मेरठ आगरा टोंक लखनऊ हैदराबाद की वे झरोखेदार खिड़कियाँ गईं. चिकें गयीं. छज्जे गए. कटरे गए. दालान और चौक गए.

    .....और बिना अख़बार की खबर बने हमारे संगीत-प्रेमी दादाजी की जवानी के दिनों से कुछ इस तरह वे ठुमरियां वे दादरे वे कज़रियाँ वे टप्पे सब कोठों से साथ ले कर निश्शब्द गायब हुईं- मिस गुलज़ार शीरीन बानो कमला बाई ज़रीना परीजान हमीदा बेगम हीराबाई मिस-मधुर वगैरह वगैरह वगैरह......

    OOOOOO

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