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लिजिये पेश है 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की ' की टाईटल कविता

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, जुलाई 20, 2012 | शुक्रवार, जुलाई 20, 2012


इस विकट दौर में राजधानी में रहते हुए जीवन बचाने और असल जीवन की समस्यायों पर पाठक का ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करती डॉ अरविन्द श्रीवास्तव की ये कवितायें बहुत हद तक अपने उद्देश्यों  में सफल ही साबित हुयी हैं।  तंगहाल ज़िंदगी को बयानती ये कवितायें बहुत सी बार गाँव की पृष्ठभूमी का महानगरीय जीवन से तुलना करने में भी पीछे नहीं रहती। समय के साथ इस बंटी हुयी संस्कृति में लेखकों,पाठकों और विचारधाराओं के फेर में उलझे लेखन  की स्पष्ट झलक भी इन्ही कविताओं के  आसपास मिलती है। कभी ये कवितायेँ वर्ग संघर्ष को केंद्र में रखती है तो कभी प्रेम में प्रकृति जैसे विषय भी साध लेती हैं।      
 सम्पादक 


 डॉ.अरविंद श्रीवास्तव जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है।



बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।यहाँ आपके सध्य प्रकाशित कविता संग्रह 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'  से कुछ कवितायेँ प्रकाशित की जा रही है .मूल रूप सेराजधानी में एक उज़बेक लड़कीसमसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशियाक्ष महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया.


राजधानी में एक उज़बेक लड़की

राजधानी के समाचार-पत्रों में
उज़बेक लड़कियों के किस्से
तकरीम से नहीं पढ़े जा रहे थे

कौतुहल, जुगुप्सा और हिकारत का हिस्सा थीं 
ये लड़कियाँ 
पुलिसिया रेड, हाय-प्रोफाइल जिस्म तजारत की खबरें
सचित्र ‘बॉक्स’ में दिख रही थीं

मैं किसी गल्प के लिए ताना-बाना बुनने
खड़ा नहीं था उस बस-स्टॉप पर 
जहाँ अपनी तमाम सभ्यता-संस्कृति, अतीत और वर्तमान को 
समेटे खड़ी थी खंडित सोवियत गणराज्य की
एक मुकम्मल अदद लड़की... शायद स्त्री!
अभी-अभी ग्लोबल मार्केट में आयी थीं
उज़बेक लड़कियाँ
नेपाल, बंगलादेश और थाइलैंड से बेहतर स्वाद के दावे लिए
अपनी गंध व मुलायमियत की बदौलत
ये वही लड़कियाँ थीं जिनके कंधों पर कभी
सेव की भरी हुई टोकरी 
अपनी संस्कृति के उच्चतम आदर्श 
चेहरे पर लालीपन की नैसर्गिता व 
साम्यवादी सत्ता का था स्वाभिमान
ये लड़कियाँ उन महान योद्धाओं के वंशज थे
जिनके घोड़े की टापों से थर्रा उठता था कभी
मध्यपूर्व तो कभी भारतीय प्रायद्वीप  

सनातनी भूख और ढेर सारी औपचारिकताओं के साथ
एक आदिम सुगन्ध जिसने मुझे जोड़ रखा था
बतौर समरकंद, बुखारा, ताशकंद और फरगना से
अस्कद मुख़्तार की कहानियाँ, बावा मुराद के गीतों से
नक्काशीदार टोपी जिसे रेडियो ताशकंद के मित्रों ने गिफ्ट किये थे मुझे
और चन्द उज़बेकी शब्द लबालब कंठ में अटके थे मेरे
कई दशकों से
उसके गले में भी कोई न कोई शोकगीत थे
कम्युनिस्ट सत्ता खोने के 
किसी भोथरे चाकू से आपनी नसें
काटने का गम वह भी किसी गीत में छुपाये हुए थी

वैश्वीकरण की उड़ान में अन्दर ही अन्दर 
सहमी थी मुस्कुराती हुई उज़बेक लड़कियाँ
समय की त्रासदी को वह चाहती थी दरकाना
हमारे गाँव-कस्बे से राजधानी गयी लड़कियों के साथ,
जिसकी सबसे बड़ी विवशता थी 
बाजारवाद में 
अपनी-अपनी त्वचा बचाने की । 



भूख का स्वाद

कुलबुलाती है अंतरियाँ
जब होता हूँ भूखा
मैं गीत गाने से नहीं चूकता!
मेरी हड्डियाँ बिखेड़ती है संगीत
बजती है कड़-कड़ा-कड़
पसलियाँ मारती है थाप
आँसूओं की लय पर
मैं गाता हूँ गीत
बिल्कुल उटपटांग किस्म का
इसलिए भी कि बच्चे मेरे गीतों की नकल
नहीं कर पाये
भूख का स्वाद होता है कैसा
वे गीतों में नहीं गुनगुनाये।


तंगहाली में

तंगहाली में चूहों को देखता हूँ मैं
और चूहे मुझे

हम बद्दूआओं और शापों को तलाशते हैं
बुरे स्वप्नों की व्याख्या करते हैं और
आँत की मरोड़ व रशद गोदामों के बारे में
बतियाते हैं
हम बतियाते हैं मंहगाई और
खाऊ जनप्रतिनिधियों के बारे में
ठीक-ठाक चलती रहती है
हमारी रिश्तेदारी

सेल्फ पर रखे मोटे धार्मिक ग्रंथों के पीछे
रहते थे चूहे
इसलिए भी सेहत उनकी कमजोर नहीं थी

ज्यों-ज्यों बढ़ती गयी मेरी तंगहाली
चूहे देखते मुझे छिप-छिप कर
सहज किन्तु चौकन्ने
और मैं उन्हें ललचाई आँखों से

इससे पहले मैं उन्हें आग में भून
कर पाता उदरस्थ
वे गये यहाँ से फूट !


बूंद

जब टपकी बूंद
फटीचर-बदहाल धरती पर

साथ-साथ फूटीं कोपलें
लहलहा उठी फसलें
झूमी धरती
कहा कथावाचक ने - देखो
धरती है कितनी सुन्दर
धूप और ऋतुएं
मछली और समुद्र
चिड़िया ओर दरख़्त
मेला-ठेला
नट-नौटंकी
सबके सब हैं इसी पृथ्वी पर

काव्यवाचक सुनाता है पृथ्वी प्रेम के गीत
और तभी गर्भित बादल करते हैं प्रसव
बूँदें / फूस की छप्परों पर
अंधेरी रातों में
उठती है जुगलबंदी बूँदों की
किसी खाली वर्तन में
संगीत की स्वर-लहरियाँ
टप टपा टप टपाटप .....


महानगरीय कवि

गांव कस्बे और जनपद का कोई कवि
महानगरीय कवि के दर्शन करने को
लम्बी यात्रा तय करता है
स्वांतः सुख-सा महसूसता है
धन्य पाता है स्वंय को
जबकि
महानगरीय कवि
गांव, कस्बे और जनपद
पहुंचने के एवज़ में
चाहता है टानना
मोटी रकमें
गर्म शाल !


भविष्य
सफेद सनमाइके का है
मेरा ब्लैकबोर्ड
जिस पर लिखता हूँ
काले मार्कर से।



सच
बहुत बेढंगा है
रूखा है बहुत,
कातिल-सा
चिकना नहीं है!




चवन्नी का लोकतंत्र


यह क्रूर समय की बेचारगी थी
संबन्ध फाहे थे और रिश्ता
एक निविदा!
यूज़ एण्ड थ्रो आचनण की एक शिष्ट शैली, जो
परिपाटी बन चुकी थी
अब चूँकि चवन्नी अपनी औकात और स्टेट्स में
सबसे निचले पायदान पर
बुढ़िया याचक सी बैठी थी
अतः सामर्थवानों ने ग्लोबल साइनिंग के लिए
उसे वित्त व्यवस्था और सुसंस्कृत कहे जाने वाले
इस सभ्यता से खदेड़ दिया था।
इस लोकतांत्रिक हत्या पर लोगों की सहमति थी
और कहें तो जश्न-सा माहौल भी
जिसे बड़े ध्यान से देख रहा था सिर्फ और सिर्फ
कमजोर व बीमार अट्ठनी।
तमाम किस्म के कथित विलापों से
इतना तो स्पष्ट था कि अब नहीं होगा पुणर्जन्म
नहीं दिखेगा किसी रंग-रूप में चवन्नी! दिखेगा भी तो
म्यूजियम के किसी कोने में चवन्नी की मृत्य शरीर!

उन्होंने अपनी हैसियत में इजाफा कर लिया है
जो कभी चवनिया मुस्कान बिखेड़ने के लिए
बदनाम थे
बदल डाले गये चूरन और लेमनचूस के रैपर
अब राजा किस्म के लोग
दिल नहीं मांगते थे चवन्नी उझाल कर

चवन्नी का खेल खत्म हो चुका है
हत्या हो चुकी है उसकी
जैसे हमारे लोकतंत्र में
सपने, उम्मीद और हौसले की हत्या होती है
यह वही चवन्नी थी जो चुटकी में सलटा देती थी
पान, बीड़ी और खैनी की तलब
घोरनदास का बेटा दिनभर मटरगश्ती करता था
चवन्नी लेकर रामोतार का पोता खिलखिला कर हँस देता
लाल आइसक्रीम उसकी आँखों में तैर जाता
गर दादी जीवित होती तो चवन्नी के हत्यारे पर खूब बरसती

बिल्कुल छम्मक छल्लो बनकर आयी थी कभी चवन्नी
चवन्नी चैप लोगों ने भी अरसा लुत्फ उठाया था इसका
सिनेमा के थर्ड क्लासी दर्शकों से सहूकारों तक दबोचा था इसे
गुल्लक की चहेती थी कभी चवन्नी

तंगहाली मे जी रही थी इधर पीलिया पीड़ित चवन्नी
लोग इसे छूने को तैयार नहीं थे
बनिया नहीं पूछ रहा था इसकी खैरियत
बच्चे कतराने लगे थे इसे देखकर
वित्त मंत्रालय की भृकुटि तनी थी
आरबीआई के आंखों की किरकिरी या फिर
चवन्नी ढालनेवाले टकसालों ने हाथ खड़े कर दिये थे
चवन्नी के नाम पर
माहौल प्रतिकूल थे।

चली गयी चवन्नी इस लोकतंत्र से
कई-कई भाषा, लिपि और जातियों-सी
पेड़-पौधे, पहाड़ व तितली-सी
सभ्यता और संस्कृति-सी
लुप्त हो गयी लोकतंत्र से चवन्नी
सरस्वती बन हमारी रगों में बहने के लिए!


लापता लोग

कसूर क्या था रात का
जिसे हाँका गया रोशनी से

मैंने हृदय की खिड़कियाँ खोल रखी थीं
कोई गुलाब फंेक कर चला गया था

अक्सर नींद में वे
ठोकते हैं कील
दीवार पर
लापाता हुए लोग
लंबे वक्त तक मुश्किल पैदा करते हैं
फोन की घंटी बजती है और वे चहक सामने आते हैं

जो रखते हैं अपना मोबाइल स्वीच ऑफ
उन्हें भी मैं इसी सूची में करता हूँ शामिल ।




अफवाह
मैंने धरती पर सेंधमारी की
और स्वांग रचा विलाप का

मैंने जिन-जिन से नमक उधार लिया
वे सभी रकाब बने थे मेरे लिए

मैंने लड़की के बालों को छुआ
और बदले में काली घटा की वसीयत लिख दी

मैंने चुम्बन लिया जिस स्त्री का
उसे चांद तोहफे में दिया

भरोसे के काबिल नहीं था मैं
बावजूद इसके
मेरे अंदर एक हृदय होने की अफवाह
जोर-शोर से थी।



प्रकाशक 

यश पब्लिकेशन्स
1/10753,गली न.3,
सुभाष पार्क ,
नवीन सहादरा,
कीर्ति मंदिर के पास 
दिल्ली-110032,
मो-09899938522
वेबसाईट-www.yashpublications.com
सजिल्द मूल्य-195/-
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा आज रविवार के  चर्चा मंच  पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सारी रचनाएं अच्‍छी हैं ..

    बहुत सुंदर !!

    उत्तर देंहटाएं

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