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डॉ. नन्द भारद्वाज की कहानी 'तुम क्‍यों उदास होती हो मूरहेन'

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, जुलाई 28, 2012 | शनिवार, जुलाई 28, 2012


  • तुम क्‍यों उदास होती हो मूरहेन
  • डॉ. नन्द भारद्वाज की कहानी
ये कहानी ''नया ज्ञानोदय' के जून 2012 अंक में प्रकाशित हुई है,हम इसे पाठक हित में यहाँ साभार प्रकाशित कर रहे हैं।

यों एकाएक नहीं बदला था मेरा मन, न किसी बेखयाली में ही यह मान बैठा था कि जीने के लिए जो करना है, खुद ही तो करना है, किसी और के आसरे रहने-जीने के क्‍या मानी? क्‍यों    किसी की आस में अपने को यों ही छोड़ दिया जाए समय की बहती धारा में और जीते चले जाएं एक ऐसी जीवारी, जो खुद का ही दम घोटती-सी लगे। यह जानते हुए कि यही एक तो मिली है जीने को, चाहे दी हुई जी लें या अपने हाथों बना-संवार कर खुद तय करें कि कैसे जीना है, एक जिन्‍दादिल इन्‍सान की तरह। कई बार सोचता हूं, अब इतने बरस बाद इस गुजरे अतीत से कैसा गिला? शायद खो भी जाती होगी उन सपनों की याद, जिन्‍हें आकार पाते देखने की ख्‍वाहिश बेशक रही हो, लेकिन बचते रहे उन तक जाने से। मन अब भी भटकता है यहां से वहां। बदलते मौसम अब भी अच्‍छे लगते हैं, खासकर उनके बीच का वह अन्‍तराल और वे यात्राएं जो दरअसल कहीं ले नहीं जातीं। घुमा-फिराकर वापस वहीं ला छोड़ती हैं, उसी एकाकी दुनिया में, जो बाहर से हरी-भरी तो दिखती है, लेकिन भीतर वही सांय-सांय सन्‍नाटा। 
     इस सन्‍नाटे और अबोले लगाव के कुछ अंश अब भी बचे रह गए हैं शायद हमारे बीच और कोई चाहता नहीं कि वे बाहर दिखाई दें। खुद भी जब किसी गहमा-गहमी में घिर जाता हूं, तो कोई निरापद कोना ढूंढने लगता हूं। औरों के चाहने पर भी उस हलचल में अपने को घुला नहीं पाता। आयोजनों में ऐसे अनुभवों पर बोलना बेशक पर से सहज लगता हो, लेकिन जानता हूं कि कितना मुश्किल है यह सब कर पाना। कई बार तो इसी दुविधा में खुद से जिरह कर बैठता हूं कि आखिर क्‍या होगा कहीं कुछ कहने से? अक्‍सर लौटकर आती आवाजों और लोगों की प्रतिक्रियाओं से ही कुछ अनुमान कर पाता हूं कि जाना अकारथ नहीं गया शायद।

      किसी बड़े आयोजन में मिले मान-सम्‍मान और अपनेपन से खुश होना तो स्‍वा‍भाविक था ही, समाप्ति पर उसी उमंग को मन में संजोए, लोगों के बीच अपने लिए रास्‍ता बनाते जब मंच से नींचे उतरा, तो अचानक उसे सामने पाकर कैसा अचकचा गया था। वह अपनी सहेलियों के बीच बैंगनी-नीले कुर्ते पर सुर्ख चुन्‍नी को माला की तरह धारण किये, विस्‍मय की तरह खडी थी  जैसे भादों की हल्‍की झड़ी में रंग-बिरंगे फूलों से लदी झाड़ियों के बीच एक पतली-सी पगडंडी पर बरसों पहले कुछ ऐसे ही सजीले परिधान में अपनी बाल-संगाती मेहुल को पुलक में खड़े देखा था, जो मेरा ही पीछा करते उस हल्‍की बारिश में घर से निकल आई थी अकेली और मैंने उसके इस तरह आने को महज एक इत्‍तफाक की तरह लिया था।

     अपनी छोटी-सी पॉकेट डायरी के खाली सफे पर कुछ लिखवाने के इरादे से जब उसने मुस्‍कुराते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया तो खुद कैसा असमंजस में पड़ गया था। ऐसा नहीं कि  ऑटोग्राफ देने का यह कोई पहला अवसर था, पर जाने क्‍यों उसे इस तरह ऑटोग्राफ देने का कोई औचित्‍य अपने तंई खोज नहीं पाया, जिसकी एक बड़ी वजह यही थी कि वह स्‍वयं उसी आयोजन में एक नवोदित प्रतिभा के रूप में पुरस्‍कृत हो चुकी थी। संयोजक ने इसी मनस्‍वी को जब अपनी बात कहने के लिए मंच पर बुलाया तो उसने कितनी उमंग से अपने प्रिय वनपाखी पर एक छोटी कविता प्रस्‍तुत की थी – ‘मूरहेन’। वही मूरहेन, जो बरसों पहले किसी पक्षी-विहार में उन्‍मुक्‍त विचरती उस बैंगनी-नीली चिड़िया की याद ताजा कर गई थी। पंछियों के झुंड में बेपरवाह अपने ही गुमान में विचरण करती इस मूरहेन का अपना अलग ही आकर्षण होता है, कोई उसे मुर्गाबी कहता है तो कोई काम-पाखी। उसी वनपाखी के रम्‍य रूपक को अपनी कविता में उकेरते हुए मनस्‍वी, कितनी भाव-विभोर थी, यह उसके हाव-भाव और मुखर प्रस्‍तुति में उजागर था। मन में उभरती ऐसी ही छवियों के बीच जब उसने फिर से अपना आग्रह दोहराया तो उसे ना कहने का कोई रास्‍ता मुझे नहीं सूझा। अनायास उसकी डायरी को अपने हाथ में लिया और खाली सफे पर उसी वनपाखी की इबारत शब्‍दों में उकेर दिया – सदा ऐसे ही सुर्ख और सजीले बने रहें आपके सपने, मूरहेन! और उसके नीचे अपने दस्‍तखत कर डायरी उसे लौटा दी। उसने मुस्‍कुराते हुए शुक्रिया अदा किया और पीछे हटकर अपनी सहेलियों के साथ उसी हॉल में एक कोने में अलग खड़ी हो गई। हॉल से बाहर चाय-नाश्‍ते के दौरान जब भी उस पर नजर पड़ी, उसे अपनी ओर उत्‍सुकता से देखते पाया। एक-आध बार बात करने को वह मेरी ओर बढ़ी भी, लेकिन मित्रों के बीच घिरे रहने के कारण शायद संभव नहीं हो पाया। आयोजन-स्‍थल से लौट आने के बाद इतना जरूर याद रहा कि उन हंसती आंखों को धारण करने वाली वह सूरत आम नहीं थी और न वह नजर ही इतनी बेइरादा, जो देर तक पीछा करती रह गई थी। 
  
          
आम तौर पर जैसा होता है, उस आयोजन के बाद अपने ठिकाने लौटकर मैं फिर से उसी रूटीन काम में मसरूफ़ हो गया। अखबारनवीसी का काम बेशक आजाद तबियत का लगता हो, लेकिन असल में सुबह से रात तक की दिनचर्या में सुकून के लिए कहीं कोई स्‍पेस नहीं होता। अपनी रुचि या पसंद के काम की तो बात ही क्‍या की जाए? अक्‍सर रिपोर्टिंग का बहुत सारा काम रात में अपनी नींद को स्‍थगित करके ही निपटाना होता था। रिपोर्ट और ब्‍यौरे तैयार करने के लिए दिन में जिस एकान्‍त और एकाग्रता की जरूरत होती थी, वह दफ्‍तर की खटर-पटर में सबके बीच कहां हासिल हो पाती? देर रात थककर अकेले बिस्‍तर में दुबक जाने की इस अनचाही दिनचर्या से छुटकारा पाने की कहीं-कोई सूरत नहीं दीख रही थी। यों भी अब जिन्‍दगी से शिकवा-शिकायत करना बेमानी-सा लगता था।
    
  निजी डाक आम तौर पर मेरी गैर-मौजूदगी में सीट पर ही रख दी जाती थी, ताकि रिपोर्टिंग की दौड़-धूप से जब भी फुरसत मिले, आकर देख लूं। कोई सप्‍ताह भर बाद अचानक अपनी रोजमर्रा की इस डाक में एक नया-सा लिफाफा देखकर मैं ठिठक गया था। पत्र की लिखावट भी नयी-सी लगी। लि‍फाफे के ऊपरी सिरे पर व्‍यक्तिगत जैसा कुछ लिखा था, लेकिन उस पर भेजने वाले का नाम-पता दर्ज नहीं था। रोज की दैनिक डाक को छोड़कर पहले उसी को खोलकर पढ़ने की जिज्ञासा हुई। यह एक पेज का छोटा-सा पत्र था, जिसमें उस आयोजन के दौरान हुई मुलाकात पर अपनी खुशी का इजहार किया गया था। आयोजन के बाकी हवालों के साथ एक मीठा-सा उलाहना भी था कि उस शाम मैंने उसे अपेक्षित तवज्‍‍जो नहीं दी, जबकि वह आयोजन के बाद मुझसे बात करने की कितनी इच्‍छुक थी। पत्र से यह भी जाना कि वह मुझे पहले से जानती है। मेरी कविताएं और लेख पढ़ती रही है और मेरे लिखे को पसंद करती है, यहां तक कि रिपोर्टिंग और टिप्‍पणियां भी वह चाव से पढ़ती है। मैंने यह भी गौर किया कि उसके लिखने में कहीं-कोई मन-बहलाव या व्‍यंग्‍य नहीं था, बल्कि मेरे प्रति एक अनजाना-सा सम्‍मान का भाव था, जो सुखद लगा। आखिर में बस यही आग्रह था कि कभी वह अपने लिखे पर मेरी राय लेना चाहे, तो मैं थोड़ा समय उसके लिए जरूर निकालूं।

     मैंने उसी वक्‍त उसके पत्र का संक्षिप्‍त-सा उत्‍तर भेजते हुए यही आग्रह किया कि वह आयोजन की उस मुलाकात और व्‍यस्‍तता को सहजता से ले। उस भीड़ में शायद उतना ही मिलना और बात कर पाना संभव था। यह भी आश्‍वस्‍त किया कि अगली बार जब भी आना होगा, उससे मिलकर वह शिकायत जरूर दूर की जाएगी।

     आनेवाले दिनों में उसके कुछ और पत्र आये, साथ ही अपनी कुछ नयी रचनाएं भी नमूने के बतौर उसने भेजी थीं, जिन्‍हें पढ़ने और उन पर अपनी राय देने में मुझे कतई असुविधा नहीं हुई, बल्कि खुशी हुई कि वह इतना मान देती है। मैंने यह बात खासतौर से गौर की कि अपनी आरंभिक रचनाओं में थोड़े कच्‍चेपन के बावजूद उसके लेखन में निरंतर निखार आता गया था और उसकी रचनाशीलता में एक नया उन्मेष था। पारिवारिक रिश्‍तों में घुलती स्‍वार्थपरता, बुजुर्ग पीढ़ी की रूढ़ मानसिकता से टकराव, युवा-मन के बारीक मनोवेग और व्‍यक्ति-मन के अन्‍दरूनी उलझावों को वह बेहतर ढंग से समझ पा रही थी। उसकी भाषा और बयानगी अपनी उम्र के लोगों से नितान्‍त अलग थी। सीधी जीवन के बीच से उठाई गई शब्‍दावली में एक खास तरह का खुलापन भी था उसमें और अपनी कहानियों में प्रणय के अन्‍तरंग क्षणों को इतना सजीव कर देती कि पढ़ते हुए रोमांच होने लगता। इन कहानियों पर जो भी सुझाव मैंने दिये, उन्‍हें उसने बहुत संजीदगी से ग्रहण किया, जहां जरूरी लगा, जिरह भी की, पर मेरी साफगोई को हमेशा पसंद  किया। इस तरह हमारे बीच संवाद और विचार-विनिमय का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह उत्‍तरोत्‍तर और गहरा - और आत्‍मीय होता चला गया।

 कोई आठ-नौ महीने बाद अपने ऑफिस के काम से मेरा फिर उसी शहर में जाने का संयोग बना। रवाना होने से पहले मैंने उसे पत्र से सूचित कर दिया था। दिन में अपना काम निपटाने के बाद उसी शाम जब हॉस्‍टल के आगंतुक कक्ष में उससे मिलने पहुंचा तो वह बेहद उत्‍साहित थी। औपचारिक बातें पूरी होते-होते उसी ने आग्रह किया था कि हम कहीं बाहर जाकर कॉफी पीएं। मन में कहीं एक संकोच और आशंका यह भी थी कि अपनी किसी बात या बेतकल्‍लुफी से उसे नाराज न कर दूं याकि हमारी दोस्‍ती में कहीं कोई छोटा स्‍वार्थ न दीख जाए उसे। यह सच है कि जीवन में पहली बार किसी के प्रति अपने मन में एक अलग तरह का आकर्षण महसूस करने लगा था, कहीं इस बात की आशंका भी थी कि मेरी यह जो बनावरहित जीवन-शैली और देशज मानसिक बुनावट है, वह कई बार नफ़ासत-पसंद लोगों के अनुकूल नहीं भी होती, यानी उस लिहाज से मेरी अपनी नजर में हमारे बीच किसी अंतरंग रिश्‍ते के लिए अवसर बहुत सीमित थे। घरवाले साल भर पहले जिस सगाई-ब्‍याह के फंदे में फांस लेना चाहते थे, उसे बेशक फिलहाल टाल दिया हो, लेकिन मैं जानता था कि वे हार मानने वाले नहीं थे, बल्कि अपनी ओर से तो उन्होंने ल़ड़की के घरवालों को आश्वस्त कर ही रखा था। कुछ अखबारनवीसी के मौजूदा काम ने भी मेरी अपनी पसंद और चाहत की सीमाएं तय-सी कर रखी थीं।  

      संयोगवश आज सुबह का मौसम थोड़ा खुशगवार था। दरख्‍तों पर उतरते चैत की चटख हरियाली यों भी नये पत्‍तों और रंग-बिरंगे फूलों में एक नयी तरावट लेकर आती है, तिस पर अगर हल्‍की-सी बारिश का साथ मिल जाए तो प्रकृति जैसे अपने ही रूप पर रीझ जाती है। सर्दी बेशक जा चुकी थी, लेकिन रात की हल्‍की बूंदा-बांदी हवा में नमी और ठंडक फिर से लौटा लाई थी। गनीमत थी कि आसमान साफ था। सुबह नींद से जागने के बाद से ही मैं इस बात को लेकर उत्‍साहित था कि आज वह मुझसे मिलने आ रही थी, इसलिए अपना पूरा आधा दिन आज उसी के लिए खाली रखा था। जैसा उसने बताया, उसका दिन का समय आमतौर पर लाइब्रेरी में व्‍यतीत होता था। हॉस्‍टल से तो वह सवेरे ही नाश्‍ता करके निकल जाती थी, लेकिन आज उसे वहां नहीं जाना था। सीधे मेरे पास गैस्‍ट-हाउस ही आना था, जिसका पता पिछली शाम मुझसे विदा होते हुए उसने ले लिया था। आज उसे अपनी कहानियों की पाण्‍डुलिपि पर मुझसे थोड़ी डिटेल में बात करनी थी। यह बात भी पिछली शाम को तय हो गई थी। यह गैस्‍ट-हाउस शहर की बड़ी झील के किनारे पहाड़ी ढलान पर बना है, जो मेरे अजीज दोस्‍त विक्रम ने कुछ ही साल पहले बनवाया था। अपने काम से मैं जब भी आता हूं, यहीं रुकता हूं। आम तौर पर वह खाली ही रहता है। बस एक केयरटेकर है, जो सुबह-शाम साफ-सफाई कर देता है और रुकने वालों को चाय-नाश्‍ता दे देता है। दिन और रात का खाना बाहर ही लेना होता है।

       सवेरे दस बजे के करीब जब वह आई तो मैं बाहर बरामदे में खड़ा उसी का इंतजार कर रहा था। हल्‍के बैंगनी बातिक कुर्ते और उसी से मैच करती गहरी फिरोजी चुन्‍नी में वह खासी आकर्षक लग रही थी। हाथ में सामान के नाम पर छोटा-सा पर्स और एक पॉली-बैग था। उसकी अगवानी करते हुए मैं उसे लिविंग-स्‍पेस में रखे सोफों की ओर ले गया। यह व्‍यवस्‍था बाहर से आने वाले मेहमानों की सुविधा के लिए की गई थी। मैंने यह उसी की च्‍वॉइस पर छोड़ दिया कि वह लिविंग-रूम के कॉमन-स्‍पेस में बैठना पसंद करेगी या मेरे कक्ष में। यों पिछली शाम की सुखद मुलाकात के बाद अब हमारे बीच औपचारिकता निभाने जैसी कोई बात नहीं रह गई थी और न कोई संकोच ही बकाया था। इस बार की मुलाकात में वह शुरू से ही कुछ खुली और आत्‍मीय-सी लग रही थी। कुछ देर उस कॉमन-स्‍पेस में बैठकर बातें करते हुए जब उसने मेरे कक्ष के बारे में पूछा तो मैंने उसी स्‍पेस में खुलते एक दरवाजे की ओर इशारा कर दिया। वह उसी सहजभाव से उठकर कमरे की ओर बढ़ गई। मैं भी उसके पीछे कमरे में दाखिल हो गया। कमरे का मुआयना करते हुए उसने कहा था, वाह, अच्‍छा गैस्‍ट-हाउस है, बिल्‍कुल घर की तरह, लेकिन बहुत सूना सूना-सा लगता है, और कोई रहता नहीं यहां? 
   
 दरअसल, यह मेरे एक दोस्‍त का अपना रिहायशी फ्‍लैट है, जिसे फिलहाल उसने संस्‍थान के गैस्‍ट-हाउस में तब्‍दील कर रखा है। सिर्फ संस्‍थान के ही काम आता है, किसी व्‍यावसायिक होटल की तरह नहीं है। बस एक केयरटेकर रहता है, जो सुबह-शाम देखभाल करता है और यहीं परिसर में बने हिस्‍से में अपने परिवार के साथ रहता है। बुलाने पर आ जाता है, चाय नाश्‍ता भी यहीं किचन में बनाकर सर्व कर देता है। मैंने एक ही सांस में सारी जानकारी दे दी।
   
 हुम्‍म्..., दिलचस्‍प आदमी लगते हैं आपके दोस्‍त! मनस्‍वी के स्‍वर में परिहास और हल्‍के व्‍यंग्‍य का मिला-जुला भाव देखकर मैं थोड़ा संकोच में पड़ गया कि कहीं कोई ग़लत अर्थ तो नहीं लगाया जा रहा। मैंने उस पर कोई अलग टिप्‍पणी नहीं की। फिर शिष्‍टाचार का खयाल करते पूछ लिया, कहिये, आप पहले कुछ नाश्‍ता लेना पसंद करेंगी या सीधे चाय ही पीना चाहेंगी। इतनी व्‍यवस्‍था तो है यहां।
  
 नहीं, रहने दीजिये। मैं नाश्‍ता करके आई हूं। हां, चाय पी सकते हैं।  उसने से जवाब दिया। 
    मैंने कमरे में लगे बैल-स्विच को दबा दिया जो केयरटेकर को बुलाने के लिए ही लगा था। इस बीच वह स्‍टडी टेबल पर रखी मेरी कुछ किताबों को देखने में व्‍यस्‍त हो गई। कुछ ही क्षणों में केयरटेकर केशव कक्ष के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ और मुझसे दो कप चाय का आर्डर लेकर लौट गया। blइस बीच मैंने सैंट्रल टेबल पर रखे अखबारों को समेटकर उसके नीचे की रैक पर रखा और बैड-साइड की रैक पर रखी एक छोटी प्‍लेट में बिस्किट सजाने लग गया। वह कौतुहल के साथ यह सब देखती रही। बीच-बीच में हम खाने-पीने की अपनी पसंद के बारे में बात करते रहे। तब तक केशव चाय ले आया और ट्रे मेज पर रख गया। मैं उसकी मनुहार करते हुए मुस्‍कुरा दिया, लीजिये, अरोगिये!   
    
 जी, पहले आप लीजिये.....। कहते हुए उसने प्‍याली उठाई और मेरी ओर बढ़ा दी। उसका मान रखते हुए मैंने प्‍याली थाम ली। मैं भी पास रखे सिंगल सोफे पर बैठ गया और चाय पीने लगा। चाय का सिप लेते हुए अपनी सहज मुस्‍कान में वह और भी खुशनुमा लग रही थी। चाय के दौरान हमारे बीच उसकी थीसिस को ले‍कर कुछ सामान्‍य-सी बातें होती रहीं। चाय पीने के बाद उसने अपने पॉली-बैग से एक फाइल निकाली और मेरी ओर बढ़ा दी।  
     फाइल के कवर पर ही मेरी नजर ठहर गई। यह उसके पहले कहानी-संगह की पाण्‍डुलिपि थी। संयोग से उससे हुए परिचय के बाद मैंने पत्रिकाओं में उसकी कुछ कहानियां पढ़ रखी थीं और उन पर पत्रों के जरिये अपनी राय भी लिखता रहा हूं। कवर पलटकर कहानियों की सूची देखने के बाद जिज्ञासावश मैंने पूछ लिया,शीर्षक के रूप में पिछले पहर की धूप भी अच्‍छा टाइटल है, आपका क्‍या खयाल है? .....यही ठीक है, जो आपने रखा है?
      मैंने इस पर काफी विचार किया है। टूटते तटबंध मुझे ज्‍यादा अपीलिंग लग रहा है,  मेरी बहुत-सी कहानियों के केन्‍द्रीय भाव को प्रकट करता है। फिर जैसा आप सुझाएं, .....मेरे लिए आपकी राय ज्‍यादा मायने रखती है।  
    
 अरे नहीं मनस्‍वी, मेरी राय आपसे अलग थोड़े ही होगी, वैसे आपका सोचना ठीक है। चलिये, फिर इसी को फाइनल मानिये। मुझे उसकी बात तर्कसंगत लग रही थी। मैं जानता हूं, आपकी बाकी कहानियां भी युवा-मन की जद्दोजहद और उनके आपसी रिश्‍तों में आते उतार-चढाव को व्‍यक्‍त करती हैं, इस लिहाज से टूटते तटबंध सटीक शीर्षक है। कहानियों का क्रम भी लगभग ठीक रखा है आपने। इसके प्रकाशन के बारे में बात हो गई किसी से?
      हां, एक दिल्‍ली के प्रकाशक से बात हुई है, प्रकाशित करने को तैयार तो हो गए हैं लेकिन रॉयल्‍टी वगैरह शायद ही कुछ दे।
     
  शुरू में सभी ऐसा ही करते हैं, मनस्‍वी। लेकिन आप अपना काम करती रहें। खुशी की बात यही है कि इसके प्रकाशन की व्‍यवस्‍था हो रही है। 
     लेकिन इसे प्रकाशक को सौंपने से पहले मैं चाहती हूं कि एक बार आप इन कहानियों को फिर से देख लें। कहीं कोई सुधार या बदलाव की जरूरत लगे तो निस्‍संकोच कहें। 
         “अरे नहीं मनस्‍वी, तुम वैसे ही बहुत अच्‍छा लिखती हो, मैं भला सुधार या बदलाव के बारे में क्‍या राय दूंगा? वाकई संकोच होने लगा कि मनस्‍वी मुझे इतना मान दे रही थी।   
     प्‍लीज आनंद, मैंने आपने हमेशा मुझे अच्‍छी राय दी है, इसीलिए यह पाण्‍डुलिपि मैं साथ लेकर आई हूं, बल्कि मैं चाहती हूं कि इसके ब्‍लर्ब के लिए आप ही कुछ पंक्तियां लिख दें, मुझे बहुत अच्‍छा लगेगा। यह कहते हुए उसने पाण्‍डुलिपि मेरी ओर बढ़ा दी, जिसे ग्रहण कर लेने के सिवा अब कोई चारा नहीं बचा था। उससे पाण्‍डुलिपि लेकर एक बार और सरसरी तौर पर देखी और वहीं मेज पर रख दी। मुझे यह देखकर अच्‍छा लगा कि मनस्‍वी मुझ पर इतना भरोसा करने लगी थी।
     पाण्‍डुलिपि मुझे सुपुर्द करने के साथ ही वह अपनी जगह से उठ खड़ी हुई। मेरे पास भी उसे रोके रखने की कोई और वजह नहीं रह गई थी। मैंने आश्‍वस्‍त कर दिया कि जल्‍दी ही पाण्‍डुलिपि पढ़कर उसे अपनी टिप्‍पणी के साथ भिजवा दूंगा। और इसी के साथ औपचारिक बातचीत करते हुए हम कमरे से बाहर आ गये। मैंने देखा कि वह जिस ऑटो से आई थी, वह अब भी गेट के बाहर खड़ा इंतजार कर रहा था। मुझसे विदा होकर वह उसी में वापस लौट गई।  
    
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 किसी नये अनुभव के बीच से गुजरते हुए अक्‍सर मैं आश्‍चर्यचकित रह जाता हूं कि समय कैसी अनसोची स्थितियों के बीच ला खड़ा करता है। नये रिश्‍तों के बनते समीकरण अच्‍छे तो लगते हैं, लेकिन वे अपनी उलझनें भी साथ लेकर आते हैं, उनसे बच निकलना न आसान होता है और न उचित ही। खासकर वह रिश्‍ता जो मन को सुकून देता हैं, जिसकी स्‍मृति मात्र से हवा में अलग तरह की सुगंध व्‍याप जाती है और कल्‍पनाएं सजीले पंखों पर सवार न जाने किस लोक में बिलम जाने की कामना करती हैं। उस अरूप को हमने कभी ठीक से देखा नहीं, लेकिन कितना मोहक लगता है उसका आकार, जो हमारे सपनों और स्‍मृतियों में नित नये मौसम सजाता है।   
     
 ये जाते हुए पावस के परवर्ती दिन थे। हवा में नमी की हल्‍की-सी तरावट अब भी बरकरार  थी और आसमान में बादलों की आवाजाही मौन और निस्‍पंद। इस बार मौसम की बारिश यों भी आम नहीं थी, खासकर मेरे लिए तो एक अलग तरह के उन्‍माद से भरी ही गुजरी। पाण्‍डुलिपि के साथ उसके लेखन पर लिखी मेरी अंतरंग टिप्‍पणी और कहानियों पर मेरी राय उसे इतनी पसंद आई कि उसने मुझ पर ही एक अच्‍छी–खासी कहानी लिख डाली। इसके बाद तो हर सप्‍ताह-दस दिन में उसके पत्र जाने कितनी उड़ाने अपने में समेटे आते और मेरी दिनचर्या को बेचैन कर जाते। लेकिन इस बार जो पत्र आया, वह बिल्‍कुल अलग तरह का था, कुछ-कुछ घरेलू किस्‍म की चिन्‍ताएं लिये हुए। लिखा था कि उसकी पीएचडी थीसिस जमा होने का समय करीब आ गया है, फैलोशिप अगले महीने से मिलनी बंद हो जाएगी, शायद हॉस्‍टल भी छोड़ देना पड़े, ऐसे में उसके लिए अपने घर लौट जाने के सिवा दूसरा कोई विकल्‍प नहीं है। वह किसी और मसले पर भी राय लेने की इच्‍छुक थी, जिसका पत्र में उसने खुलासा तो नहीं किया, बस यही आग्रह था कि किसी तरह एक दिन का समय निकालकर उससे आकर जरूर मिल लूं।
     
 संयोग से दो दिन बाद ही एक फैस्टिव-ईवेंट को कवर करने के सिलसिले में मेरा उस शहर जाने का कार्यक्रम पूर्व निश्चित था, रहने का इंतजाम भी पर्यटन विभाग की ओर से उनके गैस्‍ट-हाउस में पूर्व-निर्धारित था। मैंने फोन करके अपने आने और रुकने की व्‍यवस्‍था के बारे में उसे बता दिया था। मैं आया और दिन भर अपने काम में करने में व्‍यस्‍त रहा। बस वह शाम मनस्‍वी के लिए खाली रखी थी। उसके लिए विभाग की डिनर-पार्टी में जाना भी टाल दिया था। 
     
शाम को साढ़े सात के करीब अपनी पसंद के एक रेस्‍तरां में उसने मुझे आने का आमंत्रण दिया था। मैं निर्धारित समय से पहले वहां पहुंच गया, ताकि उसे इंतजार न करना पड़े। वह मेरे पहुंचने के कुछ समय बाद ही आ गई थी। मुझे यह देखकर अच्‍छा लगा कि उसने कोई अतिरिक्‍त बनाव-श्रृंगार नहीं कर रखा था। कॉफी का ऑर्डर देने के बाद हम कुछ देर यों ही एक दूसरे के काम की ताजा जानकारियां शेयर करते रहे। उसने बताया कि थीसिस का काम पूरा हो गया है और अगले दो-चार दिन में वह उसे जमा करा देगी। फिर अपने घर लौट जाएगी।
      कॉफी पीने के दौरान मुझे लगा कि वह मुझसे कुछ और बात करने की इच्‍छुक है, लेकिन रेस्‍तरां के भीड़-भरे माहौल में वह कह नहीं पा रही थी। मैंने उसे अपने गैस्‍ट-हाउस चलने का प्रस्‍ताव किया, तो वह असमंजस में पड़ गई। उसके अनमनेपन को देखकर मैंने भी कह दिया, अगर चलने में दुविधा हो, तो रहने दो, मैं आग्रह नही करूंगा।
    
  नहीं आनंद, वह बात नहीं है, बल्कि मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है, पहले सोचा था कि यहीं कर लें, लेकिन आज यहां कुछ अच्‍छा नहीं लग रहा। इस बीच कॉफी का बिल चुकाकर हम रेस्‍तरां से बाहर आ चुके थे। ऑटोरिक्‍शा में बैठते हुए फिर उसने मन बना लिया कि वह मेरे साथ पहले गैस्‍ट-हाउस रुकेगी और फिर वहीं से हॉस्‍टल के लिए निकल जाएगी। मुझे उसका यह निर्णय अच्‍छा लगा।   
    
 अपने रूम में आने के बाद हम पहले की तरह ही सहज थे। मैंने कोई अति‍रिक्‍त उत्‍साह नहीं दिखाया, लेकिन यह देखकर अच्‍छा लगा कि वह अब उतने ही आत्मिक लगाव से मिल रही थी। रूम के अंदर आकर वह साइड में लगे बड़े सोफे पर बैठ गई, मैं भी रूम का दरवाजा खुला छोड़कर उसी के पास छोटे सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर इधर-उधर की औपचारिक बातों के बाद उसकी हथेली को अपने हाथ में लेते हुए मैंने यों ही कह दिया था, तुम्‍हारे हाथ की रेखाएं बहुत अच्‍छी हैं, मनस्‍वी !"  
    
 सच? क्‍या कहती हैं ये? क्‍या वाकई आप इन्‍हें देखकर मेरा भविष्‍य बता सकते हैं। वह उत्‍सुकता से पूछ बैठी थी।   
     तुम्‍हारा भविष्‍य तो खुद तुम्‍हारे होने में छुपा है। कितनी अपार संभावनाएं अपने में लिये बैठी हो, उन्‍हें बाहर लाने में इन रेखाओं की ओर देखने की कहां जरूरत है?"
     आप मुझे बहला रहे हैं। सच बताइये, क्‍या सोचा है आपने? मुझमें कोई कमी देखते हैं आप?.... यही कि मैं आपसे इतने खुलेपन से कैसे मिल लेती हूं? कि मैं किसी और से भी ...." कहते हुए उसके स्‍वर में हल्‍की आशंका झलक रही थी।
   
 कैसी बात करती हो, मनस्‍वी....? प्‍लीज, ऐसा मत कहो। मैंने उसे रोकने का प्रयास किया।
     उसने अपनी बात को जारी रखते हुए आगे कहा, आनंद, मैं एक अजीब दुविधा में जी रही हूं, शायद आप नहीं जानते कि मेरे मम्‍मी-पापा ने मेरे लिए एक रिश्‍ता तय कर लिया है, बस मेरे लौटने का इंतजार कर रहे हैं, बल्कि उसी सिलसिले में अगले सप्‍ताह वे मुझे कानपुर ले जाना चाहते हैं, लड़के से मिलवाने।अब आप बताइये मैं क्‍या करूं? कब तक अकेली लड़ती रहूं इन सबसे और किसके बूते? मैं उनका सामना तभी कर सकती हूं, जब आप मेरे साथ हों।  
   
 सवाल मेरे या किसी और के साथ देने का नहीं है, मनस्‍वी! साथ देने या पाने के लिए बहुत-सी बातों का अनुकूल होना या उन्हें अनुकूल बनाना जरूरी है।  
    क्‍या हमारे रिश्‍ते में वह अनुकूलता नही है? इसे किस तरह का रिश्‍ता मानते हैं आप? सवाल करते हुए अपनी आंखों में शिकायत लिये वह सीधे मेरी ओर देखने लगी थी।
    इसे तुम एक सच्‍ची दोस्‍ती का रिश्‍ता कह सकती हो, जिसमें किसी से कुछ लेने या पाने का भाव उतना महत्‍वपूर्ण नहीं होता, जितना अपने प्रिय को देने का होता है और यह सुख खाली दैहिक सुख तक सीमित नहीं होता। अगर ऐसा है तो वह सच्‍ची दोस्‍ती भी नहीं है। पति-पत्‍नी के बीच जो रिश्‍ता होता है, क्‍या तुम समझती हो कि वे इतना स्‍वस्‍थ मन से खयाल रख पाते हैं एक दूसरे के सुख-दुख का? नहीं मनस्‍वी, लोग सिर्फ अपनी सुविधा देखना पसंद करते हैं। हमारे घरों में पत्नियां तो वैसे भी सारी उम्र इकतरफा पतिव्रत धर्म निभाने को बाध्‍य रहती हैं। न निभाएं तो उनके साथ जो बरताव होता है, उसके लिए मुझे अलग से उदाहरण देने की जरूरत नहीं है।
      .....और क्‍या होगा उस दोस्‍ती का, जब दोनों अलग-अलग कहीं एक दी हुई ज़िन्दगी जी रहे होंगे? उसने मेरी आंखों में देखते हुए पूछा।  
   
 अगर सच्‍चे दोस्‍त हैं, तो एक-दूसरे के रिश्‍ते ही इज्‍जत करेंगे। कभी अपनी वजह से उसमें दुराव नहीं आने देंगे।" अपनी बात को और खुलासा करने के लिए यह कहना भी जरूरी लगा कि स्‍त्री-पुरुष का जीवनसाथी के रूप में उम्र भर साथ रहना एक तरह का सामाजिक समझौता है। तुम चाहो तो इसे सामाजिक मर्यादा का नाम भी दे सकती हो। मैं इस रिश्‍ते की इज्‍जत करता हूं मनस्‍वी! बशर्ते कि इसमें दोनों एक-दूसरे के प्रति आत्मिक लगाव और समानता का भाव रखते हों। इज्‍जत या प्‍यार एक दूसरे से मांगें नहीं, बल्कि दें और लेने वाला सदा कृतज्ञता का भाव रखे। अगर ऐसा हो पाता तो हमारा पारिवारिक जीवन एक मिसाल होता, पर मुझे कहते हुए दुख है कि वह ऐसा है नहीं।"   
      
अब इतनी दार्शनिक व्‍याख्‍याएं तो मैं नहीं कर पाती आनंद और न इस आदर्श के पीछे   अपने आज की अनदेखी ही कर सकती। बस, अपने इन हालात और मनोदशा से कैसे बाहर आऊं,
इस पर आपकी राय जानने की उम्‍मीद ले‍कर आई हूं।  
     
 दार्शनिक मैं भी नहीं हूं, मनस्‍वी! .....तुमने बिल्‍कुल ठीक कहा, तुम्‍हें अपने आज की अनदेखी नहीं करनी चाहिये। मैं जानता हूं कि तुम्‍हारे जैसा जीवन-साथी पाना, बल्कि तुम्‍हीं को पाना, कितनी बड़ी आत्मिक खुशी होती, लेकिन मैं अपनी सीमाएं जानता हूं। मेरे पास तुम्‍हें देने के लिए एक प्‍यार के सिवा, और कुछ भी नहीं है, और वह मेरी नजर में नाकाफी है। ....अरे मेरे पास तो तुम्‍हें तुम्‍हें देने के‍ लिए एक निरापद छत तक नहीं है। तुम एक अलग तरह की जीवन-शैली में पली-बढ़ी हो, तुम्‍हारी रोजमर्रा की जरूरतें दूसरी हैं, उनकी तुम्‍हें आदत है, जबकि मेरे अतीत और वर्तमान को मुझसे अलग करके नहीं देखा जा सकता, मनस्‍वी ! जिस जीवन-शैली में पलकर बड़ा हुआ हूं, आज भी उससे मुक्‍त नहीं हूं, उन बकाया जिम्‍मेदारियों से भाग भी नहीं सकता। भागूंगा तो अपनी ही नजर में गिर जाऊंगा। तुम्‍हें शायद ठीक से अनुमान भी न हो। और एक सच्‍चा दोस्‍त होने के नाते मैं तुम्‍हें हर हाल में उन हालात से बचाकर रखना चाहूंगा, जिनकी तुम्‍हें आदत नहीं।यह कहकर मैं उसकी ओर देखता रह गया था।  
     
पर तुमसे इस तरह अलग रास्‍ते पर जाना, मुझे कतई अच्‍छा नहीं लग रहा है आनंद। मैं तुम्‍हारे साथ वो हर कष्‍ट उठा लेने को तैयार हूं, जो हमें सुख देगा। अगर यह नहीं कर पाई तो तुम्‍हारे साथ अन्‍याय होगा। कहते हुए वह गहरी चिन्‍ता में डूब गई थी। मैं खुद बेहद चिन्तित हो उठा था।
    
तुम इतनी उदास क्‍यों होती हो, मनस्‍वी? मुझे खुशी है कि तुम मेरी बात समझ रही हो। तुम इस पर और ठंडे दिमाग से विचार करना, किसी भावुकता या भावावेश में आने की जरूरत नहीं है। जिन्‍दगी को एक ठोस सच्‍चाई की तरह लो। आश्‍वस्‍त रहो, मैं हमेशा तुम्‍हारा ऐसा ही दोस्‍त बना रहना चाहूंगा, तुम बेशक मुझसे कभी मत मिलना। हम दूर रहकर भी एक-दूसरे को बहुत-कुछ दे सकते हैं। न सही कोई बड़े जीवन-अनुभव, एक मानवीय समझ और संवेदनशीलता बची रहे हमारे पास, हम उसी को साझा करेंगे। बस तुम उदास नहीं होना, मूर!  यह बात कहते हुए मेरा स्‍वर बेहद आर्द्र हो गया था और अनायास अपना दायां हाथ उसके जुडे हुए बंद हाथों पर रख दिया था। वह कुछ देर बगैर कुछ कहे गुमसुम उसी तरह बैठी रही।
    
 अभी मैंने कोई अंतिम फैसला नहीं किया है, आनंद। मैं फिर आपसे बात करूंगी। कहते हुए वह धीरे-से उठी और दरवाजे की ओर बढ़ गई। कमरे से बाहर आते हुए मैंने भी दरवाजा लॉक कर दिया और उसके साथ बाहर आ गया।  
    
मुख्‍य द्वार तक आते-आते फिर उसे तसल्‍ली देनी चाही कि वह अपने मन में कोई चिन्‍ता या मलाल न रखे। जरूरत होगी तो हम इस पर फिर बात करेंगे। गैस्‍ट-हाउस के मुख्‍य दरवाजे पर पहुंचकर मैंने बाहर खड़ा एक ऑटोरिक्‍शा आने-जाने के लिए किराये पर लिया और उसे हॉस्‍टल तक पहुंचा आया। हॉस्‍टल के मेनगेट से अंदर जाते हुए वह जब तक नजर से ओझल नहीं हो गई, मैं वहीं बैठा उसे जाते हुए देखता रहा।  
  •  
     
अगले महीने ही मनस्‍वी अपनी थीसिस जमा कर घर वापस लौट गई। जैसी आशंका थी, उसके मम्‍मी-पापा ने पहले ही अपनी जिम्‍मेदारियों से उॠण होने का बंदोबस्‍त कर लिया था। लड़के को देख आने की बात तो महज एक औपचारिकता भर थी। वह परिवार पहले से ही उनका जाना-पहचाना था और मनस्‍वी की बड़ी मौसी ने सारी जिम्‍मेदारी खुद संभाल रखी थी। लड़का अच्‍छा पढा-लिखा मेकेनिकल इंजीनियर था। वहीं की एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में सहायक मैनेजर के पद पर अभी लगा ही था, और सबसे बड़ी बात कि मनस्‍वी को उसने पहले ही अपने किसी पारिवारिक आयोजन में देख रखा था, इसलिए अपनी तरफ से वह रजामंदी दे चुका था। मनस्‍वी से यह किसी ने नहीं पूछा कि उसकी अपनी क्‍या राय है, कि वह किस तरह का जीवनसाथी पसंद करती है। उसे तो महज तयशुदा रिश्‍ते में अपनी सहमति भर देनी थी, इनकार करने या उस पर पुनर्विचार करने की कोई गुंजाइश वहां थी ही कहां? 
      
सगाई के दो महीने बाद शादी की तारीख तय कर दी गई और वह भी वहीं कानपुर जाकर, जिसके लिए मनस्‍वी के मौसाजी ने पहले ही सारी व्‍यवस्‍थाएं निश्चत कर रखी थीं। मुझे यह जानकारी संक्षेप में मनस्‍वी के उस पत्र से ही मिली, जो उसने अपनी शादी का औपचारिक निमंत्रण-पत्र भेजते हुए दी थी। मुझे भी यही सलाह दी गई थी कि मैं जल्‍दी अपना घर-परिवार बसा लूं। मैं देर तक उसके पूर्व पत्रों को याद क‍रते हुए औपचारिक निमंत्रण के साथ मिले उस पत्र को देखता रहा, जिसमें उसकी विवशता और अनमनापन साफ झलक रहा था, पत्र के अंत में उसने यह भी लिखा था कि इस पत्र को मैं आखिरी समझूं, शायद आगे संपर्क बनाये रखना उसके लिए आसान न हो। उसने निमंत्रण बेशक भेज दिया था, लेकिन मेरे लिए वहां जाने की गुंजाइश कम ही थी। बस जवाब में अपनी शुभकामनाएं और मेरी ओर से निश्चिंत रहने की तसल्‍ली जरूर भेज देनी थी। खुद अपने मन में कहीं इस बात का संतोष था कि चलो, अच्‍छा हुआ, वह किसी निर्णय पर तो पहुंची।
*
      
गुजरते समय के साथ कितनी हवा, कितना पानी बरस कर यों ही बह जाता है, बहुत कुछ धुल-बह जाता है भीतर-बाहर। नहीं चाहते कि उसकी स्‍मृति या अवशेष हमारे वजूद में कहीं बचा रह जाए निशान की तरह, जो खुद को या औरों को कुछ भी याद दिलाए। यह और बात है कि स्‍मृतियां अक्‍सर एक अवसाद की तरह बनी रहती हैं हमारे भीतर और उन्‍हीं को ढंकने-छुपाने की कोशिश में हम अक्‍सर उघड़ते चले जाते हैं।
     
बिछोह के कुछ अरसे बाद तक मैं उसे एक अमूर्त सपने की तरह जरूर याद करता रहा और मन की गहराई में कहीं हल्‍का अफसोस भी रहा कि उसकी उम्‍मीद के मुताबिक कोई पहल या भरोसा नहीं दे पाया। कई बार अपने को दिये गये दिलासे खुद का कमजोर बचाव लगते रहे और मन खिन्‍न हो उठता रहा। ये आठ साल कुछ इसी तरह के आत्‍म-संताप में कैसे गुजार गये, अब इसका तो क्‍या जवाब दूं? गुजरे सालों के पारिवारिक जीवन में कोशिश यही रही कि चारों ओर फैले गर्द-गुबार को अपने भीतर ही कहीं विलीन कर दूं, कि उसका कोई अंश बाहर न छूट-दीख जाए।        
    
 इतने बरस बाद अचानक अपनी डाक में फिर वैसे ही लिफाफे पर उसी लिखावट में अपना पता देखकर मैं विस्मित रह गया था। उसके पत्र को पहचान लेने में कोई गलती नहीं हुई मुझसे। देखकर आश्‍चर्य जरूर हुआ, बल्कि अच्‍छा भी लगा था।
     
 बरसों बाद यही एक पत्र था, जिसके माध्‍यम से उस विस्‍मृत अतीत को उसने फिर से पुनर्जीवित कर दिया था। वह इसी शहर के गर्ल्‍स कॉलेज में प्रवक्‍ता बनकर आ रही थी और यहां अपने पूर्व-परिचित के रूप में मुझे खबर कर देना उसे जरूरी लगा था। उसके पत्र से लगा कि उन बीते दिनों की स्‍मृतियों को उसने हमेशा के लिए बिसार नहीं दिया, बल्कि उसके मन में कहीं यह विश्‍वास बना रहा कि मैं उसे आज भी उसे उतना ही मान देता हूं।  
     उससे मिलने मैं स्‍वयं उसके कॉलेज पहुंच गया था। वैसे भी मुझे नये सैशन पर प्रिंसीपल से एक न्‍यूज स्‍टोरी पर बात करनी थी। संयोग से वह स्‍टाफ-रूम के बाहर ही मिल गई। आठ साल के अन्‍तराल के बावजूद उसमें बहुत मामूली-से बदलाव दीख्‍ रहे थे। हल्‍की पीली कॉटन साड़ी के गैट-अप में वह बाकायदा कॉलेज-प्रवक्‍ता लग रही थी। उसकी वही चिर-परिचित मुस्‍कान और भीतर का युवापन अब भी बरकरार था। स्‍टाफ-रूम इक्‍का-दुक्‍का लोग आ जा रहे थे, वहीं बैठकर हमने कुछ देर बात की और कुछ जरूरी जानकारियां लेकर मैं वापस लौट आया।
    
मनस्‍वी बेशक उसी शहर में आ गई थी, लेकिन हमारी मुलाकातें बहुत सीमित रह गई थीं। एक तो उसकी अपनी व्‍यस्‍तता, फिर शुरू के दिनों में अपनी बड़ी बहन के घर में मिलने की सुविधा का अभाव, बस कभी-कभार किसी साहित्यिक कार्यक्रम में मिलना हो जाता या कभी फोन पर बात हो जाती। अच्‍छी बात यही थी कि उसकी बेतकल्‍लुफी और सहज लगाव, जिसे वह सम्‍मान का नाम दिया करती है, पहले जैसा ही बना हुआ था। उस दिन संयोग से एक रेस्‍तरां में थोड़ा एकान्‍त मिल गया, तो मैं बहुत दिनों से अपने मन में घुमड़ते सवालों को उसके सामने रखने से अपने को रोक नहीं पाया। मैंने कॉफी का पहला घूंट लेते हुए पूछ लिया था, हां तो अब बताओ, क्‍या हाल है आपके लिखने-पढ़ने के?
      
लिख-पढ़ रही हूं, तभी तो ल‍ड़कियों को पढ़ा पा रही हूं। उसने सवाल को जानते हुए भी यही उत्‍तर देना मुनासिब समझा और देकर मुस्‍कुरा दी। 
      मैं इस लिखने पढ़ने की बात नहीं कर रहा। तुम्‍हारी अपनी क्रियेटिविटी का क्‍या हुआ? कहीं कुछ देखने में क्‍यों नहीं आ रहा। क्‍या सब लिखकर अपने पास ही रख लेती हो? बस अनुमान से इस सवाल के जरिये उसे उकेरने की कोशिश की थी। 
    अब क्‍या लिखने को रह गया है, आनंद। .....वही घर-गृहस्‍थी और अब तो ये नौकरी भी। 
    घर-गृहस्‍थी और नौकरी से तो इन्‍सान और परिपक्‍व होकर सामने आता है, ये उसकी रचनात्‍मकता में बाधा कब से हो गये?
     पता नहीं, कुछ उत्‍साह नहीं बचा, यह सब करने में। इसी के साथ उसके चेहरे पर हल्‍की-सी उदासी उभर आई थी, जिसे उसने हाथ के छोटे रूमाल से पौंछने की नाकाम-सी कोशिश की थी। खुद पसोपेश में था कि उसकी निजी जिन्‍दगी के बारे में कुछ और पूछना ठीक रहेगा या नहीं। फिर अपने पुराने ताल्‍लुकात का खयाल करते हुए आखिर पूछ ही लिया, अच्‍छा ये बताओ, तुम्‍हें ये नौकरी करने की अचानक क्‍यों सूझी, जबकि पिछले आठ साल से तो अपनी गृहस्‍थी में ही रमी हुई थीं?
    बस यों ही सोच लिया, इतनी पढ़ाई कर रखी थी, नैट भी क्‍लीयर किया हुआ था और बच्‍चे भी बड़े हो गये - बेटी अब सात साल की हो गई और छोटा बेटा चार साल का, अब तो स्‍कूल जाने लगा है, तो सोचा कुछ काम ही कर लूं। बड़ा नपा-तुला-सा उत्‍तर दिया मनस्‍वी ने, जो मुझे कतई अपने सवाल का वास्‍तविक उत्‍तर नहीं लगा।
    दोनों बच्‍चे आपके साथ हैं, या अपने पापा के पास?
    अभी तो उनके पापा और दादी के पास ही छोड़कर आई हूं, बाद में घर वगैरह ठीक करके अपने पास लाने की सोच रही हूं।
    
 लेकिन परेश तो खुद अच्‍छा-खासा कमाते हैं, क्‍या वे सहमत थे आपके इस निर्णय से? इस सीधे सवाल पर वह कुछ क्षण मेरे मुंह की ओर देखती रही। फिर अपनी बात पर हल्‍का-सा बल देते हुए बोली, सवाल अच्‍छी कमाई या सबकी सहमति का नहीं है, आनंद। हर इन्‍सान की जिन्‍दगी में एक समय आता है, जब कुछ निर्णय उसे अपने बूते लेने होते हैं। .....आप इतना तो मुझे जानते हैं कि मैं ज्‍यादा समय ऐसी पराश्रित जिन्‍दगी नहीं जी सकती थी। 
    शायद ठीक कह रही हैं आप। मुझे मनस्‍वी की बात में उसकी पारिवारिक जिन्‍दगी की एक कड़वी सच्‍चाई उजागर होती दीख रही थी, लेकिन उसे उस वक्‍त और उकेरना मुनासिब नहीं लगा। मैंने बात बदलते हुए फिर कहा, लेकिन लेखन में तो तुम्‍हारा अपना मन रमता था, मनस्‍वी! तुम्‍हारे पास इतनी अच्‍छी इमेजिनेशन है, इतना अच्‍छा एक्‍स्‍प्रैशन रहा है तुम्‍हारा। पहले कहानी संग्रह को कितना पसंद किया गया था लोगों ने। फिर उसके प्रति यह उदासीनता क्‍यों?
     उदासीनता तो नहीं, पर हां, घर में माहौल कुछ ऐसा रहा कि मन नहीं बन पाया कुछ और लिखने का। अब सोचती हूं, कुछ करना चाहिये।
     अपने मन को और मजबूत बनाओ, मनस्‍वी! ....तुम बेहतर कर सकती हो।
     मैं अपनी कुछ ताजा चीजें आपको दिखाऊंगी कभी। कहते हुए वह उठने की तैयारी करने लगी थी। मैं भी अपना बैग समेटकर उठ गया और हम दोनों बाहर आ गये। मेरे पास अपनी बाइक थी, जिस पर मैं उसे छोड़ देता, लेकिन उसने ऑटो-रिक्‍शा से ही जाना पसंद किया। मैंने ऐतराज नहीं किया और उसे खुशी-खुशी विदा कर दिया। 
*
       
      
 अपनी नौकरी के पन्‍द्रहवें साल तक आते-आते मेरा भी ब्‍यूरो-चीफ के रूप में प्रमोशन हो गया था और मैं संयोग से उसी शहर में पहुंच गया, जहां मेरी और मनस्‍वी की पहली मुलाकात संभव हुई थी। उसे भी अपने नये जॉब में यह चौथा साल था और बहुत से जरूरी इंतजाम उसने अपने बूते ठीक कर लिये थे। उसकी जिजीविषा को देखते हुए तो कई बार मैं अपने को काफी पिछड़ा महसूस करता था। उसका लेखन अब अपनी रफ्‍तार पर था। एक-एक कदम साधकर बढ़ती हुई वह एक समर्थ लेखिका के रूप में उभरकर सामने आ रही थी। कभी-कभार अपनी रचना को अंतिम रूप देने से पहले दिखा भी देती थी, जिस पर बात करते हुए हमेशा एक दिली खुशी मिलती। अब दोनों अलग-अलग शहरों में हो गये, तो सारा संवाद फोन या इंटरनेट तक सीमित होकर रह गया। पत्र अब वह कम ही लिखती थी। यों भी इस अदला-बदली में हमारे बीच बहुत कुछ छूटता जा रहा था, बेशक मिलने या बात करने पर उतनी ही ताजगी और अपनापन महसूस होता था, लेकिन निजी जीवन में एक-दूसरे से राय-मशवरे के जो रिश्‍ते बने-बचे रहते हैं, उनकी गुंजाइश अब नहीं रह गई थी।  
      
अपनी इस मित्रता को परिभाषित कर पाना मेरे लिए कभी आसान नहीं रहा। अगर इसी बात पर मुझसे कोई क़ैफियत मांगता है या कोई उज्र उठाता है तो मैं कहां तक इसके म्‍याने देता रहूं और फिर क्‍योंकर? मुझे बरसात में भीगना अच्‍छा लगता है, मोर पंख फैलाकर उमंग में थिरकना सुकून देता है, या अपनी ही चाल में मगन उस वन-पाखी को किसी झील के किनारे अपनी पसंद का आवास बनाना आनंदित करता है तो उसमें बगुले के ऐतराज उठाने के भला क्‍या मानी? कुछ इसी तरह देखा करता हूं मैं अपनी जीवनचर्या को और सवालों को छोड़ देता हूं ऐसे ही निर्बंध, अपने निराकरण खुद खोज लाने की ख्‍वाहिश में।

     
बरसों बाद वही मूरहेन, मेरे उसी आग्रह का मान रखते हुए फिर लौटकर आई थी उसी अभयारण्‍य के खुले आगार में, अपनी पसंदीदा शाम में बेआवाज। न कोई बकाया राग-विराग और न कुछ अतिरिक्‍त पाने की आकांक्षा। बेशक ये जीवन के अजाने उतार-चढ़ाव उसके ही निजी अनुभव-संसार की अपनी पूंजी हैं। जिसने परेश के साथ कभी अच्‍छे और कभी बोझिल पलों में रहना-जीना सीख लिया था, बरसों पहले बिना किसी शिकवे के। वह उसकी अपनी अंतरंग दुनिया है, जिसे कम ही साझा कर पाती है वह किसी के साथ। मुझे भी संकोच ही होता है, उन ब्‍यौरों तक जाने में। उसकी कहानियों में आते फंतासी चरित्रों में कहीं उसके अपने जीवन की एषणाएं और उन्‍हीं को पाने की जद्दोजहद में कहीं उसके अपने जख्‍मों की कराह भी सुनाई दे जाती है।
     
 पिछले कई सालों से मनस्‍वी अपनी नौकरी के कारण कानपुर कम ही जा पाती थी, दस साल तो वह पति से लगभग अलग-सी ही रही। आजकल सुना है, उसके पति वहां का अपना घर-बार समेटकर उसी के पास आ गये हैं। यहां उन्‍होंने अपना नया बंगला बनवा लिया है। स्‍वयं कंपनी ने भी उनकी सेवाओं का मान रखते हुए उन्‍हें यहीं के रीजनल आफिस का मुखिया बनाकर भेज दिया हैं। दोनों के बीच एक संतुलन है, जो पति-पत्‍नी को एक छत के नीचे बांधे हुए है  बड़े होते बेटी-बेटे की अपनी जिम्‍मेदारियां हैं, बेशक वे पढ़ रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी दुनिया है, जिसमें मनस्‍वी बहुत कम दखल देना पसंद करती है। इससे मनस्‍वी के भीतर एक विराग-सा उत्‍पन्‍न हो गया है। भीतर की टूटन और अनमने-पन से निजात अब कम ही मिल पाती है। वह इसकी अभ्‍यस्‍त तो कभी नहीं रही, लेकिन जीना सीख लिया है। अपने लेखन में ही कहीं, वह इस पीड़ा को विरेचित भी कर लेती है और बाहर से पूरी तरह सधी-संभली दीखती है। अपने सहकर्मियों और विद्यार्थियों को तो भनक भी नहीं पड़ने देती। कभी जब बेहद उदास होती है तो फोन करके या मेरे फोन के जवाब में अपना अवसाद बांट लेती है, सो भी बहुत अमूर्त-सा।
     
अपनी पिछली बातचीत में मैंने उसे एक आयोजन में शिरकत के लिये आने का आग्रह किया था, ताकि उसके मन को कुछ सुकून मिल सके। इसी बहाने सोचा था कि उसे उसकी पसंद की उन जगहों पर फिर से घुमा दूं, तो उसका मन बहल जाए शायद। यहां इसी लोकेल में फिर से लौट आना हमेशा उसके लिये एक उमंग का सबब रहा। ये उसी का अच्‍छा मन है कि मेरे आग्रह का उसने मान रखा।
     
स्‍मृतियों की उसी आत्‍मछलना को अनदेखा कर वही आजाद पंछी अपनी उसी पसंदीदा झील के तट पर सुकून के पल जीने फिर से लौट आया है। बरसों बाद पहाड़ियों के बीच फलक तक फैली इस समंदर-सी बेकल झील के किनारे ठंडी हवा के झोंकों के बीच इस खुशनुमा रेस्‍तरां के खुले लॉन में ठंडी कॉफी के हल्‍के घूंट भरते, अपने इस अंतरंग साथी को फिर से करीब बैठकर देखना-सुनना किसी अलौकिक अनुभव से कम तो नहीं। मुझे याद आ रही हैं, उसकी वे ताजा-तरीन उड़ानें, जो रचनाशीलता का नया आकाश रचती हैं,  उसी रचनालोक की अनूठी कलमकार अपने कल्‍पनालोक की बेसब्र उड़ानों, भाषा की बेजोड़ भंगिमाओं और अपने समूचे रचनालोक में तैरते चमकते बिम्‍बों और छवियों का अकूत खजाना लिये आज खुद एक किंवदंती-सी बनी बैठी है  उसी आजाद पंछी की तरह अपने वजूद से इतनी बेपरवाह कि कोई क्‍या घटा-जोड़ देगा उसकी शान में? कितनी विलक्षण हैं उन पौराणिक कथानकों की वे रूमानी परिकल्‍पनाएं, जो रिश्‍तों को नया अर्थ देती हैं। समंदर की तूफानी लहरों पर गहराई में उतरकर उछाल लेते नये समीकरण, अभयारण्‍यों में किलोल करते वे प्रवासी परिन्‍दे, नींद की कोटर में घुसकर फड़फड़ाती वे फुसफुसाहटें, अंधेरों के वे उनींदे कसाव, खिड़की के पल्‍लों, छज्‍जों और दालानों पर थिरकती बारिश की बूंदों का नर्तन! यह देखकर अपने चित्‍त में कहीं गहरा परितोष पाता हूं कि इस अनूठे रचनालोक की यह खोजी रचनाकार अपनी जीवन-यात्रा के उत्‍तर-पड़ाव पर आज इन्‍सानियत के नित नये किरदार रचती है और उस अनंत आकाश में कामनाओं की अरूप उड़ान भरता उसका मन जाने क्‍यों किसी पड़ाव पर चैन नहीं पाता।



डॉ. नन्द भारद्वाज
कवि और राजस्थानी साहित्यकार के रूप में ख्यात है। पिछले चार दशक से मैं हिन्दी और राजस्थानी में अपने लेखन-कार्य से जुडाव है।हमेशा से श्रेष्ठ लेखन के कलमकार जो हाल ही में अपने नए कविता संग्रह 'आदिम बस्तियों के बीच' से खासी चर्चा में है.अपनी माटी वेबपत्रिका के सलाहकार भी हैं .साहित्य के हल्के में बड़ा नाम है।आकाशवाणी और दूरदर्शन में पूरी उम्र निकली है।सेवानिवृत वरिष्ठ निदेशक,दिल्ली दूरदर्शन केंद्र,जयपुर . ब्लॉग है .हथाई,  उनका पूरा परिचय
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