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''भक्ति मनुष्य जीवन का परम पुरुषार्थ है।''-डॉ.सत्यनारायण व्यास

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, जुलाई 07, 2012 | शनिवार, जुलाई 07, 2012


(चित्तौड़ से ही प्रकाशित त्रैमासिक शोध पत्रिका ''मीरायन'' के जून-अगस्त,2012 अंक में पृष्ठ संख्या 34 पर ये आलेख मूल रूप में छपा है।यहाँ डॉ.व्यास की अनुमति और पाठक हित में साभार छाप रहे हैं।-सम्पादक )

मेवाड़ की एक और मीरा: महात्मा भूरी बाई ‘अलख’
डॉ.सत्यनारायण व्यास का आलेख 


डा. सत्यनारायण व्यास,जिनकी पहचान ख़ास तौर पर आलोचक और कवि के रूप में रही है.मूल रूप से राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में हमीरगढ़ के वासी पिछले कई सालों से चित्तौड़गढ़ में रहते हैं.जीवनभर में तेरह नौकरिया की.घुमक्कड़ी का पूरा आनंद.कोलेज शिक्षा से हिंदी प्राध्यापक पद से सेवानिवृत.आचार्य हजारी प्रसाद द्विबेदी पर पीएच.डी.,दो कविता संग्रह,एक प्रबंध काव्य,पीएच.दी. शोध पुस्तक रूप में प्रकाशित है.इसके अलावा कई पांडुलिपियाँ छपने की प्रतीक्षा में.कई विद्यार्थियों के शोध प्रशिक्षक रहे.


अपनी बेबाक टिप्पणियों और सदैव व्यवस्था विरोध के लिए जाने जाते हैं.कई सेमिनारों में पढ़े/सुने गए हैं.आकाशवाणी से लगातार प्रसारित हुए हैं.उनकी मुख्य कविताओं में शंकराचार्य का माँ से संवाद, कथा हमारे उस घर की सीता की अग्नि परीक्षा हैं.उनका संपर्क पता 29,नीलकंठ कालोनी, मोबाइल- 09461392200 चित्तौड़गढ़, राजस्थान उनका ब्लॉग लिंक है


भक्ति मनुष्य जीवन का परम पुरुषार्थ है। भक्ति हमें नश्वर से अनश्वर की ओर ले जाती है, अवास्तव से वास्तव तत्त्वज्ञान का साक्षात् कराती है। भक्त अपने में डूब कर जिस भगवान के दर्शन करता है, तो वह पाता है कि वह खुद ही तो परब्रह्म है - सर्वथा एक, अद्वितीय और अभिन्न ! जिसे वह खोज रहा था। तो उसने इस खोज में स्वयं के आत्मस्वरूप की ही तो उपलब्धि की है। नया कहीं से कुछ आया नहीं, पाया नहीं। अपने में, अपने से, अपने को ही पाया। शेष, भिन्न और दूसरा कहीं कुछ है ही नहीं। यही बात श्रीमद्भगवद्गीता में पहले से कही गई है -

उद्धेरदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।। (अध्याय 6 श्लोक 5)

आप ही अपना उद्धार कर सकते हो, अपने को घोर कष्ट नहीं देना। आप ही अपने मित्र हो और आप ही अपने शत्रु। अर्थात् स्वयं को सुधारना और बिगाड़ना स्वयं के हाथ में है।
इस कोटि का तत्त्वज्ञान, बिना शास्त्र पढ़े ही, मेवाड़ की एक अनन्य विभूति महात्मा श्री भूरी बाई ‘अलख’ को सहज ही, गृहस्थ जीवन में रहते हुए प्राप्त हो गया था - यह सुखद आश्चर्य की अद्भुत सत्यकथा है। श्री भूरी बाई का जन्म जिला राजसमन्द के गांव सरदारगढ़ में संवत् 1949 में आषाढ़ शुक्ला 14 को एक सुथार परिवार में हुआ। माता का नाम केसर बाई और पिता का नाम था रूपा जी सुथार। माता-पिता दोनों बहुत धर्मप्राण और नीति-धर्म पर चलने वाले दंपति थे। तेरह वर्ष की अल्पायु में तब के रीति-रिवाज के अनुसार भूरी बाई का विवाह नाथद्वारा के एक अधेड़ आयु के धनी चित्रकार फतहलाल जी सुथार के साथ कर दिया गया। इस बेमेल विवाह के नतीजे अच्छे नहीं हुए। कालान्तर में पति का बीमारी से देहान्त हो गया, भूरी बाई का गार्हस्थ्य जीवन खंडित हो गया और उनका मन धीरे- धीरे भक्ति की ओर झुकने लगा।
साधना और भक्ति के क्षेत्र में आगे बढ़ने की पहली शर्त है - स्व-प्रयत्न। इसके बिना कुछ नहीं हो सकता। मां के पेट से जन्म लेते ही, बच्चे को अपनी उदर-पूर्ति के लिए दूध पीने की स्वयं कोशिश करनी पड़ती है। प्रयत्न का कोई विकल्प नहीं। इस प्रयत्न के पीछे का मूल आधार है लगन। लगन के बिना प्रयत्न नहीं होगा। ऐसी तीव्र लगन हरेक को नहीं हो सकती, जो भक्तिमती मीरा या महात्मा भूरी बाई में थी। यही लगन लक्ष्य तक पहुंचाती है।
महात्मा श्री भूरी बाई अद्वैत वेदान्त की उच्च भूमिका पर पहुंच चुकी थीं। यह भूमिका सगुण-निर्गुण, शास्त्र-विवाद, जीव-ब्रह्म के द्वैत का अतिक्रमण करने वाली मधुमती आनन्दमयी तल्लीनता है, जो करोड़ों में किसी एक को प्राप्त हो पाती है। परमहंस की महानुभूति में रमी हुई श्री भूरी बाई दार्शनिक चर्चा में ज्यादा विश्वास नहीं करती थीं। उनका अपनी भक्त-मंडली में एक ही निर्देश था - ‘‘चुप’’। बस चुप रहो और मन ही मन उसे भजो, उसमें रमो। बोलो मत। ‘चुप’ शब्द समस्त विधियों का निषेध है। बोलने-कहने से विभ्रम पैदा होता है, बात उलझती है और अधूरी रह जाती है। इसीलिए ब्रह्मानन्द को अनिर्वचनीय माना गया है। उसे अनुभव तो किया जा सकता है, पर कहा नहीं जा सकता। उपनिषद् का वाक्य है कि:
यतो वाचो निवर्तन्ते
अप्राप्य मनसा सह,
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्
न बिभेति कुतश्चन।।

अर्थात्, जहां से वाणी, अपने मन के साथ उसे न पाकर चुपचाप लौट आती है - ऐसे ब्रह्मानन्द का अनुभव करके कोई भी भय शेष नहीं रहता। इसी तरह, कबीर  भी उस परम आनंमयी ब्राह्मी स्थिति को जहां ‘‘गूंगे का गुड़ खाना’’ कहते हैं, तो दूसरी ओर इसे अकथनीय और अनिर्वचनीय बताते हैं। उन्हीं के शब्दों में -

बोलना का कहिए रे भाई
बोलत बोलत तत्त नसाई।
बोलत बोलत बढै विकारा
बिन बोले का करइ बिचारा।।

यही कारण था कि ‘बाई’ सबको कहती ‘‘चुप’’! बोलो मत, उसे ध्याओ, उसमें रमो, उसको भजो! बाकी सब बेकार।मीरा ने तो परिस्थितिवश अपना घर-बार, राजमहल - सब छोड़ दिया था। उनके भी पति भोजराज का निधन हो चुका था और भूरी बाई के पति फतहलाल भी दिवंगत हो चुके थे। फिर भी बाई ने अपनी गृहस्थी का मोर्चा नहीं छोड़ा और अंतिम समय तक प्राण रहते घर-गृहस्थी के सारे काम और अतिथि-सत्कार अनवरत करती रहीं। स्त्री-शरीर में होने से बाई ने किसी महात्मा के प्रेरित करने पर भी संन्यास लेना उचित नहीं समझा। वे महाराज जनक की तरह अपने घर में ही देह पाकर भी ‘विदेह’ बनीं रहीं और इस बात को झुठला दिया कि भगवद्प्राप्ति के लिए गृहत्याग और संन्यास आवश्यक है।
दरअसल, भक्ति किसी की बपौती नहीं है। भक्ति में लिंग-भेद, वंश, जाति, धन-यौवन आदि की कोई बाध्यता नहीं है। राजस्थानी में इस आशय का एक सुन्दर दोहा है, जो बाई के संबंध में उपयुक्त है -
जो करसी उणरी हुसी
आसी बिण नूंतीह।
ये नंह किण रा बाप री
भगती रजपूतीह।।
जरा सोचिए, जिनकी भक्ति और ज्ञान की सुरभि से खिंचकर ओशो रजनीश जैसे चिंतक व दार्शनिक मिलने चले आये हों और बाई की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हों; विख्यात सन्त सनातन देव जी और अनेक दार्शनिक, ज्ञानी, भक्त, महात्मा, कई रियासतों के ठाकुर लोग, सद्गृहस्थ बिना बुलाए - सुथार-परिवार की एक मामूली विधवा गृहस्थिन, जो बहुत अल्पशिक्षित थीं - से बार-बार सान्निध्य पाने को, मार्गदर्शन हेतु आते रहे हों - क्या वह कोई मामूली हस्ती थी ?
मेवाड़ के महान् तत्त्वज्ञानी सन्त बावजी चतुरसिंह जी ने बाई में उस परा प्रज्ञा के दर्शन किए थे और आश्वस्त किया था कि उन्हें परमपद की अनुभूति होगी और ऐसा ही हुआ भी।बाई भजन पर जोर देतीं। भजन उस परम तत्त्व से संबंध बनाए रखता है। वे सांसारिक बातों से बचने की सलाह देतीं, लेकिन संसार के सभी कर्तव्यों को पूरा करने का भी आग्रह करतीं।
उनकी चर्चा का माध्यम प्रायः मेवाड़ी बोली ही रहती थी। सहज बातचीत में ही वे ऊंची से ऊंची तत्त्वज्ञान की बात कह देती थीं, जैसे रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे। उनका दृढ़ मत था कि एक परमात्मा के सिवाय कुछ है ही नहीं। इसी संदर्भ में उनके द्वारा बनाई गई ‘काली पोथी’ की घटना उल्लेखनीय है। सत्संग में आने वाले भक्त रोज़ आग्रह करते थे कि ‘‘बाई! आप भी अपने आध्यात्मिक अनुभवों का कोई ग्रंथ लिखिए न! हम सब पर और दुनिया पर यह आपका उपकार होगा।’’ तो उसी वक्त बाई ने कुछ कागज़ और स्याही मंगाई। कागज़ से कॉपी बनाई, और थाली में स्याही घोल कर कॉपी के सभी कागज़, ऊपर के मुखपृष्ठ को छोड़कर स्याही से काले रंग डाले। फिर ऊपर के खाली पृष्ठ पर सिर्फ ‘‘राम’’ लिख दिया और उसका मर्म समझाया कि इस संसार में सबकुछ अंधकारमय है, केवल ‘राम’ ही एक प्रकाशपुंज हैं। शास्त्र-पोथियां सब बेकार हैं, राम ही सत्य और नित्य हैं। इसलिए ‘‘चुप’’।
बाई चर्चा में, मेवाड़ी के दो-तीन शब्द बहुत अर्थ-गूढ़ भाव से प्रयोग में लेती थीं - एक तो ‘‘जांण’’, दूसरा ‘‘कळकळाहट’’, तीसरा ‘‘भाण’’। यानी अनुभूति, सांसारिक व्याकुलता और उपलब्धिमूलक भावबोध - ये क्रमशः उनके तीनों बहुव्यवहृत शब्दों के अर्थ हैं।
यह विडंबना ही है कि मेवाड़ अंचल की ऐसी महान् तपस्विनी, योगिनी, अद्वैत भावमयी परमहंस तत्त्वज्ञा महात्मा श्री भूरी बाई को बहुत कम लोग जानते हैं। हिन्दुस्तान को छोड़िए, राजस्थान और मेवाड़ में ही कम लोगों को ऐसी महान् विभूति की जानकारी है। यह हमारा दुर्भाग्य और प्रमाद है कि हम अपने ही अंचल के ऐसे परमहंस व्यक्तित्व से अनभिज्ञप्राय हैं। महान् दार्शनिक ओशो रजनीश ने जिन्हें राबिया, मीरां, सहजो बाई आदि की श्रेणी की सन्त और भक्त घोषित किया हो, उन बाई के प्रति हमारी उदासीनता व उपेक्षा चिन्ता का विषय है।
महात्मा श्री भूरी बाई को ‘अलख’ नाम किसी अन्य सन्त महात्मा ने अभिभूत होकर दिया था। यह इतिवृत्त तो एक झलक मात्र है। मेवाड़ की इस महान् किंतु अल्पज्ञात विभूति का देहावसान 3 मई 1979 ई0, वैशाख शुक्ला 7 संवत् 2036 को हुआ। उनके बारे में विस्तृत विवरण, कुछ जागरूक और समझदार लोगों ने लिखकर रख लिया था, जो पुस्तकाकार रूप में स्व. श्री लक्ष्मीलाल जोशी के संपादकत्व में प्रकाशित हो चुका है और उसके भी एकाधिक संस्करण छप चुके हैं। यही नहीं, उदयपुर निवासी डॉ. लक्ष्मी झाला ने महात्मा भूरी बाई के जीवन-दर्शन पर - ‘‘सहज साधना सन्त परंपरा के परिप्रेक्ष्य में मेवाड़ की महात्मा भूरी बाई का दार्शनिक विवेचन’’ शीर्षक से शोधप्रबंध लिखकर पीएच.डी. की उपाधि भी प्राप्त की है।

महात्मा श्री भूरी बाई के परोपकारी कर्म योगी जीवन से प्रेरणा लेकर कई समाज-सेवा के प्रकल्प भी चल रहे हैं, जिनमें से उदयपुर स्थित ‘‘अलख नयन मंदिर नेत्र संस्थान’’ सर्वाधिक उल्लेखनीय है, जो सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में नेत्र-चिकित्सा हेतु ‘‘चल नेत्र इकाइयों’’ के माध्यम से चिकित्सा शिविर आयोजित कर अभावग्रस्त ग्रामीण जनता की सेवा कर रहा है। सभी सन्त महात्माओं के जीवन-दर्शन का सार-सूत्र भी यही है कि दीन-दुखी की सेवा, ईश्वर की सेवा का ही सच्चा रूप है।

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1 टिप्पणी:

  1. आपने जो लेख भक्ति पर लिखा और अपनी माटी में प्रकाशित किया है उसे पढ़ कर बहुत बधाई उसके लिए आप बधाई के पात्र है. भगवान् श्री राम ने अपनी नौ भक्ति में पहली भक्ति संतो क़ि सेवा दूसरी में कथा का सुनना और उस पर चिंतन करना बताया . आप बहुत योग्य साहित्यकार लेखक है. आपके ऊपर इश्वर क़ि छाया है. वह बाणी रहे. संतोष गंगेले -जिला उपाध्याक्शय श्रम जीवी पत्रकार संघ छतरपुर मध्य प्रदेश

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