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कहानी की नयी ज़मीन तैयार करती हेमंत शेष की कथाएँ

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जुलाई 16, 2012 | सोमवार, जुलाई 16, 2012






हेमंत शेष
(राजस्थान में प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही साहित्य जगत का एक बड़ा नाम है.लेखक,कवि और कला समीक्षक के नाते एक बड़ी पहचान.इनके कविता संग्रह  'जगह जैसी जगह' को बिहारी सम्मान भी मिल चुका है.अब तक लगभग तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.हाल के दस सालों में सात किताबें संपादित की है.साथ ही 'राजस्थान में आधुनिक कला' नामक एक किताब जल्द आने वाली है.)


ये कथाएँ उनके हाल में वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर से प्रकाशित हेमंत शेष का नया कहानी संग्रह '‘रात का पहाड़’' में समाहित हैं।



एक
गायब-गायिका 


दुलारी बाई? – एबसेंट
मिस गुलाब ? - एबसेंट
जहाँआरा कज्ज़न ? – एबसेंट
मिस शैला. – एबसेंट


तारा. पुष्पा बाई. गुलज़ार. बिब्बो बेगम. मिस बादाम. अनवरी. मिस गुले-गुलज़ार. राजकुमारी. छप्पनछुरी. अमीना बाई. हुस्न बानो. सब के सब- एबसेंट..... अमृतसर दिल्ली जयपुर मेरठ आगरा टोंक लखनऊ हैदराबाद की वे झरोखेदार खिड़कियाँ गईं. चिकें गयीं. छज्जे गए. कटरे गए. दालान और चौक गए. .....और बिना अख़बार की खबर बने हमारे संगीत-प्रेमी दादाजी की जवानी के दिनों से कुछ इस तरह वे ठुमरियां वे दादरे वे कज़रियाँ वे टप्पे सब कोठों से साथ ले कर नि:शब्द गायब हुईं- मिस गुलज़ार शीरीन बानो कमला बाई ज़रीना परीजान हमीदा बेगम हीराबाई मिस-मधुर वगैरह वगैरह वगैरह

दो
मरना 
मैं भारी-भरकम था- ऊपर से आलसी और बदपरहेज़ी भी आला दर्जे का! सुबह कभी उठा बगीचे की हवा खाने गया. जिंदगी भर व्यायाम से दूर रहा. चटपटा खाना पसंद था. डाइबिटीज़ और ब्लड प्रेशर तो था ही-हार्ट की बीमारी भी हो गई और एक दिन मैं मर गया!
सीधे नरक में गया. एन. के. जैन मिल गए.

वह पहले से वहां थे. मुझ से पहले मरे थे-जब कि मेरी तरह ज़र्दा पान खाते थे, सुपारी, दारू से कोसों दूर, चाय-कॉफ़ी कभी चखी नहीं, अनुलोम-विलोम और कपालभाति में ही पूरा जीवन निकला. संतों की इज्ज़त करते- दान दक्षिणा देने में कभी पीछे नहीं रहे. हमेशा सच बोलते और गुरुजनों का आव-आदर करते. अस्पताल जा कर अनजाने बड़े-बूढों की सेवा के बाद जानवरों को रोटी और चींटियों को आटा देना नित्य-नियम था.

-जैन साब! आप और यहाँ? मैंने पूछा.
कहने लगे- मैंने भी यमराज के दरबान से ये ही सवाल पूछा था. उसने बड़ा सिंपल सा उत्तर दिया.
-क्या? मैं उत्सुक था.
-यही कि मृत्युलोक में मरने से किसी चीज़ का कोई रिश्ता नहीं.
तब से मैं इस रहस्यमय वाक्य का मनन करता रहा हूँ, वाक्य तो साधारण है पर अर्थ समझ नहीं रहा- क्या आप बताएँगे?

तीन
सरोकार

कमीज़ मेरी थी- नौकर की नहीं. तो जब धोबी ने जयपुर में इस्तरी के बाद उसके दो बटन तोड़ दिए तो मैं उस पर बहुत आग-बबूला हुआ. नौकर की होती तो शायद विनोद कुमार शुक्ल रायपुर छत्तीसगढ़ में धोबी को खरी-खोटी सुनाते!


चार 
ऊँट

वे सिर्फ ऊँट थे पर हिन्दी से असंतुष्ट.
सब ने मिल कर तय किया कि वे इसे बदलेंगे, बदल डाल कर रहेंगे. गाँव के सारे ऊंट एक मैदान में जमा हुए. एक बूढ़ा ऊंट, जिसकी शक्ल फ्रेंच कट दाढ़ी की वजह से लेनिन जैसी लगती थी, बोला- कामरेडों, भाषा को बदल डालने का मतलब है- उसके अपमानजनक मुहावरों को बदलना. सब ऊंट एक ही आप्त-वाक्य में सारा व्याकरण समझ गए और उसके पीछे हो लिए जो पहाड़ की तरफ जा रहा था.

सब से वयोवृद्ध और बुद्धिमान ऊंट ने बीच चढ़ाई पर ही दम तोड़ दिया, पर बचे खुचे सब गिरते-पड़ते भी पहाड़ की चोटी पर जा पहुंचे. अब वे पहाड़ पर खड़े थे, और पहाड़ उनके नीचे था, तब भी हिन्दी ने मुहावरा बदलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई क्यों कि ऊंटों ने ईमानदारी से बूढ़े ऊंट की समाधि पहाड़ की आधी ऊंचाई पर बनाई - उसकी चोटी पर नहीं.
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5 टिप्‍पणियां:

  1. JAADUGAR KAHANEE KA ASALII SHEERSHAK hai- MARNA!, Please Amend!

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  2. मानिक जी! क्या आप के पाठक इन कहानियों से इत्ते अभिभूत हैं कि कोई टिप्पणी ही नहीं दे रहे?

    उत्तर देंहटाएं
  3. वे कलानायक जिनकी उपस्थिति हमें अपनी साँस्कृतिक विरासत से, मनुष्यता के सृजनकर्म से जो़ड़े रखती थी, हमारी ही नासमझियों के चलते अब वे एक गहरी अनुपस्थिति छोड़ गए है। ऐसी अनुस्थिति जिसमें मशीनी अनुवाद, कलात्मक सृजन के रूप में अन्धाधुन्ध परोसा जा रहा है। इस अंधेरे मोड़ पर कोई नहीं जो हमें इन दोनों के बीच अन्तर करने की तमीज सीखा सके। 'गायब गायिका' में मौजूद कलाविदुषियों के अलावा कुछ समय पहले हमसे विदा हुई माण्ड गायिका रूखमों बाई भी एक ऐसा ही खालीपन छोड़ गयी थी... 'गायब गायिका' इस खालीपन को जिस व्यंग्यात्मक लहजे में हमारे समक्ष रखती है, उससे बच पाना असम्भव है...

    उत्तर देंहटाएं
  4. हेमंत शेष की लघुकथाएं निसंदेह रचना शैली में एक नया आयाम जोड़ती लगती हैं. कम से कम शब्दों में उनकी ये कहानियां भारी दार्शनिक बातें, विडंबनाओं के फैलते परिवेश का आकलन, या गहरी निराशा की अभिव्यक्ति करती हैं.
    आजकल की सस्ती लोकप्रियता को गायनेतर गतिविधियों से हासिल करती तथाकथित गायिकाएं पुराने ज़माने की ठोस और फ़न में माहिर उन गायिकाओं और कोठेवालियों से कितनी अलग हैं! ‘ऊंटों’ की कशमकश, करने का उत्साह, न कर पाने की विवशता, न करने की अकर्मण्यता आलस्य और उदासीनता बहुत कुछ बयान करती है.
    इन छोटी कहानियों को प्रकाशित करने के लिए बधाई और धन्यवाद.
    आदित्य बहुगुणा

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