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डॉ.सदाशिव श्रीत्रिय की नज़र में 'नाथद्वारा'

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जुलाई 05, 2012 | गुरुवार, जुलाई 05, 2012


निबंध: पावन नगरी - अपावन गलियाँ 



डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो.08290479063,ई-मेल

(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से     रचनाकाल: अप्रैल, 1999  प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )



नाथद्वारा श्रीनाथजी की पावन नगरी है और वैष्णव भक्तों द्वारा श्रीनाथ मंदिर में अब भी उच्चस्तरीय शुचिता व स्वच्छता बरती जाती है। पर यह किंचित विडंबनापूर्ण है कि इस पावन नगरी की उन अनेक गलियों में, जिनमें यहां के कई प्रबुद्ध, समृद्ध व प्रभावशाली व्यक्ति भी निवास करते हैं, स्वच्छता का स्तर, उनमें व्याप्त गंदगी और प्रदूषण के कारण इतना नीचा है कि उन्हें कोई भी आसानी से नाथद्वारा के स्लम क्षेत्रों की संज्ञा दे सकता है। इन गलियों में जहां-तहां कूड़ा बिखरा रहता है, इनके दोनों और खुली नालियों के किनारे बैठकर बच्चे शौच करते रहते हैं और इन नालियों में मल बहता रहता है।


इन गलियों में गाएं, सूअर और कुत्ते स्वतंत्र घूमते रहते हैं, और उनके द्वारा की गई गंदगी इस कदर चारेां ओर बिछी रहती है कि इनमें पैदल चलने वालों को बड़ी सावधानी से अपने वस्त्र व जूते बचाते हुए गुज़रना होता है। किसी मकान की ऊपरी मंज़िल से कूड़ा-करकट, मूत्र या गंदा पानी सर पर गिरा दिए जाने का खतरा भी इन गलियों से गुज़रने वाले के लिए, हर समय बना रहता है। बग़ैर नाक पर रूमाल रखे आप इन गलियों में थोड़ी देर खड़े तक नहीं रह सकते। 


इस नगर के पुराने निवासी इस बात को जानते हैं कि स्वच्छता और व्यवस्था के मामले में इन गलियों के हालात आज पहले से बदतर ही हुए हैं। पहले जब इन गलियों के मार्ग पक्के नहीं थे और इनमें बिजली-पानी आज की तरह उपलब्ध नहीं थे तब ये गलियां शायद आज की तुलना में अधिक साफ-सुथरी और दुर्गंध-मुक्त थीं। उस समय इनमें इतने सूअर जहां-तहां विचरण नहीं करते थे और गाएं भी इनमें किसी चरवाहे के साथ सुबह-शाम ही आती-जाती दिखाई देती थीं। इन गलियों के जिन कुछ घरों में पुराने ढंग के शौचालय थे, उनकी सफाई भी आज की तुलना में तब कहीं अधिक सावधानी से की जाती थी। 


जब से इन गलियों के मार्ग पक्के हुए हैं, जब से इन मार्गों के दोनों ओर जल प्रवाह के लिए खुली नालियों का निर्माण हुआ है, और जब से इन गलियों के मकानों को नलों से पानी उपलब्ध होने लगा है इनके निवासियों ने मल निस्तारण का अपना एक मौलिक तरीका स्वतः विकसित कर लिया है जिसके द्वारा वे अपने फ्लश प्रणाली के शौचालय से घरों के मल को पानी के साथ सीधे ही इन खुली नालियों में बहा देते हैं। मल निस्तारण के इस घोर अवैज्ञानिक, अस्वास्थ्यकर और किसी भी सभ्य देश के कानून के मुताबिक अत्यंत आपराधिक तरीके को नगर पालिका व उसके सफ़ाई कर्मचारियों ने जैसे जान बूझकर अनदेखा कर दिया है।  कमजोर तबके के कुछ लोग इन नालियों के ठीक ऊपर स्थित घरों में ही रात-दिन निवास करते हैं और इन नालियों के आसपास गंदगी व अपवित्रता के अत्यंत जुगुप्सा जनक दृश्य आए दिन देखे जा सकते हैं। चूहे-बिल्ली व अन्य जंतु इन गंदी नालियों में होते हुए इन मकानों के रसोईघरों तक पहुंच जाते हैं और जलदाय विभाग द्वारा सप्लाई होने वाले पानी का दबाव जब कम हो जाता है, तब कुछ लोगों को इन मलयुक्त खुली नालियों के बिल्कुल निकट ही किसी पाइप लाइन को बीच में से खोल कर पानी भरते देखा जा सकता है। कई बार इन गलियों में पशु-मल इस तरह बिछा रहता है कि जूतों या वाहन के पहियों को उसमें सनने से बचाया ही नहीं जा सकता। लगता है कि अस्वच्छ और दुर्गंधमय परिवेश को ही इन गलियों के अधिकांश निवासियों ने अब अपनी नियति मान लिया है। इस अस्वास्थ्यकर परिवेश के मौन स्वीकार के कारण ही शायद उन्हें अब इसकी अस्वच्छता में स्वयं वृद्धि करते हुए कोई अपराधबोध नहीं होता। 


इन गलियों में व्याप्त अस्वच्छता व दुर्गंध का कारण यदि आप इनके निवासियों से पूछें, तो उनमें से अधिकांश लोग इसका दोष सीधे-सीधे नगरपालिका के सफ़ाई कर्मचारियों के या सरकार के मत्थे मढ़ देंगे। पर इस संबंध में इससे बढ़कर असत्य कथन कोई नहीं हो सकता। यह सच है कि इन गलियों में जलदाय विभाग के कर्मचारी कई बार गड्ढ़े करके यूं ही छोड़ जाते हैं और नगरपालिका के सफाई कर्मचारी भी कई बार गंदगी और कूड़े के ढेरों को लम्बे समय तक इन गलियों में ही पड़े रहने देते हैं, जिसके कारण गाएं, सूअर और कुत्ते इनकी गंदगी को फिर से इधर-उधर फैला देते हैं किन्तु यह किसी के द्वारा कभी भी देखा जा सकता है कि प्रतिदिन सफ़ाई कर्मचारियों के इन गलियों को बुहार कर पूरी तरह साफ़ कर चुकने के मुश्किल से दस प्रन्द्रह मिनट बाद ही इन पर आसपास के कई घरों से गंदगी और कूडा-करकट डाला जाने लगता है। परिणामतः पूरे दिन में केवल यह दस-पन्द्रह मिनट का अंतराल ही शायद वह समय होता है, जिसके दौरान इन गलियों को थोड़ी साफ़-सुथरी देखा जा सकता है।  


    सार्वजनिक स्थानों की सफ़ाई के संबंध में लोगों का यह व्यवहार शायद उस अधिक बड़ी और देशव्यापी समस्या का एक अंग है, जिसके कारण हमारे यहां की अधिकांश सड़कें, उद्यान, सिनेमागृह, सार्वजनिक शौचालय या बसों व टेªन के डिब्बों के फ़र्श कभी साफ़ सुथरे नहीं रह पाते। इस समस्या का समाधान तभी संभव है जबकि सार्वजनिक उपयोग के स्थानों के प्रति भी हमारे यहां लोग वही भाव विकसित करें,  जो वे अपने निजी भवनों के भीतरी भागों के प्रति रखते हैं। सार्वजनिक सहयोग के अभाव में, अथवा अपने घर का कूड़ा किसी दूसरे के घर के आगे डाल आने की प्रवृत्ति के चलते कोई भी व्यक्ति या कोई भी संस्था इन स्थानों को साफ़ रखने का ज़िम्मा नहीं ले सकती। इन गलियों की इस समस्या का हल इनके निवासियों को सफ़ाई के संबंध में शिक्षित, जागरूक और अधिक ज़िम्मेदार बनाकर ही निकाला जा सकता है। सार्वजनिक उपयोग के स्थानों की सफ़ाई के लिए नागरिक ज़िम्मेदारी संबंधी कानून व नियम भारत के मुकाबले अन्य देशों में अत्यधिक कठोर हैं, और यदि हम भी सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता को महत्त्व देना चाहते हैं, तो इसके लिए हमारे सफ़ाई संबंधी नियम कानूनों में आवश्यक सुधार करके उन पर सख़्ती से अमल करने और करवाने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है।


नाथद्वारा की इन गलियों के वर्तमान हालात में सुधार के लिए सर्वप्रथम इनकी खुली नालियों में मल बहाए जाने का कोई विकल्प ढूंढ़ना ज़रूरी है। इन गलियों के पुराने शौचालयों को अब लोगों ने स्वतः जिस तरह के फ़्लश शौचालयों में तब्दील कर लिया है, उनके निर्माण की नियमानुसार अनुमति नगरपालिका द्वारा उनमें से प्रत्येक के मल निस्तारण के लिए एक सेप्टिक टैंक व एक सोकपिट की व्यवस्था किए जाने तक नहीं दी जा सकती। किन्तु वस्तुतः ये गलियां इतनी संकड़ी हैं कि उनमें इतनी बड़ी संख्या में सेप्टिक टैंक आदि के लिए खड्डे खोद पाना सर्वथा असंभव है। इन गलियों में स्थित मकानों के भीतरी चौक-आंगन अत्यधिक छोटे होने और उनके तल की भूमि कई जगह चट्टानी होने के कारण इन सोकपिट आदि का उनके भीतरी भागों में निर्माण भी असंभव है। आज की बदली हुई भौतिक व सामाजिक परिस्थितियों में इन घरों की पुरानी मल संग्रहण व निस्तारण पद्धति को भी फिर से लागू कर पाना संभव नहीं है। इसलिए वर्तमान स्थिति में इन गलियों में मल निस्तारण का अब एकमात्र उपयुक्त विकल्प इन गलियों में बिछाई गई कोई भूमिगत सीवरेज लाइन ही हो सकती है, जिससे प्रत्येक घर के ये फ्लश प्रणाली वाले तमाम शौचालय जोड़ दिए जाएं। यह तथ्य थोड़ा आश्चर्यजनक लग सकता है कि वस्तुतः इस प्रकार की भूमिगत सीवरेज प्रणाली के विकास के लिए न केवल इन तरह की अधिकांश गलियों में बहुत समय पहले पाइप लाइनें बिछाई जा चुकी हैं, बल्कि इस लेखक की जानकारी के अनुसार जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग को इसके लिए 1996 में तीन करोड़ 80 लाख रुपया स्वीकृत भी किया जा चुका है। इस नगर के किसी क्षेत्र विशेष से इस सीवरेज लाइन को निकालने की अनुमति न मिल पाने के मामूली व्यवधान के कारण यह योजना बीच में ही इस तरह छोड़ दी गई है, जैसे अब इसकी कोई ज़रूरत ही नहीं रह गई हो। नाथद्वारा के हज़ारों नगरवासियों को राहत और कल्याण के लिए तथा इसके वातावरण को अधिक स्वच्छ, प्रदूषण मुक्त और स्वास्थ्यकर बनाने के लिए इस योजना का शीघ्रातिशीघ्र पूरा किया जाना निहायत ज़रूरी है। 


किन्तु यह बात भलीभांति समझ ली जानी चाहिए कि मात्र किसी भूमिगत सीवरेज प्रणाली का निर्माण इन गलियों की स्वच्छता की गारंटी नहीं दे सकता। सार्वजनिक उपयोग के स्थानों की सफ़ाई के संबंध में जब तक आम लोगों की आदतों में सुधार न हो तब तक इस दिशा में किए गए कोई भी प्रयास केवल पानी पर लकीर साबित होंगे। जब तक नाथद्वारा निवासी उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए सकोरों, पत्तल-दोने  और पोलीथिन की थैलियों को लापरवाही से कहीं भी फेंकते रहेंगे, जब तक वे पान-गुटखा खाकर उसकी पीक कहीं भी थूकते रहेंगे, जब तक वे अपने बच्चों को शौच के लिए खुली नालियों के किनारे बिठाते रहेंगे, और जब तक वे घर के कूडे़-करकट और गंदे पानी को किसी भी समय निःसंकोच इन गलियों में कहीं भी फैलाते रहेंगे तब तक इस बात की उम्मीद करना व्यर्थ है कि ये गलियां किसी अन्य सुधार के बावजूद साफ सुथरी रह सकेंगी। लोगों द्वारा फैलाई जाने वाली झूठन, गंदगी और कूड़े के कारण गाएं, सूअर और कुत्ते बराबर इनमें घूमते रहेंगे और उनके गोबर व मल से इनकी हालत और ख़राब करते रहेंगे। 


इन गलियों को साफ़-सुथरा रखने के लिए इसीलिए आज सबसे बड़ी आवश्यकता इनके सभी निवासियों को शिक्षित करके इनकी स्वच्छता के संबंध में उनके ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार में बदलाव लाने की है। उन्हें किसी तरह यह समझाना ज़रूरी है कि वे अपनी गलियों को अपने घर का एक भाग समझ कर और उसके प्रति अपनत्व का भाव विकसित करके ही साफ़-सुथरा रख सकते हैं। उन्हें उस सामान्य पराजयवादी सोच सेे बाहर लाने की भी ज़रूरत है जिसके कारण वे सोचते हैं कि ये गलियां उनके कुछ भी कर लेने के बावजूद गंदी रहेंगी। नाथद्वारा की इन गलियों में आज अवश्य कुछ पढ़े-लिखे नवयुवक व नवयुवतियां मिल जाएंगे। इन गलियों के निवासियों में यह आत्मविश्वास जागृत करना कि उनके ज़रा से सहयोग, प्रयत्न और अनुशासित आचरण द्वारा इन गलियों को अस्वच्छता व दुर्गंध से सदा के लिए मुक्त किया जा सकता है, इन पढ़े लिखे नवयुवाओं का नैतिक कर्त्तव्य है। ये युवा लोग हर गली-मोहल्ले में संगठित होकर सामूहिक प्रयत्न द्वारा निश्चय ही जन-जन में इस प्रकार की सामान्य चेतना जागृत कर सकते हैं। स्कूल-कॉलेजों की स्काउटिंग, एन.सी.सी. और राष्ट्रीय सेवा योजना आदि गतिविधियों के माध्यम से भी जन चेतना का यह काम किया जा सकता है। राष्ट्रीय सेवा योजना के एक दिवसीय वार्षिक शिविर को पूरी पूर्व तैयारी के साथ नाथद्वारा में इस प्रकार के एक सफ़ाई चेतना अभियान पर केन्द्रित किया जा सकता है। अन्य स्वैच्छिक संस्थाएं भी इस अभियान में अपना सहयोग दे सकती हैं। राजसमंद जिले में चल रहे उत्तर-साक्षरता कार्यक्रम को भी नाथद्वारा वासियों के लिए उनके गली मोहल्ले की सफ़ाई संबंधी शिक्षा से जोड़ा जा सकता है। 


यह तथ्य भी किंचित विडंबनापूर्ण है कि श्रीनाथजी की इस पावन नगरी की गलियों को साफ़ सुथरा रखने के लिए किसी गंभीर संघर्ष की शुरुआत यहां के नगरवासियों की ओर से न होकर यहां बाहर से आने वाले वैष्णवों की ओर से हो। ‘श्रीजी सेवा वैष्णव समाज‘ नामक मुंबई की एक स्वैच्छिक संस्था ने मंदिर मार्ग की गंदगी से विक्षुब्ध होकर तथा यहां के नागरिकों व अधिकारियों से बारंबार की गई अपीलों के निष्फल हो जाने पर अंततः इस बारे में किसी सीधी कार्यवाही का संकल्प किया। इस संस्था ने मंदिर के आसपास के कुछ मार्गों की सफाई के लिए यहीं के कुछ सफ़ाई कर्मचारियों को नियुक्त करवाया, जिनके लिए पारिश्रमिक यह संस्था प्रतिमाह मुंबई से भेजती है। यह बात शायद कुछ लोगों को चौंकाने वाली लग सकती है कि इस संस्था के प्रयत्नों से प्रोत्साहित होकर इसके काम को आगे बढ़ाने के बजाए यहां के आम लोगों ने उल्टे इसके काम में बाधाएं ही उत्पन्न कीं। इस संस्था द्वारा मंदिर पर रखवाए कूड़ादानों को लोग निजी उपयोग के लिए उठाकर घर ले गए और बुहारे जाने वाले मार्गों पर उनके द्वारा की जाने वाली गंदगी का फैलाव आज भी पूर्ववत जारी है। 


    श्रीजी सेवा वैष्णव समाज जैसी किसी भी बाहरी संस्था की नाथद्वारा में सफ़ाई संबंधी फ़िक्र केवल मंदिर के आसपास के उन्हीं क्षेत्रों को लेकर हो सकती है जिनका कि उपयोग इस संस्था से जुड़े लोगों को स्वयं करना पड़ता है। नाथद्वारा की भीतरी गलियों व मोहल्लों की सफ़ाई के संबंध में तो किसी भी प्रकार के सुधार की आशा तभी की जा सकती है जबकि इनके निवासी स्वयं इस बारे में जागरूक हों। 


जहां तक इन गलियों में विचरण करने वाले पशुओं का प्रश्न है लगता है, इनकी पीर को समझने वाली नाथद्वारावासियों की वैष्णवता में भी अब कुछ कमी आ गई है। कई बेसहारा गाएं आज इन गलियों की नालियों में मुंह मारती और अखबार या पोलीथिन की थैलियां निगल कर बीमार हो जाने का ख़तरा उठाती घूमती रहती हैं, पर इनके मालिक तब तक इन पर अपना दावा नहीं जताते जब तक वे पुनः प्रसव के उपरान्त दूध देने लायक नहीं हो जातीं। इसी तरह पेचिश और चर्मरोगों से ग्रस्त अनेक सूअर इन गलियों में मल त्याग करते स्वच्छंद घूमते रहते हैं। इनके मालिकों को इनकी याद तभी आती है जब वे या तो इनके बाल उखाड़ना चाहते हैं, इन्हें किन्हीं पोर्क व्यवसाइयों के हाथ बेचना चाहते हैं, या फिर उनके किसी वाहन द्वारा दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर उस वाहन के चालक से हर्ज़ाने के रूप में कुछ न कुछ वसूल कर लेना चाहते हैं।


श्रीनाथजी के प्रति भक्ति रखने वाले किसी भी वैष्णव के लिए नाथद्वारा नगर श्रीनाथ मंदिर का ही विस्तार है और इसीलिए उसकी स्वच्छता के प्रति बरती जाने वाली लापरवाही किसी भी वैष्णव के लिए अधर्म का पर्याय है। इस समूचे नगर को स्वच्छ, सुन्दर और पवित्र बनाए रखना हर वैष्णव का धार्मिक कर्त्तव्य है, चाहे वह नाथद्वारा का निवासी हो अथवा कहीं बाहर का। 


लोक कल्याण की अनेक योजनाओं पर नाथद्वारा में करोड़ों रुपया व्यय किया जा रहा है, किन्तु यहां की गलियों में व्याप्त गंदगी और बदबू के निराकरण की किसी योजना को आज तक कभी गंभीरता से नहीं लिया गया है। इस नगर के निवासियों को, मंदिर मंडल को, यहां कार्यरत संस्थाओं को और राज्य सरकार को श्रीनाथजी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के प्रथम उपाय के रूप में इस नगर को स्वच्छ व सुन्दर बनाने का हर संभव प्रयत्न करना चाहिए। जब तक लोगों में श्रीनाथ मंदिर के विस्तार स्वरूप इस नगर को साफ-सुथरा और पवित्र बनाए रखने की इच्छा जागृत नहीं होती तब तक उन्हें शायद सच्चे अर्थों में वैष्णव नहीं कहा जा सकता।
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