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श्रीरंगम श्रीनिवास राव जैसे कवि हिन्दी के परिदृश्य से गायब ही रहे।

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जुलाई 16, 2012 | सोमवार, जुलाई 16, 2012


  • तेलुगु कवि श्रीश्री का ‘महाप्रस्थान’: 
  • सामाजिक मुक्ति का महाअभियान


पुस्तक समीक्षा  By कौशल किशोर

‘भूत हूँ, यज्ञोपवीत हूँ
विप्लव गीत हूँ मैं -
सुनाऊँ तो पद्य हूँ
चिल्लाऊँ तो वाद्य हूँ
अनल.वेदिका समक्ष
अस्त्र नैवेद्य हूँ मैं।’

कविता में विप्लव गीत की रचना करने वाले ‘श्रीश्री’ के उपनाम से मशहूर तेलुगु के कवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव ;जन्म अप्रैल 1910, मृत्यु 15 जून 1983 हिन्दी के प्रगतिशील कवियों - शमशेर, नागार्जुन व केदार के समकालीन रहे हैं। इनका जन्मशताब्दी वर्ष पिछले साल समाप्त हुआ है। हिन्दी समाज में शमशेर, नागार्जुन, केदार व अज्ञेय को लेकर सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर काफी आयोजन हुए। पत्रिकाओं ने अंक निकाले। इस दौरान फैज व मजाज को याद करने की औपचारिकता भी पूरी की गई।  लेकिन श्रीश्री जैसे कवि हिन्दी के परिदृश्य से गायब ही रहे। 

जबकि सत्तर व अस्सी के दशक में क्रान्तिकारी सांस्कृतिक आंदोलन, जिसका राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य था, को श्रीश्री और तेलुगु के दिगम्बर कवियों ने नई ऊँचाई प्रदान की थी। यह ऐसा आंदोलन था जिसने क्षेत्र व भाषा की सारी दीवारों को ध्वस्त कर दिया था। उस वक्त श्रीश्री श्रीश्री हिन्दी के का्रन्तिकारी सांस्कृतिक आंदोलन जगत में सितारे की तरह चमक रहे थे। पर आज हिन्दी के साहित्य समाज द्वारा वे भुला दिये गये। इसके पीछे मुख्य कारण यही हो सकता है कि  वह प्रगतिशील व जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन आज बिखराव का शिकार है। एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में उसकी धारा काफी कमजोर है। आज का दौर ऐसा ही है। ऐसे दौर में तेलुगु के साहित्य समाज द्वारा श्रीश्री की कविताओं को हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाना निसन्देह महत्वपूर्ण कार्य है। श्रीश्री के जन्मशती वर्ष के मौके पर आंध्र प्रदेश के तरिमेला नागिरेड्डी मेमोरियल ट्रस्ट ने श्रीश्री की मशहूर काव्यकृति ‘महाप्रस्थानम्’ का हिन्दी में प्रकाशन किया है। इस कृति का हिन्दी अनुवाद निर्मलानंद वात्स्यायन ने किया है।  

श्रीश्री ऐसे कवि रहे है जिन्होंने जनमंचीय कवि.कौशल का इस्तेमाल करते हुए लोकप्रिय काव्य.लेखन के द्वारा आंध्र की जनता के बीच पहुँचने और उसे जाग्रत करने का कार्य किया था। 1930 से ही आंध्र की जनता और तेलुगु के जन साहित्य की उन्होंने सेवा की थी, तेलुगु की विभिन्न शैलियों और बोलियों में अपने को अभिव्यक्त किया था तथा इनके माध्यम से अपने विचारों की गर्मी को दूसरों तक पहुँचाने में उन्हें अदभुत सफलता मिली थी। उन्होंने घोषणा की थी ‘1930 के पहले तेलुगु कविता ने मेरा नेतृत्व किया, लेकिन इसके बाद मैंने तेलुगु कविता का नेतृत्व किया है।’ उन्होंने कहा था ‘यह शताब्दी मेरी है।’

लेखन के क्षेत्र में श्रीश्री  का पदार्पण उस वक्त हुआ था, जब मध्ययुगीन हिन्दू रूढ़ियों के विरुद्ध समाज सुधार आंदोलन चल रहा था और इससे एक नया साहित्य और नई शैली पैदा हो रही थी। इस समय तेलुगु कविता, जो छायावाद की सुकुमार बाँहों और रोमांटिक भावुकता में मस्त थी, गहन होती अनुभूतियों की वजह छन्दमुक्त होने के लिए छटपटा रही थी। श्रीश्री ने तेलुगु कविता को छायावाद से मुक्त कर नई जमीन दी तथा रचना विधान, विषय वस्तु, भाषा, छंद आदि में परिवर्तन किया। श्रीश्री पर विश्वनाधा सत्यनारायण और कृष्ण शास्त्री का प्रभाव था। विश्वनाधा सत्यनारायण अदभुत विद्वान थे और उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था। कृष्ण शास्त्री एक रोमांटिक कवि थे और इन दिनों श्रीश्री की कविता की मुख्य विषय वस्तु रोमांस पूर्ण सामाजिक जीवन था, वहीं सामाजिक आलोचना भी थी। ं उन्होंने अपने बारे में लिखा है - 

‘जो कुछ देखा जो कुछ सुना उसे
व्यक्त करने निकला था मैं
शब्दों की खोज करने लगा जब
कितने ही पद दौड़ते आये तब
कोश के मुरदाघरों को छोड़
व्याकरण की जंजीरें तोड़
छंदों की सांप की लपेट से आजाद हो।’ 

यह ऐसा दौर था, जब जमींदारों व साम्राज्यवादियों के खिलाफ देश के व्यापक हिस्से में जन आक्रोश क्रान्तिकारी उभारों के रूप में फूट रहा था और हिन्दी साहित्य सहित सारी भारतीय भाषाओं में एक नये आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी। प्रेमचंद की अध्यक्षता में प्रगतिशील लेखक संघ का प्रथम अधिवेशन हो चुका था। तेलुगु साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन का श्रीश्री ने नेतृत्व किया तथा अपने साहित्य में उन्होंने वही कार्य किया जो बांग्ला में काजी नजरुल इस्लाम ने किया था। उनकी कविताओं का संग्रह ‘महाप्रस्थानम्’ ने महा जागरण का कार्य किया, जिससे तेलुगु कविता में नये युग का सूत्रपात हुआ। ‘खड्ग सृष्टि’ उनका दूसरा अत्यन्त लोकप्रिय काव्य संकलन रहा है। श्रीश्री ने तेलुगु साहित्य में जो विशिष्ट कार्य किया, इसी वजह उन्हें महाकवि कहा जाता है। उन्हें ‘साहित्य अकादमी’ और ‘सोवियत रूस नेहरू पुरस्कारों’ से भी सम्मानित किया गया

अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य की अपेक्षा तेलुगु साहित्य की जनता के राजनीतिक आंदोलन से कहीं ज्यादा घनिष्ठता रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि यहां के सांस्कृतिक आंदोलन ने राजनीति को कमान में रखा तथा अपने राजनीतिक उद्देश्यों को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया। इसलिए राजनीतिक आंदोलन के उतार चढ़ाव का यहां के सांस्कृतिक आंदोलन पर सीधा प्रभाव पड़ा और जब राजनीतिक आंदोलन शासक वर्ग के दमन उत्पीड़न का शिकार हुआ तो सांस्कृतिक आंदोलन को भी इसी तरह के आघातों का सामना करना पड़ा।

माटे तौर पर हम आंध्र के सांस्कृतिक आंदोलन को तीन चरणों में भिाजित कर सकते हैं - पहला, तेलंगाना आंदोलन के पूर्व। दूसरा, तेलंगाना आंदोलन के बाद। और तीसरा, श्रीकाकुलम आंदोलन और उसके बाद। श्रीश्री आंध्र के सांस्कृतिक आंदोलन के इन तीनों चरणों में सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं। तेलंगाना आंदोलन से पहले ही प्रगतिशील लेखक संघ, जो तेलुगु में अभ्युदय लेखक संघम् के नाम से जाना जाता है, का गठन हो चुका था। वैसे हिन्दी भाषी क्षेत्र में जहां यह संघ 1936 में गठित हुआ, वहीं आंध्र में इसका सम्मेलन 1943 में ही किया जा सका। सन 1943 में ही प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में डा0 गैरक पति राजाराव ने ए0 के0 अब्बास और अनिल डी सिल्वा  के साथ मिलकर आंध्रप्रदेश में इप्टा का गठन किया। इप्टा व प्रलेस ने सामंती व्यवस्था के विरुद्ध, हिटलर के फासीवाद के खिलाफ और बंगाल के अकाल के बारे में प्रचार करने के लिए गीत, नाटक, कविता आदि विभिन्न रूपों का भरपूर इस्तेमाल किया। श्रीश्री आदि कवियों ने इस विषय पर ढ़ेरों कविताएँ लिखीं।

साहित्य और संघर्ष - तेलंगाना आंदोलन की दो आंखें थीं। तेलंगाना आ्रदोलन ने संघर्ष की नई ऊँचाइयां हासिल की। इस दौर का लेखन भी इससे प्रभावित हुए बिना नही रहा। यह ऐसा दौर था जब वर्ग संघर्ष का विकास हुआ ही, इसने सांस्कृतिक आंदोलन को भी आवेग प्रदान किया। श्रीश्री आदि रचनाकारों ने जनता के बीच कवि व कलाकार के रूप में ख्याति अर्जित की। निजाम के विरुद्ध संघर्ष में इनकी रचनाओं ने नये नये रूप हासिल किये जिन्हें जनता अपनी सर्वाधिक प्रसन्नता के क्षणों में और अपने कार्य के दौरान गाया करती थी। लेकिन तेलंगाना आंदोलन के संदर्भ में कम्युनिस्ट नेतृत्व के पीछे हटने की वजह से जन संघर्ष और साहित्य दोनों को गंभीर आघात लगा। 

इस तरह 1950 से लेकर श्रीकाकुलम संघर्ष के बीच का दौर राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलन की खामोशी का काल था।  इस दौर में कम्युनिस्ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ, जिससे श्रीश्री जुड़े हुए थे, का रुख सरकार के प्रति संघर्षात्मक कम सहयोगात्मक ज्यादा था। इसके प्रतिबिम्ब के बतौर सांस्कृतिक आंदोलन में भी उतार आया और सुधारवादी प्रवृतियों ने जड़ जमाना शुरू किया। प्रतिक्रियास्वरूप निराशावाद व शून्यवाद ;निहलिज्मद्ध जैसी नकारात्मक प्रवुतियों ने साहित्य में जन्म लिया। इसने लेखकों की युवा पीढ़ी को दिग्भ्रमित किया। चेरावण्डा राजु, भैरवैयया, नग्नमुनि, निखिलेश्वर, ज्वालामुखी आदि कवि ‘दिगम्बर’ और ‘पैगम्बर’ गोष्ठियों से जुड़े हुए थे। इन दिगम्बर कवियों पर अमरीकी बीट पीढ़ी व पाश्चात्य नाराज युवकों का असर था। यह काव्य प्रवृति हिन्दी की ‘अकविता’ और बांग्ला की ‘भूखी पीढ़ी’ से मिलती.जुलती थी। यह ऐसा दौर था जब श्रीश्री भी कई तरह के उतार चढ़ाव से ग्रस्त थे। फिर भी भारत.चीन सीमा संघर्ष के समय भारत चीन मैत्री समिति की आंध्र शाखा के अध्यक्ष के रूप में वामपंथी कम्युनिस्टों की गिरफतारी का उन्होंने विरोध किया, सीमा के सवाल पर सरकार के रुख की आलोचना की तथा जनमत जाग्रत करने का कार्य किया।  

लेकिन नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम संघर्ष से आंध्र के राजनीतिक व साहित्यिक आंदोलन को नया जीवन मिला। दिगम्बर व पैगम्बर गोष्ठियों से जुड़े कवियों को नई दिशा मिली। विप्लवी रचियतालु संघम ;विरसमद्ध का गठन हुआ। श्रीश्री इसके अध्यक्ष बने और इस आंदोलन का नेतृत्व किया। वास्तव में यह श्रीश्री का ‘महाप्रस्थान’ था, एक ऐसी व्यवस्था के लिए महा अभियान था जिसमें अन्याय, शोषण, यातना, सजा, अकाल, रुदन व घोटाले न हो। ‘महाप्रस्थानम्’ महाभारत के मिथक को लेकर लिखी गई कविता है। महाभारत के खत्म होने के बाद पांडव स्वर्ग की ओर प्रस्थान करते हैं। श्रीश्री का महाप्रस्थान इस लुटेरे समाज से संघर्ष करते हुए समसमाज के निर्माण के लिए सामाजिक मुक्ति का महा अभियान है। उनका गीत ‘नई कविता’ और ‘प्रतिज्ञा’  श्रमिक जीवन के सौंदर्य को सामने लाता है। 

‘महाप्रस्थान’ में उनकी 41 कविताएं संकलित हैं। ये कविताएं 1930 से 1941 के बीच लिखी गई थीं जो संग्रह के रूप में 1950 में आईं। संग्रह के रूप में आने से पहले बताया जाता है कि ये कविताएं हजारों लाखों के बीच सुनाई गईं। इससे इनकी लोकप्रियता का पता चलता है। तेलुगु के प्रमुख साहित्यकार रचकोण्डा विश्वनाथ शास्त्री ने कहा था कि ‘कार्ल मार्क्स की ‘पूंजी’ के बजाय श्रीश्री की कविता ‘महाप्रस्थान’ ने आंध्र में कम्युनिस्ट बनाने का काम किया’। इसीलिए कहा जाता है कि श्रीश्री‘ का ‘महाप्रस्थान’ तेलुगु में महाविस्फोट की तरह था जिसने तेलुगु कविता की पूरी जमीन को ही बदल दिया। इन्हीं विशेषताओं की वजह से श्रीश्री को तेलुगु का महाकवि कहा जाता है। आज कैसी कविता चाहिए, श्रीश्री कहते हैं -

‘‘हिलने वाली और हिलाने वाली
बदलने वाली और बदला लेने वाली
गाने वाली और गवाने वाली
आगे .........और आगे बढ़ा ले जाने वाली
गहरी नींद से जगाने वाली
परिपूर्ण जीवन देने वाली
चाहिए भाई नई कविता। ’’

महाप्रस्थान 
तेलुग काव्यकृति:
श्रीश्री, तरिमेला नागि रेड्डी मोमोरियल ट्रस्ट,
32-13-26/1, बी0 एम. राव रोड,
मोघलराज पुरम,
विजयवाड़ा ,आंध्रप्रदेश

तेलुगु से हिन्दी अनुवाद:
निर्मलानन्द वात्स्यायन,
मूल्य: रु 100/-

समीक्षक

जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,
लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,
राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017 है.
मो-09807519227


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