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संतानों में सपने ढूँढते माँ -बाप

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जुलाई 19, 2012 | गुरुवार, जुलाई 19, 2012


निबंध: पुत्रो न स्तोतव्यः



डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो.08290479063,ई-मेल

(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से    रचनाकाल: अगस्त 1999  प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )

      समाज में लम्बे समय से चली आ रही किसी मान्यता का स्थान जब कोई नई मान्यता लेने लगती है तब इस बात का ख़तरा भी पैदा हो जाता है कि इस नवस्वीकृत मान्यता के प्रभावों को वह समाज अतिरेक की सीमा तक बढ़ जाने दे। उदाहरणार्थ जब फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिकों ने मानव मन की अनेक विकृतियों का उत्स उसकी दमित कामेच्छा में खोजना शुरू किया तो न केवल ब्रह्मचर्य व संयम की बातें तमाम पढ़े-लिखे लोगों को पुरातनपंथी लगने लगीं बल्कि जैसे समूची यौन नैतिकता को ही कठघरे में खड़ा कर दिया गया । इसी प्रकार जब जाति, वर्ग, लिंग और वर्ण के आधार पर मानव-मानव के बीच भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष शुरू हुआ तो मनुष्यों की प्रकृतिगत भिन्नता तथा अनुशासनबद्धता व कर्तव्यपरायणता के सारे बुनियादी सवाल ही जैसे हाशिए पर आ गये।


                         आज का मध्यवर्गीय भारतीय समाज जहाँ नारी स्वातंत्र्य के मामले में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है वहीं बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा को लेकर इसके माता-पिता और शिक्षकों के विचारों में भी आज काफी बदलाव दिखाई देता है। मध्यवर्गीय परिवारों में माता-पिता पहले जहां बच्चों से कठोर अनुशासन पालन व आज्ञाकारिता की मांग करते थे वहां आज बच्चों की इच्छाओं और आवश्यकताओं को भी इनमें समुचित महत्व दिया जाने लगा है। शिक्षकों को भी आज का भारतीय समाज छात्रों के साथ अत्यधिक कठोरता बरतने अथवा उन्हें शारीरिक दंड देने के लिए पहले की सी स्वीकृति नहीं देता। एक बच्चे  को भी एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखने-स्वीकारने को आज का समाज अधिक सही दृष्टिकोण मानता है और इसीलिए उसकी उपलब्धियों को पर्याप्त महत्व देना उसे आवश्यक लगता है। चाणक्य की सूक्ति  ैपुत्रो न स्तोतव्यः’’ इसीलिए लोगों को आज के संदर्भ में अप्रासंगिक प्रतीत होगी।


                         हमें आजकल कई ऐसे माता-पिता मिल जाएंगे जो अपने बच्चों की उपलब्धियों का अपने मित्रों व परिचितों के सामने वर्णन करना अपना आवश्यक कर्तव्य मानते हैं। उनकी मान्यता संभवतः यह रहती है कि उपलब्धियों का यह वर्णन व प्रदर्शन उन बच्चों के आत्मविश्वास में वृद्धि करता है तथा उन्हें और भी बड़ी उपलब्धियों के लिए प्रोत्साहित करता है। उनकी इस मान्यता को शायद पूरी तरह ग़लत भी नहीं ठहराया जा सकता; किन्तु जब ये माता-पिता अपने बच्चों की हर छोटी-बड़ी उपलब्धियों को प्रदर्शन की वस्तु बना देते हैं और इस प्रदर्शन के बदले में जब वे अपने हर मित्र व परिचित से वाहवाही की अपेक्षा करने लगते हैं तब इस वाहवाही के महज एक औपचारिकता में बदल जाने का ख़तरा अवश्य पैदा हो जाता है।


                         इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि चाणक्य जैसे मनीषी ने पुत्र की अपने ही मुंह से प्रशंसा का निषेध आखिर किस आशय से किया होगा ?शायद इसके पीछे कारण यह रहा हो कि अपने पुत्र की प्रशंसा परोक्ष रूप से अपनी ही प्रशंसा जैसा है और कोई भी सभ्य व विकसित समाज आत्मप्रशंसा को श्लाघनीय नहीं मानता। किसी सुसंस्कृत व्यक्ति से अपेक्षा यह की जाती है कि वह जहां दूसरों की साधारण उपलब्धियों को भी मुक्त कंठ से सराहे वहां अपनी किसी बड़ी व महत्वपूर्ण उपलब्धि के बारे में भी दम्भहीनता का परिचय दे। आत्मप्रशंसा के इच्छुक व्यक्ति से अन्य लोगों की उपलब्धियों के संबंध में तटस्थ व वस्तुपरक निर्णय की अपेक्षा भी नहीं रखी जा सकती। अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा आप ही पीटने वाले को शिष्ट लोग गंवार और बड़बोला समझते हैं।


                         बच्चों के प्रोत्साहन हेतु उनकी प्रशंसा ज़रूरी है पर ज़रूरी यह भी है कि यह प्रशंसा अपव्यय से बचते हुए और पूरी ईमानदारी के साथ की जाए। हर छोटी या बड़ी उपलब्धि की एक सी प्रशंसा न केवल प्रशंसा का अवमूल्यन करती है बल्कि श्रेष्ठ व अश्रेष्ठ में भेद कर पाने की क्षमता को भी कुंद करती है। आम जन की रुचियों के परिष्कार व उनकी निर्णय क्षमता को धुंधला न होने देने के लिए भी यह आवश्यक कि केवल प्रशंसा व पुरस्कार के हक़दार को ही प्रशंसित व पुरस्कृत किया जाए। किसी कुपात्र की प्रशंसा करना अथवा किसी अयोग्य व्यक्ति को इतर कारणों से पुरस्कृत करना न केवल नैतिक बल्कि एक सामाजिक अपराध भी है क्योकि इससे जनसामान्य की रुचियों व उनकी निर्णय क्षमता में विकृित आती हैं।


                         मानव प्रकृति की अपूर्णता का सहज स्वीकार किसी व्यक्ति को अहंकार से बचाये रख कर निरंतर सद्गुणों में वृद्धि के लिए प्रेरित करता है। अपने आप को सर्वगूणसम्पन्न समझने वाला व्यक्ति अपनी प्रगति के मार्ग को स्वयं अवरुद्ध कर लेता है। इस संबंध में उस कलाकार की कथा ध्यान देने योग्य है जो किसी प्रसिद्ध चित्रकार से चित्रकारी सीख रहा था। शिष्य कलाकार जब भी अपने किसी नये चित्र को गुरु के पास ले जाता वह उसमें कोई न कोई कमी निकाल कर बता देता। एक दिन शिष्य कलाकार ने धैर्य खोकर गुरु से कह दिया कि उनकी तो आदत ही हर चीज़ में दोष ढूंढने की पड़ गयी है। तब गुरु ने उसे समझाया कि किस तरह अहंकार ने अब उसके आगे बढ़ पाने पर रोक लगा दी है।


                         स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा सराहनीय है किन्तु हर बार पहले स्थान पर रहने की इच्छा को भी शायद जीवन के प्रति पूर्णतः स्वस्थ दृष्टिकोण के रूप में नहीं लिया जा सकता। यदि सभी लोग प्रथम स्थान के इच्छुक हो जाएं तो फिर दूसरे , तीसरे व अन्य स्थानों पर कौन लोग रहेंगे ? इसीलिए किसी प्रतिस्पर्द्धा में निचले स्थानों का सहज स्वीकार भी मानव समाज के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। वस्तुतः व्यक्ति की निजी उपलब्धियों को भी मोटे तौर पर मानव समुदाय की सामूहिक उपलब्धियों के एक अंश के रूप में ही देखा जाना चाहिए। स्वयं को ब्रह्मांड का केन्द्र मान लेने से ही वह आत्मकेन्द्रितता जन्म लेती है जो किसी व्यक्ति को अपने आपको महान और अन्य सभी को छोटा और महत्वहीन समझने की दिशा में ले जाती है।


                      आजकल अधिकाँश  लोग किसी की सच्ची और ख़री आलोचना से भी कन्नी काट जाते हैं। उन्हें भय रहता है कि कहीं उनकी आलोचना सामने वाले को नाराज़ न कर दे और कहीं इस नाराज़गी का परिणाम उन्हें स्वयं को किसी न किसी रूप में न भुगतना पड़ जाये। स्वस्थ आलोचना से कतराने की यह प्रवृŸिा वस्तुतः नफ़े-नुकसान का हिसाब लगाने वाली एक वणिक वृत्ति  है जो सत्य-असत्य और नैतिक-अनैतिक के बीच भेद करने के बजाय केवल अपना काम निकालने या ग्राहक न बिगाड़ने की नीति को तरजीह देती है। सच्चाई और ईमानदारी पर पर्दा डालने की यह प्रवृति कई बार तो माता-पिता और शिक्षकों तक को दूकानदारी के रंग से रंग देती है जबकि नैतिकता उनसे यह अपेक्षा करती है कि आवश्यकता पड़ने पर वे अपने बच्चों या छात्रों के प्रति कठोरता बरत कर भी उन्हें सुमार्ग पर चलाने का प्रयत्न करें। अगली पीढ़ी के प्रति उनके दायित्व बोध और  नेकनीयती में विश्वास करके ही तो समाज उन्हें उसके साथ कठोरता बरतने का विशेषाधिकार भी देता है।


                         हमारे समाज में आ रहे वर्तमान परिवर्तनों को देख कर लगता है कि माता-पिता अब बच्चों से और शिक्षक अपने छात्रों से जैसे भय खाने लगे हैं। वे अब अक्सर अपने बच्चों और छात्रों के साथ किसी भी तरह के संघर्ष से कतराते हैं और किसी भी तरह उन्हें ख़ुश रखने और उनके प्रति भले बने रहने की कोशिश करते हैं। जिन परिवारों में माता-पिता के बीच मतैक्य नहीं होता और जिन शिक्षण संस्थाओं के शिक्षक टीम भावना के साथ काम नहीं करते उनमें कुछ लोग बच्चों को अपने व्यक्तिगत प्रभाव में रखने की कोशिश करने लगते हैं। तब वे परिवार, शिक्षण संस्था या बच्चों के दीर्घकालीन हितों की अनदेखी करते हैं और उनके अनुचित कृत्य को भी स्पष्ट रूप् से अनुचित नहीं कहते। इस प्रवृति  से वे न केवल अपने बच्चों और छात्रों का बल्कि अंततः समाज का और स्वयं का भी नुकसान ही  करते हैं।


                         जिन माता-पिताओं या अध्यापकों के चरित्र में किसी प्रकार का नैतिक दोष होता है वे कभी भी अपने बच्चों के मार्गदर्शन में कठोरता नहीं बरत सकते। अपने छात्रों के साथ बैठ कर शराबखोरी करने वाला अध्यापक किस मंुह से उन्हें नशे से दूर रहने की सीख दे सकता है ? जो लड़कियां अपनी माताओं के चारित्रिक दोष जानती हैं उन्हें कुमार्ग से बचाने के लिए डांटने-फटकारने या दंड देने का नैतिक अधिकार उनकी माताओं से सदा के लिए छिन जाता है। छात्रों की ट्यूशन करने वाले अथवा उनसे किसी प्रकार का व्यक्तिगत लाभ उठाने वाले शिक्षक इसी तरह उन्हें ख़री बात कहने का अपना अधिकार खो बैठते हैं।


                         लोगों की बढ़ती हुई व्यावसायिक वृति आजकल कई बार प्रशंसा को भी एक सौदे की चीज़ में बदल देती है। कई लोग अपने सामने वालों की महज इस कारण प्रशंसा करते हैं कि वे इस प्रशंसा के एवज में उनसे कुछ प्राप्त कर सकें। दुनियादारी जानने वाले कई लोग अपने पुत्रों, पुत्र-वधुओं और पौत्र-पौत्रियों को अपने प्रति अनुकूल बनाए रखने के लोभ से ही उनकी निरंतर प्रशंसा को किसी गुर की तरह इस्तेमाल करते हैं। उनका यह व्यवहार वस्तुतः एक प्रकार के स्वार्थीपन का प्रमाण है जो अपनी संतति के गुणात्मक सुधार के बजाय परिस्थियों को यथासंभव अपने अनुकूल बनाए रखने की कामना से प्रेरित होता है। कई राजनेता आजकल हर उस व्यक्ति की प्रशंसा के पुल बांधने में निष्णात होते हैं जो उन्हें अपना समर्थन देता है। ये नेता न केवल प्रशंसा की बल्कि कई बार पुरस्कारों की भी राजनीति करते हैं। मैं तुम्हें पुरस्कार देता/दिलवाता हूं ; तुम मुझे समर्थन दो /दिलवाओ’’ उनका सूत्र होता है। दूसरी ओर वे स्वार्थी लोग जो किन्हीं उच्चपदासीन नेताओं या पदाधिकारियों से कुछ प्राप्त करने के इच्छुक होते हैं मौका पड़ने पर उन्हें कलामर्मज्ञ, साहित्यकार, संगीतरसिक, इतिहासज्ञ अथवा किसी भी विषय का ज्ञाता बताने में ज़रा भी संकोच नहीं करते। ऐसे स्वार्थी लोग बहुत से पुरस्कारों को भी सर्वथा निरर्थक व महत्वहीन बना देते हैं क्योकि उनकी चालबाजियों के कारण वे उनके वास्तविक अधिकारियों को कभी मिल ही नहीं पाते। पुरस्कारों की यह राजनीति सभी का नुकसान करती है।   अयोग्यता और कार्य की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता के बावजूद पुरस्कृत हो जाने वालों को यह कभी आत्मालोचन का अवसर नहीं देती । पुरस्कारों की राजनीति करने वाले सर्वाधिक नुकसान शायद उस समाज का करते हैं जो श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ में भेद करने की अपनी क्षमता ही खो बैठता है और अच्छे को बुरा व बुरे को अच्छा समझने लगता है।


                         किसी क्षेत्र विशेष में महारत हासिल करने के लिए अथवा किसी उद्देश्य में उनकी गहरी आस्था के कारण पहले लोग जिस तरह तात्कालिक प्रसिद्धि या प्रशंसा की पर्वाह किये बिना लम्बे समय तक साधना में जुटे रहते थे उसमें भी अब कमी आती जा रही है। किसी संस्था के या समाज के लिए ज़रा सा कार्य करते ही व्यक्ति अब किसी न किसी तरह उसके लिए श्रेय पाने को लालायित रहता है। पर्दे के पीछे रह कर काम में सहयोग देने के बजाय अब लोग मंच पर बैठना अधिक पसंद करते हैं। काम की उत्कृष्टता बनी रहे इससे अधिक चिन्ता अब लोगों को इस बात की रहती है कि कहीं उनका नाम वर्णित होने से न रह जाये। समकालीन मान्यता की पर्वाह न करते हुए महाकवि भवभूति की भांति अपने काम की विशिष्टता व गुणवत्ता  में विश्वास आज लोगों में बिरले ही देखने को मिलता है।


                         अपनी तत्काल कीर्ति की भूख लोगों में आज इस क़दर बढ़ी है कि इसके लिए वे अक्सर अपने ही जैसों का एक संगठन भी बना लेते हैं। इस संगठन के सदस्य एक दूसरे के कार्यों का वस्तुपरक मूल्यांकन करने के बजाय परस्पर प्रशंसा करते हुए  ''अहो रूपं, अहो ध्वनि ’’ वाली उक्ति चरितार्थ करते रहते हैं। किसी विचारधारा के आधार पर संगठित होने वालों के लिए उस विचारधारा का अनुकरण ज़रूरी हो जाता है। इस तरह कीर्ति व आत्मप्रशंसा के लोभ में कई लोग तटस्थ व वस्तुपरक निर्णय की अपनी स्वतंत्रता को भी दांव पर लगा देते हैं।


                         आज इस बात की आवश्यकता और भी बढ़ी हुई लगती है कि सचाई और न्याय असत्य और अन्याय पर विजय प्राप्त कर सके। केवल संख्या के आधार पर किसी सत्य का गला नहीं घोंट दिया जाना चाहिए। लोगों की निर्णय क्षमता का स्पष्ट व अक्षुण्ण बने रहना निहायत ज़रूरी है। जो श्रेष्ठ है वही आदरणीय व प्रशंसनीय भी होना चाहिए। किसी की उपलब्धियों के संबंध में निर्णय करते समय ग़ैरईमानदारी नहीं बरती जानी चाहिए। किसी समाज को अपने सर्वोच्च पुरस्कार श्रेष्ठतम लोगों के लिए सुरक्षित रखने में समर्थ होना चाहिए।
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