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युवा पीढ़ी प्रेम की रंगत को पहचानने में असमर्थ होती जा रही है

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जुलाई 12, 2012 | गुरुवार, जुलाई 12, 2012


निबंध: अब कहाँ प्रेम की वह रंगत



डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो.08290479063,ई-मेल

(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से     रचनाकाल: अप्रैल, 2000 प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )


फ़ारसी शायर निज़ामी द्वारा वर्णित लैला-मजनूं के किस्से के अंतिम भाग में जब लैला को एक बुज़ुर्ग उसके प्रेमी से मिलाने के लिए ले जाता है और जब लैला उसके प्रेम में दीवाने मजनूं से दस कदम ही दूर रह जाती है तब वह उस बुज़ुर्ग से कहती है:



मेरे आगे बढ़ने की सीमा यहीं तक है। मैं इस वक्त एक जलती हुई मोमबत्ती हूँ। यदि मैं आग के पास गई तो मैं ख़ुद पिघल कर ख़त्म हो जाऊंगी। प्रेम करने वालों के लिए बहुत ज़्यादा नज़दीकी अंत का कारण बन जाती है और इसीलिए प्रेमियों  को एक दूसरे से दूर ही रहना चाहिए। बीमार रहना बेहतर है, बनिस्पत आगे चल कर इलाज की वजह से शर्मिंदा होने के। 


यदि हमारे मीडिया को समाज का आईना माना जाए तो शायद यह कहना गलत न होगा कि इस तरह के मध्ययुगीन प्रेम की कोई कल्पना कर पाना जिसे निज़ामी की उपर्युक्त पंक्तियां प्रकट करती हैं, और जो मात्र देह तक सीमित न रह कर किसी अधिक गहरे और आदर्श, अमूर्त व रहस्यपूर्ण आत्मिक-आध्यात्मिक संबंध की तलाश करता हो, आज के अधिकांश प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए असंभव हो गया है। आज की युवा पीढ़ी प्रेम की उस रंगत को पहचानने में असमर्थ होती जा रही है जिसे ग़ालिब की 

  ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तेज़ार होता। 
या
आशिकी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूं ख़ूने जिगर होने तक।


जैसी पंक्तियां प्रकट करती हैं। 


हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण में आ रहे बदलाव के कारण उस प्रजाति का रूमानी प्रेम, जो युवा प्रेमी-प्रेमियों के बीच अचानक प्रकट होकर उन्हें एक ख़ास तरह की खुशी से भर देता था, जिसकी खुशबू उनके जीवन के हर पल और हर पहलू में व्याप्त हो जाती थी, जिसमें प्रेमी-प्रेमिका दैहिक आकर्षण से आगे जाकर अपने प्रेम से ही प्रेम करने लग जाते थे और उसके लिए बड़ी से बड़ी ज़ोखिम उठाने या सारी दुनिया ठुकराने को तैयार हो जाते थे, शायद पशु-पक्षियों की अनेक दुर्लभ प्रजातियों की भांति अब विलुप्ति के कगार पर है। यह बात साहित्य-प्रेमियों को कुछ चिन्ताजनक लग सकती है, क्योंकि हमारा बहुत सा काव्य और बहुत सा कथा-साहित्य इसी आवेगपूर्ण प्रेम की भावभूमि पर लिखा गया है जिसमें डूब कर प्रेमी-प्रेमिका अपने द्वैत को तिरोहित कर देते थे। प्रेम करने वालों को उनका वह प्रेम  अत्यंत रहस्यमय और जन्म-जन्मान्तरों के बंधन जैसा लगता था। आज जो प्रेम हम देखते हैं, उसमें शायद प्रेमी-प्रेमिकाओं के समूचे अस्तित्व को प्रभावित कर उन्हें उस तरह दीवाना बना देने  की ताकत नहीं रही। न ही शायद अब वह उस मीठे दर्द या उस चिर-विरहिणी के से भाव से संयुक्त रहा है, जिसका वर्णन हम रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसेे कवियों के काव्य में पाते हैं


प्रहर शेषेर आलोय रांगा से दिन चैत्रा मास
तोमार चोखे देखे छिलाम आमार सर्वनाश ।
         (शेष प्रहर के आलोक से लाल उस दिन चैत्र मास में तुम्हारी आंखों में अपना सर्वनाश देखा था।) 


आज का प्रेम शायद बहुत ज़्यादा दुनियादारी भरा, हिसाब-किताब करने वाला, व्यावहारिक व पालतू हो गया है। वस्तुतः जिस प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में रूमानी प्रेम जन्म लेता और फलता-फूलता था, उसमें अब काफ़ी तेज़ी से बदलाव आ रहा है। वे सामाजिक वर्जनाएं, जो प्रेम करने वालों के रास्ते में रुकावटें खड़ी करके प्रेमी को उनके लिए जीवन की बहुमूल्यतम वस्तु बना देती थीं, आज ध्वस्त होने लगी हैं। इस प्रकार के  वर्जना रहित समाज में उस तरह के रोमांच की कल्पना कर पाना असम्भव है, जिसे प्रेमिका के स्पर्श या उसके नैकट्य मात्र से प्रेमी अनुभव करता था। इटालवी कवि दांते अपनी कृति ‘विटा नोवा ‘ में बिएट्रिस को देखने पर अपने जिस तरह के अनुभव का वर्णन करता है, अथवा लीलावती की  उपस्थिति में जिस तरह के रोमांच के अनुभव का वर्णन हमें के.एम. मुंशी की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘स्वप्न सिद्धि की खोज में‘’  में मिलता है, उस तरह के अनुभव को वह समाज शायद सदा के लिए निर्वासित कर देता है जिसमें जाति, धर्म, माता-पिता, परिवार, सामाजिक विषमता या कानून संबंधी वर्जनाएं प्रेमी-प्रेमिका के मिलन को रोक नहीं सकतीं और जिसमें नायिकाएं सरे आम कूद-कूद कर नायकों के गले में झूलती रहती हैं या उनकी आंखों से मारी जाने वाली गोलियों का शिकार होती रहती हैं। 


अपने जिस प्रेम को प्रेमी-प्रेमिका दुनिया की ईर्ष्यालु व शत्रुतापूर्ण निगाहों से किसी कीमती हीरे की तरह छिपा कर रखते थे, उसका प्रदर्शन जब वेलेन्टाइन कार्डों, हवाई चुम्बनों और संदेश वाहन के हजारों नए साधनों से बगैर किसी लाजो-हया के होने लगता है, तब उस प्रेम का किसी गहरी वफ़ादारी और समर्पण के भावों से संयुक्त होना संभव नहीं रह जाता। जिस देश में रागात्मक प्रेम के स्वीकार का अर्थ प्रेमी या प्रेमिका के लिए जीवन भर का बंधन होता था वहां चाय की प्याली बढ़ाने के अंदाज में ‘आई लव यू टू‘ कहना उस देश के सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में जिस बदलाव का संकेत देता है, उससे सचमुच गालिब की


     कहते  हैं  जब  रही  न  मुझे ताकते सुखन
   जानूं किसी के दिल की मैं क्यूं कर कहे बगै़र
                                                                                                   जैसी पंक्तियों के लिए आम लोगों की समझ से बाहर होकर पूरी तरह अर्थहीन हो जाने का ख़तरा पैदा हो गया है।           
                                                  
आज के औसत प्रेमियों के लिए प्रेम  एक हल्का-फुल्का खेल मात्र रह गया है, जिसमें  प्रतिबद्धता जैसे किसी भाव का होना आवश्यक नहीं रहा। कोई प्रेमी अब देवता नहीं है और न ही किसी के द्वारा किया जाने वाला प्रेम पूजा। प्रेम की सदाकत के असर से ही प्रेमी अब तमाम मानवीय क्षुद्रताओं से ऊपर उठ जाए यह कोई आवश्यक नहीं। प्रेम का भाव हर प्रेमी को किसी अति विशिष्ट आह्लाद से भर दे यह भी कोई ज़रूरी नहीं। प्रेम का खेल खेलते हुए भी प्रेमी आज उसमें गाफ़िल हो जाने के बजाय काफ़ी चाक-चौबंद रह सकता है। इस दृष्टि से प्रेम के मामले में कल का खलनायक भी शायद आज के समाज में नायक हो सकता है। 


  आज के व्यक्तिवादी और आत्मकेन्द्रितता की ओर बढ़ते समाज में उस प्रकार के किसी भी प्रेम के जीवित रह पाने की उम्मीद करना व्यर्थ है, जो अपनी स्वाभाविक प्रकृति से ही व्यक्ति से उसकी हस्ती को पूरी तरह मिटा कर किसी दूसरे की हस्ती में विलीन कर देने की मांग करता है। आज जबकि नारी समाज में अपनी वैयक्तिकता की तलाश कर रही है शायद ही कोई लड़की कृष्ण के प्रेम में बावरी राधा की जगह अपने आपको रख कर देख पाएगी। इसी तरह जो समतावादी समाज हर क्षेत्र में पुराने नौकर-मालिक संबंधों को अस्वीकार कर रहा हो, उसमें उस तरह के किसी प्रेम की कल्पना कर पाना असंभव है तो उदात्तीकृत होकर ‘म्हाने चाकर राखोजी‘ जैसे भाव का रूप ले सके।


हम देखते हैं कि बहुत सा प्रेम-काव्य जिस कशमकश को प्रकट करता है उसके मूल में एक ओर संपूर्ण समर्पण की वह अनिवार्यता है, जो रूमानी प्रेम की पहली शर्त होती है और दूसरी  ओर व्यक्ति का वह अहं और आत्माभिमान है, जो दूसरों के सामने किसी भी तरह के झुकने को कमज़ोरी मानता है। बगैर इस कशमकश की कल्पना किए उस भाव को शायद ही समझा जा सके, जो ग़ालिब की निम्नांकित पंक्तियों में व्यक्त होता है


 छोड़ा न रश्क ने कि तेरे घर का नाम लूं,
  हर इक से पूछता हूं कि जाऊं किधर को मैं 
                   जाना पड़ा रक़ीब के दर पर हज़ार बार,
ऐ काश जानता न तेरी रह गुज़र को मैं।


   हमारे समाज से रूमानी प्रेम के गायब होते जाने का एक और महत्त्वपूर्ण कारण हमारी अत्यधिक व्यस्तता और फ़ुर्सत का तज्जनित अभाव है। बहुत सी कलाओं की साधना के लिए और बहुत से भावों को गहराई से महसूस करने के लिए आदमी के पास फ़ुर्सत का होना ज़रूरी है। आज के इस घोर प्रतिस्पर्द्धा व आपाधापी भरे युग में, जिसमें लोग दूसरों के सर पर पांव रख कर आगे जा रहे हों उस ‘तसव्वुरे जाना’ के लिए किसके पास फुर्सत है, जिसे ग़ालिब साहब अपनी

 दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन
                  बैठे रहें  तसव्वुरे  जाना   किए हुए


जैसी पंक्तियों में व्यक्त करते हैं। आज का प्रेमी प्रेम के संवेग को ही शायद एक प्रकार की मानसिक अस्वस्थता के रूप में लेने लगा है, जिसके बारे में ‘करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमां और‘ जैसी कोई बात कहने के बजाय उसकी कोशिश शायद यही रहती है कि वह उस तरह की किसी मानसिक अस्वस्थता से मुक्त होकर फिर से अपने काम लगे। विरह जनित प्रेम केे दर्द को सीने में पालते रहने की प्रवृत्ति को शायद आज का मनश्चिकित्सक आत्मपीड़न की अस्वस्थ प्रवृत्ति के रूप में देखेगा और लौकिक दृष्टि से सफल होने के लिए प्रेमी-प्रेमिकाओं को यथाशीघ्र उससेे मुक्त हो जाने की सलाह देगा। फ्रायड और उसके परवर्ती मनोवैज्ञानिकों के प्रभाव से जो वैचारिक बदलाव आया है और आ रहा है, उसमें ग़ालिब जैसे शायरों की शायरी के लुत्फ़ का अंत  अवश्यंभावी है। रूमानी प्रेम पहले मानव के लिए न केवल दुष्प्राप्य को प्राप्त करने की इच्छा से बल्कि कुछ-कुछ आदर्श और पूर्णता की ओर बढ़ने के भाव से भी जुड़ा रहता था। प्रेम का भाव प्रेमियों को सामान्य से ऊपर और औरों से समृद्धतर होने का एहसास करवाता था। पर लगता है आज हमारा पूरा समाज ही आदर्श और पूर्णता के प्रत्ययों में अपनी आस्था खोता जा रहा है। आज हमारी अधिकांश गतिविधियां व्यक्तिगत स्वार्थों, जान्तव कामनाओं और उपभोक्ता मूल्यों द्वारा संचालित होती हैं।


अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा भी आज हर व्यक्ति के लिए तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है। हर प्रकार के मनोभावों की व्याख्या अब हम यांत्रिक या वैज्ञानिक आधार पर करने लगे हैं। मानव का अनुभव-संसार अब केवल दृश्य व स्थूल तक सीमित होता जा रहा है। संतति-निरोधकों के बढ़ते प्रचलन, गर्भ समापन में निहित असंवेदनशीलता और परिवार के बारे में बदलती मानसिकता के कारण प्रजनन से असंयुक्त यौन का अब मातृत्व, वात्सल्य और सृजन जैसे भावों से भी अलगाव होता जा रहा है। 


वस्तुतः रूमानी प्रेम पर भी आज व्यावसायिक समाज के मूल्य हावी हो गए हैं। शारीरिक सौन्दर्य को आज किसी ईश्वरीय उपहार या किसी अलौकिक अनुभूति के द्वार के रूप में न देखा जाकर व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में देखा जाने लगा है। सौन्दर्य के माध्यम से आज कोई दिव्यता, सत्य या पूर्णता की तलाश नहीं करता। सुन्दर देह को आज शायद मात्र एक जिन्स और यौवन को उस जिन्स के व्यापार की सर्वाधिक उपयुक्त ऋतु समझा जाने लगा है। यही कारण है कि आज का व्यावसायिक समाज हर सुन्दर देह का सार्वजनिक प्रदर्शन सौन्दर्य प्रतियोगिताओं आदि के माध्यम से करवाता है और उसे चॉकलेटों, पेय पदार्थों आदि तक के साथ संयुक्त करके दिखाता है। मानवीय सुन्दरता को इस प्रकार खाने-पीने की वस्तुओं से जोड़ कर दिखाना प्रेम और सौन्दर्य की मध्ययुगीन दृष्टि से शायद हास्यास्पद, मूर्खतापूर्ण और अपमानजनक तक कहा जाता, किन्तु आज शायद स्थूल और पार्थिव ही अधिकांश लोगों के लिए बोधगम्य रह गया है। कोई भी ऐसा प्रत्यय या ऐसी गतिविधि जिसे ख़रीद-फ़रोख्त के दायरे में नहीं बांधा जा सकता व्यापारिक मूल्यों वाले समाज को एक प्रकार की बेचैनी से भर देता है और वह समाज उसे अपनी व्यावसायिक अवधारणाओं के खांचों में बिठाने की ताबड़तोड़ कोशिश करने लगता है। 


भौतिक व व्यावसायिक मूल्यों के हमारे समाज पर इस तरह हावी  हो जाने के कारण वह अब किसी प्रकार की कल्पनात्मकता, काव्यात्मकता, मिथकीयता, रहस्यमयता या अलौकिकता के लिए अनुकूल नहीं रह गया है। यही कारण है कि रूमानी प्रेम का जो देव पहले कभी अपनी पूरी भव्यता के साथ प्रेमियों के सम्मुख प्रकट होकर उनके दिलो-दिमाग और उनकी अन्तरात्मा तक को एक अनूठे, अलौकिक और समृद्ध अनुभव से भर देता था, उसकी शायद बहुत हल्की-सी ही झलक इस पीढ़ी के युवाओं को कभी भूले-भटके मिल पाती है। उन्हें शायद अब बहुत कम मौकों पर और बहुत अस्पष्ट रूप से ही कभी ‘कुछ-कुछ होता है।‘


यह विचारणीय है कि हमारे समाज से रूमानी प्रेम के भाव का यह विलोप क्या हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक अवनति का सूचक नहीं है? प्रेम के माध्यम से व्यक्ति अपने अहं की क्षुद्रता से ऊपर उठकर किसी अधिक विशाल व व्यापक प्रत्यय की कल्पना करने और उसके साथ एकाकार होने की चेष्टा के लिए प्रेरित होता है। प्रेम का भाव ही शायद उदात्तीकृत होकर मानव को मानवता, राष्ट्र या परमात्मा जैसी किसी बृहत्तर व उच्चतर धारणा से संयुक्त करता है। ऐसे में रूमानी प्रेम का विलोप क्या मानव लिए ऊपर उठने की किसी सीढ़ी के टूट जाने जैसा नहीं है? क्या उसका अर्थ मानव द्वारा आदर्श और पूर्णता, अलौकिकता और नैतिकता जैसे प्रत्ययों को सदा के लिए अलविदा कहने जैसा नहीं है?


हमें शायद इस बात पर भी विचार करने की ज़रूरत है कि जब हम किसी विदेशी संस्कृति को बग़ैर हमारी सांस्कृतिक विरासात के परिप्रेक्ष्य में उसके गुण-दोषों की भली-भांति परीक्षा किए स्वीकार करने लगते हैं, तब हमारे इस स्वीकार के परिणाम साहित्य, दर्शन, नैतिक मान्यताओं आदि के संदर्भ में हमारी समझ से कहीं बहुत ज़्यादा हानिकारक और गंभीर हो सकते हैं। संभव है आज के सामाजिक बदलाव में हम अपनी सांस्कृतिक विरासत का वह बहुत सा हिस्सा सदा के लिए खोने जा रहे हों, जो वैचारिक और भावानात्मक स्तर पर आम आदमी के जीवन को समृद्ध व मूल्यवान बनाए रखता था।
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