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‘कल के लिए’ के अदम गोण्डवी अंक समीक्षा Vaya कौशल किशोर


लघु पत्रिका आन्दोलन::कल के लिए 



‘कल के लिए’,
त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका ,
संपादक: डॉ जय नारायण,
अनुभूति,
विकास भवन,
बहराइच-271801
'सूकून', 5/150,
जानकीपुरम विस्तार लखनऊ
मो-09415036571
09455733230
ईमेल-
budhwarjainarain@gmail.com

सदस्यता राशि
एक अंक तीस रूपया
वार्षिक अस्सी रुपया
संस्थाओं के लिए एक सौ बीस रुपया


महानगरों के साहित्यिक कोलाहल से दूर बहराइच जैसे जिले से हिन्दी पत्रिका ‘कल के लिए’ डॉ जय नारायण के संपादन में पिछले बीस बर्षों से निकल रही है। इसका नया अंक अदम गोण्डवी की स्मृति पर केन्द्रित है। इसे मात्र स्मृति अंक कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि यह हमें अदम के दम और उनकी कविता के तेवर व ताकत से परिचित कराता है। यह ऐसा दौर है जैसा कि संपादक जयनारायण कहते हैं  ‘समकालीन कविता का पूरा वितान उस मध्यवर्ग व उच्च मध्यवर्ग के बीच तना है जो भयंकर रूप से अवसरवाद की चपेट में है।’ आज जब प्रचार.प्रसार के लिए साहित्यकार तथा उसके साहित्य का महानगरीय होना जरूरी हो गया है ऐसे में कस्बों.गांवों के लिखे जा रहे साहित्य का उपेक्षित हो जाना स्वाभाविक है। अदम गोण्डवी के साथ भी ऐसा ही हुआ है। 

अदम की कविताएँ समकालीन कविता के अवसरवाद से संघर्ष करते हुए आगे बढती है। वह सौ में उन सŸार की बात करती है जो हाशिए पर ढकेल दिये गये हैं, उनके पक्ष में खड़ी होती है जो लगातार ठगे गये हैं, आजादी व मानवोचित अधिकारों से वंचित किये गये हैं। ‘कल के लिए’ का यह विशेष अंक इस मायने में अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि यह अदम के इसी संघर्षशील काव्य व्यक्तित्व को सामने लाता है। गजल व नज्मों, उनके फार्म व कन्टेंट तथा रचना कर्म व व्यक्तित्व के विविध पहलुओं पर विमर्श, साक्षात्कार, परिचर्चा, संस्मरण, बातचीत, टिप्पणियों आदि के माध्यम से उन पर संपूर्णता में विचार करता है।

अदम की कविता जनता की भाषा में जनता की बात करती है। यह जहाँ खड़ी है, वह हिन्दी.उर्दू की सियामी जुड़वा जमीन है, जिसकी आत्मा जनभाषा की है। यही कारण है कि डॉ मैनेजर पाण्डेय अपने विमर्श में कहते हैं कि ‘कविता की दुनिया में अदम एक अचरज की तरह हैं।’ उन्हें अदम नजीर अकबराबादी की परम्परा के कवि लगते हैं। राजेश जोशी अदम की गजल के फार्म पर काफी गहराई में जाकर विचार किया है कि ‘गजल एक रुमानी, अर्बन...नागरी फार्म है लेकिन अदम गजलों के फार्म को लेकर संघर्ष करते हुए नजर आते हैं।’ अदम ने जिस फार्म को विकसित किया वह गजल के मूल और पारंपरिक स्वभाव से भिन्न है। ये गजलें देशज और प्रतिरोधत्मक अंतर्वस्तु लिए हुए हैं तथा राजनीतिक व्यंग्य इन्हें मारक बनता है। अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से अदम की गजलें लोगों की जुबान पर तथा उनकी स्मृतियों रच.बस गई हैं। 

जहाँ इस अंक में ‘अदम की शायरी का मिजाज’, ‘विद्रोही स्वर का संताप’, ‘जम्हूरियत की जुबान’, ‘तरक्की पसन्द तहरीक और अदम की शायरी’ आदि शीर्षक के तहत अदम की कविता पर रविभूषण, आशुतोष कुमार, सुभाषचन्द्र कुशवाहा, राजेश मल्ल आदि के लेख हैं, वहीं विजय बहादुर सिंह का अदम गोण्डवी से लिया लम्बा इंटरव्यू है। यह इंटरव्यू अदम की विचार प्रक्रिया तथा देश, दुनिया व समाज के बारे में उनके विचार को सामने लाता है। इसी तरह उनके साथी, सहकर्मियों जैसे आदियोग, श्याम अंकुरम, दयानन्द पाण्डेय, स्वप्निल श्रीवास्तव, बुद्धिनाथ मिश्र, अटल तिवार, वशिष्ठ अनूप आदि के संस्मरण भी है जो अदम के जीवन संघर्ष से रू ब रू कराता है साथ ही किन उतार चढ़ाव व जीवन के कठिन कठोर संघर्ष से गुजर कर अदम निर्मित हुए हैं, इससे यह भी पता चलता है। अंक में अदम की कविता के बहाने दो परिचर्चाएँ भी हैं जिनमें संजीव, अनामिका, प्रभात रंजन, अशोक कुमार पाण्डेय, शिवमूर्ति, मदन कश्यप आदि ने भाग लिया है। अंक में अदम पर विश्वनाथ त्रिपाठी, सुभाष राय, दयाशंकर राय, नवीन जोशी, आलोक धन्वा, पुरुषोŸाम अग्रवाल आदि की कुछ छोटी परन्तु जरूरी टिप्पणियां भी हैं। इस तरह अदम गोण्डवी को केन्द्रित अंक में संपादक जय नारायण और उनकी टीम का परिश्रम, लगाव और प्रतिबद्धता साफ झलकती है। 

कुल मिलाकर ‘कल के लिए’ का यह अंक एक ऐसे कवि से हमारी मुलाकात कराता है जो ‘कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठा हाथ’ वाली परम्परा का कवि है। वह अपने को डी क्लास ही नहीं करता वरन अपने को डी कास्ट भी करता है। इस अर्थ में अदम जनता के सच्चे कवि है जिसका जीवन उस किसान की तरह रहा, जो मौसम और समय की मार झेलता है। अन्न पैदाकर सबको खिलाता है, पर अपने भूखा रहता है, अभाव में जीता है। यही अभाव अदम के जीवन में रहा। उनके लिए कविता करना धन व ऐश्वर्य जुटाने, कमाई करने का साधन नहीं रहा बल्कि उनके लिए शायरी करना, गजलें लिखना सामाजिक प्रतिबद्धता थी, समाज को बदलने के संघर्ष में शामिल होने का माध्यम था। इस अर्थ में अदम हिन्दी कविता के एक अत्यन्त जरूरी, विशिष्ट और दुर्लभ कवि हैं। ‘कल के लिए’ अदम की ऐसी ही छवि उकेरता है। 


जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,
लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,
राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017 है.
मो-8400208031

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2 टिप्‍पणियां:

  1. ‘अदम’ के ‘दम’ लिखना अच्छा लगा।
    जो पंक्तियां अच्छी लगी थी उनकी कापी करना चाहता था
    उललेख के लिए,
    संभव नहीं हुआ।
    अच्छी पत्रिका अच्छी टीम

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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