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आधार पत्र :महावीर समता संदेश के 20 वर्ष पूरे होने पर तीन दिवसीय उत्सव

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, अगस्त 30, 2012 | गुरुवार, अगस्त 30, 2012


दिनांक 12 से 14 अक्टूबर, 2012
राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन 
विषय: 
लोकतन्त्र का भविष्य, मीडिया और संस्कृति

हिम्मत सेठ


वरिष्ठ साथी पत्रकार,
उदयपुर से प्रकाशित 
'समता सन्देश' 
पत्र के सम्पादक और 
समतावादी लेखक हिम्मत सेठ



फोन: 0294-2413423,
मो. 94606.93560
यह मूल्यांकन कठिन है। स्वतन्त्रता का प्रजातन्त्र आज कहा है मनोवृतियां लोकतन्त्र की दशा, दिशा पर कहीं सहमत है और कहीं नहीं पर कुछ बातें बड़ी साफ है। लगता है। यही कि भारतीय समाज किसी खोज में है ऐसी खोज जिसका कोई आधार हो और तथाकथित संक्रमण कालीन व्यथाओं के तार्किक वैशाखी से अलग किसी पुख्ता बात को अपना केन्द्र मान लिया जाये। कुछ बातें हुई। यह प्रजातन्त्र गरीब परिवेश में की न केवल संभ्रात स्वार्थी अभिजनों के हाथों सौंप चुका है। बढ़ते नवीन मध्यम वर्ग ने आधुनिकता के नाम पर ऐसे मूल्यों का समर्थन कर दिया हे, जो उनके मूल उत्पति समाज में भी स्वीकार नहीं किये जाते। तथाकथित तकनीकी, व्यापारिक और सूचना के स्वामियों की नई पौध प्रजातन्त्र की प्रक्रियाओं की हिस्सेदारी में शामिल होना चाहती है। या नहीं इसमें संशय है। प्रजातन्त्र के वर्तमान दौर में सहसा नेतृत्व विहीनता एक नया विकास है। गली मोहल्लों, सीविल सोसायटी, राजनीतिक दल, विधायकाऐं शिक्षा संस्थान आदि सभी में यह सवाल उठा खड़ा हुआ है कि यदि नेतृत्व की यही शून्यता चली तो क्या हम प्रजातन्त्र की इस तोड़-मरोड को हम झेल पाऐंगे? कहीं हम प्रजातंत्रिक अराजकता की ओर तो नहीं मुड रहे? इस प्रजातांत्रिक अराजकता में प्रश्न तो बहुत से है। पर उत्तर कहीं नहीं। 

किसी भी चुनाव में कोई विकल्प नहीं की स्थिति प्रजातन्त्र की संडाध जिसकी बदबू प्रत्येक नागरिक को परेशान कर सकती है। यह बात केवल राजनीति की ही नहीं प्रजातन्त्र की अपनी सामाजिक नीतियां हुआ करती है। इस मोड़ पर आकर यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है कि आखिर इस स्वीकृत प्रजातन्त्र की सामाजिक नीति क्या है? हमारी नीति गैर बराबरी को बनायें रखने की है या न्यूनतम बराबरी की। आरक्षण बराबरी लाने का हथियार नहीं है। पर हां बराबरी लाने के प्रयास या ऐसे कार्यक्रम जो बराबरी लाने के यंत्र हो आवश्यक व साधन है जो प्रजातन्त्र में गैर बराबरी की खाइयों को पाट सकें। प्रजातन्त्र का एक आधार जन बहस है। पर अब बहसे नहीं होती। गली-मोहल्लों को छोड़ दे संसद में भी बहस नहीं होती। प्रजातन्त्र की यह प्रतिनिधि संस्था अब पहलवानी का अखाड़ा है।
लगता है इस प्रजातांत्रिक संस्कृति में कांटे ज्यादा उगे है। इस बहुलतावादी संस्कृति में एकीकृत होना आम बात है। ऐसी बहुलता में छेड़छाड़ जरूर है, पर मूल उद्देश्यों से भटकाव नहीं? क्या हम किसी प्रजातान्त्रिक संस्कृति को स्थापित कर पाए है। प्रजातन्त्र आमजन की संस्कृति का तन्त्र है। लोकतन्त्र और भारतीय समाज के समागम में आमजन कहीं हाशिये पर। लोकतन्त्र में उनकी अपनी हिस्सेदारी औपचारिक रूप से मत देने की है। आमजन के मत से चलता यह तथाकथित प्रजातन्त्र जिन लोगों के हाथों में है और जो प्रजातन्त्र की मशीन के संचालक है। अभिजात संस्कृति को जन्म देने में तो समर्थ है पर आम जीवन की संस्कृति उनसे कोसो दूर है।
आखिर प्रजातन्त्र का चौथा खम्भा, मीडिया क्या कर रहा है। इस प्रजातन्त्र में उसकी हिस्सेदारी क्या है। कारपोरेट स्वामित्व द्वारा प्रदत स्वामित्व उन्हें कहां ले जा रहा है? आखिर नेतृत्व शून्यता को वह भर तो सकता ही था। कहीं ऐसा तो नहीं कि नेताओं के विकासी जीवन के चटखारे उन्हें ज्यादा दर्शक या पाठक देते है। दर्शक और पाठक की जेब किसी भी वाणिज्यिक कार्य प्रणाली के लिये सुखद हो सकती है। पर वह दायित्व की पूर्ति नहीं है। इससे कई सवाल उभरे है। गांव कहां है? आमजन की पीड़ा मात्र खबर है या संवेदनशीलता के प्रति लोगों का खिचाव। आखिर मीडिया की भी समाज नीति क्या है। प्रजातन्त्र के उद्देश्यों की रक्षा की कसम केवल मीडिया ही खा सकता है। पर यह कसम अभी ली ही कहां गई है। पत्रकार या मीडिया कर्मी एक जीविकोपार्जन का साधन तथा चौथे खम्भे की तरह छत को थामे रखना दो अलग-अलग कर्तव्य है।
प्रजातन्त्र के संदर्भ में मीडिया के लिये यहीं सवाल नहीं है। इसीलिये जरूरत इसी बात की है कि हम प्रजातांत्रिक संस्कृति में उठ रहे इन सवालों पर गौर करें और इन का विश्लेषण करें शायद हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचे।
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