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'व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ' -3 (डॉ.ओम निश्चल)

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अगस्त 07, 2012 | मंगलवार, अगस्त 07, 2012

'व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि '
लेखक:ओम निश्चल



बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.
अवध विश्वविद्यालय से साठोत्तरी हिन्दी कविता पर शोध.
अपनी माटी पर आपकी और रचनाएं यहाँ 
मार्फत : डॉ.गायत्री शुक्‍ल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर, 
नई दिल्‍ली-110059, फोन नं. 011-25374320,मो.09696718182 ,ईमेल:omnishchal@gmail.com  पूरा परिचय यहाँ 


मैने शालिनी माथुर जी का आलेख पढ़ा है। उनसे बात भी की। पवन करण की इस कविता पर उनकी दृष्टि तो आप देख पढ़ ही चुके हैं। कथादेश में आपका प्रतिवाद भी पढ़ा। मेहनत की है आपने शालिनी के अतिरंजित आलोचकीय दृष्टि से कविताओं को देखे जान की सीवनें उधेड़ी हैं। प्रथमद्रष्ट्या अपनी रौ में वे अपनी बात सिद्ध भी कर ले जाती हैं। पर निजी बातचीत में वे एक आक्रामक रुख रख कर बोलती हैं(या बोलने ही नही देतीं दूसरों को) मैंने इस दृष्टि से भी कविताओं को देखे जाने की प्रवृत्ति और पद्धति पर उनसे बात करनी चाही थी पर एक खास किस्म की अहम्मन्यता के चलते हमारे संवाद समरस हो सके। उन्होंने कहा कि हिंदी कवि इतने लोलुप और आत्ममुग्ध हैं कि हजारों स्त्री विषयककविताऍं कवि मित्रों और विरोधियों को उन्हें भेज चुके हैं। मुझे लगा ये तो पपीते की झाड़ पर चढ़ चुकी हैं,इनसे क्या बात की जाए। पर क्योंकि एक समय और आज भी मैं पवन करण कीभाभी का प्रेमी, बहन का प्रेमी मौसी का प्रेमीटाइप कविताओं का विरोधी रहा हूँ जिसमे एक खास तरह की फार्मूलाबद्धता नजर आती है, केवल इसीलिए, पवन की कविता की इस तल्ख आलोचना का स्वागत करूँ, ऐसा नही है। 

अस्पताल से बाहर टेलीफोनपर मैंने नई दुनिया में लिखा था, अनिच्छा से लगभग। पर उसमें तमाम अच्छी कविताऍं हैं। पढ़ कर अच्छा लगा बाद में बिहार विधान परिषद की पत्रिकासाक्ष्यमें उन की कुछ कविताओं पर लिखा औरपिता की पिटाई के आस्वादसरीखी अप्रकृत संज्ञा पर एतराज भी दर्ज किया। दरअसल स्त्री को लेकर पवन और अनामिका की दृष्टियों में वैपरीत्य है। पवन करण स्त्रीको लेकर अति उत्साही छोरों तक जाते हैं। उसकी काल्पनिक आजादी का उत्सव मनाते हुए भाभी का प्रेमी टाइप की फार्मूलाबद्ध कविताऍं लिखते हैं। यों स्त्री मेरे भीतर में उनकी कुछ अच्छी और मार्मिक कविताऍं भी हैं। पर यह मुहावरा यानीस्त्री मेरेभीतर तो मंगलेश डबराल का है। कहा है उन्होंने: कि एक स्त्री के कारण एक स्त्री बची रही मेरे भीतर। तो सर्वसंग्रहवाद तो राजेश जोशी जैसेतमाम कवियों में है परयही सिद्ध करना थाजैसी प्रमेयवादी कविताओं को सराहा नहीं जा सकता।

वैसे स्त्री को लेकर रीतिकाल से लेकर आधुनिक काल में भारती तक और अभी अभी युवा कवियों तक के यहॉ स्त्री के सौंदर्यधायी प्रतिमानों में उनके अंगों के प्रति उत्सवता का भाव मौजूद है। और यह समाज में भी है। तो सौंदर्य के प्रतिमान भी हमारेया कवियों के भी वैसे ही होंगे। वह लोकोत्तर प्राणी नही है आप या हमी हैं। मुझे पवन करण की इस कविता में देहासक्ति तो दिखती है पर परपीड़न का भाव नहीं। पर खोद खोद कर चीजें खोजी जाऍंगी तो शालिनी जैसी व्याख्याऍं ही होंगी। आखिर आपने भी तो हेमंत शेष की एक स्वस्थ कविता को उपभोगवादी करार दिया था, दूसरी तो खैर प्रकट तौर पर आक्रामक थी ही। क्या बुरा कहा था हेमंत ने कि - ‘जो सारे संसार को बुहारती है, तमाम पतियों के साथ सोती है, आदि आदि, मुझे उस स्त्री की चिंता है।‘? पर आपकी आलोचना-पद्धति से वह कविता स्त्री विरोधी हो गयी। यह मैं नहीं मानता मेरे लेख का एक शीर्षक ही है: जो सारे संसार को बुहारती है---लेकिन आपने हेमंत की कविता का अल्पपठन करना था तो आपने उसके भीतर की अंतर्ध्वनियॉ नहीं सुनीं, उस ध्वनि की अनदेखी की जो उसमें अनुस्यूत है। दूसरी कविता की बात और है। वह अतिरेक मे जाती है।

अनामिका स्त्रीवादी कवयित्री नहीं हैं हॉं स्त्रियों के मनोजगत और उनके वजूद को लेकर उनके यहॉं संजीदा काव्य-संरचनाऍं मौजूद हैं। वे अंत:पुर के एकांत में रह रही स्त्रियों के संसार को सामने लाती हैं। इसके अलावा घर परिवार की रुनझुन और स्त्रियों का संसार भी उनके यहॉं कम घना नही है। पर उनकी आलोच्य रचना में जिसकी ओर शालिनी ने इंगित किया है--एक गुणीभूतव्यंग्य है जिसे शालिनी समझ नही पाई। वह अभिधा में पसरी पदावली पर कुपित हो बैठी। यह मोटी बुद्धि का इस्तेमाल है। जडीभूत समझ। जैसे कि उसे यह सिद्ध करना ही हो। जैसे कि आपको यह सिद्ध करना है कि ये कविताऍं निष्पाप हैं या हेमंत की पहली कविता स्त्रीउपभोगवादी। शालिनी माथुर स्त्रीवादी कार्यकर्त्री हैं इसलिए आलोचना के सम्यक् औजार उनके पास नहीं हैं तो भी आलोचना को इस नजर से भी रखा जा सकता है, यह पद्धति तो उन्होंने दी ही है। इसलिए एक सॉंस में आप उनकी स्थापनाओं को अनदेखा नही ही कर सकते।

मैंने शालिनी से कहा कि क्या उन्होंने प्रियंवदा काभया कबीर उदासपढ़ा है जिसका नायक कैंसर से ग्रस्त वक्ष को निकलवा देने वाली स्त्री के साथ एक अनुरागमय सान्निध्य जीता है। इतने संतुलित तरीके से वह उपन्यास लिखा गया है कि दुख सुख राग अनुराग देह विदेह की मोहक सिंफनी आबोहवा में गूंजती रहती है।उन्होंने कहा, नहीं। आखिर जो वे सिद्ध करना चाहती थीं उसके लिए देश विदेश के तमाम चिंतकों की पेशी करवाने क्या जरूरत थी। केवल ज्ञान बघारने की अहम्मन्यता। जैसे इल्म से शायरी नही आती आशुतोष जी, वैसे इल्म से कविता के मर्म तक नहीं पहुँचा जा सकता, उसके इन्ग्रैडियेंट्स उधेड़े बिखेरे जा सकते है। कविता की समझ के लिए सहृदयता चाहिए, तभी इसे हृदय में कंघी करने वाली विधा कहा माना गया है।

शालिनी की दिक्कत यह है कि वे अतिवादी छोरों पर जाकर बाल की खाल निकालने में आनंद का अनुभव करती हैं। सरसरी तौर पर वे रचनाऍं आपको भली भी लग सकती हैं एक संस्कारबद्ध जीवनानुभवों के चलते। पर वे विखंडन और मोटिव्स की अतिरेकी व्याख्याओं तक भी जाती हैं।पर इससे हमारेकवियों को यह पता चलेगा कि आलोचना का स्कैनर और उसकी पद्धतियॉं मौजूदा आलोचनात्मक प्रविधियों और मानदंडों से अलग भी हो सकती हैं। शालिनी यह राह तो दिखाती ही हैं।

आपने थ्रेडबियर एनालिसिस कर कविता की आलोचना के मानदंड की व्याधियॉं चिह्नित की हैं। पर भई प्रोफेसर होने के नाते मैं आपकी सारी बात मान लूँ ऐसा नही है। पर आपकी सराहना जरूर करता हूँ कि इस ओर आपने पहल की। पर मदन कश्यप क्या कहना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें कितने ज्ञान की जरूरत है, क्या कहता है उनका वक्तव्य। समझ नहींआता।क्या इसे लीपापोती कहा जाए।अनिता गोपेश शालिनी के बहाव में बह गयी हैं तो आपकी समीक्षा से थोड़ी देर में वे शायद अपने मत पर पुनर्विचार करें। निश्चय ही अनामिका के यहॉं यह बात उस खीझ और अवमान के अनुभवोंकी रोशनी में कही गयी है, जो स्त्रियॉं अपने अंगों को लेकर समाज में झेलती हैं। पर इस कथन में भी आत्मदया और हृदय के नम कोरों की उष्णता है जिसे शालिनी नही देख सकीं और ही उर्मिला जैन अनिता गोपेश।

अनिता सुधी विदुषी महिला है, साहित्यिक परिवार के संस्कारों को आयत्त कियाहैउन्होंने किन्तु कविता को एक-सरीखा नही ग्रहण कियाजा सकता। यहॉं सारा किस्सा जमाने से सौंदर्यधायी उत्तेजक शीलसंवर्धक माने गए नख शिख प्रतिमानों को लेकर है। सारी की सारी प्रेम कविताओं में लोग या तो अध्यात्म सिद्ध करते रहतेहै या लोकोत्तरता। कविता के केंद्र में देह को निकाल दें तो सारा रीतिकाल निरस्त कर दिया जाना चाहिए। पर वहॉ रीतिबद्धता केवल देह को लेकर नहीं,कविता के सौंदर्य के बखान की शैलियों और रीतियों पर भी आधारित है। अशोक वाजपेयी की कविता सांसारिकता और दैहिकता को खूँटियों पर टॉग कर व्यर्थ के लोकोत्तर जगत में विचरण करने नाट्य नहीं करती। यह देह अज्ञेय में भी है, सर्वेश्वर में भी।जहॉ वे(अज्ञेय) प्रेमिका के दोनो वक्षों के बीच नाक घुसा कर रमने की चेष्टा दर्ज करते हैं। जहॉं सर्वेश्वर देह के एक एक अंगोंको पुकार कर अंत में कहते हैं---आओ मेरी छॉह में जुड़ाओ। तो सौंदर्य के इन अथक सतत सौंदर्य के प्रतिमानों को निरस्त नही किया जा सकता है, इनके प्रति मलिन और लोलुप दृष्टियों का परिमार्जन किया जा सकता है। क्योंकि भोग तो हमारे निहारनेमें भी है। केवल दैहिक संसर्ग में ही नहीं, वह हमारी फंतासियों में भी सॉंस लेती है। किन्तु वासना सदैव निंदनीय नही है। का

कात्यायनी ने लिखा है: सारी वासनाऍं दुष्ट नहीं होतीं।

भारती ने लिखा: हो यह वासना तो जिन्दगी की माप कैसे हो।

यही नही, हमारे समय के इरोटिक काव्य में ऐसे प्रसंग अनन्त हैं लेकिन उनका इस तरह क्षिद्रान्वेषण नही किया गया जैसा आज की स्त्रीवादी आलोचिकाऍ कर रही हैं। यह वासना हमारे जीवन का स्वीकार्य और अनुमन्य पहलू भी है। यह जीवन आनंद का एक महास्रोत है। कृष्णा सोबती कहती है सेक्स हमारे जीवन का महाभाव है। उत्सव है। यह उत्सवता कविताओं में सदा से रही है और रहेगी। क्योंकि यह पुरुष ही कहता है: स्त्री मेरे भीतर है।स्त्री से किसी ने यह नहीं पूछा कि तुम्हारे भीतर पुरुष है कि नहीं ?

निश्चय ही, क्योंकि बहुत सारी चीजें लोगों में सामान्य होती हैं। कुछ चीजों में मतभेद होता है। यही व्यक्ति की अद्वितीयता है। मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना: ऐसे ही थोड़े कहा गया है? कविता हर व्यक्ति की समझ पर निर्भर करती है।हो सकता है यहॉं आपनेजो तर्कगिनाये हैं या मैंने ही---उसे कोई विलक्षण व्यक्ति सिरे से नकार दे और एक अलग काव्यास्वाद की सैद्धांतिकी पेश कर दे। क्योंकि आशुतोष जी---

हमसे बेहतर कहने वाले
तुमसे बेहतर सुनन वाले।

आज कविताओं को मोटी बुद्धि से समझा जा रहा है। गुणीभूत व्यंग्य और ध्वनियों के अंत:संसार बिला गए हैं जैसे। सतह पर हम जैसे सिंघाड़े की फसल काट रहे हैं। और तुर्रा यह कि हम वाल्मीकि के वंशज हैं, तुलसी के वंशज हैं, फिराक के वंशज हैं। कविता के विट को उसकी व्यंजना को समझने की जरूरत है और यदि कहीं सयत्न मैलाफाइड इंटेशन्स की बू आती है तो उस पर विचार होना चाहिए। मै तो संस्कृत का विद्यार्थी हूँ, नेरुदा, व्हिटमैंन ,शिम्बोर्स्का, वोल सोयिंका, सिल्विया प्लाथ को उतना नहीं जानता ,बस अनुवादों के जरिए जानता हूँ लेकिन कविता जब घटित होती है, इसकी घंटी मुझे भी सुनाई देती है। लेकिन जिस तरह काव्यास्वाद को हॉंकने, उसकी व्याख्या करने की वृषभ शक्तियॉं आजमाई जा रही हैं, उसने तर्कातीत होने की हदें तोड़ दी हैं। अरे भले दिमाग और दिल से कवि की आवाज़ भी सुनी जानी चाहिए। महात्मा गॉंधी कहते थे कि यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम दूसरा गाल भी उसके आगे कर दो। यदि यह कविता की पंक्ति मान ली जाए तो इसका क्या यही अर्थहोगा। क्योंकि कोई मूढ़ ही होगा जो इसकी अभिधा पर जाएगा। इसकी व्यंजना को परख सकेगा।

इसीलिए एक जमाने से अध्यापकों और आलोचकों ने कविता की रूखी सूखी व्याख्याऍं की हैं, अपने दिमागी सेंसर्स ईजाद किये हैं।ऐसे में अचरज नही कि संस्कृत का एक आचार्य यह सीख देता है: कवियों को सदैव वैयाकरणों से बचना चाहिए।

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3 टिप्‍पणियां:

  1. मानिक जी मेरी टीप में वर्तनी की गल्‍तियॉं बहुत हैं। इन्‍हे पाठकों से अनुरोध हे कि सुधारकर पढें। यह एकाग्र लेख नही है,प्रतिक्रियावश खंड खंड में उपजे विचार हैं। मानिक जी ने इन्‍हें एकत्र किया है। उनका आभार। इसे लेकिन पुन: मुझे सुधार कर लिखना होगा।

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  2. आज इस टिप्पणी को अपनी पहली फुर्सत में देखूँगा.... पर कहना न होगा- ज़हीन विचारक डॉ. ओम निश्चल का यह आलेख सुचिंतित और तर्काश्रित होने से मननीय है - मानक जी! आप ऐसी ही वैचारिक चीज़ों से 'अपनी माटी' को उपजाऊ बनाते आये हैं, आगे भी ऐसा करें! वर्ना हिन्दी में ब्लॉग बना लेने की सुविधा ने कुछ लिजलिजे (लखनवी) लिक्खाडों को अपने (पर्यायवाची दोष के नाम वाले) ब्लॉग को केवल गंदे कपड़े धोने का घिनौना-घाट बना डाला है...

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  3. अच्छा प्रयास है
    अपनी माटी से जोड़ने के लिये/

    मनीस पाण्डेय
    प्रतापगढ़ , उत्तर प्रदेश

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