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जन्माष्टमी स्पेशल:प्रेमचंद गांधी की कविता ने उपजे नए सवाल

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, अगस्त 10, 2012 | शुक्रवार, अगस्त 10, 2012

(मीरा को लेकर आमजन में चली आ रही परिपाटी की तरह फलती-फूलती परिभाषाओं के विपरीत यहाँ  कुछ नए सवाल उपजती प्रेमचंद बाबू की ये कविता फेसबुक से यहाँ उधार लेकर छाप रहे हैं.-सम्पादक )





हिन्दीजगत के युवा रचनाकारों की जमात में अच्छा खासा नाम रखते हैं.देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं.इनका एक ब्लॉग है . प्रेम का दरिया  साथ ही फेसबुकी विमर्श में पूरी सक्रियता , 'कुरजां' पत्रिका के सम्पादक हैं. मूल रूप से कवि है।अभी तलक एक कविता संग्रह 'इस सिंफनी में' और एक निबंध संग्रह 'संस्कृति का समकाल' प्रकाशित हो चुका है। जानेमाने स्तंभकार, कुरजां जैसी पत्रिका के प्रवेशांक से ही चर्चा में हैं। लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई और राजेन्द्र बोहरा सम्मान  से नवाजे जा चुके हैं। साहित्य के साथ ही सिनेमा में भे लेखनगत रूचि है।


मो 09829190626,










यह कविता मेरी नहीं है, यह मुझसे मीरा ने लिखवाई है।-प्रेमचंद गांधी

क्‍यों कहा मां ने बचपन में कि
मेरा ब्‍याह तुमसे हो चुका है
मैं तुम्‍हारे ही सपने देखती बड़ी हुई मेरे श्‍याम
मेरी हर सांस तुम्‍हें ही पुकारती थी
हर ओर तुम्‍हारी ही मोहिनी मूरत दिखती थी

मैं नादान, मासूम बालिका थी श्‍याम
मुझे क्‍या मालूम था कि तुम्‍हारे नाम का पागलपन
कभी सचमुच ही पगली बना देगा

उन महलों में जहां औरतों का दम घुटता था
मैं तुम्‍हारे स्‍वप्‍नों की छांव में बड़ी हुई श्‍याम
तुम मेरे मुक्तिदाता बन गए थे
मैं सोचती थी इन महलों की कैद से निजात दिलाने
एक दिन जरुर आएगा मेरा श्‍याम
मैं नहीं जानती थी कि मेरा श्‍याम
मुझे अपनी ही कैद में एक दिन जकड़ लेगा
और सदियों तक मुझे बावली बना कर रख देगा

जब एक बार हो ही चुका था मेरा ब्‍याह तुम्‍हारे साथ
तो फिर क्‍यों ब्‍याहा मुझे राणाजी के साथ
क्षत्रियों में तो नहीं थी प्रथा दो पतियों की मेरे श्‍याम
मैं रोती कलपती रही पर किसी ने नहीं सुना मेरा रूदन
तुमने भी तो नहीं सुनी मेरी चीख पुकार मेरे श्‍याम

नहीं मैं कुछ नहीं कहूंगी राणाजी के लिए
वो भले मानस कैसे जानते कि मेरा पहले से ही एक पति है
वो संसारी आदमी कहां समझते तुम्‍हारा और मेरा संबंध
उन्‍हें कहां मालूम था कि
मेरा पति कहीं है
कि मैं उसी की सुहागन हूं

अगर मैं जानती होती कि
तुम्‍हारी हजारों रानियां हैं
असंख्‍य गोपियां तुम्‍हारी दीवानी हैं
तो मैं उनमें से ही एक हो जाती मेरे श्‍याम
वो जिनका कोई नहीं जानता नाम
तुम्‍हारी ही कृपा है मैं उनमें नहीं रही

पर तुम बड़े झूठे हो श्‍याम
मैं पुकारती रही अहोरात्र और तुम
बस अपनी मूरत में ही मुस्‍कुराते रहे
ढीठ कहीं के
तुमने कभी मुझे क्‍यों नहीं पुकारा
क्‍या राधा-रुक्मिणी ने रोक रखा था तुम्‍हें
या गोपियों के साथ रास रचा रहे थे कहीं
जब मैं मंदिर में सिर पीट-पीट कर चिल्‍ला रही थी
तुम्‍हारे ही गीत गा रही थी

सुनो मैं सच कहना चाहती हूं आज
कि मुझे तुमसे सच में गहरा प्रेम था
कि मैं तुम्‍हारी सुहागन बनकर भी खुश थी
और तुम्‍हारी विधवा के रूप में भी

पर सुनो श्‍याम
तुम्‍हारे कारण मेरी जग हंसाई तो हुई जो हुई
तुमने एक स्‍त्री का जीवन क्‍यों नष्‍ट किया श्‍याम
अरे तुमने मुझे एक सामान्‍य लड़की तो क्‍या
आम औरत का जीवन भी नहीं जीने दिया मेरे श्‍याम

सोचो अगर मेरे भी बच्‍चे होते तो क्‍या मैं इतनी पगली होती
तुम्‍हारे जैसा ही एक नटखट श्‍याम मेरे आंगन में भी खेलता
उस पर मैं अपना पूरा प्रेम लुटाती
उसके लिए हरपल चिंतित रहती
सुनो मेरे चंचल-वृत्ति श्‍याम
हर स्‍त्री की कामना होती है
तुम्‍हारे जैसी एक सुंदर संतान की
तुमने मुझे उससे वंचित कर दिया

खैर एक जनम तो तुमने मेरा छीन ही लिया
मुझे इस कदर बदनाम किया कि अब तो लोग
अपनी बेटियों का नाम मीरा रखने से डरते हैं
बस इतनी कृपा करना कि अगले जन्‍म में
मैं एक आम औरत की तरह रह सकूं

कुछ तुम्‍हारे गुण अवगुण भी आ जाएं मुझमें
मैं नहीं चाहती कि तुम्‍हारी तरह मेरे हजारों प्रेमी हों
पर प्रेम की कामना के बीज उगें तो उगने देना मेरे श्‍याम
जब तुम दो के साथ सहज स्‍वीकार्य हो
तो कोई स्‍त्री अन्‍य के प्रेम में ना मारी जाए श्‍याम
तुम्‍हारे जन्‍म दिन पर इतनी कामना तो कर ही सकती हूं
कि एक स्‍त्री को प्रेम का अधिकार दिला दो

तुम यदुवंशी मैं क्षत्राणी
फिर भी अपना प्रेम फला
इस भरतखण्‍ड में तुम्‍हारे युद्धक्षेत्र में
स्त्रियां प्रतिबंधित हैं प्रेम करने के लिए
वहां खाटों पर खांपें खाल खींच रही हैं प्रेमियों की
और तुम अपना जन्‍मदिन मना रहे हो
वाह मेरे श्‍याम वाह
मुबारक हो ऐसा जन्‍मदिन हजार बार।
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