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अपने ढंग से एक सिनेमाई संसार रच रहे हैं अनुराग कश्‍यप, इम्तियाज अली, तिग्‍मांशु धूलिया या दिबाकर बनर्जी जैसे लोग

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, अगस्त 11, 2012 | शनिवार, अगस्त 11, 2012



राम कुमार सिंह  

लेखक,फिल्म निर्माता और पत्रकार साथी,ख़ास तौर पर फिल्म समीक्षाएं करते हैं.उन्हें फेसबुक पर भी यहाँ ट्रेस किया जा सकता है.वर्तमान में राजस्थान पत्रिका से जुड़े हुए हैं.

जयपुर ,राजस्थान
(उनका बाकी लेखन यहाँ पढ़ा जा सकता है. )

गैंग्‍स ऑव वासेपुर 2 देखते हुए यह खयाल भी नहीं आता कि इस पर टिप्‍पणी लिखी जानी चाहिए। बस मुझे उसे देखते हुए मजा आ रहा है। फिल्‍म समीक्षक या उससे भी ज्‍यादा रसिक होते हुए मुझे बहुत बार यह लगता है कि सिनेमा का असली आनंद तो यही है कि एक आदमी उसे बनाता है। दूसरा उसे देखते हुए आनंदित होता है। अपने ढंग से रसानुभूति करता है। यह जो बीच में घुसकर कई विचारधाराएं और जोड़ तोड़ लगाते हुए अपनी अपनी राय फिल्‍मकार को देने लगते हैं, वे घुसपैठिए हैं। मैं भी एक ऐसा ही घुसपैठिया हूं। अपनी बहुत सारी गलतफहमियों और 
ज्ञान के बोझ के साथ। यह ज्ञान भी उन फिल्‍मकारों के लिए ही है, जो अपने ढंग से कोई सिनेमा बना रहा है। ये ज्ञान साजिद खान, सलमान ज्ञान, करण जौहर आदि के लिए नहीं होता। उनके लिए इनके पास एक ही वाक्‍य है, इनके मुंह क्‍या लगना, इनको कोई सिनेमा बनाना थोड़े ही आता है? इस ज्ञान को झेलने के लिए अभिशप्‍त हैं, अनुराग कश्‍यप, इम्तियाज अली, तिग्‍मांशु धूलिया या दिबाकर बनर्जी जैसे लोग, जो अपने ढंग से एक सिनेमाई संसार रच रहे हैं।

सौ करोड़ क्‍लब की घोषणा करते इस मायावी संसार में गैंग्‍स ऑव वासेपुर कह के लेती हैं। मेरे ही बहुत से मित्र इसे मुसलमान विरोधी करार दे रहे हैं। वे इसे अलग किस्‍म की सांप्रदायिक फिल्‍म बता रहे हैं। माफ करें, मुझे वह कहीं से सांप्रदायिक नहीं लगती। मुझे लगता है, ऐसे सारे लोग अपने एक पूर्वाग्रह के सा‍थ अपने घर से भाले बरछी, गोली पिस्‍तौल लेकर चले हैं और यह तय करके आए हैं कि इससे अनुराग कश्‍यप पर हमला करना है। गैंग्‍स ऑव वासेपुर का खात्‍मा करना है। लेकिन यह अब इतना असान नहीं है। जो टिकट लेकर थियेटर में गया है, वह खुश होकर बाहर लौटा है। वहीं से फोन करके अपने दोस्‍त को बताया है कि यार फिल्‍म तुम भी देखना। मुझे तो मजा आ गया।

हमारे समय ने हमें हिंदू और मुसलमान भेद के साथ इतन आतंकित कर दिया है कि हम भीतर ही भीतर उस चक्रव्‍यूह का शिकार हैं जो हमें फंसाने के लिए ही रचा गया है। धर्म निरपेक्षता कोई मजबूरी नहीं है। वह मानव होने की निशानी है। या तो आप आदमी हैं या आप नहीं हैं। बस यही फर्क साम्‍प्रदायिक होने और ना होने में मुझे लगता है। आप सांप्रदायिक हैं तो आप आदमी नहीं हैं भेडि़ए हैं। मौका पाकर शिकार करेंगे। हमारी भीतरी चुनौती बेहद खतरनाक है। इसलिए मेहरबानी करके वासेपुर को कोई सांप्रदायिक मुलम्‍मा चढ़ाने की कोशिश मत करिए। जहां तक मुझे जानकारी है, वासेपुर में आरएसएस का पैसा नहीं लगा है। यह वासेपुर के आसपास के दो स‍त्‍ता केंद्रों के आपसी संघर्ष और बदले की कहानी है। मैं इसे हिंदू और मुसलमान की कहानी समझकर नहीं देखता। कहानी भी वहीं के लेखक जीशान कादरी की है। जाहिर है उसकी प्रामाणिकता की अधिक जिम्‍मेदारी उनकी भी है।

गैंग्‍स ऑव वासेपुर देखना एक आनंददायी सिनेमाई अनुभव है। बदला कभी खत्‍म नहीं होता। फिल्‍म की शुरुआत वहीं से है, जहां यह छूटी थी। पूरा परिवार एक साथ खाना खा रहा है। जब सब लोग अपनी अपनी थाली में और खाए जा रहे हैं तो उनकी मां कहती है, तुम लोगों को खाना पचता कैसे है रे। (रिचा चड्ढा ने कमाल का अभिनय किया है दोनों फिल्‍मों में।) गौर करिए फिल्‍म खत्‍म ऐसे ही मोड़ पर होती है, जो आपको परेशान करके रखता है। सब कुछ खत्‍म होने के बाद भी आपको लगता है, आप वहीं खड़े हैं। क्‍या हुआ जो फैजल का परिवार वासेपुर छोड़कर मुंबई आ गया।

यह बात फैजल जानता है। वह लगभग जब बदला लेने के आखिरी पड़ाव पर है उस समय रोने लगता है कि उसे अपने अब्‍बू के धंधे में नहीं आना था लेकिन वह पता नहीं कैसे आ गया? वह सब छोड़ना चाहता है लेकिन छोड़ नहीं पाता और उसका यह पछतावा जब पिघलकर आंखों से निकलता है तो वह उससे ठीक अगले दृश्‍यों को और ताकतवर कर देता है, जब रामाधीर सिंह के हाथ में‍ पिस्‍तौल है। फैजल लगभग सारी बाधाएं पार करते हुए रामाधीर के सामने गन लेकर खड़ा है। रामाधीर के हाथ कांपते हैं। वह गोली नहीं चला सकता। वह घुटने टेकता है। वह यूरोपीय शैली में बने टॉयलेट के कमोड पर बैठ जाता है निढाल। फैजल के पास पर्याप्‍त समय है, उसकी आंखों में आंखें डालकर बिना कुछ कहे, यह कहना कि अगर तुमने नफरत की फसल बोयी है, तुमने यदि मेरे अपनों की हत्‍या की है, तुमने मेरे घर में आग लगाई है तो हाथ तुम्‍हारे भी जलेंगे। तुम पूरे जलोगे। यह देखो, तुम्‍हारी कह के ले रहा हूं। धांय, धांय, धांय। दरअसल यहां तिग्‍मांशु धूलिया और नवाजुद्दीन सिद्दकी ने वो जादू पैदा किया है जिसके लिए बड़े से बड़े अभिनेता तरस जाएंगे। तिगमांशु तो सचमुच अभिनेता के रूप में इस फिल्‍म के जरिए बॉलीवुड के लिए बड़ी खोज है।

फिल्‍म क‍था के स्‍तर पर ही नहीं, तकनीकी तौर पर भी सचमुच चौंकाती है। डीओपी राजीव रवि कमाल करते हैं। अनुराग ने पूरी संपूर्णता के साथ दृश्‍यों को रचा है। चारों लेखकों ने पटकथा को रचा है और बिना किसी दबाव के उसे क्रियान्वित किया है। पीयूष मिश्रा को हम पहले से जानते रहे हैं लेकिन वरुण ग्रोवर और स्‍नेहा खनवलकर की गीत संगीत की जुगलबंदी सचमुच अलग उम्‍मीदें जगाने वाली हैं।

अकसर अनुराग यह कहते हैं कि वे अपने किस्‍म की फिल्‍में बना रहे हैं जिसका लोगों ने यह अर्थ निकाला कि वे सिनेमा को बदल रहे हैं। दरअसल वो उन सब लोगों को हौसला देते हैं, जो अपने ढंग से फिल्‍में बनाना चाहते हैं और वे राउडी राठौड़ों, सिंघमों, बॉडीगार्ड (ओं) और टाइगरों के सामने सीना तानकर खड़े हैं। गैंग्‍स ऑव वासेपुर उसी श्रेणी की फिल्‍म है, निर्देशकीय आजादी को सुपर सितारों के चंगुल से बाहर निकालती है। एक गुणवत्‍ताहीन, नैतिकताविहीन, गैर जिम्‍मेदाराना आर्थिक लालच को चुनौती देती है।
मुझे एक लोककथा याद आती है।

एक धर्मपरायण गांव में एक नई बहू को रात को पेशाब लगी। उसे अंधेरे से डर लगा तो उसने घर के चौक में बनी यज्ञवेदी में पेशाब कर दिया। सुबह यज्ञवेदी से सोने की ईंट निकल आई। घर के मुखिया ने सबसे पूछा तो राज खुल गया। मुखिया ने कहा, अनजाने में गुनाह हो गया, कोई बात नहीं लेकिन इसका पता नहीं चलना चाहिए। फिर भी लोगों को पता चल ही गया। पूरे गांव के लोगों ने अपनी बहूओं को यज्ञवेदी में पेशाब करने के लिए बाध्‍य किया और सोने की ईंट निकालने लगे। गांव के लोग अमीर हो गए और अराजक भी। एक संयमी ब्राह्मण ने अपने परिवार को हिदायत दी थी कि जो सब कर रहे हैं वो हम नहीं करेंगे। उसकी पत्‍नी ने कहा, जब सब अमीर हो गए हैं तो तुम क्‍यों यह दारिद्रय ओढे हो?ब्राह्मण ने कहा, अगर हम भी यही करने लगे तो यह गांव बचेगा नहीं। लेकिन परिवार का दबाव था। अंतत: ब्राह्मण ने अपनी पत्‍नी से कहा, एक बार तुम यज्ञवेदी में पेशाब कर सकती हो लेकिन हम यह गांव छोड़ देंगे। यह तब रहने लायक बचेगा नहीं। ब्राह्मण की पत्‍नी ने यज्ञवेदी में पेशाब कर दिया। सुबह सोने की ईंट तो निकल आई लेकिन ब्राह्मण ने गांव छोड़ दिया। अगले दिन से पूरे गांव में सोने की ईंट निकलना बंद हो गई। लोगों ने अपनी बहूओं को पीट पीटकर यज्ञवेदी में पेशाब करवाया लेकिन ईंट नहीं निकली। उस गांव की आगे की दुर्दशा का अनुमान आप खुद लगा सकते हैं।

मुझे लगता है बॉलीवुड में कुछ फिल्‍मकार अब भी बॉक्‍स आफिस पर दारिद्रय के बावजूद यज्ञवेदी में मूतने के लालच से बचे हैं। अनुराग कश्‍यप उनमें सबसे आगे हैं। ये सब भी वैसा ही करने लगेंगे जैसे पूरा बॉलीवुड गांव करने लगा है तो उस गांव का पतन निश्चित है। वे अब भी अंधेरे से ना डरते हुए सिनेमा के दीये को सौ करोड़ के तूफानी लालच से बचाए आगे चल रहे हैं। मैं उनके साथ हूं। मुझे जिस किस्‍म का सिनेमा पसंद आता है। जो मेरी भूख शांत करता है, वो ये लोग बना रहे हैं। इसलिए मुझे भी लगता है कि यज्ञवेदी में मूतकर सोने की ईंट नहीं निकालनी चाहिए।आप सबको भी बिना अफवाहों पर ध्‍यान दिए थियेटर में जाकर गैंग्‍स ऑव वासेपुर देखनी चाहिए। 
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