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डॉ. मंजरी शुक्ल की कहानी 'नियति'

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अगस्त 14, 2012 | मंगलवार, अगस्त 14, 2012



डॉमंजरी शुक्ल
(अंगरेजी में स्नातकोत्तर, लेखन-पठन में रूचिहै। 
आकाशवाणी में उदघोषक हैं। 
पत्र-पत्रिकाओं एवं समाचारपत्रों  में कविताएँ एवं कहानियां प्रकाशित हुई।
दूरदर्शन मे बच्चो के कार्यक्रम एवं गीत लेखन किया है।
पता--३०१जेमिनी रेसीडेंसी, राधिका काम्प्लेक्स के पास, मेडिकल रोड, गोरखपुर, .प्र.-२७३००६,मो.-9616797138

हरे और नीले निशान मानो मेरी माँ को सुहाग की निशानी के रूप में विवाह पर ही बतौर   तोहफा मिल गए थेपिताजी का घर आने जाने का कोई समय नहीं था I पर जब हम सो कर उठते तो माँ की कलाइयों में टूटी चूड़ियो के घाव देखकर समझ जाते की रात में पिताजी आये थेबचपन में  मेरा खड़े खड़े ही पेंट गीली कर देना इस बात का गवाह था कि मैं उनसे कितना थर्राता था I

 लुका - छिपी के खेल में मुझे कभी कोई नहीं हरा पाया ,इसका श्रेय भी मैं  पूरी निष्ठा से अपने पिताजी को ही देना चाहूँगा ,क्योकि  जब भी वे घर में आते तो चोरो की तरह धीरे से घुसते ताकि उनके आने का किसी को पता नहीं चल पाए और जो भी गाना गाते या रेडिओ सुनता मिल जाए वो लातें - घूँसे  खाने के लिए तैयार हो जाए I
पर शूरुआत में मैं बहुत ही नासमझ था और ये सोचता था कि मेरा पिटना एक इत्तफाक हैं पर जब यह सिलसिला पूजा पाठ की तरह मेरी  दिनचर्या में शामिल हो गया तो मैं समझ गया कि मुझे उनकी  आहट पहचाननी होगी I और मैं धीरे-धीरे इसका इतना अभ्यस्त हो गया कि मुझे इस खेल में मजा आने लगा और पिताजी के साथ-साथ मैं पूरे मोहल्ले के पैरो की आवाज़ जानने लगा  कुछ  दिनों बाद  तो  मैंने  इतनी  महारथ   हासिल  कर  ली थी कि  बिल्ली  को  दूध पीने से      पहले भी  हजार  बार  सोचना  पड़ता  था  कि  कही  मैं    पहुच  जाऊं  और उसकी धुनाई कर दूँ I मुझे अपनी माँ कि हालत पर बहुत तरस आता थापर मेरी माँ अपनी ही दुनिया जीती थी और मनुस्मृति का नियमित अध्यन करती थी जिसमे पति को देव तुल्य बताया है और पति  के गंदे पैरों  को धोकर पीने से मोक्ष की प्राप्ति होती हैं I     

खैर,माँ की पूर्ण निष्ठा और समर्पण  भी पिताजी के व्यव्हार को नहीं बदल पाया I अगर कुछ बदला तो हमारी उम्र जो पल-पल बढ़ती  रही और किसी को एहसास भी नहीं हुआ I पता चलता भी कैसे ,पिताजी अपना वर्चस्व कायम करने की उधेड़बुन में बुत बने रहे ,माँ अपने जीर्ण शीर्ण बीमार शरीर को किसी तरह चलाती रही और मैं एक डरपोक बालक से एक कायर पति बन गयाजब मेरी बीवी यानी शांति ने घर में कदम रखा तो वह पहली नजर में ही ताड़  गई कि मेरे घर में कितना दमघोंटू   वातावरण हैनाम तो उसका शांति  था पर शांति को अशांति के द्वारा कैसे लाया जा सकता है ,ये वो बखूबी जानती थी I  थी तो वह घरेलू और संस्कारी लड़की,पर माँ कि तरह अन्याय बर्दाश्त  करना उसके बस के बाहर था I

दो-तीन दिन तक तो वह नई  नवेली दुल्हन का नकाब ओढ़े रही  पर चौथे दिन से ही उसने घर कि सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली I मुझे अच्छी तरह याद हैं कि जब गर्म चाय  की प्याली उसने माँ के काँपते हाथो में पकड़ाई थी तो उस कप को देखकर माँ कितनी देर फूट -फूटकर रोई थीआज उनके पूरे जीवन में ऐसा पहली  बार हुआ था कि किसी ने उनको इतने सम्मान के साथ बैठाकर एक प्याली चाय की पकड़ाई हो मेरा  तो  यह  हाल  था   कि  जब  भी  मैं  माँ की कुछ मदद करने जाता तो पिताजी की मेहनत मेरी पीठ पर हो जाती और मैं रोता हुआ भाग   जाता I  

माँ को चाय देने के बाद शांति  पिताजी को चाय देने गई I बस यही बात पिताजी के अहम् को चोट पहुँचाने के लिए काफी थीकप लेकर उन्होंने शांति के मुहँ पर फेंक   दिया I 

गर्म चाय से उसका मुहँ झुलस गया और वह दर्द से चीख  उठी I  क्रोध में भरकर उसने पिताजी की ओर आग्नेय नेत्रों से देखा और बिफरी  शेरनी सी उसी हालत मैं नंगे पैर घर से बाहर निकल गईमैं पागल जैसा नज़रे नीची करके कप के टूटे हुए टुकड़े बिनने लगा I  डर के मारे मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था कि कही शांति के वापस आने पर उसे पिताजी कही घर से ही निकल दे Iक्या बचपन का खौफ इतना भयानक हो सकता हैं कि शरीर तो बढ़ता हैं पर साथ   का डर हजारों गुना I नहीं तो आज मुझ  जैसा जवान और हट्टा-कट्टा आदमी अपने अधेड़ पिता के सामने पत्ते सा काँप रहा हैं I............ 

तभी पिताजी गरजे  -"आज ही उसको उसके मायके छोड़कर    नहीं तो तेरी खैर नहीं हैं I  
"खैर तो अब आपकी नहीं हैं I " एक रोबदार आवाज़ गूंजी 

मैंने और बाबूजी ने पीछे मुड़कर  देखा तो शांति पुलिस इंस्पेक्टर और सिपाहियों के साथ खड़ी पिताजी को खा जाने वाली नजरों से घूर रही थी I  पिताजी के माथें   पर डर के कारण पसीना गया ,और उन्होंने गिरने से बचने के लिए मेरी बाहँ  थाम ली Iपता नहीं क्यों पिताजी को डर से काँपते देखकर मन को बहुत सुकून आयामुझे लगा जैसे बरसों से बहते हुए माँ के आँसूं उसने अनजाने में ही पोंछ दिए I तभी इंस्पेक्टर पिताजी के पास आकर बोला-"चलिए,थाने चलिए मेरे साथ,आप की बहु ने आप पर उसको प्रताड़ित करने और जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया हैं I  पिताजी की तो जैसे सांप सूंघ  गया था,वह घबराहट में ये भी भूल गए कि उन्होंने शांति से एक शब्द भी नहीं  कहा था यंत्रवत उसके पीछे जाने लगे I

 तभी माँ शांति के पैरो पर गिर पड़ीहडबडाकर शांति ने माँ  को उठाया और गले से लगा लिया I फिर वह इंस्पेक्टर से बड़े ही सधे शब्दों में बोली-" सरमैं अपनी रिपोर्ट वापस लेती हूँ I और अगर आगे कभी ऐसा हुआ तो मैं सीधा कोर्ट में जाऊँगी I बाबूजी की हालत  तो पुलिस को देखकर ही ख़राब हो गई थी ,कोर्ट का नाम सुनते ही डर के मारे कुर्सी पर बैठ गए 

इंस्पेक्टर भी शरीफ था ,परिस्थिति समझ कर वहां से शांतिपूर्वक चला गया I
  
और दूसरे दिन से हमारे घर की  काया पलट हो गई I माँ की मनुस्मृति पिताजी ने आत्मसात कर ली और वे माँ का पूरा ध्यान रखने लगे I. और सालों  बाद मैंने यह जाना की अन्याय के विरोध में एक बार तो खड़ा जरूर होना चाहिए शायद आप न्याय आसानी से पा ले I.......
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