आजादी के अधूरे व अपूर्ण होने का अहसास भी लोगों के दिलों में गहराया है। - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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आजादी के अधूरे व अपूर्ण होने का अहसास भी लोगों के दिलों में गहराया है।

 पन्द्रह अगस्त पर विशेष लेख

आलेख  By:-कौशल किशोर

छायाचित्र चितौड़ के युवा छायाकार रमेश टेलर से साभार 
आज देश अपनी आजादी की पैंसठवीं वर्षगांठ मना रहा है। ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां आजादी के बाद से प्रगति व विकास हुआ है। भारतीय उपमहाद्वीप में हम एक क्षेत्रीय महाशक्ति बनकर उभरे हैं। दुनिया की एक बड़ी आर्थिक शक्ति बनने का हम दावा करते हैं। समाज में ऐसे लोगों की अच्छी खासी आबादी उभरी है, जहां सम्पन्नता आई है। हम ‘गर्व’ कर सकते हैं कि दुनिया के सर्वाधिक धनाढ़य लोगों में भारतीय भी शामिल हैं। हमारी संसद अरबपतियों से रौशन है। 

लेकिन इसके बावजूद क्या इस सच्चाई से इनकार किया जा सकता है कि आजादी के अधूरे व अपूर्ण होने का अहसास भी लोगों के दिलों में गहराया है। भूख, गरीबी, महंगाई, दुख, नाइंसाफी व मुसीबतों के पहाड़ के नीचे दबकर बहुसंख्यक आबादी के अन्दर जो दर्द व कराह है, उससे आजादी का सारा अहसास  ही उसके अन्दर से हवा हो गया है। जिन प्रतिनिधियों को  जनता ने बड़ी उम्मीद से चुना, उन्हें देश चलाने की जिम्मेदार दी, यह उनके लिए देश लूटने का ‘सर्टिफिकेट’ साबित हुआ। वे जनता के सेवक तो नहीं बन पाये, बेशक वे बड़ी और कॉरपोरेट पूँजी के सेवक जरूर बन गये। जनता मतदान करती रही। वह सरकारें बदलती रही। पर अपनी जिन्दगी में गहराते अंधेरे को नहीं बदल पाई। आखिरकार वह किस पर यकीन करे ? बार बार इन पैंसठ सालों में ऐसे ही चौराहे पर उसने अपने को खड़ा पाया है। फिर भी, जब भी, जिससे भी थोड़ी सी उम्मीद दिखी, उसे अपना नायक मान वह निकल पड़ी उसके साथ।

ऐसे ही नाउम्मीदी भरे दौर में जब पिछले साल अन्ना हजारे की ओर से भ्रष्टाचार के विरुद्ध रामलीला मैदान में अनशन शुरू हुआ, ‘वंदेमातरम्’, ‘भारत माता की जय’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान पर अन्ना ने तिरंगा लहराया तो इंडिया गेट से लेकर सारे देश में तिरंगा लहरा उठा और लगा कि 1942 के अगस्त का इतिहास अपने को दोहरा रहा है।  इसे अगस्त क्रान्ति व दूसरी आजादी की जंग कहा गया। पर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि देश की जनता आंदोलनों के द्वारा भी ठगी गई है। चाहे जेपी का 1974 का आंदोलन हो या आज का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। उसने संपूर्ण क्रान्ति के ‘क्रान्तिरथियों’ को पतित होते देखा है। ये सत्ता  की राजनीतिक पार्टिर्यों में बदल गई। उसके अर्थतंत्र का हिस्सा बनकर रह गई। वहीं, अन्ना हजारे का ‘व्यवस्था परिवर्तन’ व ‘वैकल्पिक राजनीति’ के नाम पर आंदोलन से पीछे हटना जनता की आशा के लिए गहरा धक्का है। लेकिन एक बात साफ है कि तमाम उतार.चढ़ाव व आशा.निराशा के बीच देश की जनता के अन्दर यह बात गहरे बैठती गई है कि पन्द्रह अगस्त को जो आजादी मिली वह अधूरी व अपूर्ण है तथा समय के साथ उसके अन्दर सच्ची आजादी की आकांक्षा लगातार प्रबल होती गई है।

वैसे तो देश के आजाद होने के समय भी इस आजादी को लेकर सवाल थे और उस वक्त ही आजादी के चरित्र तथा यह आजादी किसके हित में है जैसे विषय पर विचार आने लगे थे। इस तरह के विचारों व भावों को उस दौर में प्रगतिशील कवियों ने यूँ व्यक्त किया था - ‘कौन आजाद हुआ, किसके माथे से गुलामी की सियाही छूटी’। अर्थात देश के आजाद होते ही आजादी के अधूरेपन का अहसास महसूस किया जाने लगा था। हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान संघर्ष के रास्ते, आजाद भारत के मॉडल तथा उसके स्वरूप को लेकर मत वैभिन्न था और इस संघर्ष में कई घाराएँ क्रियाशील थीं। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों - गांधी, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, डॉ अम्बेडकर आदि के बीच गहरे मतभेद थे। इसके बावजूद उनकी समझ व दृष्टि साफ थी।  भगत सिंह के लिए आजादी का तात्पर्य ‘गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों’ के हाथों में सŸाा का हस्तांतरण नहीं था बल्कि मजदूरों व किसानों के हाथों में वास्तविक सŸाा का होना था। मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकार में हमें इन्हीं विचारों का दर्शन होता है जब वे कहते हैं कि ‘जॉन की जगह गोविन्द’ का शासन की कुर्सी पर बैठ जाना आजादी नहीं है। वे आजाद भारत को किसानों.काश्तकारों के राज में देख रहे थे। 

डॉ0 अम्बेडकर गैर बराबरी पर आधारित सामाजिक ढ़ांचे के विरुद्ध थे। उन्होंने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के समक्ष कहा था कि भारतीय गणतंत्र के रूप में 26 जनवरी 1950 को हम अंतरविरोधों से भरपूर जिन्दगी में प्रवेश कर रहे हैं जहां हमारे पास राजनीतिक  समानता व स्वतंत्रता होगी, वहीं आर्थिक व सामाजिक जीवन में यह हमारे लिए दुर्लभ रहेगा। डॉ0 अम्बेडकर की ये शंकाएं निर्मूल नहीं थीं। आर्थिक व सामाजिक जीवन की कौन कहे, राजनीतिक समानता व स्वतंत्रता भी आजाद भारत में क्षतिग्रस्त होती रही है। गाँधीजी से जब पूछा गया था कि आपके सपनों का भारत कैसा होगा तो उन्होंने कहा कि स्वराज्य को प्रत्येक गरीब की कुटिया तक पहुँचाना हम सबका काम होगा और मेरे सपनों का भारत ऐसा होगा जिसमें हर आदमी यह महसूस कर सके कि यह देश उसका है, उसके निर्माण में उसकी आवाज का महत्व है। 

हमारी आजादी के नायकों में चाहे जितने मतभ्ेाद हों पर उन्होंने ऐसे आजाद भारत के बारे में कभी नहीं कल्पना की होगी कि जहां आवाज किसी की गूँजे तो वह दबंगों, धनपशुओं, राजनीतिक सौदागरों और अपराधियों की हो। हमारे शासकों ने जिन नीतियों पर अमल किया है, उनसे अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने जब देश गुलाम था तब लिखा था ‘स्वानों को मिलता दूध.भात/ भूखे बालक अकुलाते हैं/ मां की हड्डी से चिपक ठिठुर/जाड़े की रात बिताते हैं।’ पर यह आज भी हकीकत है। ऐसी व्यवस्था है जहाँ साम्प्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कॉरपोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी, बाहुबली व माफिया सŸाा की शोभा बढ़ा रहे हैं, सम्मानित हो रहे हैं, देशभक्ति का तमगा पा रहे हैं, वहीं इनका विरोध करने वाले, सर उठाकर चलने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है, उनके लिए उम्रकैद है, जेल की काल कोठरी है। हम यह कहते हुए नहीं थकते कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यह किसानों का देश है। पर हमारे अन्नदाता की क्या हालत है ? उदारवादी नीतियों के पिछले दो दशक में ढ़ाई लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है।

हमारी आजादी देश के बंटवारे की त्रासदी लेकर आई थी। पैंसठ साल बाद भी उसके घाव आज तक नहीं भरे हैं। उस दर्द की टीस अब भी बनी है। वहीं, उदारवादी नीतियों ने पिछले दो दशकों के दौरान देश का एक और विभाजन कर डाला है - इंडिया बनाम भारत। ऐसा ‘इंडिया’ जो सामं्राज्यवादी नीतियों का अनुगामी है। देश का अमेरिकीकरण किया जा रहा है। यह ‘इंडिया’ पश्चिम के मूल्यों, संस्कृति, जीवनशैली के अंधानुकरण में लगा है। हमारी नौजवान पीढ़ी को तैयार किया जा रहा है कि वे अमेरिका व पश्चिमी देशों में ही अपना भविष्य तलाशें। दूसरी तरफ शोषित.पीड़ित.गरीब.दलित ‘भारत’ है जिसे जल, जंगल, जमीन और उसकी श्रम संपदा से लगातार बेदखल किया जा रहा है। इन पैंसठ सालों में उसके तकलीफों व अभावों की गठरी भारी होती गई है। सŸाा और सम्पति से बेदखल गरीबों का कोई पुरसाहाल नहीं है। क्या देश के इन भारतवासियों के लिए आजादी का कोई मायने बचा है ? तभी तो अदम गोण्डवी जैसे कवि को यह कहना पड़ा है:

‘‘आजादी का जश्न मनाये वो कैसे
जो आ गये फुटपाथ पर घर की तलाश में
अब एक ही चारा है बगावत
कह रहा हूँ मैं पूरे होशो हवास में।’’ 


जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,
लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,
राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017 है.
मो-09807519227

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