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''मेरी राजस्थान यात्रा ''-अशोक जमनानी

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, अगस्त 18, 2012 | शनिवार, अगस्त 18, 2012

(अशोक बाबू का अगला उपन्यास  अपनी छपाई के  अंतिम दौर में है। उसी को लेकर उनकी हाल की राजस्थान के जैसलमेर,बाड़मेर और जोधपुर की यात्रा के संस्मरण यहाँ साझा कर रहे हैं। ये छिटपुट विचार है। असल बात उनके उपन्यास में नज़र आयेगी जहां उनका नायक खुद मांगनियार है। उनकी ये लेखन यात्रा वैसे उनकी वेबसाईट पर भी जारी है।-माणिक )

पोकरण 




पश्चिमी राजस्थान की यात्रा के आरम्भ में मैंने सोचा था कि पहला पड़ाव राम देवरा होगा लेकिन रुणीचा रा पीर के पुराने दर से पहले नए दर तक कैसे पहुँचता इसीलिए पोकरण में कुछ समय प्राचीन महल में बिताया तो श्रद्धा के साथ-साथ महल का कलात्मक सौंदर्य भी मुझे रुकने के लिए विवश करता रहा . वैसे बार-बार यह भी सोचता रहा कि पोकरण को अधिकांश देश वासी परमाणु परीक्षण   स्थल के रूप में जानते हैं लेकिन इस जगह का रिश्ता श्रद्धा से भी है और संस्कृति से भी. न जाने क्यों ये बात छुपी ही रह गयी ..... क्या सरकारें  श्रद्धा और संस्कृति के प्रसारित होने से डरती हैं ????????????




पोकरण से चले तो रामदेवरा जाने वाले रास्ते में लोगों की भीड़ तो थी ही मगर मंदिर से मीलों पहले  सड़क के किनारे श्रद्धालुओं के छोड़े हुए जूतें-चप्पल बरबस ही ध्यान आकर्षित कर रहे थे तपता हुआ सूरज सर पर था और मैं उन लोगों को देख कर आश्चर्य चकित था जो अपने जूतें-चप्पल उतारकर नंगे पाँव रामदेवरा की ओर बढ़ रहे थे अधिकांश लोग जूतों को राह में छोड़ना शुभ समझते हैं  . मैंने उनकी तपस्विनी श्रद्धा को प्रणाम किया और  उनके प्रति मेरी श्रद्धा तब और बढ़ गयी जब मुझे कुछ दूर नंगे पाँव चलना पड़ा . ज़मीन इतनी गर्म थी की दो कदम चलना भी मुश्किल था ऐसे में  जो लोग मीलों नंगे पाँव आये होंगे उनका समर्पण तो स्तुत्य ही था . लेकिन रामदेवरा पहुँच कर उन्ही लोगों का एक भिन्न रूप भी देखा जो लोग चप्पलें रास्ते में नहीं उतार पाए थे वो मंदिर के  सामने ही अपने जूते- चप्पल छोड़ कर जा रहे थे और उन्ही जूतों के साथ रामदेव पीर की तस्वीरें और उनकी पागलियाँ अंकित ध्वजाएं रास्ते और मंदिर प्रांगण में पड़ी हुई थी .

कुछ देर पहले जो ध्वजाएं भक्त जमीन पर भी नहीं रख सकते थे वो अब जूतों के साथ थी . भक्त और मंदिर प्रशासन दोनों के लिए जूतों और रामदेवरा की तस्वीरों का साथ होना बहुत सहज था. भक्तो के लिए जूतें छोड़ना महत्वपूर्ण था और मंदिर प्रशासन के लिए अतिरिक्त ध्वजाएं और तस्वीरें फिकवाना महत्वपूर्ण था. दोनों एक ही जगह फेंकी जा रही थी और मैं सोच रहा था कि जिस समाज को श्रद्धा इतना ऊँचा उठाती है उसी समाज को अविवेक कितना नीचे गिरा देता है . फिर हम तो हिन्दुस्तानी हैं हमें श्रद्धा आकर्षित नहीं करती वरन अंधश्रद्धा ही हमारा पाथेय है और हमने पाखंड को ही धर्म मान लिया है शायद इसीलिए हम जिसकी पूजा करते हैं उन्हें जूतें-चप्पलों के साथ रखते हुए हम ज़रा भी विचलित नहीं होते .

रामदेवरा  










राजस्थान के लोक देवताओं में रामदेव जी का नाम अग्रगण्य है . वो हिन्दुओ के लिए अवतार हैं तो मुसलमानों के पीर भी हैं . भादों माह में लगने वाले रामदेवरा के मेले में पूरे देश से लोग आते हैं और श्रद्धा का आलम ये है की आने वालों में अधिसंख्य पैदल ही आते हैं. जोधपुर के बाद तो २०० किलोमीटर की दूरी में शायद ही कोई स्थान ऐसा होगा जहां इस महीने में रामदेवरा जाने वाले पद यात्रियों का समूह दिखायी न दे . इस मंदिर में श्रद्धा का जो वातावरण था उसने मुझे बहुत प्रभावित किया . मंदिर के नगारची ने मुझे नगारा बजाने का आमंत्रण दिया तो मैं खुद को रोक नहीं पाया और मुझे लगा कि शायद रामसा पीर का आशीर्वाद मुझे मिल गया आखिर  मेरे राजस्थान आने का उद्देश्य यहाँ के संगीत और संगीतकारों की कहानी ही तो था . समय होता तो एक पूरा दिन वहां बिताता लेकिन मुझे आगे बढ़ना पड़ा क्योंकि कहानी को आगे बढ़ाना था .




सनावड़ा

सनावड़ा वैसे तो पश्चिमी राजस्थान का एक आम गाँव ही है लेकिन इसकी एक खासियत है यहाँ मौजूद राजस्थानी लोक कलाकार - मांगनियारों के लगभग ४५ परिवार. किसी एक ही गाँव में सैकड़ो कलाकार एक साथ रहते हैं ये कल्पना भी दुर्लभ लगती है लेकिन सनावड़ा आइये यहाँ के ४५ परिवारों का हर शख्स कलाकार है - महिलाएं और बच्चे भी . मैं सनावड़ा पहुंचा तो पहली मुलाकात बच्चों से ही हुई पर तब एक अजनबी से मिलने का संकोच उनमे था. आगे बढ़ा तो झूला झूलती लड़कियां मिल गयीं बहुत दिनों बाद दिखाई दिए इस दृश्य ने रूह को बहुत सुकून पहुँचाया . गाँव के बारे में कल लिखूंगा हाँ वहां से विदा होने तक सारे  बच्चों से मेरी दोस्ती हो चुकी थी ढलते सूरज की मद्धम रौशनी में वो मेरे साथ फोटो खिंचवाने में जैसा उत्साह दिखा रहे थे उसने मेरे भीतर ढेर सारा उजाला भर दिया  आते वक़्त उन्होंने पुछा ' फिर कब आओगे' मैंने कोई जवाब नहीं दिया . कैसे बताता कि यहाँ मुझे  कहानी लिखने का मेरा स्वार्थ लाया है कहानी पूरी होने के बाद शायद यहाँ फिर न आ पाऊँ मैं शायद वहां दोबारा जा नहीं पाउँगा  लेकिन इस  बात का पूरा भरोसा है की  उनके  इस निश्छल स्नेह को मैं याद रखूँगा ............... जीवन भर .






जिस गाँव में सैकड़ो कलाकार रहते हो वहां किसी अन्जान  अतिथि के प्रति भी आत्मीय व्यवहार देखने को मिले तो बहुत आश्चर्य चकित नहीं होना चाहिए . संगीत में इतनी सामर्थ्य तो शेष है कि तेजी से बदलते दौर में भी भारतीय मूल्यों को भारतीय जन-जन के मन में संजोकर रख सके . सनावड़ा में मुझे अपेक्षा से अधिक स्नेह मिल रहा था . गाँव के कच्चे घर जिन्हें झूपा कहते हैं मुझे बहुत आकर्षित कर रहे थे मैंने बहुत संकोच के साथ वहां कुछ वक़्त बिताने की अनुमति मांगी तो बहुत प्रसन्नता के साथ उन्होंने झूपा मेरे लिए खाली कर दिया . मिट्टी की दीवारें और मिट्टी के चूल्हे के साथ मिट्टी की खुशुबू भी मुझे वहां रुकने के लिए विवश कर रही थी लेकिन मैं जल्दी ही वहां से आगे चल पड़ा .

कच्चे घरों के साथ-साथ गाँव में पक्के घर भी बहुत थे एक घर के बाहर कुछ महिलाएं गीत गा रही थीं उनके स्वर में जो करूणा थी उसने मुझे वहां रुकने के लिए विवश कर दिया वो घर किसी मांगनियार का ही था और गीत गा रही महिलाएं भी मांगनियार ही थीं जो दिल को छू लेने वाली एक परंपरा का निर्वाह कर रहीं थीं . विवाह के बाद बेटी जब घर आती है और लौटकर ससुराल जाती है तो घर और आस-पड़ोस  की महिलाएं उसके जाने के बाद घर के आँगन में बैठकर गीत गाती हैं कुरजां ,अरणी जैसे कई गीत हैं जो इस अवसर पर गाये जाते हैं ये लोक गीतों का मंचीय प्रदर्शन नहीं था ये लोक गीतों  का मूल स्वरुप था इसलिए मैं बहुत देर तक वो गीत सुनता रहा गाने वाली महिलाओं के चेहरे ढंके हुए थे पर उनके स्वर में जो करूणा थी जो पीर थी उस पीर उस करूणा का अदृश्य चेहरा  किसी को भी द्रवित कर सकता था . उन्होंने एक गीत गाया ..............
                             

बाबेजी री कुरजों उड़ जासी 






                             म्हरो वहतोड़ो बाद्लियो बरस जासी 
                             आज म्हारी धीयल बाई सासरिये जासे 
                            म्हरो वहतोड़ो  बाद्लियो बरस जासी 


बेटी को ससुराल जाना है कुरजों को उड़ जाना है और  रुके हुए बादल को बरस जाना है ये बादल और कुछ नहीं आँखों में रुके हुए आंसू ही तो हैं
                       
घूंघट के पीछे उनके आंसू आँखों में थे या फिर वो बादल बरस गए थे ये तो मैं जान नहीं पाया पर उनके स्वर मैं बसी हुई पीड़ा मेरी आँखों से बरसने को आतुर हुई तो मैं वहां से चल पड़ा मैं उन बादलों को बाहर बरसने नहीं देना चाहता था मैं चाहता था की वो भीतर बरस जाएँ ताकि संवेदना की नमी बनी रहे मुझमे भी और मेरी कहानी में  भी .................




मेरे नए उपन्यास का नायक मांगनियार है . इसीलिए उनके जीवन को करीब से देखने-समझने के लिए मैं राजस्थान गया था .लोक-गीत देश के हर हिस्से में गए जाते हैं लेकिन मांगनियार एक ऐसी जाति है जो लोक-गीतों का पर्याय बन चुकी है . संगीत इनके जीवन का आधार है . ये कलाकार मंचों पर तो कुछ ही समय से प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन संगीत से इनका रिश्ता सदियों पुराना है . अपने राजपूत यजमानों के यहाँ ख़ुशी के अवसर पर गीत गाना ही इनका पेशा है.  जब धर्म के नाम पर अलगाव का आलम हो तब ऐसे लोगों के बीच होना कितना सुकून पहुंचता है जो हमारी गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक हों . मांगनियार इस्लाम को मानते हैं लेकिन किसी भी राजपूत के यहाँ ख़ुशी का कोई अवसर हो तो इनकी उपस्थिति अनिवार्य होती है जिन रस्मों में केवल परिवार के लोग होते है ये वहां भी मौजूद रहते हैं. और जब कभी इनके यहाँ ख़ुशी या गम का कोई मौका हो तो इनकी सारी जरूरतें हिन्दू राजपूत पूरी करते हैं .

परस्पर रिश्ते का आलम ये है कि किसी हिन्दू यजमान के यहाँ किसी की मृत्यु हो जाये तो मुस्लिम मांगनियार के यहाँ शोक मनाया जाता है और इस दौरान वे रंगीन साफे के स्थान पर सफेद साफा बंधते हैं जो शोक का प्रतीक होता है . सनावड़ा एक ऐसा गाँव है जहां मांगनियारों के बहुत से घर हैं. मुझे एक घर में उनके गीत सुनने के लिए आमंत्रित किया गया संयोग से तीन पीढ़ियों के कलाकारों को एक साथ सुनने का मौका मिला बुजुर्ग निहाल खां जवान होता मोहम्मद नवास और नन्हा याकूब खां .सबके संगीत में मिट्टी की अद्भुत महक और मिट्टी से अनमोल जुड़ाव . मैं बहुत देर तक उनके गीत सुनता रहा . ये किसी व्यवस्थित महफ़िल की दास्ताँ नहीं है कमरे में मेरे साथ दो बकरियां थीं बाहर कुछ गायें थीं और कुछ दूर एक ऊँट था वो सब भी श्रोता थे बस एक ही फर्क था वो रोज़ सुनते हैं और मैं एक बार सुनने के बाद शायद ऐसी महफ़िल में फिर शामिल नहीं हो पाऊंगा ...... लेकिन मौका मिला तो मैं फिर जाऊंगा वहां जहां हर शख्स को ऐसी रूह मिली है जो इंसानियत के मायने समझाती है .    


भीयांढ़ और कमायचा





सनावड़ा में और भी बहुत कुछ था जिसे फिर कभी लिखूंगा अभी तो कुछ आगे बढ़ते है और बाड़मेर जिले के एक दूसरे गाँव भीयांढ़ चलते हैं मेरे लिए ये गाँव महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यहाँ रोज़े खां रहते हैं . मांगनियार गायकी के उन चंद लोगों में से एक जो अपनी प्राचीन गायकी के हुनर को अब भी जीवित रखे हुए हैं. उनके घर पर जिस आत्मीयता के साथ मेरा स्वागत हुआ वो शब्द कहाँ बयां कर पाएंगे . थाली में सजे गेहूं के दाने और दीपक के साथ गुड़ जिसका एक छोटा टुकड़ा खिलाकर मेहमान को भीतर ले जाते हैं . उनका घर गाँव के आखिरी सिरे पर था पास में एक तालाब था जो अब पानी का रास्ता देख रहा था और रास्ता तो कई मोर भी देख रहे थे जो रोज़े खां के घर के पास ऐसे घूमते हैं मानो पालतू मुर्गियां हों अगली सुबह हमारी नींद बारिश की बूंदों ने खुलवाई क्योंकि हम छत  पर सो रहे थे मेघों से घिरा आसमान ,जहां तक नजर जाये वहां तक फैली मरुभूमि और नीचे ज़मीन पर बादलों के स्वागत में नाचते मोर मैं छत से नीचे ही नहीं जाना चाहता था पर आगे जाना था इसलिए मन मार कर नीचे आया.

रोज़े खां के साथ बातों का सिलसिला चल पड़ा और उनके परिवार ने लोक-संगीत का जो रस बरसाया उसे क्या मैं कभी भूल पाऊंगा. गीतों को खड़ताल गति देते हैं तो कमायचा उसमे मरुभूमि का सारा का सारा सौन्दर्य भर देता है कमायचा मांगनियारों का अपना वाद्य है लेकिन इसका पहला सुर ही सुनने वाले को अहसास करा देता है की अब जो रस बरसेगा वो उस सोनारी धरती का होगा जिसे माडधरा कहते हैं एक विकल ध्वनि, जो गूंजती है तो प्यास जगाती भी है और प्यास बुझाती भी है . लेकिन ये कमायचा भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है . धीरे-धीरे ये वाद्य लुप्त हो रहा है एक तो इसे बजाने में नयी पीढ़ी की रूचि कम है उस पर अब इसे बनाने वाले भी कम होते जा रहे हैं जो बचे हुए लोग हैं वो कभी कभार बिकने के कारण इसे बनाना छोड़ चुके है इसीलिए अब ये बाज़ार में इतना महंगा बिकता है कि कोई गरीब लोक कलाकार इसे खरीदने का सपना ही देख सकता है . आर्थिक उदारवाद ने हमें जो कुछ दिया उसकी भरपूर कीमत भी वसूली है बाज़ार अब केवल उनके लिए आनंद का अवसर उपलब्ध कराता है जिनकी जेबें ठसाठस भरी हुई हैं बाकी लोगों के लिए तो ये तमाशा बस देखने की चीज़ है . राजस्थानी के मशहूर कवि आइदान सिंह भाटी लिखते हैं ...............
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           सुरीली सारंगिया 
           कोडीला कमायचा 
           बिकण लागता बीच बाजारां 
           बाज़ार खरीद लीनी वै सारंगियां 
           अर बण गया पारखू 
           मरम समझणियां 
           अजैई मरै भूखां   .


ये सुरीली सारंगियां और कोडीले कमायचे बीच बाज़ार में बिक रहे हैं और बाज़ार ही उन्हें खरीदकर खुद को पारखी  घोषित कर चुका है और असली पारखी जो इनका मरम समझते हैं वो आजकल भूखे मर रहे हैं ................... मैं ख़त्म होते कमायचे के सुरों में डूबा हुआ सोच रहा था कि बाज़ार के सब कुछ छीनते बेरहम हाथ काश बख्श देते सुरीली सारंगियों को .... कोडीले कमायचों को ..............



              
                                             

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1 टिप्पणी:

  1. भारतीय संस्क्रती व संस्कारो का मिलन अपनी माटी बेब पोर्टल चेनल पर ह़ी मिलता है. आपकी मेहनत साहित्य को जीवित करती है संतोष गंगेले लेखक नौगाव जिला छतरपुर मध्य प्रदेश

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