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हेमंत शेष की चयनित कविता

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, अगस्त 02, 2012 | गुरुवार, अगस्त 02, 2012





हेमंत शेष
(राजस्थान में प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही साहित्य जगत का एक बड़ा नाम है.लेखक,कवि और कला समीक्षक के नाते एक बड़ी पहचान.इनके कविता संग्रह  'जगह जैसी जगह' को बिहारी सम्मान भी मिल चुका है.अब तक लगभग तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.हाल के दस सालों में सात किताबें संपादित की है.साथ ही 'राजस्थान में आधुनिक कला' नामक एक किताब जल्द आने वाली है.)







अगर घर एक पर्व है ....

हर सुबह खुल जाता है घर एक छाते की तरह बेआवाज़

थकी-माँदी सीढ़ियों पर हमेशा इंतज़ार में मिलते हैं सुबह के अखबार
दूध की बोतलों का जीवन वहीं से शुरू होता है


रसोई से उठती हैं सुबह शाम पकते हुए अन्न की पदचापें
हेंगर पर टंगे वस्त्रों में छिपी रहती हैं कुछ भूली-अभूली यादें

न जाने कैसे धूल, आलों और अलमारियों में जम जाती है
दुनिया भर की झाड़-पोंछ के बावजूद

पर्दों के साथ हिलते हैं खिड़की पर ठहरे वर्ष
फ्रेमों में पीली पुरानी तस्वीरें ऊँघती हैं
स्त्रियां गुसलखानों में निःशब्द न जाने किन किन बातों पर सुबकती हैं

माँ के बर्तनों की खटर-पटर से टूट जाती है मुँह-अँधेरे
घर के बच्चों की नींद

छज्जों पर हरी काई बेआवाज़ उग आती है
जैसे उगती हैं मुँडेर पर उम्मीदें खिड़की में इंतज़ार
बरामदों मं किसी की अगवानी... और बंद कमरों में प्रेम

बिस्तरों पर लेटी रहती हैं फुर्सतें थकान और कभी बीमार देहें
कभी आरामकुर्सियों पर अलसाती हैं निश्चिन्तताएँ

नवंबर की दोपहर की धूप में ही तय की जाती है
शाम की रसोई - कि आज क्या बनेगा?
स्वेटरों के लिए डिजाइन भी वहीं तय होते हैं
वहीं पढ़ी जाती हैं पुरानी चिट्ठियाँ उपन्यास
और साप्ताहिक परिशिष्टों से उतारी
डायरियों में बंद नए व्यंजनों की विधियाँ

छत पर अक्सर सुखाए जाते हैं पापड़-बडियां गीले कपड़े और अचार
छतें- जहाँ घरों के युवा होते लड़के
चौथे मकान वाली माला मनीषा या मेघना की एक झलक पाने के लिए
हर शाम बेसब्री से टहलते दिख जाते हैं

हर रात जब सारे घर पर नींद का नशा छा जाता है
बेखटके घर में घूमते हैं चूहे

रसोईघर की सिंक में ऊंघती तश्तरियों और रकाबियों में
उनके प्रीतिभोज के लिए घर के हर सदस्य द्वारा
कुछ या बहुत कुछ छोड़ा गया होता है.

.....और कुछ इसी तरह रोज
यह पर्व, यह घर, शुरू होता है!

जो कविता नहीं कहती

कविता कहती है
सिर्फ तीन दिन बाद लोग बदल जाएँगे-
पत्नियों को बेइन्तहा प्यार करने वाले और
बच्चों की इच्छाओं के लिए समर्पित
शाम को अच्छे कपड़े पहन कर बगीचे में घूमने वाले
दुकानदारों द्वारा लौटाई गई रेज़गारी को न गिनने वाले
यहाँ वहाँ थूक देने की आदतों से सख़्त ऐतराज करने वाले
बाज़ार से बिना खरीदे भी खुश दीखने वाले
रेस्त्राओं में दोस्तों को कॉफी पिला कर प्रसन्नतापूर्वक बिल चुकाने वाले

कविता कहती है
सिर्फ़ तीन दिन बाद
लोग रोटियों को स्वाद लेकर खाएँगे
अच्छी सब्ज़ी की तारीफ़ करेंगे
महिलाओं के लिए बस की सीट छोड़ देंगे
बूढ़ों को हाथ पकड़ कर रास्ता पार कराएँगे
अपरिचितों से भी मिलेंगे मुस्करा कर
और विदा में नम्रतापूर्वक जोड़ देंगे हाथ
अतिथियों के आगमन पर खुश होंगे
अपनी छोटी-छोटी पराजयों पर रोएँगे नहीं लोग
केवल तीन दिन बाद
कविता कहती है

वे तीन दिन, तीन रातों के बाद आएँगे....

पर पृथ्वी पर
वे तीन रातें कब आएँगी?

कविता नहीं कह सकती !
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2 टिप्‍पणियां:

  1. हेमंत शेष की कविताओं का मैं हमेशा से कायल रहा हूँ. जीवन में घटती ज़रूरी, बेमानी, रूमानी, सहज, रोज़मर्रा ...बातों को वे जिस ढंग से अपनी कविताओं में कहते हैं, मुझे उस तरह की शैली और सहजता का अहसास बहुत ही कम कवियों की कविताओं से हुआ है. ‘अगर घर एक पर्व है...’ कविता इसी बात का सुन्दर उदाहरण है. उनकी कविताओं की हर पंक्ति गहरी व्यथा, कटाक्ष, अर्थ, विवशता, और बहाव लिए होती है जो मन को बहुत देर तक खंगालती और झिंझोड़ती रहती है.
    मैंने तो उनके कुछ ही कविता संग्रह और कवितायेँ पढ़ी हैं, अन्य पाठकों ने तो पढ़ी होंगी. जिन्होंने नहीं पढ़ी हों, उनके लिए आपने हेमंत शेष की जो दो चुनिन्दा कवितायेँ यहाँ दी हैं उनके लिए आपको धन्यवाद.
    आदित्य बहुगुणा

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप फिर फेस बुक पर छाए रहे हैं। आपने स्त्रियों पर कटाक्ष कर, उनके नामों वाली कविता लिख कर बहुत बुरा किया है इसे आपका दिल जानता है...कुछ उत्प्रेरक मानने न दें तो अलग बात है। लेकिन आप हिन्दी के आज के बहुत महत्वपूर्ण कवि हैं इसे कोई नहीं नकार सकता। दोस्ती दुश्मनी अपनी जगह पर है और प्रतिभा इन सब से बिल्कुल अलग। ये कविताएं क्या आपकी सभी कविताएं आधुनिक हिन्दी कविता की समकालीन धड़कन से जुड़ी हैं और हिन्दी कविता को विश्व स्तर तक ले जाती हैं। वक्त मिले तो मेरी वॉल से टैग हुई एक चर्चा को ज़रूर पढ़ें। बस लिखते रहिए।

    उत्तर देंहटाएं

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