सुबोध श्रीवास्तव की कवितायेँ - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

सुबोध श्रीवास्तव की कवितायेँ


(1)
(रचना शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह 'सरहदें' से)

जब, एक दिन

वहां, जहां खड़ा है
वह वृक्षमानव
आसपास बसती है
एक समूची दुनिया।
वृक्षमानव
बखूबी जानता है कि
कल, जब वह
जी भी नहीं पाया होगा
अपनी पूरी उम्र,
बांट न पाया होगा
सबको
ठंडी छांव,
सुन नहीं पाया होगा
जीभरकर किलकारियां
अपनी शाखों पर
इधर-उधर
नटखट बंदरों से झूलते
बच्चों की,
तभी/ उसके ही जिस्म के
एक हिस्से में जड़ी
कुल्हाड़ी थामे
कई जोड़ा हाथ
क्षण भर में मिटा देंगे
उसका अस्तित्व।
फिर कोई कारीगर
उसके शरीर को
कई हिस्सों में बांटकर
बनाएगा
आधुनिक शैली में
फर्नीचर के उत्कृष्ट नमूने-
जिन पे बैठकर बनेंगी
पर्यावरण रक्षा की
अनेक योजनाएं।
फिर भी वह
विस्मृत नहीं कर पाता
आदमियत के साथ अपना रिश्ता
क्योंकि-
वह यह भी जानता है कि
आधुनिकता की दौड़ में
बदहवास सा भागता आदमी
जब हर कहीं मिटा चुका होगा
हरियाली का अस्तित्व
किसा रोज/शाम को
कंकरीट के जंगल से उकताकर
वापस लौटने पर
उसका बच्चा
रोपता मिलेगा/एक नन्हा पौधा
तब उसे, अचानक याद आयेगा
बचपन में-
खुद का पेड़ों पर झूलना
और वह
सहमे से बच्चे को
पुचकार कर उठा लेगा गोद में।


( रचनाएं काव्य संग्रह 'पीढ़ी का दर्द' से)
(1)
कठपुतलियां

हां, हम सब
सिर्फ कठपुतलियां हैं
हाड़-मांस की
चलती-फिरती/ बोलती हुई
जिनकी डोर है
तहज़ीबदार
समाज के हाथों में।
यूं जि़न्दा रहना/ और
सुनहरे सपने देखना
जिन्दगी के कदमों की
आहट देते हैं
लेकिन
जि़न्दा आंखों के सामने
सपनों का
छटपटाकर दम तोड़ देना
और, होठों का खामोश रहना
यह सब/ हाड़-मांस के
पुतले की
प्राणवायु नहीं हो सकते कभी।
वैसे भी-
बेजान चीज़ों और
संवेदनाओं में
कोई साम्य नहीं बैठता।

(2) 
वसुन्धरा

मुझे
तुमसे कोई शिकायत नहीं है
'वसुन्धरा'
कि तुम/ 'आकाश' नहीं हो पाई
अब तक
क्योंकि-
मैं भी तो नहीं बदल सका
अपना स्वरूप।
मैं, अक्सर महसूसता हूं
अपने आकाश होने का दर्द
और / मर्यादित सीमाएं
फिर भी
मन के कोने से
अक्सर फड़फड़ाकर उठती है
इक हूक सी
कि आखिर क्यों
नहीं बदल जाता
धरती और आकाश होने का अर्थ।

सुबोध श्रीवास्तव,
(नई कविता, गीत, गजल, दोहे, कहानी, व्यंग्य, रिपोर्ताज और बाल साहित्य  रूचि है। रचनाएं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। दूरदर्शन/आकाशवाणी से प्रसारण के बहुतेरे अवसर प्राप्त रचनाकार)
संपर्क:-'माडर्न विला', 10/518,खलासी लाइन्स,कानपुर,(उप्र)-208001,मो.09305540745,ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in
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