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''पल्लव,जन-प्रतिबद्धता का कायल है। ''-डॉ. नवलकिशोर

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अक्तूबर 16, 2012 | मंगलवार, अक्तूबर 16, 2012

  • कहानी का लोकतंत्र: पल्लव
  • पुस्तक  समीक्षा -डॉ. नवलकिशोर








कहानी का लोकतंत्र-
पल्लव, 
आधार प्रकाशन, 
पंचकूला (हरियाणा) 
प्र.सं.2011, पृ. 168, 
मूल्य- 250/-रु.

युवा आलोचकों- विशेषतः कहानी-समीक्षकों में पल्लव एक उभरता नाम है। ’बनास‘ पत्रिका के दो अंकों (1) स्वयं प्रकाश (2) काशीनाथसिंह पर- के जरिए उसने अपनी कथा-अभिरुचि का उत्तम परिचय दिया है। इनके साथ ’मीरा‘ पर एक नए नज़रिए से पुस्तक संपादित कर वह परम्परा के प्रति भी अपनी संलग्नता व्यक्त कर चुका है। इस पृष्ठभूमि को जानने वाला पाठक उसकी इस पहली स्वतंत्र पुस्तक ’कहानी का लोकतंत्र‘ को स्वागत भाव से तो लेगा ही और पढ़ने पर उसे कुछ पठन-सुख मिला तो वह लेखक को साधुवाद भी सहज ही देना चाहेगा। इस किताब की समीक्षा के फिल-वक्त मैं अपने को एक ऐसे ही पाठक के रूप में पाता हूँ- पहली पुस्तक के लिए अतिरिक्त अभिशंसा के साथ। हर उस युवा लेखक की प्रथम कृति आलोचना के स्वराकाश में एक ताजा धुन की तरह होती है, जिसके पास गुनगुनाने के लिए एक अलग-सा राग होता है। कहानी की इधर की चर्चा-परिचर्चाओं में सार्थक हस्तक्षेप के लिए इस लेखक के पास कुछ ऐसे मन्तव्य अवश्य हैं जो युवा समीक्षकों के नए समुदाय में उसे थोड़ा अलग खड़ा करते हैं।
सबसे बड़ी बात तो यही कि वह उस चर्चा में शामिल नहीं है जो विचारधारा-निरपेक्षता को युवा-कहानी का खास गुण बताती है। इसके विपरीत पल्लव जन-प्रतिबद्धता का कायल है। जैसा कि मैं जानता हूँ उसका वैचारिक ही नहीं क्रियात्मक जुड़ाव राजनीतिक रूप में वाम पक्ष के साथ है और यही उसकी  पक्षधरता निर्धारित करता है, लेकिन इस शर्त के साथ कि ’सार्थक कहानी वही होगी जिसमें विचारधारा रचना के भीतर बिना कोलाहल के उपस्थित हो और दृष्टि प्रदान करे।‘ उसकी प्रतिबद्धता अपने को सिद्ध करने के लिए प्रहारार्थ विरोधी लेखन को नहीं तलाशती, लेकिन अपनी वैधता के लिए तटस्थता का दिखावा भी नहीं करती। कहानी लेखन में यथार्थ के विविध रंग और विविध विधियों के प्रति अपने स्वीकार-भाव को घोषित करते हुए उसने अपनी किताब को ’कहानी का लोकतंत्र‘ नाम अवश्य दिया है, लेकिन इस लोकतंत्र के भीतर अपने पक्ष में मताभिव्यक्ति वह दृढ़ता और स्पष्टता से करता है।




नवलकिशोर
च-6, उदयपार्क, सेक्टर-5,
हिरणमगरी, उदयपुर-313002 
(0294) 2465422 मो. 09351587096

कहानी-प्रसंग की शुरूआत वह ’कहानी के इस ओर‘ लेख से करता है। यह लेख भूमिका जैसा है। ’इस ओर‘ से उसका अभिप्राय उस तरफ की कहानियों से है जिनका जिक्र अक्सर चर्चाओं में नहीं होता-’’कहानी की नई चर्चाओं में खास तरह के शहरी उच्च-मध्य वर्ग के जीवन की रंग-बिरंगी तस्वीरों को जगह मिली है, लेकिन भारत के संपूर्ण सामाजिक जीवन का यथार्थ इन तस्वीरों में आने से रह जाता है ...अपवाद-स्वरूप गाँवों की कहानियाँ लिख लेना एक बात है, वहाँ के धूल- धक्कड़ को फाँकते हुए कहानी लिखना दूसरी बात। प्रायोजित चर्चाओं में गाँव की अनुपस्थिति को रेखांकित किया जाना जरूरी है।‘‘ इस उद्देश्य के लिए वह जिन अचर्चित किन्तु महत्त्वपूर्ण युवा कथाकारों और उनकी कहानियों को तीव्रालोक में लाना चाहता है वे हैं - सत्यनारायण पटेल और चरण सिंह ’पथिक‘। पटेल की ’पनही‘ के पूरण के श्रम और कौशल से गढ़ी जूतियों को पटेल जबरन सिर्फ सेर भर अनाज में खरीद लेना चाहता है -’बता दी न अपनी जात. एक सेर अनाज कम पड़े तो क्या एक जोड़ी पनही का मण भर लेगा?‘ यह कहानी केवल दलित श्रमिक के शोषण का दस्तावेज होकर नहीं रह जाती, प्रतिरोध की पनपती चेतना को भी प्रकट करती है-सवर्ण पटेलों के छोरों के डर से अब दलित भागते नहीं, वे अपने टापरों में लाठी-हंसियाँ जो भी हथियार हैं उन्हें लेकर मुकाबले के लिए तैयार हो जाते हैं। इस तरह यह कहानी गाँव के सत्ता-समीकरण के नये यथार्थ को एक सशक्त कथारूप में ढालती होती है। 

’पथिक‘ की कहानियों के बारे में पल्लव का कहना है कि वे गाँव के ठीक बीच से आई हैं- वर्गीय चेतना की प्रतिनिधि रचनाएँ बनकर। ’दंगल‘ कहानी का विशेष उल्लेख वह इसलिए करता है कि गाँवों में होने वाले आशु-कविता के ’दंगल‘ अब जिस तरह साम्प्रदायिकता और जातिवाद के दंगल बनते जा रहे हैं - यह कहानी उसे बखूबी बताती है। इन दो कहानीकारों पर कुछ विस्तार से चर्चा करने के साथ पल्लव ने ’इसी ओर के‘ उन कहानीकारों का भी स्मरण किया है, जो अब ’युवा‘ के दायरे में भले न आएँ, लेकिन समाज के उपेक्षित तबकों की कहानियाँ लिखते आ रहे हैं - जैसे एस.आर.हरनोट, भवानी सिंह, भगवानदास मोरवाल, हरियश राय, कैलाश बनवासी, महेश कटारे, पंकज मित्र, हरिओम, अरुण कुमार असफल। इन्हीं के बीच अभिषेक कश्यप की कहानियों पर भी एक अच्छी टिप्पणी दी गई है, लेकिन जैसा लेखक ने बताया है वह कुछ अलग प्रकृति का लेखक है, इसलिए उसकी यहाँ चर्चा खपती नहीं। वैसे भी यह लेख दो खंडों तक ही रहता तो ज्यादा मुक्कमल होता। यह भूमिका- लेख विशेष उल्लेखनीय इसलिए है कि यह लेखक की उस समीक्षा-दृष्टि को उजागर करता है जिससे वह समीक्ष्य कहानियों पर विचार करता है। पुस्तक में बीस लेख हैं और सभी में आधारभूत रूप में यह नज़रिया मौजूद है। इन लेखों को बिना उप-शीर्षकों के तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले और दूसरे भाग में छह-छह और तीसरे में आठ लेख रखे गए हैं।
पहले भाग के पहले लेख का जिक्र ऊपर हो चुका है। दूसरे लेख में उन कहानीकारों की रचना-विधि की प्रशंसा है जो कहानी को पढ़ने से अधिक कहने-सुनने वाली विधा मानते हुए पाठकों को भागीदारी के लिए आमंत्रित करते रहते हैं। लेखक के अनुसार रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश, उदयप्रकाश और रघुनन्दन त्रिवेदी (स्व.) में बेशक सामाजिक-राजनीतिक सरोकार अव्वल रहते हैं, पर उनकी कहानियाँ एक बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचने में इसलिए सफल होती हैं कि उनकी बुनावट में रोचकता को पूरी तवज्जो दी गई है। सफल कहानी, दरअसल, उसे ही कहा जा सकता है जो कला के पैमाने पर खरी उतरने के साथ पाठक को आकर्षित करने का गुण भी अपने में लिए हुए हो। तीसरे लेख में लेखक जयनन्दन, कैलाश बनवासी, हरीचरन प्रकाश, प्रियदर्शन मालवीय और लोक बाबू की उन चर्चित कहानियों को लेता है, जो देश की नवउदारी अर्थनीति के कारण संकटग्रस्त किसानी की दुर्दशा के नये यथार्थ को उद्घाटित करती हैं। उसे लगता है कि ये कहानियाँ मानो ’गोदान‘ के इस कथन को ही आज दोहरा रही हैं -’थाना-पुलिस, कचहरी-अदालत सब है हमारी रक्षा के लिए, लेकिन रक्षा कोई नहीं करता. चारों तरफ लूट है. जो गरीब है, बेकस है, उसकी गर्दन काटने के लिए सभी तैयार रहते है. भगवान ना करे, कोई बेईमानी करें. यह बड़ा पाप है, लेकिन अपने हक और न्याय के लिए न लड़ना उससे भी बड़ा पाप है।‘‘ 

मतलब आज का किसान हालाँकि ’गोदान‘ के किसान की तरह ही बुरी हालत में है, पर अब वह चुप बैठने वाला नहीं रहा है। चौथे लेख में विजेन्द्र अनिल की ’बैल‘, स्वयं प्रकाश की ’नैनसी का धूड़ा‘ और कैलाश बनवासी की ’बाजार में रामधन‘-इन तीनों कहानियों पर विचार करते हुए वह जिस उपसंहार-कथन की ओर हमें ले जाता है, वह द्रष्टव्य है -’’न बैल को तिनका है, न किसान को रोटी. हाँ रास्ता है आत्महत्या का- आत्मघात का तीनों कहानियाँ इसी शोषण और हाहाकार का शोकगीत सुनाती हैं न ’गोदान‘ अप्रासंगिक हुआ और न गाय-बैल खरीदने-पालने की आस ही पूरी हो पाई. प्रेमचन्द से कैलाश बनवासी तक किसान की यह दुर्दशा है।‘‘ पाँचवे लेख में ओमप्रकाश वाल्मीकि के कहानी-संग्रहों -’सलाम‘ और ’घुसपैठिए‘ की समीक्षा है। पल्लव मैनेजर पाण्डेय के इस कथन से सहमति जताते हैं-’दलित- साहित्य की भूमिका का महत्त्व केवल दलित समाज के विकास में ही नहीं, अपितु सवर्ण समुदाय को दर्पण दिखाते हुए उसे विकृति मुक्त करने में भी है।‘ उसके अनुसार वाल्मीकि की कहानियाँ इस ज़रूरत को पूरा करती हैं और रचनात्मक मुठभेड़ को संभव बनाती हैं।
दूसरे भाग का पहला लेख महिला-कथाकारों की कहानियों से सम्बन्धित है। इस लेख में मृदुला गर्ग , चित्रा मुद्गल, राजी सेठ, सुधा अरोड़ा और मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों पर चर्चा के साथ तेलुगु कथाकार वोल्गा की कहानियों को भी, जो लेखक के मतानुसार हिन्दी में भी प्रशंसित हैं, शामिल किया गया है। इन लेखिकाओं की कहानियों के बारे में लेखक उचित ही कहता है कि ये हमें स्त्री के दुःखों और संघर्षों को स्त्री की अपनी आवाज़ में समझा सकी हैं और हमारी मर्दवादी मदान्धता को प्रबल चुनौती भी दे सकी हैं। इस लेख में अलग-अलग लेखिकाओं पर अलग-अलग समीक्षा के उपरान्त एक उपसंहारात्मक टिप्पणी भी होती तो लेख बेहतर हो सकता था। साथ ही स्त्री-विषयक दो कहानियों को लेकर पुरुष-दृष्टि और स्त्री-दृष्टि पर तुलनात्मक विचार की अपेक्षा भी हिन्दी में बनी हुई है- पल्लव चाहें तो जोरदार पहले कर सकते हैं। दूसरे लेख में कहानी के समकालीन परिदृश्य पर पुरानी पीढ़ी के सक्रिय कहानीकारों-अमरकान्त, रमेश उपाध्याय, चन्द्रकान्ता और सत्यनारारायण की कहानियों के जिक्र के साथ एकाएक चर्चा में आए शैलेय की कहानियों का विशेष उल्लेख किया गया है। लेखक के अनुसार शैलेय की पहचान पहाड़ के जीवन-संघर्षों को अपनी कहानियों में फिर-से खड़ा करने की कवायद से बनी है- कलाहीन होने का भ्रम देती उनकी कहानियाँ पहाड़ के साधारण जनों के जीवन में आ रहे निरन्तर बदलावों और उलझते सम्बन्धों का अनुभव सिद्ध चित्र दे पाने में बहुत सफल रही हैं।
तीसरे भाग के आठ लेखों में प्रत्येक में किसी एक ख्यात कहानी का पुनर्पाठ है। पहले में रघुनन्दन त्रिवेदी की ’एक दिन रामबाबू झाड़ी लाँघ जायेंगे‘, दूसरे में विद्यासागर नौटियाल की ’सोना‘, तीसरे में विजयदान देथा की ’दुविधा‘, चौथे में पंकज बिष्ट की ’टुंड्रा प्रदेश‘, पाँचवे में स्वयं प्रकाश की ’पार्टीशन‘, छठे में कृष्णबलदेव की ’मेरा दुश्मन‘, सातवें में इस्मत चुगताई की ’घरवाली‘ और आठवें में प्रेमचन्द की ’कफ़न‘ को विचारार्थ लिया गया है। इन सभी पर पल्लव ने ऐसी टिप्पणियाँ की हैं, जो उन्हें एक बहुत सजग पाठक-आलोचक के रूप में सामने आती हैं और कहानियों के पुनर्पाठ की ज़रूरत बताती हैं।
प्रस्तुत किताब एक लेख-संकलन है, जिसमें कुछ लेखकों और कुछ कहानियों का बार-बार उल्लेख हुआ है, इसे दुहराव दोष नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसा लेखकीय वक्तव्यों के लिए प्रमाणीकरण आवृत्ति के रूप में ही हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस पुस्तक के जरिए पल्लव युवा कथा-आलोचकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं। आशा की जानी चाहिए कि उनकी अगली किताब एक विषयबद्ध आलोचना-कृति होगी, जो उनकी इस पहचान को और गहराएगी। एक वरिष्ठ सह-बंधु के नाते उनके प्रति मेरी यह हार्दिक शुभाशंसा है।


पल्लव
युवा आलोचक और 'बनास जन' पत्रिका के सम्पादक हैं.
पल्लव को इसी आलोचना पुस्तक पर 14 वें आचार्य निरंजननाथ सम्मान से सम्मानित करने की घोषणा हुयी है 

वर्तमान में हिंदी विभाग,हिन्दू कोलेज में सहायक आचार्य हैं.
मूल रूप से चित्तौड़ के हैं ,अब दिल्ली जा बसे हैं.
उनका पता है.
फ्लेट . 393 डी.डी..
ब्लाक सी एंड डी
कनिष्क अपार्टमेन्ट
शालीमार बाग़
नई दिल्ली-110088
 मेल pallavkidak@gmail.com

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