लुद्रवा/ अल्लाह जिलाई बाई/मूमल-महेंद्र/ - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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लुद्रवा/ अल्लाह जिलाई बाई/मूमल-महेंद्र/

लुद्रवा  

लुद्रवा या लोद्रवा कभी भाटी शासकों की राजधानी रहा था लेकिन वक़्त बीता तो एक राजधानी का अस्तित्व समाप्त हुआ और जैसलमेर के माथे पर मुकुट रखे जाने का पथ प्रशस्त हुआ. लुद्रवा आज भी अवशेषों को माध्यम बनाकर अपने प्राचीन वैभव की दास्तान सुनाता है. साथ ही नए निर्माण के कारण अस्तित्व में आये जैन मंदिर की बेहद खूबसूरत जालीदार दीवारें जिनकी हर एक पंक्ति का शिल्प भिन्न-भिन्न होने के कारण रचनात्मक कौशल का बेहतरीन नमूना है किसी के भी आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं .


इसी मंदिर का तोरण अपने मूल में प्रयुक्त प्राचीन पत्थरों को माध्यम बनाकर इस नगर के शैव होने का प्रमाण देता सा लगता है. पर मेरे लिए इस नगर के प्राचीन राजधानी होने से अधिक महत्वपूर्ण था इस नगर का राजस्थान की सर्वाधिक चर्चित लोक प्रेम कथाओं में से एक - मूमल की नायिका का यहाँ से जुड़ाव. कभी लुद्रवा में मूमल का घर था और सिंध के सोढा राजपूत महेंद्र ने यहीं मूमल के साथ प्रेम की अमर दास्तान जी थी . 

मैंने जब राजस्थांनी  लोक संगीत की सर्वाधिक चर्चित गायिका अल्लाह जिलाई बाई आवाज में मूमल सुना था तब से ही में इस जगह आना चाहता था.. ..............
              

  काली रे काली काजलिये रे रेख जी 
               कोई भूरो बादल में चमके बीजली                      
              रंग भीणी ऐ मूमल हाले तो ले चालूँ 
               अमराणे रे देस रे  .............


लुद्रवा में मुझे बार-बार यही लगता रहा की ये धरती आज भी वही  प्रेम कथा  सुना रही है . न जाने कितने योद्धा यहाँ रहे होंगे ,राजधानी का वैभव भी कम नहीं होगा पर काल के प्रवाह में सब कुछ खो गया . आज ये धरती सब नाम भूल चुकी है पर मूमल-महेंद्र का नाम आज भी यहाँ गूंजता है . राजधानियां मिट जाती हैं , राजवंश खो जाते हैं पर पर मोहब्बत की दास्तान पर वक़्त की रेत कभी पर्दा नहीं डालती बल्कि वहां से गुजरो तो धीरे से कहती है कि इस विकल माडधरा पर कभी सब कुछ भूलकर रोज़ चला आता था महेंद्र क्योंकि तब  यहाँ रहती थी मोहब्बत के लिए अपनी जान दे देने वाली अनिंद्य सुन्दरी  .... मूमल ...... 

    

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