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'राजधानी में एक नाइजेरियाई लड़का' और दूसरी कवितायेँ

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, अगस्त 03, 2012 | शुक्रवार, अगस्त 03, 2012





 डॉ.अरविंद श्रीवास्तव जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है।

बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।यहाँ आपके सध्य प्रकाशित कविता संग्रह 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'  से कुछ कवितायेँ प्रकाशित की जा रही है .मूल रूप सेराजधानी में एक उज़बेक लड़कीसमसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशियाक्ष महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया.

राजधानी में एक नाइजेरियाई लड़का अभी-अभी जो गुजरा है लंबा, बिल्कुल काले रंग का सर पर फर टोपी सदृश्य बालों वाला युवक मेरे स्पैम बॉक्स में पड़े कई मेल का स्वामी जिसे क्लिक करते ही मेरी जली किस्मत चमक सकती थी हजारों डालर पुरस्कार में देना चाहता है वह औने-पौने दाम पर बेचना चाहता है वह मुझे अपना कीमती कैमरा पता नहीं क्यों बड़ी विनम्रता से मांगते हैं वे मेरा सेल नम्बर, स्ट्रीट नम्बर और एकाउंट नम्बर भी मुझे वे धरती का बेहद खुशनसीब इंसान धोषित करते हैं कई बार सोचा कितने धनी व उदार है फर सदृश्य टोपी वाला यह नाइजेरियाई! मेल-प्रोवाइडरों की वार्निंग को कर्ह-कई बार चाहता हूँ अनदेखा करना कई-कई बार आता है गुस्सा लाल चेतावनी पर कई-कई बार मिलता है वह नाइजेरियाई चाहता हूँ अदा करना आभार बटमारी के किसी नायाब इल्म का हिस्सा नही हुआ मैं कि मेरे पास चंद कविताओं के अलावे खोने के लिए कुछ भी नहीं था। यूनेस्को की गाड़ी किसी भीड़ भरे बाजार में या किसी सुदूर देहात की कच्ची सड़कों पर ‘यूनेस्को’ लिखी गाड़ी देखता हूँ जब भी, सोचता हूँ अन्दर गंभीर सा दिखने वाला आदमी रुपयों भरा थैला लेकर तलाश रहा है मुझे डायरेक्ट ‘मैन टू मैन’ बाँटना चाहता है खर्चा-पानी मोहभंग हो चुका है उनका सरकारी मिशनरी से किस्म-किस्म के घोटालो की खबरों से आजिज है वह उठ गया है उनका भरोसा एनजीओ से वह तलाश रहा है मुझे बाढ़-पीड़ित होने के कई प्रमाण सहेज रखे है मैने जनेवा और कोपेनहेगन की फंडो के लिए चाहता हूँ मैं उससे कुशल क्षेम बतियाना अपनी काबिलियत की कुछ टिप्स देना अक्सर यही होता है जब भी नजर आती है यूनेस्को की गाड़ी चन्द ही लम्हों में हो जाती है आँखों से ओझल ! समलैंगिक कार्यक्रम के प्रति न्यूनतम साझे कार्यक्रम की प्रचलित परंपरा अपनी जिम्मेदाराना चुप्पी तोड़ते हुए हत्यारे के पक्ष में क्षमा की याचना करते निर्वस्त्र झुकी है यह जानते हुए कि धरती एक पौधे की अपेक्षा नहीं रख सकती समलैंगिकों से ऐसे समय में जब धरती पर शूरवीर और पराक्रमी जनों की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जा रही थी, अभी कई - कई ग्रहों को भेदना शेष था नैसर्गिकता के कथित दमधोंटू पचड़े के विरुद्ध स्वर्ग के नये दरवाजे की चाभी समलैंगिकों ने हथिया ली थी सभ्य राष्ट्रों में उनकी लामबंदी और टोले - नगर, महानगर बन रहे थे जंगल जिसके लिए जीवन शैली की नयी परिभाषा गढ़ी जा रही थी जिसमें नैतिकता को रूढ़िवादी सोच के खाते में डाला गया था साझे कार्यक्रम की सफलता चुप्पी पर आधारित थी एचआईवी तरह की जोखिमों को देखते हुए जुबान पर कंडोम की सिफारिश थी और इसे लोकप्रिय बनाने की सहमति आम होते जा रही थी किसी बहसबाजी पर ह्यूमेन राइट अब अधिक चौकन्ना दिख रहा था कुछ और नस्लें लुप्त होने वाली थीं कुछ वायरस अश्व गति से करीब आ रहा था साझे कार्यक्रम के मुख्य एजेंडे मे निर्धारित था जिनका राज्याभिषेक कूँ - कूँ करती कुछ आवाजें दबोच ली गयी थीं कुछ आँखें नाटक कर रही थीं अंधा होने का । विरासत अर्सा गुजर गया जमींदोज हो गये जमींदार साहब बहरहाल, सब्जी बेच रही है साहब की एक माशूका उसके हिस्से स्मृतियों को छोड. कोई दूसरा दस्तावेज नहीं है फिलवक्त साहबजादों की निगाहें उनके दाँतों पर टिकी है जिनके एक दाँत में सोना मढ़ा है । मामूली आदमी का धोषणापत्र मामूली आदमी हूँ असमय मरुँगा तंग गलियों में संक्रमण से सड़क पार करते हुए वाहन से कुचल कर या पुलिस लॉकअप में माफ करना मुझे अदा नहीं कर सकूँगा मैं अपना पोस्टमॉर्टम खर्च । 2. मामूली आदमी हूँ दिख जाऊँगा सभी जगह रिक्शा-ठेला खींचता, मोटिया ढोता खेत - खलिहान, स्टेशन-बस अड्डा सभी जगहों पर हम ही हम आप करो चिंता शेयर-सत्ता, ओजोन-अन्तरीक्ष की मुझे करनी है सबेरे की! चर्चा में वक्त बूँदों के उत्सव का था बूँदें इठला रही था गा रही थीं बूँदें झूम - झूम कर थिरक रही थीं पूरे सवाब में दरख्तों के पोर - पोर को छुआ बूँदों ने माटी ने छक कर स्वाद चखा बूँदों का रात कहर बन आयी थाीं बूँदे सबेरे चर्चा में बारिश थीं बूँदें नहीं ! अंगूठे बताओ, कहाँ मारना है ठप्पा कहाँ लगाने हैं निशान तुम्हारे सफेद - धवल कागज पर हम उगेंगे बिल्कुल अंडाकार या कोई अद्भुत कलाकृति बनकर बगैर किसी कालिख,स्याही और पैड के अंगूठे गंदे हैं मिट्टी में सने है आग में पके हैं पसीने की स्याही में। अंटार्टिका का एक हिमखण्ड अभी खड़ा था यही कोई लाख वर्षों से समुद्र की देह पर चुपचाप निहार रहा था हमें हार - थक कर एक झटके में वह टूटा पिधला और मिनटों में खो गया समुद्र में। श्राद्ध भोज उदासी छँट चुकी थी जैसे कई- कई दिनों बाद छँटता है माध में कुहासा दुख भरे बारह दिनों और कोई फल पक कर तैयार हो चुका हो तेरहवें दिन कि जैसे छप्पड़ पर लदे कोहरे में अचानक आ गयी हो मिठास कटहल कटने को हो तैयार लहलहा उठा हो बाड़ी - झाड़ी का साग और शुरू हो चुकी हो बच्चों की धामा - चौकड़ी पिछवाड़े में कुत्तों की चहलकदमी भोज भंडारे की हो - हो दही धर में बिल्लियों पर सख्त नजर लपलपाती जीभ सबने खाये श्राद्ध भोज उदासी ढोने का मीठा फल !
कविता के प्रति हमारी अनुदारता हमारी सारी थकान हमारी कविताओं में दिखती है अवसाद भाव और सम्मोहित करते शब्द कविताओं में ढल कर समग्रता प्राप्त करते हैं हमारी थकान में रहती है दिन भर धूर्त्त लोगों की संगति सहित मृतप्राय वस्तुओं में पुनर्जन्म की उम्मीद बगदाद का संग्रहलय और बामियान के बुद्ध मौसम में आये अचानक परिवर्तन पर नुक्ताचीनी अभिवादन के लिए उठे हाथ की अनदेखी स्कूल से बच्चों की सकुशल वापसी की चिंता असहिष्णुता का कुख्यात वक़्त हमारी सारी थकान कविता बन निखरती है और अक्सर हम कविताएँ लिख भेज देते हैं राजधानी की मंडियों में !


प्रकाशक 

यश पब्लिकेशन्स
1/10753,गली न.3,
सुभाष पार्क ,
नवीन सहादरा,
कीर्ति मंदिर के पास 
दिल्ली-110032,
मो-09899938522
वेबसाईट-www.yashpublications.com
सजिल्द मूल्य-195/-
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