Latest Article :
Home » , , , , » कुलधर में जो देखा वो तो कुल धरा में कहीं देखा नहीं

कुलधर में जो देखा वो तो कुल धरा में कहीं देखा नहीं

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, अगस्त 31, 2012 | शुक्रवार, अगस्त 31, 2012


मैंने पहली बार कोई उजड़ी हुई इतनी व्यवस्थित बस्ती देखी. वैसे तो कुलधरा के लिए कहा जाता है .....

कुलधर मंदिर मजीद कुलधर कुल री सायबी
कुलधर में जिमदीठ कुल धर में दीठी नहीं .

कुलधर में जो देखा वो तो कुल धरा में कहीं देखा नहीं . शायद कभी ऐसा ही वैभव रहा होगा पालीवालों की इस बस्ती का जिसने इसे पूरी धरा से अधिक वैभवशालिनी बना दिया होगा वैसे भी पालीवालों का समृद्ध इतिहास है और इस वैभवशाली समाज ने जहां-जहां नगर बसाए वहां-वहां समृद्धि ने एक अनूठी दास्ताँ भी लिखी. लेकिन न जाने क्या कारण है कि इनकी कहानियों में उजड़ने की दास्ताँ भी शामिल हो जाती है पालीवालों का पलायन से भी पुराना रिश्ता रहा है और एक ऐसे ही पलायन ने कुलधरा से उसका वैभव छीन लिया था . किसी दीवान की कुदृष्टि कुलधरा की किसी बेटी पर पड़ी तो इस स्वाभिमानी समाज ने दीवान से बेटी का विवाह करने के स्थान पर रातों-रात वो गाँव छोड़ना बेहतर समझा और एक समृद्ध बस्ती धीरे-धीरे खंडहर बन गयी .आज सोचें तो आश्चर्य होता है की गाँव की एक बेटी किसी एक घर की इज्ज़त नहीं थी वो पूरे गाँव की इज्
ज़त थी और उसके लिए पूरे गाँव ने अपना सब कुछ छोड़ने में में ज़रा भी वक़्त नहीं गवाया . चौड़ी सड़कें, चौपालें, गाड़ियों को रखने के स्थान और घरों का सुव्यवस्थित आकार आज भी इस बस्ती के 

वैभव की दास्ताँ सुनाते हैं तो पूरे गाँव में फैला सन्नाटा जैसे बीते वक़्त का साक्षी बनकर खड़ा हो जाता है . मेरे साथ जो लोग थे उन्हें पूरा भरोसा था कि इस गाँव में भूत हैं. मैंने कहा कि मुझे उन भूतों से मिलना है तो उन्होंने वहां रात रुकने की चुनौती दे डाली मैं चुनौती स्वीकार करता इससे पहले ही हम जिस घर में खड़े थे वहां मेरे साथ गए सलीम खां ने नीचे के तलघर में उतरने की कोशिश की तो सैकड़ो चमगादड़ बाहर आ गए और फिर जो हम बाहर भागे तो रात रुकना तो छोड़िये हम तो वहां उस ढलती हुई शाम में रुकने का मन भी नहीं बना पाए . वो सचमुच एक भयावह अनुभव था एक टूटे खंडहर मैं सैकड़ो चमगादड़ों का अचानक हमला ... मैंने तो बस यही कहा ..... कुलधर में जिमदीठ कुल धर में दीठी नहीं


Share this article :

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (01-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template