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समाज का नंगापन दिखाती कहानी 'कमली'

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अगस्त 14, 2012 | मंगलवार, अगस्त 14, 2012



कहानी-कमली
डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.

लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com

कोई हफ़्ते भर से कमली अपने ही पेट से पैदा हुए बच्चे पर लाड़-प्यार लुटाने के लिए तरस रही थी। पहले उसे मैडम के बेडरूम में आने-जाने परकोई पाबंदी नहीं थी। बिना इज़ाज़त लिए वह वहाँ जाकर झाड़ू-पोछा करने और बिस्तर लगाने घुस जाती थी। कभी किसी ने कुछ नहीं कहा। लेकिन, पिछलेसोमवार को मैडम ने दो टूक लफ़्ज़ों में कह दिया था, "कमली! मैं तेरी हरक़त पर कई दिनों से नज़र रखे हुई हूँ। तूँ बार-बार बेडरूम में जाकर बच्चे कोगोद में उठाने और अपने गंदे मुँह से चूमने से बाज नहीं रही है। अब तूँ कान खोल कर सुन ले; तेरा काम खत्म हुआ। अगर तूने ज़्यादा चीं-चपड़ कीतो अभी तुझे यहाँ से चलता कर दूंगी..."

कमली को बड़ा कोफ़्त हुआ और वह मन मसोस कर आँगन में गई, "आख़िर, बच्चे से मुझे परहेज़ करने के लिए क्यों कहा जा रहा है जबकिवह मेरे ही शरीर का एक हिस्सा है?"

कमली का सारा बदन मैडम के रूखे बर्ताव से सूखा जा रहा था। उसे लगा कि जैसे उसका शरीर एक सूखे पत्ते की तरह अंधड़-तूफ़ान में जाने कहाँ उड़ा जा रहा है। उसका स्वयं पर से नियंत्रण ख़त्म होता जा रहा है। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैडम का मिज़ाज़ इतनी जल्दी बदल जाएगा। उसने वापस मैडम के पास जाकर उसके चेहरे पर अपनी नज़रें गड़ा दीं, "मैडम! भले ही यह बच्चा वादे के मुताबिक आपका हुआ; लेकिन मैंने इसे नौ महीने तक अपनी कोख में सहेजकर अपने खून से सींचा है। कम से कम मुझे उसको गोद में उठाकर घड़ी दो घड़ी खिला तो लेने दीजिए।"

बच्चे पर उसके द्वारा हक़ जताए जाने से मैडम के चेहरे पर नफ़रत एक वहशी बाज़ की तरह फड़फड़ा उठी, "बस! बहुत सुन लिया। अब इस बच्चे को आइंदा छूने की ज़ुर्रत मत करना; वर्ना, इसका ख़ामियाजा बड़ा बुरा होगा।"

कमली का मुँह दुःख और आश्चर्य से खुला रह गया। उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। वापस सींढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे में जाते समय उसका गला सूखने लगा। उसे बार-बार ख़ुद पर गुस्सा रहा था कि उसने ऐसा कोई समझौता किया ही क्यों जिससे उसने अपने शरीर को तबाह तो किया ही; साथ में, वह कलंकित भी हुई। कुल मिलाकर, उसने अपना भविष्य चौपट कर दिया। अपनी ज़िंदगी में ज़हर घोल दिया। इधर की रही, उधर की।अब वह ऐसे दोराहे पर खड़ी है जिसका हर रास्ता कुछ दूर जाकर बंद हो जाता है। उसे लगा कि वह तेजी से घूमते हुए चाक पर चकरघिन्नी कर रही है जिसे निर्दयी कुम्हार अपने कठोर हाथों और सख़्त अंगुलियों से दबा-दबाकर अपने मुताबिक आकार-प्रकार में ढालना चाहता है। जब वह किसी आकर्षक आकृति में ढल जाएगी तो उसे अलाव पर पका दिया जाएगा और फिर, कई चटख रंगों में रंगकर किसी हाट-बाजार में बेचने के लिए रख दिया जाएगा। वह पानी की बोतल उठाकर सारा पानी एक ही साँस में गटागट पी गई और खिड़की के सहारे झुककर बाहर सड़क पर दौड़ती मोटर-गाड़ियों की भीषण धक्कमपेलपर अपनी नज़रें टिका दीं। बेशक! उसके मन के भीतर हो रही हलचल उस भीषण धक्कमपेल से कहीं अधिक बौख़लाहट पैदा करने वाली है।

"उफ़्फ़!" एक तेज चींख उसके मुँह से निकलकर कमरे में ज़ब्त हो गई। उसे साफ दिखाई दे रहा था कि सड़क पार कर रही कोई भिखारिन एक ट्रक की चपेट में गई है। उसे अपनी निग़ाहें, उस भिखारिन के लहूलुहान शरीर को किनारे रख रहे लोगों पर जमाए रखना बर्दाश्त नहीं हो सका। उसे लगा कि जैसे उसका शरीर निर्जीव-सा होकर इतना भारी हो गया है कि उसे आसानी से उठाया नहीं जा सकता है। वह बड़ी मुश्किल से अपने शरीर को ढोते हुए चारपाई पर बैठ पाई। लेकिन, तभी मैडम की तीक्ष्ण आवाज़ ने उसके रक्त-प्रवाह को कई गुना बढ़ा दिया, "कमली, कमली! कहाँ मर गई तूँ..."

कमली को अहसास हुआ कि मैडम का तेवर अपने पुराने अंदाज़ में चुका है। वह उसके घड़ियाली आँसू को यादकर अपना सिर पीटने लगी कि उसने क्यों उस पर इतना ज़्यादा यकीन किया।

कोई दो साल पहले उसने इस घर में बतौर नौकरानी काम-काज शुरू किया था। वह यह यादकर चिहुँक गई कि किस तरह उसने कोई दो वर्ष पहले अपने गाँव से भागकर इस घर में पनाह लिया था। उसकी अपनी सगी माँ ने उसे तीन सौ रुपए थमाते हुए एक बस में बैठा दिया था, " जा, बेटी जा! तुझे तेरे लंपट सौतेले बाप से बचाने का बस यही एक रास्ता बचा हुआ है। ईश्वर तेरा भला करे..." उसने बस की सीट पर बैठे-बैठे खिड़की से अपनी माँ को बेहद कातर दृष्टि से देखा था। वह अपनी माँ पर से नज़रें बड़ी मुश्किल से हटा सकी थी; वह सड़क के किनारे एक पत्थर पर झुककर सिर पीटते हुए फटेबाँस की तरह घों-घों रो रही थी। उसे अच्छी तरह याद है कि जब वह कोई बारह साल की थी जबकि उसे दुनियादारी का ज्ञान होने लगा था, तो उसकी माँ कितने सुरीले सुर में लोरियाँ गुनगुनाया करती  थी। लेकिन उसके पिता की अकाल मौत के बाद उसकी माँ किस तरह बिरजू के प्रेमजाल में उलझती चली गई थी और एक दिन उसने शिवाले में जाकर उसके साथ शिवलिंग के फेरे लेते हुए एक नई ज़िंदगी की शुरुआत की आस पालने लगी थी!

कमली यानी कमलेश्वरी; हाँ, यही नाम रखा था उसके पिता ने जिन्हें इस बात का कोई पूर्वाभास नहीं था कि वह कुछ ही दिनों में अपनी लाडली को इस बेरहम दुनिया के रहमो-करम पर बेसहारा छोड़ देगा और अपनी पत्नी यानी उसकी माँ को किसी दूसरे मर्द की तलाश में दर-दर भटकना पड़ेगा। आख़िर,कुल पैंतीस वर्ष की वीना यानी कमली की माँ को पहाड़-जैसी ज़िंदगी काटने के लिए कुछ तो करना ही था। अकेली और वह भी जवान औरत तो ऐसी मीठी आग की तरह होती है जिसके ताप से हर कोई अपना ज़िस्म सेंकना चाहता है। ऐसे में उसे ख़ुद को महफ़ूज़ रखने के लिए किसी पुरुष के बस! एक इशारे की ज़रूरत थी और बिरजू की ओर से इशारा मिलते ही वह उसके पीछे बावली-सी डोलने लगी थी। किंतु, कमली को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। उसे अपने सौतेले बाप का चाल-चलन बिल्कुल रास नहीं रहा था। उसका यह शुबहा पक्का होता जा रहा था कि उसके सौतेले पिता की नीयत उसके पास आकर खराब हो जाती है। भला, बेटी से, भले ही वह सगी हो, इस तरह पेश आना अच्छा लगता है क्या? वह तो धर्म, पुराण, समाज सभी का छीछालेदर करने पर तुला रहता था। उसने अपनी माँ से शिकायत की तो उसने उसकी अनसुनी कर दी जैसे कि उसकी समझ में कुछ भी आया हो। कोई चार साल भी मुश्किल से नहीं गुजरे होंगे कि कमली का नाक में दम हो गया।

उस मनहूस भोर को यादकर वह बेतहाशा काँप उठती है जबकि वह अपनी माँ और सौतेले पिता के साथ रात से ही बिस्तर में गहरी नींद में खर्राटेभर रही थी। माँ तो पौ फटने से पहले ही नहा-धोकर मंदिर जल चढ़ाने निकल गई थी। अचानक! उसकी नींद, बाज़ के निशाने पर अपनी जान को तरसती गोरैया की तरह, फुर्र हो गई क्योंकि उस पर बिरजू की ज़बरदस्त जकड़ इस कदर बढ़ती जा रही थी कि पहले तो उसने सोचा कि वह गलती से अपने पिता के भारी-भरकम शरीर के नीचे गई है। लेकिन, अगले ही क्षण उसे पूरा यक़ीन हो गया कि बिरजू उसके साथ कोई नागवार हरक़त करने जा रहा है। बड़े ज़द्दोज़हद के बाद वह उसके चंगुल से मुक्त होकर, पलंग से कूदती-फाँदती बाहर दालान में दरवाजे के कोने से जा टकराई थी। जब वह घिघियाकर अपनी चोट सहला रही थी कि तभी मंदिर से लौट चुकी उसकी माँ ने उसे अपनी बाँहों की बैसाखी से उठा लिया, "अरे, क्या हुआ, कमलेश्वरी बेटा?" उसने जैसे ही उसका माथा चूमा, उसने दहाड़ मारकर अपने फटे कपड़े की ओर इशारा करते हुए, अपना चेहरा उसकी आँचल में छिपा लिया।

वीना को यह समझने में देर नहीं लगी कि कमली हमेशा बिरजू से क्यों दूरी बनाए रखना चाहती थी जबकि वह उसे छेड़ने से बाज नहीं आता था।जब वीना ने अंदर आकर बिरजू को सवालों से घेरना चाहा तो वह उससे कतराकर झटपट बाथरूम में घुस गया।

उसके बाद कई महीनों तक बिरजू और वीना के बीच तूं-तूं मैं-मैं का घमासान दौर चलता रहा। घर की कलह ने हरेक का जीना हराम कर दिया था।एक दिन कमली के तो होश ही उड़ गए जबकि उसने बिरजू को उसकी माँ के साथ हो रही बातचीत को दरवाजे के पीछे से छिपकर सुना था, "कमलेश्वरीकोई मेरी बेटी नहीं है। इसलिए अगर उससे मैं किसी तरह कोई ज़िस्मानी ताल्लुकात बनाता हूँ तो मेरा कोई धर्म भ्रष्ट होने वाला नहीं है।"

उस दिन बिरजू के बाहर जाने के बाद उसकी माँ उसके आगे रो पड़ी थी, "कमली बेटा! बिरजू से ब्याह करने की सज़ा मैं तुम्हें भुगतने नहीं दूंगी। मैं ऐसा समझौता कभी नहीं कर सकती कि माँ-बेटी एक ही मर्द की बीवियाँ बनें। अगर ऐसा हुआ तो मैं ख़ुदकुशी कर लूंगी।"

कमली ने अपना हाथ उसके मुँह पर रख दिया, "शुभ-शुभ बोलो, माँ!"

"जब इतना बड़ा अशुभ इस घर में होने जा रहा है तो शुभ-शुभ क्या बोलूं? उसकी सीलन-खाई आवाज़ में गहरा विषाद घुला हुआ था।

उस दिन शाम को कमली ने कालेज़ से वापस आकर जैसे ही बरामदे में कदम रखा, उसने अपनी माँ को वहाँ एक तैयारशुदा बैग के साथ उसका बेसब्री से इंतज़ार करते हुए पाया। उसे लगा कि माँ कहीं अपने किसी रिश्तेदार के पास अविलंब जाने से पहले उससे मिलकर कुछ ज़रूरी बातें करना चाहती है। लिहाज़ा, इसके पहले कि उसकी माँ कुछ कहती, वह तपाक से बोल उठी, "यह क्या माँ? तुम कहीं जा रही हो?"

"मैं नहीं, तुम जा रही हो।" माँ के चेहरे पर दृढ़ निश्चय का भाव साफ तैर रहा था।

"लेकिन, कहाँ?" वह अनिश्चय के भँवर में डूब-उतरा रही थी।

"कहीं भी... मैं नहीं जानती। मैंने तेरे कुछ कपड़े-लत्ते, कापी-किताब और मैट्रिक और इंटर के दस्तावेज़ इस बैग में रख दिए हैं। तूँ अभी यहाँ सेसुरक्षित निकल जा; मैं नहीं जानती शहर में तेरा कहाँ और कैसे बंदोबस्त होगा?"

उसने बड़ी मुश्किल से अपने आँसुओं को रोके रखा ताकि उसकी ममता उसकी कमजोरी बनकर कमली को नरक में ले जाने की वज़ह बन जाए!अगर वह इस घर में कुछ और दिन रह गई तो वह, वहशी बिरजू से नहीं बच पाएगी। इसलिए, वह उसे वहीं से खींचती हुई सड़क पर एकदम भागती हुई आगई थी और जैसे ही एक बस आकर वहाँ रुकी उसने उसे ज़बरन उसमें चढ़ा दिया, उसके हाथ में कुछ रुपए पकड़ाते हुए..."

कमली अपनी माँ से कई सवाल पूछना चाहती थी; लेकिन, वह तो ज़ल्दबाज़ी में यह भी नहीं कह सकी कि 'माँ, मेरा क्या होगा? यह तो मैं नहीं जानती; लेकिन, मुझे तेरा अंज़ाम अच्छी तरह पता है। बिरजू कुछ ही दिनों में तुम्हें पुरानी फटी-चिथी चड्ढी-बनियान की तरह किसी कूड़ेदान में निपटादेगा...'

उसे अपनी माँ पर बेहद ग़ुस्सा रहा था, 'आख़िर, हम दोनों साथ होते तो दुःख-दर्द मिल-बाँटकर भोग लेते।'

कोई डेढ़ घंटे तक दुश्चिंताओं के झंझावात में पटखनी खाने के बाद जब वह होश में आई तो उसका ध्यान इस सच की ओर गया कि अब उसे इसनिष्ठुर दुनिया का सामना अकेले ही करना है। उसने बस को शहर की किसी भीड़-भाड़ वाले इलाके से गुज़रते हुए पाया और जैसे ही एक रेड लाइट पर बसरुकी, वह उतर गई। वह वहाँ से खिन्न मन, निरुद्देश्य चलते-चलते एक पार्क में गई। बस से उतरने के बाद मन में गोते लगाते हुए, वह खोई-खोई पता नहीं कितनी दूर गई थी, उसे इसका कोई अंदाज़ा नहीं लगा। पर, उसका सारा बदन थककर चूर हो गया था और सिर दर्द से फटा जा रहा था। शायद!काफी देर से कुछ भी खाने-पीने के कारण वह ज़्यादा ही नरवस होती जा रही थी। उसने पार्क के चारो ओर अपनी नज़र दौड़ाई; फिर, कंधे से अपना बैग नीचे रखकर बदन की अकड़न को अंगड़ाई लेकर दूर किया और वहीं घास पर धम्म से एक गठरी की तरह उकड़ूं बैठ गई। उसकी इस हरक़त पर दाईं ओर बैठे कुछ लौंडे चुटकियाँ ले-लेकर हँसते हुए फ़ब्तियाँ कस रहे थे। वह एकदम सकपका गई; लेकिन, उसने बाईं ओर कुछ बुज़ुर्ग व्यक्तियों को देख, राहत की लंबी साँस ली। तभी उसने अचानक ग़ौर किया कि सूरज पश्चिम की ओर तेजी से छिपता जा रहा है और उसकी लाल-पीली किरणों पर काले बादलों का काफ़िला छाता चला जा रहा है। वह काँप उठी, "बाप रे! अंधेरे में मैं कहाँ जाऊँगी?" वह बड़ी तकलीफ़ से अंदर साँस लेकर ख़ुद को चैतन्य बनाने की चेष्टाकर रही थी। निःसंदेह! उसका जोश ठंडा पड़ता जा रहा था। उसे यह भी अहसास नहीं हो पा रहा था कि उसके दिल की धक-धक चल रही है या नहीं...।उसने पल भर को दाईं ओर नज़र दौड़ाई--शरारती लौंडे खिसककर और पास गए थे जबकि बाईं ओर बैठे पाँच बुज़ुर्गों में से तीन जा चुके थे और बाकी दो भी उसकी ओर टकटकी लगाए हुए लगातार उसे देखते जा रहे थे। उसे लगा कि ये बुज़ुर्ग भी कुछ देर में कहीं चले जाएंगे। फिर, उसका क्या होगा? ये लौंडे तो...

उसने लौंडों के चेहरों को बारी-बारी से देखा। उसे हैरत हो रहा था कि हरेक के चेहरे पर बिरजू का अक्स दिखाई क्यों दे रहा है। उसके रोएं भय से सिहरकर खड़े हो गए। उसके दिमाग में सुबह के अख़बार की मोटी हेडलाइन कौंध गई--रास्ता भटकी युवती का सामूहिक... उसे यह सोचकर ताज़्ज़ुब हो रहाथा कि अभी तो उसका बलात्कार हुआ ही नहीं; फिर, यह ख़बर पहले ही कैसे छप गई? वह उस ख़बर में बताई गई हर बात से स्वयं को जोड़कर आतंकित हुई जा रही थी। उसे लगा कि यह अंधेरा, रात के पसरने के कारण नहीं, बल्कि किसी अज्ञात बीहड़ जंगल में किसी अंधी गुफ़ा में भटक जाने के कारण चारो ओर फैलता जा रहा है।

सहसा, उसकी तंद्रा टूट गई जैसेकि उसके सिर पर किसी ने गरम हथौड़ा मार दिया हो, "तुम यहाँ रास्ता भटक गई हो, या..." एक बुज़ुर्ग ने उसकेपास आकर यह सवाल किया। चारो लौंडे भी चौड़े होकर उसके पास गए और उसे घेरते हुए खड़े हो गए। तब तक दूसरा बुज़ुर्ग भी वहाँ धमका था--एक निहायत भद्दी मुस्कान के साथ जो उसकी सफेद मूँछों के नीचे चेहरे पर उभरी रेखाओं से साफ झलक रही थी। उसने अपने पपड़ाए होठों पर जीभ लिसोढ़ते हुए अपनी शरारती आँखें मिचमिचाई, "कोई बात नहीं, रास्ता भूल गई हो तो क्या हुआ? आज रात तुम मेरे यहाँ ठहर जाओ; कल सबेरे ख़ुद मैं तुम्हें अपनी गाड़ी से जहाँ कहोगी, वहाँ छोड़ आऊँगा।"

उसकी बात पर लौंडे हिहियाते हुए बड़ी बेशर्मी से हँस पड़े। कमली को लगा कि जैसे हजारों बिच्छुओं ने एक-साथ उसे डंक मार दिया हो। उसने अपनेसीने पर हाथ रखा; बेशक! उसका दिल धड़क रहा था--वह भी बड़ी तेजी से। वह उछलती हुई उठ खड़ी हुई और लगभग चींखती हुई अपने बैग को कंधे परलटकाने लगी, "तुम सभी बड़े बदतमीज़ हो। मैं इसी कालोनी में रहती हूँ। उधर देखो, वो मेरा घर है..." उसने पार्क से बाहर बिजली की रोशनी में चमकरहे एक बड़े से घर की ओर इशारा किया। चूँकि वह उनसे बुरी तरह घिरी हुई थी और उनकी आँखें विषबुझे चाकुओं की तरह उसके बदन में चुभ रही थीं;इसलिए, वह उन्हें यह अहसास दिलाने के लिए कि वह सच कह रही है, लंबे-लंबे डग भरते हुए पार्क से बाहर गई और उसी घर का गेट खोलकर अंदर घुसने लगी। पर, ठिठक गई।

"अरे-रे-रे-रे! कौन हो तुम और क्या काम है?" सामने उस घर की मालकिन ने उसका रास्ता जाम कर दिया।

"वो-वो, वो कुछ आदमी मेरा पीछा कर रहे हैं," उसने अंगुली से पार्क की ओर इशारा किया जहाँ कोई भी नज़र नहीं रहा था।

"तुम्हें कहाँ जाना है?" महिला ने उसके बैग को ध्यान से देखा।

"कहीं नहीं। हाँ-हाँ, यहीं कहीं।" वह हकलाकर रह गई।

महिला को विश्वास हो गया कि वह अपने घर से भागी हुई कोई लड़की है। उसने उसके उभरे हुए उरोज़ को घूरकर देखा और उसके चेहरे पर अपनीआँखें गड़ा दीं, "अच्छा-अच्छा! मैं समझी। तुम गाँव से काम ढूँढने शहर आई हो। तुम्हारी जैसी कई लड़कियाँ कामकाज के फिराक में मोहल्लेभर घूमती फिरती हैं।"

"जी-जी! हाँ मैडम! मैं काम की तलाश में ही इधर का चक्कर लगा रही हूँ। चौका-बर्तन, रसोई, झाड़ा-पोछा, सब करती हूँ..." पता नहीं, कमली का दिमाग कैसे इतना चल गया कि उसकी ज़ुबान से ऐसी बातें अपने-आप ही फूट पड़ीं?

"कुछ पढ़ी-लिखी भी हो?" महिला ने उसके पहनावे और बातचीत से उसकी औकात का अंदाज़ा लगाया।

वह संकोच में डूब गई। फिर, उसने अपना अंगूठा दिखा दिया, "नहीं, नहीं, मैडम! मैं अंगूठाछाप, एकदम अंगूठाछाप हूँ।" उसे लगा कि अगर उसने अपनी शैक्षिक योग्यता बताई तो उसे एक पल भी उस घर में टिकने नहीं दिया जाएगा।

कुछ देर और बातें करने के बाद जब उस महिला को यक़ीन हो गया कि यह लड़की सचमुच ज़रूरतमंद है तो वह उसे घर के अंदर ले गई। घर मेंघूम-घूमकर उसने उसे सारा कामकाज समझाया और फिर बरामदे में कुर्सी पर बैठते हुए उसके सामने हिदायतों का पुलिंदा खोल दिया, "देखो! यहाँ कोईचोरी-चकारी की तो सीधे थाने का रास्ता दिखा दूंगी। काम साफ-सुथरा करना; हाँ, टाइम से सब निपटाना। साहब सुबह आठ बजे आफिस को निकलते हैं।उनका लंच तैयार करना और उसके बाद घर का सारा कामकाज और रसोई... लेकिन, एक बात और..."

"क्या मैडम?" कमली की तो जैसे साँस ही अटक गई।

"सा' से ज़्यादा ज़बानज़दग़ी मत करना। वर्ना! कान उमेठकर बाहर खदेड़ दूँगी।"

कमली ने, माँ की डाँट खा रहे एक बच्चे की तरह अपना सिर हिलाया और मैडम के इशारे पर अपना बैग उठाकर ऊपर सींढ़ियाँ चढ़ने लगी। कुछ देरबाद जब वह बरामदे में दोबारा आई तो उसने मैडम को साहब से बातें करते हुए सुना, "सुनो जी! बड़े मजे की नौकरानी आज चंगुल में फँसी है। कई दिनों से मैं एक नौकरानी की फिराक़ में कहाँ-कहाँ नहीं भटकी? मुझे तो यह कोई मज़बूर लड़की लगती है।" साहब ने घूमकर लड़की को अंदर जाते हुए देखा।पलभर के लिए कमली की नज़रें भी साहब से टकराईं। उसने जाते हुए अपना नितंब ऐसे झाड़ा जैसे कि साहब की आँखें वहाँ चिपक गई हों।

कोई सालभर में कमली ने अपनी जी-तोड़ मेहनत से घर की गृहस्थी में हींग और फिटकरी लगाकर इसका रंग इतना चोखा बना दिया वह घर,मंदिर जैसा दिखने लगा। कभी-कभार वह बीमार पड़ जाती तो जैसे पूरे घर में जंग लग जाता। बहरहाल, उस घर में आकर उसने ख़ुद को बड़ा महफ़ूज़ पायाथा। इसलिए, उसने निश्चय कर लिया कि वह उस घर की चाकरी करते-करते भले ही बूढ़ी होकर मर-खप जाए, उसका चौखट कभी नहीं छोड़ेगी। लेकिन, एकदिन उसने ख़ुद को दो-राहे पर बड़े धर्म-संकट में खड़ा पाया। उसने महसूस किया कि कुछ दिनों से मैडम उसके प्रति विशेष दयालु होती जा रही हैं और अब उनका रवैया पहले की तरह शुष्क और तीखा नहीं रहा। अब वे उसे ज़बरन पकड़कर सोफे पर बैठाती, बेडरूम में बुलाकर अपने सिरहाने सिर दबाने को कहती और यहाँ तक कि कभी-कभी डाइनिंग टेबल पर साथ खाना खाने की ज़िद भी करतीं। कमली को लगने लगा कि मैडम निःसंतान होने के कारण अपनी ममता और वात्सल्य उस पर लुटाना चाहती हैं। बहरहाल, एक दिन मैडम के बदले हुए व्यवहार का रहस्य उसे तब पता चला जबकि साहब सुबह आफिसजा चुके थे। उसने ड्राइंगरूम में कमली को सोफे पर बैठाते हुए उसकी पीठ पर बड़े प्यार से हाथ फेरा, "कमली, तुमने काफी समय से इतने दिलो-जान सेइस घर की सेवा की है कि मैं तुम्हें अपनी बहन जैसी मानने लगी हूँ। अब तुम इस घर की सदस्य जैसी हो गई हो। हमारी तुमसे बड़ी आशाएँ हैं। मैं वादाकरती हूँ कि मैं तुम्हारे प्रति अपनी सारी ज़िम्मेदारी तुम्हारी बड़ी बहन की तरह निभाऊंगी। आख़िर, जब तुम इस घर की इतनी चिंता करती हो तो मेरी भी ड्युटी बनती है कि मैं तुम्हारी चिंता करूँ!"

उस क्षण, कमली उसकी बातों से इतनी भाव-विह्वल हो गई थी कि वह सुबगती हुई उसके पैरों से लिपट गई, "मैडम! मैं हालात की मारी हुई हूँ।आपने मुझे सहारा देकर ज़िंदगीभर के लिए कर्ज़दार बना दिया है। मैं आपका कर्ज़ उतारने के लिए ख़ुद से जो भी बन पड़ेगा, वह खुशी-खुशी करूंगी। मैं इसज़ुबान से कभी नहीं मुकरूंगी।"

मैडम ने बड़ी चालांकी से उसकी ज़ुबान पकड़ ली, "कमली! तुम अगर चाहो तो तुम मुझ पर सिर्फ़ एक उपकार करके केवल अपना कर्ज़ उतार सकती हो, बल्कि उल्टे मुझे कर्ज़दार भी बना सकती हो..."

"वो कैसे?" उसका मुँह ताज़्ज़ुब से खुला रह गया।

उसने उसे उठाकर अपने सीने से लगाया। फिर, उसका माथा सहलाने लगी, "तुम मेरे बच्चे की माँ बन जाओ, कमली! मैं तुम्हारा यह अहसान मरते दम तक नहीं भूलूंगी..."

"मैं आपका मतलब नहीं समझी, मैडम!"

मैडम की आँखें बरसने लगीं, "इस घर की दीवारें एक बच्चे की किलकारियों की मोहताज़ हैं। भगवान ने मुझे औरत का रूप-रंग तो दिया है; पर,मुझसे माँ बनने का हक़ छीन लिया है। बहुत कोशिश की मैंने और तुम्हारे साहब ने; लेकिन, क़िस्मत का बदा हम नहीं टाल सके। मेडिकल जाँच से पताचला कि कमी मुझमें है। मैं कभी माँ नहीं बन सकती..."

वह फफकते हुए कमली के सीने से लिपट गई।

"लेकिन, इसके लिए मुझे करना क्या होगा?" कमली अभी भी नहीं समझ पा रही थी कि वह, मैडम की मदद किस प्रकार से कर सकेगी।

मैडम उसके सीने से अलग होकर दोनों हाथ बाँधकर खड़ी हो गई, "बच्चे पैदा करने के लिए जो एक औरत करती है, वही तुम्हें करना होगा। बस कुछ मिनट अपने साहब के साथ...इसके लिए मैं तुम्हें मुँहमांगा ईनाम दूंगी!"

कमली अवाक रह गई। उसने सोचा भी नहीं था कि उसे मैडम के अहसानों का बदला इस तरह चुकाने के लिए मज़बूर होना पड़ेगा। उसने बड़े धर्म-संकट में अपना सिर झुका लिया। उसकी चुप्पी बता रही थी कि उसे सारी बातें समझ में गई हैं। कुछ मिनट, मौन अज़गर की तरह उसाँसें लेता हुआ पसरा रहा। फिर, वह सोचने लगी, "जब मैडम सारे भेदभाव मिटाकर मेरे प्रति इतनी आत्मीयता से पेश रही हैं तो मैं भी अपना सर्वस्व उस पर न्यौछावर करने से पीछे नहीं हटूंगी।"

कमली के तलवे से चिपकी जुबान फिर हिल उठी, "पर, मैडम! मेरा क्या होगा? क्या मुझ अभागन की क़िस्मत में यही सब लिखा हुआ है?"

मैडम ने अपना हाथ उसके मुँह पर रख दिया, "तुम्हें बिल्कुल घबड़ाने की ज़रूरत नहीं है, कमली! उसके बाद मैं तुम्हारी परवरिश अपनी बहन की तरह करूंगी। तुम्हारी ज़िंदगी की सारी ज़रूरतें पूरी करूंगी। तुम्हारा शादी-ब्याह और सब कुछ..."

 कमली को लगा कि जैसे मैडम के शब्दों ने उसके हाथ-पैर में बेड़ियाँ डाल दी हैं जिनसे वह कभी मुक्त नहीं हो सकेगी। उसने अहसास किया किउसके लिए ये बेड़ियाँ ही अच्छी हैं। लिहाज़ा, वह तो पहले ही मैडम का कर्ज़ उतारने के लिए अपनी जुबान हार चुकी है।



कमली ने जोर से अपना सिर झटककर हिलाया और वह वापस वर्तमान की खुरदरी जमीन पर गई। इसके पहले कि वह मैडम की कर्कश पुकार,"कमली, हरामज़ादी! कहाँ मर गई, तूँ" बार-बार सुनने के बाद सींढ़ियाँ उतरकर उसके पास पहुँचती, मैडम उसके सामने ऐसे धमकी, जैसेकि आसमान से बिजली टूट पड़ी हो। वह अपनी मुट्ठी में बंद दुपट्टा उसके चेहरे पर मारते हुए चींख उठी, "यह क्या? अपना गंदा दुपट्टा मेरे बच्चे पर डाल रखा है..."

"जी, जी, वो! बच्चे के मुँह पर मक्खियाँ भनभना रही थीं। इसीलिए, मैंने अपने दुपट्टे से बच्चे को ढँक रखा था..." वह सलीके से हकला भी नहीं पा रही थी।

पर, गुस्से में मैडम बेकाबू हो गई थी। उसने आगे बढ़कर एक झन्नाटेदार तमाचा कमली के मुँह पर रसीद कर दिया। कमली तो तमाचा खाकर जड़हो गई। मैडम लगातार चींखती जा रही थी, "हरामज़ादी! अहसानफरामोश! नाबदान का कीड़ा..." और फिर, वह उसके सारे कपड़े और सामान सब बालकनी से नीचे फेंकने लगी।

कमली कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। लेकिन, मैडम के सख़्त बर्ताव से यह साबित हो चुका था कि मैडम उससे येन-केन-प्रकारेण छुटकारा पानाचाहती है। आख़िरकार, उसने भी यह तय कर लिया कि अब उसे इस घर में पल भर भी नहीं टिकना है। उसने नीचे आकर अपने सारे बिखरे कपड़े-लत्ते इकट्ठे किए और उनकी एक गठरी बनाई। कुछ देर वह गठरी पर सिर रखकर बिलखती रही। फिर, वह अचानक गठरी को कंधे पर डालकर गेट की ओर बढ़ने लगी। उसने एक बार फिर सिर घुमाकर मैडम की ओर देखा कि शायद! जाते-जाते वह उसे रोक ले या यह कहने लगे कि 'कमली! अभी इस घर कोतेरी बहुत ज़रूरत है। बच्चे को पालने की ज़िम्मेदारी भी तेरी है। इसे स्तनपान कौन कराएगा?' पर, वह तो लगातार गुर्राए जा रही थी, "गेट आउट, यूप्रास्टीट्यूट..."

कमली सामने पार्क में उसी स्थान पर गठरी रखकर कुछ देर सुस्ताने बैठ गई, जहाँ पर वह कोई दो साल पहले आकर बैठी थी। उसके कान में मैडम की निर्मम आवाज़ अभी भी उसे अंदर तक झँकझोर रही थी। उसने अपने मन को टटोला; उस दिन भी उसकी मनःस्थिति कुछ-कुछ आज जैसी ही थी। उस दिन वह कुछ वहशी मर्दों से छुटकारा पाना चाह रही थी जबकि आज कुछ कुत्ते उसे और उसकी गठरी को बार-बार सूँघ रहे हैं। वह फुसफुसाने लगी, "अबमुझे आदमी नहीं, कुत्ते ही पूछेंगे। औरत मिट्टी की ऐसी हांडी है जो केवल एक बार ही आग पर चढ़ती है।" आज उसे अपनी माँ बहुत याद रही है। वह सिसक उठी, "मुझे अपनी माँ के पास जाना है। काश! मैं आख़िरी बार अपने बच्चे का मुँह देख लेती!" उसने पलभर के लिए मैडम के घर की ओर टकटकीलगाकर देखा। मैडम, गेट पर किसी औरत से बातें कर रही है। बेशक! वह कोई कामवाली होगी। कमली के जी में आया कि वह अभी जाकर उस औरत को बता दे कि 'उस घर में काम करने का अर्थ है--अपनी आबरू को गिरवी रखना। शायद! मैडम दूसरी संतान की इच्छा इसी औरत से पूरी करे!' उसने औरत को बड़ी हमदर्दी से देखा। पलभर को वह हैरत में पड़ गई। उसने औरत को बड़े ध्यान से देखा; वह लगभग चींख उठी, "अरे! यह तो मेरी माँ है? तो क्या माँ भी बिरजू की यातनाओं से छुटकारा पाने के लिए यहाँ गई..." वह उठकर दौड़ पड़ी--"माँ, माँ!" लेकिन, तब तक औरत अंदर जा चुकी थी और मैडम ने भीतर से गेट बंद कर लिया था।  
('हिमप्रस्थ' अंक 10, जनवरी  2012,   घोड़ी चौकी, शिमला में प्रकाशित ) 
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