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'कॉपीराइट':लेखन, कला, नृत्य या संगीत के क्षेत्र में पूर्णकालिक रहकर जीवन चलाना आसान नहीं है।

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अगस्त 07, 2012 | मंगलवार, अगस्त 07, 2012


आलेख:-कॉपीराइट से मुक्ति की बात ख़तरनाक है
लेखक:-उद्भ्रांत
साभार स्त्रोत:-जनसत्ता में पंद्रह जुलाई 2012 को छापा गया था  

राजकिशोर बहुविज्ञ फ्रीलांस पत्रकार हैं सो सभी तरह के विषयों पर उनकी कलम चलती रहती है। कई बार उनकी सूक्ष्मान्वेषी दृष्टि चकित करती है। विगत वर्षों में उन पर गांधी का प्रभाव भी झलकने लगा है। लोहियावादी रहे, कम्युनिस्ट रहे--शायद मार्क्सवादी के कार्ड होल्डर भी, नहीं तो सिम्पैथाइज़र। शुरू के दिनों में नवगीत लिखते थे, फिर उपन्यास जैसी विधा में हाथ आज़माया। नवभारत टाइम्स में पत्रकार, पिछले साल वर्धा में ‘राइटर इन रेसिडेन्स’ और अब ‘पूर्ववत’ फ्रीलांसर। ये सारी विशेषताएं उनके लेखन में प्रतिबिम्बित होती रहती हैं।
मगर कई बार वे बहुत निराश करते हैं। कॉपीराइट का सवाल (8 जुलाई, 2012) उठाते हुए यह कह देना कि ‘पूर्णकालिक लेखन साहित्य के साथ एक भद्दा मज़ाक है’ स्वयं में ही एक भद्दा मज़ाक है, जिसकी अपेक्षा मुझे उनसे नहीं थी। बंगाल की समृद्ध संस्कृति से वाकिफ़ लेखक जानता है कि शरतचंद्र, विमल मित्र की परम्परा कैसी है, इसीलिए अगला वाक्य--‘अच्छा है कि हिंदी में ऐसे लेखक कम हैं जो वर्धा से लौटने की स्वाभाविक परिणति है। ‘पूर्णकालिक लेखक’ तो किसी भी भाषा में कम ही होंगे, मगर ऐसे साधकों का मज़ाक उड़ाना शोभनीय नहीं। अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर, निर्मल वर्मा इसी श्रेणी में आयेंगे। कानपुर के भगवती प्रसाद वाजपेयी आजीवन मसिजीवी रहे। वहीं के बाबू प्रतापनारायण श्रीवास्तव अंग्रेज़ों के ज़माने की एक रियासत में जज के प्रतिष्ठापूर्ण पद को छोड़कर तीस वर्ष तक पूर्णकालिक लेखक रहे। इन लेखकों के तपोनिष्ठ जीवन का मैं साक्षी रहा हूँ। भगवतीचरण वर्मा ने पूर्णकालिक लेखक रहकर प्रतिष्ठापूर्ण जीवन भी जिया।
यहाँ मैं प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, यशपाल, जैनेंद्र, दिनकर या अश्क की बात नहीं कर रहा, जिन्होंने अपनी पत्नी या पुत्र के सहयोग से प्रकाशनगृह चलाया। वैसे देखा जाये तो वे भी पूर्णकालिक लेखक ही थे। निराला और उग्र ने महादेव सेठ के मतवाला प्रेस में कुछ समय जो काम किया, वह कोई नौकरी जैसा नहीं था। इनमें से अधिकांश के जीवन चरित आ चुके हैं। लेखन के लिए समर्पित इनका जीवन अभावों से परिपूर्ण एक साधक का जीवन था जो लस्टम-पस्टम चल सका तो इसीलिए कि कॉपीराइट उनके पास था, जिसके बल पर वे प्रकाशक से पारिश्रमिक ले पाते थे। भले ही वह जितना मिलना चाहिए उससे कम होता था। मगर इस रोग का इलाज तो आज भी किसी के पास नहीं है। तमाम तरह के संघर्ष--यहाँ तक कि वर्ष 1974 में भैरवप्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय और रघुवंश जैसे दिग्गज लेखकों द्वारा बुलाये गए त्रिदिवसीय लेखक सम्मेलन--के बाद भी इसका संतोषजनक हल नहीं मिल सका है।
उन ‘पूर्णकालिक लेखकों’ में से कौन-सा लेखक ‘समाज की वास्तविक प्रक्रियाओं से’ कटा हुआ था? किस लेखक को तत्कालीन ‘यथार्थ की कम समझ’ थी? बड़ा आदर्श वाक्य है कि ‘कमाने के लिए हर आदमी को श्रम करना चाहिये और जब उसकी मर्जी हो तब उसे लिखना, रँगना, गाना या नाचना चाहिए’! लेखक से पूछने का मन होता है कि अपना सम्बंधित लेख क्या उसने बिना परिश्रम के जादुई छड़ी घुमा कर लिखा है? बच्चन जी को अपनी आत्मकथा के तीन ड्राफ़्ट करते मैंने देखा है। टॉलस्टाय ने ‘युद्ध और शांति’ जैसे विशालकाय उपन्यास को शायद दर्जन बार ड्राफ़्ट किया। श्रीलाल शुक्ल ने ‘रागदरबारी’ के फ़ाइनल ड्राफ़्ट में एक तिहाई पृष्ठ कम कर दिये थे। जब बच्चन जी और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखक इतना श्रम करते थे तो पूर्णकालिक लेखक कितना करते होंगे, इसका अनुमान टॉलस्टाय के उदाहरण से मिल जाता है। लेखन में दोनों तरह का श्रम लगता है--शारीरिक के साथ मानसिक भी। प्रेमचंद इसीलिए स्वयं को ‘कलम का मज़दूर’ कहते थे। प्रिय भाई, आपके हाथ न चलते होते और रघुवंश ने पाँव के अँगूठे से लिखने के कष्टप्रद श्रम की असाध्य कला विकसित न की होती तो लेखक का सारा चिंतन हवा-हवाई ही रहता या आप गुरू-शिष्य परम्परा का निर्वाह करते हुए शिष्य से अपने बोले हुए को लिखाने का ‘श्रम’ करा रहे होते! इस अत्याधुनिक कम्प्यूटर युग में भी रिकॉर्डेड विचारगोष्ठियों के दस्तावेज़ीकरण में धन के साथ कितना श्रम भी लगता है इसे नामवर जी द्वारा कुछ महीने पूर्व लोकार्पित ‘आलोचना का वाचिक’ पढ़कर आप जान सकते हैं। युवा आलोचक-सम्पादक आशीष त्रिपाठी भी आपकी जानकारी में इज़ाफ़ा करने में समर्थ होंगे।
ताज्जुब है कि राजकिशोर ‘रंगने’ (चित्रकला), ‘गाने’ (शास्त्रीय गायन) और ‘नाचने’ (शास्त्रीय नृत्य) में शारीरिक श्रम की अनिवार्य भूमिका से अनभिज्ञ हैं! बड़े गुरूओं की तो बात छोड़िये, थोड़ा-सा भी नाम जिनका हो गया है वे बता देंगे कि गायक और नर्तक प्रतिदिन छह से आठ घंटे का रियाज़ करने के बाद उस यत्किंचित उपलब्धि को पा सके हैं! यहाँ तक कि ठुमरी, ग़ज़ल के अलावा आल्हा, चैती, फाग और रसिया गाने वाले लोकगायक और विभिन्न शैलियों के लोकनर्तक भी जब अपनी प्रस्तुति के बाद मंच से उतरते हैं तो पसीने से उनके कुरते महक रहे होते हैं। तीजनबाई को देखिये। प्रत्यक्ष न सही तो ‘बुद्धू बक्से’ में ही! या अपनी आर्ट गैलरी में कैनवस पर रंगों के नृत्य से उत्पन्न चित्तलोभी मूर्त्त-अमूर्त्त रूपाकारों के अंकन के आविष्कार-हेतु घंटों हाथ में तूलिका लिये बैठे किसी चित्रकार को। किसी संगीतकार को किसी गीत की नयी धुन बनाने के लिए शाम से आधी रात तक मगज़मारी करते मैंने देखा है। बिना इसके कलाओं में अन्तर्भूत श्रम का महत्त्व आपकी समझ में नहीं आएगा।
ठीक है कि कबीर जीविका-हेतु हाथ का श्रम करते थे, मगर उनकी साखियाँ या पद शाम की फु़रसत की ‘मर्ज़ी’ में नहीं निकलते थे। हाथों के श्रम के साथ उनकी वाणी से साखियाँ प्रकट होती थीं जिन्हें उनके भक्त या शिष्य भोजपत्र पर लिखते या कंठाग्र करते थे। सूर, तुलसी और मीरा अपने काव्य का गायन-कीर्तन घंटों तक मंदिरों में या दर-दर घूमते हुए अवश्य करते थे और समाज से जो रूखा-सूखा मिलता था उसी से अपना गुज़ारा कर लेते थे। मगर वह दूसरा युग था। कागज़ का आविष्कार नहीं हुआ था, ‘बाज़ार’ ने हमला नहीं बोला था, प्रकाशक का जन्म नहीं हुआ था! कॉपीराइट की बात नहीं सोची जा सकती थी। उनके परिवार नहीं थे या उन्होंने परिवार छोड़ा हुआ था। फिर भी याद रखना होगा कि रामलीला मंडली की स्थापना तुलसी ने ही की थी जो स्थान-स्थान पर रामलीलाएं करती थी। अब इसे किसी अभिनेता या स्ट्रगलर से पूछिये कि जिसे परदे पर या नाटक में प्रत्यक्ष देखकर दर्शक खुशी से तालियाँ पीटते हुए हर्षध्वनियाँ करते हैं, उस चरित्र को अपने अभिनय से मूर्त्त करने की पृष्ठभूमि में उसका कितना श्रम और समर्पण-भाव लगा है! शूटिंग के दौरान अभिनेता श्याम की घोड़े से गिरकर हुई मृत्यु और ‘कुली’ में अमिताभ बच्चन पर लगी मरणांतक चोट बताती हैं कि इस कला में भी श्रम के साथ संघर्ष और ख़तरा कितने घुले-मिले हैं। बलराज साहनी की आत्मकथा ही पढ़ लें।
जेनुइन रचनाकार की प्रकृति नियमित नौकरी में लगने वाले श्रम के अनुकूल प्रायः नहीं होती। वह लीक छोड़कर चलता है और ऐसा करने में जान को जोखिम में डालने वाले परिश्रम को भी खुशी से स्वीकारता है। इसीलिए भक्त कवि कहता था--‘संतन कहा सीकरी सों काम?’ आधुनिक युग में भी ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे। जीविका-हेतु नौकरी करने वाले दो-चार लेखकों को छोड़कर अपनी नौकरी में सफलता पाने या उससे संतुष्टि पाने वाला लेखक या कवि आपको शायद ही कोई मिलेगा।
अंग्रेज़ी छोड़कर, पूर्णकालिक लेखक हिंदी में ही नहीं, अन्य भाषाओं में भी कम मिलेंगे। विदेशों में तो लेखन को व्यवसाय का दर्ज़ा मिला हुआ है और एक ही किताब से लेखक को इतनी रॉयल्टी मिल जाती है कि वह कई बरस तक शान से ज़िंदगी व्यतीत कर सकता है। इधर अपने देश में भी ‘शिवा ट्रायलोजी’ वाला लेखक अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक लेखक बन गया है!
तो हिन्दी में अगर पूर्णकालिक लेखक कम हैं तो उसके लिए रोना क्यों? कारणों का पता सबको है। हिन्दुस्तान में लेखन, कला, नृत्य या संगीत के क्षेत्र में पूर्णकालिक रहकर जीवन चलाना आसान नहीं है। जीवनयापन की परिस्थितियाँ निरंतर दुष्कर होती जा रही हैं। एक सच्चा लेखक या कवि या कलाकार अपने को समग्ररूपेण कला के लिए समर्पित करना चाहता है मगर सामाजिक परिस्थितियाँ इसकी अनुमति नहीं देतीं। नौकरी की और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभाने के बाद बचे अत्यल्प समय अथवा असमय में जब वह अपने रचनात्मक कर्म के लिए प्रवृत्त होता है तो उसी भावना से विवश होकर। पूर्णकालिक लेखक ‘स्त्री का अपने सौंदर्य पर जीना’ जैसा ‘भद्दा मज़ाक’ नहीं है। ऐसा कहकर आप उस लेखक का अपमान कर रहे हैं। अगर तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी कोई निर्मल वर्मा, कोई विष्णु प्रभाकर, याद्रवेंद्र शर्मा चंद्र, कोई निराला, नागर या उग्र अथवा बांग्ला के शरत् या विमल मित्र ऐसा कर पाते हैं तो हमें ऐसे साधक-तपस्वियों को श्रद्धा से स्मरण करना चाहिए, न कि उनका मज़ाक बनाना!
रॉयल्टी के सवाल पर टॉलस्टाय और पत्नी सोफ़िया के झगड़े का उल्लेख करते हुए राजकिशोर की कल्पना है कि विवाह के समय सोफ़िया को अपने माता-पिता से ‘भारी स्त्री-धन मिला होता’ अथवा ‘परिवार का भरण-पोषण आराम से’ सम्भव करने वाला ‘अपना काम’ खुद कर रही होती तो उसके ‘प्रसन्न होने की संभावना’ ज़्यादा होती, क्योंकि ‘किताबों की बिक्री थोड़ी और बढ़ जाती’, क्योंकि ‘किस लेखक को पाठक नहीं चाहिए?’ इन दोनों बातों में अन्तर्विरोध है।
कोई गारंटी नहीं है कि सोफ़िया प्रसन्न हुई होती। वे पत्नी होने के नाते लेखक की सम्पत्ति--जिसमें बौद्धिक सम्पत्ति भी शामिल है--की उत्तराधिकारिणी थीं। ज़्यादातर मामलों में लेखक-पत्नियों का नज़रिया भौतिक दृष्टि से संचालित होता है जो लेखन को व्यर्थ का शग़ल मानती हैं। उस व्यर्थ के शग़ल से ‘अर्थ’ की प्राप्ति कॉपीराइट सुरक्षित रखने से ही संभव हो सकती है। टिप्पणी-लेखक सोफ़िया का उल्लेख करते हुए कहता है कि ‘किस लेखक को पाठक नहीं चाहिए’? लेकिन सोफ़िया तो लेखक नहीं थी! उसे पाठकों की बढ़ोत्तरी से तभी मतलब होता, जब टॉलस्टाय की मृत्यु के बाद वह उनकी किताबों के अधिकार की स्वामिनी होती और उसे अधिक पारिश्रमिक मिलता।
तीसरी और सबसे आपत्तिजनक बात राजकिशोर का यह कहना है कि कॉपीराइट होने की स्थिति में अगर ‘लेखक सफल है यानी उसका बाजार मूल्य चढ़ा हुआ है तो वह अपनी किताबों की कमाई पर वैसे ही सुगमतापूर्वक जी सकता है जैसे कोई स्त्री अपने सौंदर्य को बाजार में बेचकर’। घृणास्पद होने की सीमा तक चला गया कुतर्क है। मुझे आश्चर्य है कि राजकिशोर को हो क्या गया है! कोठे पर बैठने या बाजार में विपणन का औजार बनने वाली एक तरह की तवायफ़ की कोटि में पूर्णकालिक लेखक को रखकर प्रकारान्तर से यह टिप्पणी-लेखक स्वयं को ही गाली दे रहा है, क्योंकि उसकी स्वयं की पुस्तकें भी तो अभी तक कॉपीराइट से मुक्त नहीं हुई हैं!
ध्यान रखिये कि पुस्तक का कन्टेन्ट महत्त्वपूर्ण होता है। अनुपम मिश्र की कॉपीराइट-मुक्त किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ की विभिन्न प्रकाशनों से लाखों प्रतियाँ अगर बिकी हैं तो उसकी सहज भाषा, रोचक प्रस्तुति और पानी के असंदिग्ध महत्त्व को निरूपित करने वाली सामाजिक सोद्देश्यता के कारण। किताब में गुणवत्ता नहीं है तो उसे कोई प्रकाशक नहीं छापेगा या अधिक प्रतियाँ नहीं छापेगा। गांधी होना तो सबके बस की बात नहीं--राजकिशोर के लिए भी नहीं--कि ट्रस्ट बन जाए और रॉयल्टी उसमें चली जाए। शैलेश मटियानी जैसे दिग्गज पूर्णकालिक लेखक की सन्तति को भी रॉयल्टी की इतनी राशि नहीं मिलती कि परिवार ठीक से जीवनयापन कर पाता, जिस कारण जैसे-तैसे उसे नौकरी के लिए भी कोशिशें करनी ही पड़ती हैं।
चूँकि अधिकांश लेखकों का परिवार भी है इसलिए वे कॉपीराइट से मुक्ति की बात नहीं करेंगे। प्रकाशक तो अभी भी अपना घर भरने में सक्षम हो जाता है। तब तो वह खुले खजाने और भी लूट करेगा! अभी तो यदा-क़दा कोई सिरफिरा लेखक या कवि इस या उस मुद्दे को लेकर कोर्ट पहुँच भी जाता है। तब उसके पास अपनी वैचारिक सम्पत्ति को लुटेरों द्वारा लुटते देखने की बेचारगी के सिवाय कुछ भी नहीं होगा।
या तो आप संत बन जायें, जो आप हो नहीं सकते। आप इसी समाज में रह रहे हैं। परिवार के भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा और रहने के लिए छोटा ही सही घर भी चाहिए--अपना नही ंतो हर महीने आय का एक तिहाई से अधिक हिस्सा बिना किसी रिटर्न के खर्च करा देने वाला किराये का ही सही! अपनी साधारण-सी नौकरी में (आखि़र कितने लेखक आई.ए.एस., पी.सी.एस., आई.पी.एस., विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर या इन पंक्तियों के लेखक जैसे दूरदर्शन या आकाशवाणी के वरिष्ठ अधिकारी या वरिष्ठ पत्रकार बन पाते हैं!)। ईमानदारी के साथ सिर्फ़ वेतन के बल पर यह सब मिलना भी अंत समय तक आसान नहीं हो पाता! तब यह सोचिये कि लेखक बेचारा अगर किसी तरह नौकरी के बाद के समय को सृजन में तब्दील करने के बाद कॉपीराइट के बूते अपने परिवार के लिए कुछ पैसा (भले ही वह वास्तविक से कम हो) रॉयल्टी के रूप में पा जाता है तो वह उसे क्यों छोड़े--ऐसे अवसर की ताक में  बैठे गिद्धों के लिए! ध्यान रखिये कि मैं जासूसी या सड़क छाप रोमैन्टिक उपन्यासों अथवा अन्य लोकप्रिय लेखकों की बात नहीं कर रहा।
यह तो मानी हुई बात है कि किताब को अधिकाधिक बिकने के लिए उसमे नूतन उद्भावना वाले लोकरंजक या लोकप्रसारक तत्व अवश्य होने चाहिए। अगर वे नहीं होंगे तो सर्वाधिक बिकने वाला साहित्यरूप उपन्यास तक नहीं बिकेगा--जैसी प्रतीति इसी अंक में रमेशचंद्र शाह के उपन्यास ‘कथा सनातन’ की समीक्षा लिखते हुए सत्यदेव त्रिपाठी ने कराई है। और विश्वास करिये कि अगर उनकी मौजूदगी है, तो ‘कविता के अंत’ की उद्घोषणा और ‘कविता नहीं बिकती’ जैसे प्रकाशकीय फ़तवों वाले इस अँधेरे समय में कविता की पुस्तक भी बिकेगी। आत्मोल्लेख के लिए क्षमा माँगते हुए यह उदाहरण देना चाहूँगा कि एक वर्ष से भी कम समय में अपने नवीनतम महाकाव्य ‘अभिनव पाण्डव’ के द्वितीय संस्करण के लिए उसकी भूमिका लिखकर मैंने कुछ दिन पूर्व ही प्रकाशक को दी है, उसी के साथ प्रकाशित ‘राधामाधव’ की भी तेज़ी से बिक्री हो रही है और दो वर्ष पूर्व प्रकाशित खण्डकाव्य ‘वक्रतुण्ड’का संस्करण भी प्रकाशक की सूचना के अनुसार मात्र तीस प्रतियाँ रहते समाप्त हो गया है! कॉपीराइट का अनुबंध न होता तो इन या पूर्व की अनेक पुस्तकों से मुझे वह पैसा न मिलता जो भले ही बहुत अधिक न रहा हो, मगर परिवार के यत्किंचित काम तो आ सका। इस तरह की बातें भ्रम पैदा करती हैं। जब विद्वानों की यह हालत है तो दूसरों से क्या अपेक्षा की जाय? हमारी इसी कमज़ोरी का लाभ हिंदी के प्रकाशक उठाते हैं जिस पर विस्तार से फिर कभी लिखूँगा।


उद्भ्रांत जी 
उद्भ्रांत जी 
साहित्य जगत का एक बहुत ज़रूरी और बड़ा नाम.२००८ के भवानी प्रसाद मिश्र सम्मान से नवाजे जा चुके वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत जी पिछले समय उनकी पुस्तक अस्ति  से भी चर्चा में रहे हैं.उनसे जुड़ी एनी चर्चाएँ यहाँ अपनी माटी वेबपत्रिका में और भी आगे जानकारी के लिहाज से पढ़ी जा सकती है.संपर्क सूत्र--बी-463, केन्द्रीय विहार,सेक्टर-51,नोएडा-201303,मोबाइल: 09818854678


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