कमायचा भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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कमायचा भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है

भीयांढ़ और कमायचा
बाड़मेर जिले के एक दूसरे गाँव भीयांढ़ चलते हैं मेरे लिए ये गाँव महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यहाँ रोज़े खां रहते हैं। मांगनियार गायकी के उन चंद लोगों में से एक जो अपनी प्राचीन गायकी के हुनर को अब भी जीवित रखे हुए हैं। उनके घर पर जिस आत्मीयता के साथ मेरा स्वागत हुआ वो शब्द कहाँ बयां कर पाएंगे । थाली में सजे गेहूं के दाने और दीपक के साथ गुड़ जिसका एक छोटा टुकड़ा खिलाकर मेहमान को भीतर ले जाते हैं। उनका घर गाँव के आखिरी सिरे पर था पास में एक तालाब था जो अब पानी का रास्ता देख रहा था और रास्ता तो कई मोर भी देख रहे थे जो रोज़े खां के घर के पास ऐसे घूमते हैं मानो पालतू मुर्गियां हों अगली सुबह हमारी नींद बारिश की बूंदों ने खुलवाई क्योंकि हम छत  पर सो रहे थे।

मेघों से घिरा आसमान ,जहां तक नजर जाये वहां तक फैली मरुभूमि और नीचे ज़मीन पर बादलों के स्वागत में नाचते मोर मैं छत से नीचे ही नहीं जाना चाहता था पर आगे जाना था इसलिए मन मार कर नीचे आया। रोज़े खां के साथ बातों का सिलसिला चल पड़ा और उनके परिवार ने लोक-संगीत का जो रस बरसाया उसे क्या मैं कभी भूल पाऊंगा। गीतों को खड़ताल गति देते हैं तो कमायचा उसमे मरुभूमि का सारा का सारा सौन्दर्य भर देता है कमायचा मांगनियारों का अपना वाद्य है लेकिन इसका पहला सुर ही सुनने वाले को अहसास करा देता है की अब जो रस बरसेगा वो उस सोनारी धरती का होगा जिसे माडधरा कहते हैं।

एक विकल ध्वनि, जो गूंजती है तो प्यास जगाती भी है और प्यास बुझाती भी है। लेकिन ये कमायचा भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा हैं। धीरे-धीरे ये वाद्य लुप्त हो रहा है एक तो इसे बजाने में नयी पीढ़ी की रूचि कम है उस पर अब इसे बनाने वाले भी कम होते जा रहे हैं जो बचे हुए लोग हैं वो कभी कभार बिकने के कारण इसे बनाना छोड़ चुके है इसीलिए अब ये बाज़ार में इतना महंगा बिकता है कि कोई गरीब लोक कलाकार इसे खरीदने का सपना ही देख सकता है। आर्थिक उदारवाद ने हमें जो कुछ दिया उसकी भरपूर कीमत भी वसूली है बाज़ार अब केवल उनके लिए आनंद का अवसर उपलब्ध कराता है जिनकी जेबें ठसाठस भरी हुई हैं बाकी लोगों के लिए तो ये तमाशा बस देखने की चीज़ है। राजस्थानी के मशहूर कवि आइदान सिंह भाटी लिखते हैं। 

           सुरीली सारंगिया 

           कोडीला कमायचा 
           बिकण लागता बीच बाजारां 
           बाज़ार खरीद लीनी वै सारंगियां 
           अर बण गया पारखू 
           मरम समझणियां 
           अजैई मरै भूखां   .


ये सुरीली सारंगियां और कोडीले कमायचे बीच बाज़ार में बिक रहे हैं और बाज़ार ही उन्हें खरीदकर खुद को पारखी  घोषित कर चुका है । असली पारखी जो इनका मरम समझते हैं वो आजकल भूखे मर रहे हैं। ................... मैं ख़त्म होते कमायचे के सुरों में डूबा हुआ सोच रहा था कि बाज़ार के सब कुछ छीनते बेरहम हाथ काश बख्श देते सुरीली सारंगियों को .... कोडीले कमायचों को ..............



              
                                             

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